
बचपन का शोर जवानी की उलझन
और बुढ़ापे का शांत जमाना
देख मालिक एक सावन की
कैसा कैसा रूप निराला
बचपन की एक नाव पुरानी उसपर हम सब खेले थे
और झूलों की रुत सुहानी जिस पर हम सब झूले थे
बाग बगीचे में अदभुत फल का क्या ठिकाना था
हर बरस सावन की चाह का एक ग़जब जमाना था
यौवन में सावन की कजरी और प्रीतम का प्यार
साजन की राह निहारत सजनी करे सृंगार
सब बगिया बीच झूलो का यह ये अद्भुत त्यौहार
हर बरस सावन की खुशियां मिले हमे हर बार
बूढ़ा सावन बचपन को ढूढे...