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2026 ~ Lav Tiwari ( लव तिवारी )

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शनिवार, 13 जून 2026

पंडित जवाहर लाल नेहरू बनाम श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी - लेखक श्री माधव कृष्ण गाज़ीपुर उत्तरप्रदेश

नेहरू बनाम मोदी

निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी नेहरू जी के कार्यकाल से आगे निकल गए। यह बड़ी बात है। इसके लिए उनके राजनैतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता को दाद दी जानी चाहिए।

जनसंघ या भाजपा को वर्षों बाद एक राजनैतिक व्यक्तित्व मिला है जिसे राजनीति की समझ है, जिसने जमीन पर वर्षों कार्य किया है और प्रधानमंत्री पद पर आने से पहले मुख्यमंत्री के रूप में जिसने प्रशासनिक कौशल का परिचय भी दिया है।

देश की सीमाओं की रक्षा, आतंकवादियों को देश की भूमि से दूर रखने, देश को एक कुशल नेतृत्व देने के लिए मैं मोदी जी का प्रशंसक हूं और रहूंगा। देश के डिजिटाइजेशन, आत्मनिर्भरता, धारा ३७० जैसी अनेक निर्णायक नीतियों के कारण वह इतिहास में सम्मिलित हो चुके हैं।

मोदी जी द्वारा अपनी विचारधारा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति खुला प्रेम भी उनकी महानता का द्योतक है अन्यथा शीर्ष पर पहुँचने के बाद अनेक लोग स्टेट्समैन बनने के लोभ में वैचारिक दूरी बनाने लगते हैं। लेकिन आज का विषय कुछ और है।

यह बात तो हुई समय सीमा की, मोदी जी की और उनकी राजनैतिक कुशलता की। लेकिन इस आधार पर प्रधानमंत्री नेहरू जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को कम करके आंकना किसी की भी भूल होगी। वह महामानव थे, इसमें कोई संदेह नहीं।

संघ के विद्यालय में पढ़ने के कारण और पारिवारिक परिवेश के कारण मुझे अपने देश के महापुरुषों पर गर्व है, उनमें अटूट श्रद्धा है। जब कोई नेहरू के के व्यक्तित्व और कृतित्व पर कीचड़ उछालता है तो मुझे पीड़ा होती है।

क्या हम नेहरू जी को छोटा करने लायक पर्याप्त बड़े बन चुके हैं? क्या हम नेहरू जी का अध्ययन कर चुके हैं? क्या उनका इस देश के स्वाधीनता संग्राम में कोई योगदान नहीं है? क्या उन्होंने स्वतंत्रता के बाद इस देश को कुछ नहीं दिया?

नेहरू जी का मूल्यांकन करते समय इन प्रश्नों पर अवश्य विचार होना चाहिए, और अच्छे से विचार होना चाहिए। जब देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा था, और जब यह विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली देश का उपनिवेश था, उस समय नेहरू जी एक समृद्ध परिवार के उत्तराधिकारी थे।

उनका आनंद भवन आज भी उनकी समृद्धि की गाथा गाता है। वह आनंद भवन उनके पिता और पुत्री ने देश को दे देने में जरा भी संकोच नहीं किया। नेहरू जी ने अपने पिता द्वारा इतनी बड़ी संपत्ति कांग्रेस को देने पर कभी विरोध नहीं किया। (परिशिष्ट)

उन्होंने विदेश से पढ़ाई की, सीधे उच्च न्यायालय से प्रैक्टिस शुरू की लेकिन उसी वर्ष १९१२ में उन्होंने अपना जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया। २३ वर्ष की उम्र! और राष्ट्र के लिए यह समर्पण! क्या उनकी देशभक्ति पर प्रश्न उठाना देशभक्ति है?

और हमें यह भी याद रखना होगा कि उस समय की राजनीति आज की तरह सत्ता और धन के लिए नहीं थी। उस समय कांग्रेस में सम्मिलित होने का अर्थ था, जेल आंदोलन अंग्रेजों का विरोध और घर की बर्बादी। और उद्देश्य: एकमात्र देश की स्वाधीनता।

पंडित नेहरू नेता सुभाष चंद्र बोस को अत्यंत प्रिय थे। 1939 के पुनर्निर्वाचन में नेहरू ने बोस का सक्रिय समर्थन नहीं किया, पर वे उनके कट्टर विरोधी भी नहीं थे। उन्होंने चुनाव के बाद कांग्रेस की एकता बनाए रखने और बोस-गांधी समझौते का प्रयास किया। नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने नेहरू ब्रिगेड नाम क्यों रखा था? केवल सतही स्तर पर इतना समझ लेना भी नेहरू और बोस के प्रेम को समझने के लिए पर्याप्त होगा। (परिशिष्ट)

वह पंडित नेहरू ही थे जिन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को सत्ता के केंद्र में रखा। उन्होंने अपनी पुत्री के स्थान पर शास्त्री जी को दीर्घकाल के लिए राजनैतिक संरक्षण और विश्वास दिया, उन्हें प्रांतीय नेता से राष्ट्रीय नेता बनाया। आज हम सबके चहेते प्रधानमंत्री शास्त्री जी नेहरू के कारण उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन गए। (परिशिष्ट)

पंडित नेहरू के प्रति मेरी अटूट श्रद्धा वैसी ही है जैसी किसी और राष्ट्रभक्त महापुरुष के प्रति। यह तो केवल कुछ छोटे उदाहरण हैं जो उनके विषय में फैलायी जा रही सोशल मीडिया भ्रांतियों के विरुद्ध टिककर सोचने के लिए एक आधार देती हैं।

उनकी नीतियों की आलोचना हो सकती है, विशेषकर उनके चीन युद्ध की तैयारियों को लेकर, लेकिन इतिहास का यह मूल्यांकन इतिहास के उस बिंदु पर खड़े रहकर करना होगा। औए मूल्यांकन से कोई अछूता नहीं रहता। लेकिन एक बिंदु किसी के सर्वस्व को नष्ट नहीं कर सकता।

परिशिष्ट:
१. नेहरू परिवार का पुराना घर स्वराज भवन (जो पहले आनंद भवन कहलाता था)। पंडित मोतीलाल नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लगभग 1930 में समर्पित कर दिया था। इसके बाद नए बने घर का नाम आनंद भवन रखा गया। वर्तमान आनंद भवन को बाद में इंदिरा गांधी ने नवंबर 1970 में राष्ट्र को समर्पित किया और इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया।

२. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इंग्लैंड के इनर टेम्पल (Inner Temple) में कानून की पढ़ाई की। वे 1912 में बार-एट-लॉ (Barrister-at-Law) बने और उसी वर्ष भारत लौटकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। सार्वजनिक जीवन (राजनीति) में उनका प्रवेश भी लगभग इसी समय शुरू हो गया। भारत लौटने के बाद वे 1912 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बांकीपुर अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। बाद के वर्षों में उनका राजनीतिक जुड़ाव बढ़ता गया और 1919 के होम रूल आंदोलन तथा 1920 के असहयोग आंदोलन के दौरान वे पूर्णकालिक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे।

३. 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष नेता जी ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया और उसके अध्यक्ष के रूप में नेहरू जी को नियुक्त किया।
1939 में बोस और कांग्रेस नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद हुए, जिसके परिणामस्वरूप बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। इसके बावजूद नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने रहे और समिति का कार्य आगे बढ़ाते रहे। 1939 में नेहरू द्वारा बोस को लिखे पत्रों में भी वे समिति के कार्य का उल्लेख करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे उससे अलग नहीं हुए थे।

४. लाल बहादुर शास्त्री को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र में लाने की प्रक्रिया धीरे-धीरे हुई, लेकिन निर्णायक मोड़ 1951–52 में आया।
1951 में जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) का महासचिव बनाया। शास्त्री ने 1951-52 के पहले आम चुनावों के संगठन और प्रत्याशी चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1952 में, जबकि वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रभावशाली मंत्री थे, नेहरू ने उन्हें राज्य में न रखकर दिल्ली बुलाया और अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल में रेल एवं परिवहन मंत्री बनाया। इसे शास्त्री को राष्ट्रीय नेतृत्व की पंक्ति में लाने का सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
इसके बाद नेहरू ने उन्हें लगातार महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए—रेलवे, परिवहन एवं संचार, वाणिज्य एवं उद्योग, और अंततः गृह मंत्रालय। इससे उनका कद कांग्रेस और सरकार दोनों में बढ़ता गया।
1964 में नेहरू की तबीयत खराब होने पर उन्होंने शास्त्री को बिना विभाग के मंत्री के रूप में फिर मंत्रिमंडल में लाकर अपने निकटतम सहयोगियों में रखा।

५. 1939 के कांग्रेस अध्यक्षीय चुनाव (त्रिपुरी संकट) में नेहरू जी की भूमिका जटिल थी। वे न तो पूरी तरह नेता जी के साथ खड़े हुए, न ही गांधीवादी खेमे के सक्रिय चुनाव-प्रबंधक बने।
५.1. नेहरू ने बोस की उम्मीदवारी का खुला समर्थन नहीं किया। गांधीजी और उनके निकट सहयोगी पट्टाभि सीतारमैया को उम्मीदवार बनाना चाहते थे। नेहरू बोस की कई नीतियों से सहानुभूति रखते थे, लेकिन वे गांधीजी से टकराव के पक्ष में नहीं थे।
५.2. नेहरू गांधी खेमे के साथ रहे, लेकिन बोस-विरोधी अभियान के प्रमुख नेता नहीं बने। कांग्रेस कार्यसमिति के कई सदस्य बोस के पुनर्निर्वाचन के विरुद्ध सक्रिय थे, जबकि नेहरू अपेक्षाकृत मध्यस्थ भूमिका में रहे।
५.3. बोस की जीत के बाद नेहरू ने समझौता कराने का प्रयास किया। जब बोस चुनाव जीत गए और कांग्रेस में संकट गहरा गया, तब नेहरू ने दोनों पक्षों के बीच मेल-मिलाप की कोशिश की। बाद में उन्होंने बोस से इस्तीफा वापस लेने की अपील भी की थी।
५.4. नेहरू बोस की कुछ बातों से सहमत थे, पर उनकी रणनीति से नहीं। दोनों समाजवादी झुकाव रखते थे, लेकिन यूरोप की परिस्थितियों, कांग्रेस संगठन और स्वतंत्रता संघर्ष की रणनीति पर उनके मतभेद थे।
संक्षेप में, 1939 के पुनर्निर्वाचन में नेहरू ने बोस का सक्रिय समर्थन नहीं किया, पर वे उनके कट्टर विरोधी भी नहीं थे। उन्होंने चुनाव के बाद कांग्रेस की एकता बनाए रखने और बोस-गांधी समझौते का प्रयास किया।

६. 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष Subhas Chandra Bose ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया और उसके अध्यक्ष के रूप में नेहरू जी को नियुक्त किया।
1939 में बोस और कांग्रेस नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद हुए, जिसके परिणामस्वरूप बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
इसके बावजूद नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने रहे और समिति का कार्य आगे बढ़ाते रहे। 1939 में नेहरू द्वारा बोस को लिखे पत्रों में भी वे समिति के कार्य का उल्लेख करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे उससे अलग नहीं हुए थे।

माधव कृष्ण, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल


सक्षमता पास शिक्षकों को भी CTET/ TET पास करना जरूरी सुप्रीम कोर्ट

सक्षमता पास शिक्षकों को भी CTET/ TET पास करना जरूरी ।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश ।

अब शिक्षकों को नौकरी बचाने के लिए सीटीईटी या टीईटी पास करना जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर उनकी नौकरी खत्म हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी शिक्षकों सीटीईटी या टीईटी पास करने का निर्देश दिया है। बिहार के लगभग 2.60 लाख शिक्षक इस वक्त 'रडार' पर हैं, जिन्होंने अब तक ये दोनों परीक्षाएं पास नहीं की हैं।

जिन शिक्षकों की उम्र 55 वर्ष से अधिक है, उन्हें नौकरी से तो नहीं निकाला जाएगा, लेकिन उनकी तरक्की के रास्ते बंद हो जाएंगे। बिहार के ऐसे 60 हजार शिक्षकों को न तो प्रधानाध्यापक बनने का मौका मिलेगा और न ही अनुभव का लाभ। उन्हें नौकरी बचाने के लिए मिली छूट उनके करियर की ग्रोथ को फ्रीज कर देगी। 15 वर्ष पहले ही शिक्षकों के लिए टीईटी और सीटीईटी परीक्षा की वैधता अनिवार्य कर दिया गया था। 29 जुलाई 2011 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने स्पष्ट किया था कि सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को टीईटी पास करना अनिवार्य है। यह शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता है। इसके बाद विभिन्न राज्यों में टीईटी के साथ ही सीटीईटी की परीक्षा शुरु की गई थी। टीईटी परीक्षा पास होने के बाद अभ्यर्थी केवल अपने स्कूल में ही नियुक्त युक्त हो सकते है। जबकि, सीटीईटी परीक्षा पास होने के बाद वे देश के सभी सरकारी स्कूलों में नियुक्त हो सकते है। सीटीईटी परीक्षा पास होने के बाद अभ्यर्थी अपने राज्यों में स्थित सरकारी स्कूलों के साथ ही केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, दिल्ली स्कूल सहित अन्य स्कूलों में नियुक्ति हो सकती है। शिक्षा मंत्री ने साफ किया है कि नियुक्तियां नियमों के मुताबिक ही होंगी। दूसरी तरफ, बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के सचिव आनंद मिश्रा ने इसे गलत ठहराया है। उनका कहना है कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर नए नियम थोपना अन्याय है।

सिर्फ 3 मौके, 2028 आखिरी डेडलाइन

शिक्षकों के पास खुद को साबित करने के लिए अब बहुत कम समय बचा है। सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त 2028 तक का अल्टीमेटम दिया है। बिहार में अपनी टीईटी परीक्षा नहीं होने के कारण शिक्षकों के पास अब केवल सीटीईटी का ही विकल्प है। साल 2025 की परीक्षा का मौका हाथ से निकल चुका है, अब 2027 और 2028 के रूप में तीन मौके ही शेष हैं।

कुल शिक्षकः 5.80 लाख संकट मेंः 2.60 लाख बुजुर्गः 60 हजार प्रमोशन पर रोक
स्तोत्र समाचार पत्र




शुक्रवार, 12 जून 2026

मासूम भांजे का गला रेतने वाले जल्लाद मामा को फांसी- जज शक्ति सिंह जी

गाजीपुर कोर्ट में जज शक्ति सिंह जी की चर्चा हर तरह लोग यही बोल रहे है जज हो तो शक्ति सिंह जी जैसा👇
गाजीपुर कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मासूम भांजे का गला रेतने वाले जल्लाद मामा को फांसी, जज ने तोड़ी पेन की निब!

अदालत में पूछा गया- "छोड़ दिया तो क्या करोगे?"... हत्यारे ने कहा- "जो उलझेगा, उसे भी मार दूंगा", फिर सुनाई गई मौत की सजा

गाजीपुर। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की अदालत ने चार वर्षीय मासूम दानियाल उर्फ अदनान की निर्मम हत्या के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दोषी मामा *अमजद खान* को फांसी की सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश शक्ति सिंह की अदालत ने इस जघन्य अपराध को "दुर्लभतम से दुर्लभ" श्रेणी का मानते हुए दोषी को मौत की सजा दी। फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश ने परंपरा के अनुसार अपने पेन की निब भी तोड़ दी।

कोर्ट में दिखी हैवानियत, नहीं था कोई पछतावा

सजा सुनाए जाने से पहले अदालत ने दोषी अमजद खान से पूछा कि यदि उसे छोड़ दिया जाए तो वह क्या करेगा। इस पर उसने निर्भीकता से जवाब दिया, "अगर कोई मुझसे उलझेगा तो मैं उसकी भी हत्या कर दूंगा।"

जब अदालत ने पूछा कि क्या उसे अपने किए पर पछतावा है, तो उसने साफ शब्दों में कहा, *"बिल्कुल नहीं।"* दोषी के इस रवैये को देखते हुए अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई और आदेश दिया कि उसे तब तक फांसी पर लटकाया जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।

मामूली विवाद में मासूम की ले ली थी जान

यह हृदयविदारक घटना 21 अक्टूबर 2021 को दिलदारनगर क्षेत्र के बारा गांव में हुई थी। चार वर्षीय दानियाल अपनी मां शबाना नाज के साथ ननिहाल आया हुआ था। इसी दौरान किसी बात को लेकर शबाना और उसके भाई अमजद खान के बीच विवाद हो गया।

गुस्से में आगबबूला अमजद ने अपने ही सगे भांजे पर धारदार चाकू से हमला कर उसका गला रेत दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मासूम का सिर गर्दन से मात्र कुछ इंच ही जुड़ा रह गया था। मां ने अपनी आंखों के सामने बेटे को तड़पते हुए दम तोड़ते देखा।

सगे भाई-बहनों की गवाही बनी सबसे बड़ा सबूत

घटना के बाद मृतक के चाचा अरबाज खान ने हत्या का मुकदमा दर्ज कराया। सुनवाई के दौरान कुल 9 गवाहों ने अदालत में बयान दिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि आरोपी की तीन सगी बहनों और एक सगे भाई ने भी न्याय के पक्ष में खड़े होकर उसके खिलाफ गवाही दी।

इन्हीं मजबूत साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर अदालत ने अमजद खान को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई।

जज बोले- क्रूरता की सारी हदें पार हो गईं

फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश शक्ति सिंह ने कहा कि चार साल का बच्चा दुनिया की भलाई और बुराई से पूरी तरह अनजान था। उसके साथ जो हुआ वह अमानवीयता और क्रूरता की पराकाष्ठा है। एक मां के सामने उसके बच्चे की हत्या कर दी गई, जिसका दर्द शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

इकलौते बेटे को याद कर रो पड़ा पिता

फैसले के बाद दानियाल के पिता भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि दो बेटियों के बीच दानियाल उनका इकलौता बेटा था और उसकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने बताया कि बाद में उनके घर एक और बेटे का जन्म हुआ, लेकिन दानियाल की याद आज भी उन्हें हर पल रुलाती है।

अदालत के इस फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने राहत की सांस ली है और इसे न्याय की बड़ी जीत बताया है।


गुरुवार, 11 जून 2026

बेसिक शिक्षा विभाग अब बड़े स्तर पर परिषदीय विद्यालयों में 60000 शिक्षकों की भर्ती की तैयारी


उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग का ई-अधियाचन पोर्टल क्रियाशील होने के बाद राज्य में शिक्षक भर्ती प्रक्रिया तेज हो गई है। बेसिक शिक्षा विभाग अब बड़े स्तर पर परिषदीय विद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती की तैयारी में जुट गया है। विभाग के अनुसार, विभिन्न विद्यालयों में कुल करीब 60,000 पद रिक्त हैं, जिनमें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्र शामिल हैं।

इनमें से नगर क्षेत्र के विद्यालयों में 11,508 पद खाली हैं, जिनकी समेकित जानकारी आयोग को ऑफलाइन भेज दी गई है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 48,000 पद रिक्त बताए जा रहे हैं, जिनका विवरण तैयार कर ऑनलाइन पोर्टल पर भेजने की प्रक्रिया चल रही है।

गौरतलब है कि शिक्षा सेवा चयन आयोग पहली बार परिषदीय शिक्षकों की भर्ती परीक्षा आयोजित करेगा। इससे पहले यह जिम्मेदारी परीक्षा नियामक प्राधिकारी (PNP) के पास थी। अब नई व्यवस्था के तहत भर्ती प्रक्रिया को और पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने की तैयारी की जा रही है।

विभाग रिक्त पदों का पूरा डेटा तैयार कर रहा है और नियमावली में भी संशोधन किया जा रहा है। जैसे ही सभी अधियाचन ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड होंगे, भर्ती प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ाई जाएगी।

कुल मिलाकर यह भर्ती प्रदेश के हजारों अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ा अवसर मानी जा रही है, खासकर उन उम्मीदवारों के लिए जो लंबे समय से शिक्षक भर्ती का इंतजार कर रहे हैं।

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शुक्रवार, 5 जून 2026

आने वाले समय में बहुत सारी लड़कियां शादी नहीं करेगी..।

आने वाले समय में बहुत सारी लड़कियां शादी नहीं करेगी..। 

यहां की शादी व्यवस्था वो नरक है जिसमें पढ़ा लिखा कर अपनी जवान बेटी दूसरों के घर दो और बहुत सारा पैसा भी दो..! 

लड़की कमाती है तो भी, नहीं कमाती है तो भी...! कितना बकवास सिस्टम है ये..।

बेटियों को जिस दिन पिता की संपत्ति में बराबर का हक़ मिलने लग जायेगा ( धरातल पर, सिर्फ कानून में नहीं) उस दिन ऐसे लड़कियों का मरना बंद हो जाएगा..। 

अपने बाप के घर वापिस जाने पर उसे ये नहीं लगेगा कि भाई भाभी या समाज क्या कहेगा..! 
उसे पता होगा अपने हिस्से के घर जा रही हूं वापिस..! 
उस दिन वो अपने बाप भाई का वेट भी नहीं करेगी कि वो लेने आए ससुराल से तब ही जाऊंगी...! 
नहीं रखा ससुराल या पति ने ढंग से तो खुद ही चली जाएगी..! 

ये हत्या/ आत्महत्याएं इसलिए हो रही है कि लड़कियों के पास लौटकर जाने को घर नहीं है..। 
पति चाहेगा तो ही ससुराल रह सकती है, उधर पिता माता चाहेंगे तो ही मायके रह सकती है..। खुद का चाहना कुछ है ही नहीं..। 

लड़की का घर होना सबसे ज्यादा जरूरी है..। अभी हम यहीं तक पहुंच पाए है कि लड़कियों को पढ़ा दे, नौकरी करने दे..। अभी बहुत जरूरी जो है वो ये कि उनका घर भी हो..। पिता से मिला घर (घर में हिस्सा)..। जैसे लड़कों को मिलता है..। 

लड़कों को कभी इस समस्या से नहीं  गुजरना पड़ता कि किसी और के घर जाना है, अपने फ्रेंड्स, कंफर्ट जॉन, पेरेंट्स , सिबलिंग्स......सब छोड़कर..। 
इसमें लड़कों का दोष नहीं, व्यवस्था का है..। 

इस व्यवस्था में वही लड़कियां कामयाब हो रही जिनको रणनीति आती हैं, इस सिस्टम में एडजस्ट होने की, या लाभ लेने की..। जिनकी संख्या बहुत कम हैं..। 

साधारण लड़कियों को वर्षों लग जाते नए घर, लोगों के बीच एडजस्ट होने में..। 

" पहले परिवार छोड़ना पड़ेगा, फिर फ्रेंड्स फिर करियर कॉम्प्रोमाइज और फिर मदरहुड... इतने चैलेंज के बाद कोई इंसान,  कितना ही ओरिजिनल पर्सनेलिटी में जी पाएगा..  ये सब समझ पाने के लिए ही फेमिनिज्म की जरूरत है..। "


मंगलवार, 12 मई 2026

मेरी माँ मेरा बचपन मेरा सामाजिक जीवन मेरा साहित्यिक संसार मेरी एक दुनियां एवं मेरे जीवन के विविध आयाम - लेखक राजेश श्रेयस

मेरी माँ....मेरा बचपन....मेरा सामाजिक जीवन..मेरा साहित्यिक संसार.. मेरी एक दुनियां एवं मेरे जीवन के विविध आयाम ।
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साहित्य और अध्यात्म की बेल कहीं न कहीं से मेरे मन में, मेरी माँ के द्वारा ही विरोपित की गई थी । उनकी ( माँ ) यह अभिरुचि कब मेरी अभिरुचि बन गई यह नहीं कह सकता लेकिन मैंने बचपन मे अपने माँ के सानिध्य में रहते हुए इस चीज को तो अवश्य महसूस किया था कि पढ़ना,आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होना और उसके अनुरूप अपने जीवन में उसे उतारना, हमारे संस्कारों की यात्रा है । जहाँ तक मैं जब इस वीडियो को आपको दिखा रहा था तो वीतराग महात्मा श्री श्री 1008 श्री स्वामी स्वतंत्रतानंद जी महाराज द्वारा रचित तत्वदर्शनी गीता टीका की पवित्र पुस्तक मेरे हाथ में थी और मैं जो बात मै कर रहा था और जिस श्री सूर्य नारायण सिंह की बात कर रहा था, वह कोई और नहीं थे, वे मेरे नाना जी थे और मेरे नाना जी के संस्कार और उनकी रुचि और उनके जीवन जीने की शैली इस सब का प्रभाव मेरी माँ पर पड़ा और माँ के बाद शायद मुझे लगता है कि ये सारी चीजे इस तरह से नीचे उतर कर चली आयीं । मेरा बचपन माँ के साथ बीता तो मुझे लगता है कि जो कुछ भी मैं आज लिखता हूँ या अपनी कलम चलाता हूँ तो उस साहित्य में आध्यात्मिक पुट और अध्यात्मिक दर्शन जो दर्शन होते हैं,वह सब बचपन में माँ के सानिध्य में उसके द्वारा पढ़े गए गीतों, भजन, श्रीमद् भागवत गीता के प्रति उसकी आकर्षण रामायण, नारी कल्याण, श्री रामचरितमानस, श्री राधेश्याम रामायण आदि का वाचन यह सब कुछ, मुझे अपने माँ से मिला। आज संयोग से मातृ दिवस है मातृ दिवस के इस अवसर पर मैं अपनी पूज्यनीया मां को प्रणाम करता हूँ ।
एक वार्ता के दौरान डॉ.शिवम तिवारी ने जब मुझसे पूछा , या एक लंबी प्रश्नावली के माध्यम से मेरे मार्गदर्शक साहित्यिक प्रेरणा स्रोत डॉ. महेश दिवाकर जी ने जब यह जानना चाहा था कि मेरे अंदर यह साहित्य कहाँ से आया, तो मैंने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि आज मेरा साहित्य जो कुछ भी है वह मेरी माँ के कारण ही है। यह मेरी माँ में कहां से आया तो वह उसका पूरा श्रेय मेरे नाना जी तक जाता है । मेरा ननिहाल उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया के तहसील रुद्रपुर के सन्नीकट ग्राम अकटहा में है , जो श्रीनेत वंशीय ( सूर्यवंशी) क्षत्रियों का गांव है।
मेरा जन्म संवरा बलिया में हुआ जहाँ हमारी पारिवारिक विरासत थी । यहां पर खेती-बारी, अध्ययन अध्यापन, के साथ-साथ कुश्ती पहलवानी या फिर सामाजिक रूप से अपने रुतबे को एक ऐसे आदर्श के रूप में रखने की परंपरा थी, जिसकी सुगंध कोसों तक जाए। यानि परिवार का संस्कार इतना उच्च हो कि उसे और उस परिवार को कई कोसो तक लोग जाने । कुछ ऐसी ही परंपरा का परिवार मेरे गांव का परिवार था । मेरे बाबाजी और विशेष रूप से मेरे छोटे चाचा जी श्री उदय शंकर सिंह जो हमारे गांव संवरा के अट्ठारह वर्षो तक प्रधान रहे, उनकी जीवन शैली और उनके कार्य करने की पद्धति और मेरे ननिहाल पक्ष की संस्कृति कुछ अलग थी।

इन दोनों संस्कारों और संस्कृतियों का प्रभाव मैं कहीं न कहीं अपने जीवन में पाता हूँ । मेरे भीतर जो सामाजिकता है वह मुझे मेरे परिवार यानी मेरे पिताजी के पक्ष से मिला, जहां हर छोटे बड़े तबके के लोगों के साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हुए सब की भावनाओं का आदर करते हुए, सब के दुख सुख में भागीदारी करते हुए, अपने को स्थापित किया जाता है यह सब मुझे अपने पितृ पक्ष यानी अपने पिताजी के परिवार से मिला, पूर्वजों के समय में शायद हमारे परिवार में एक मलिकार बाबा होते थे उनके पास ऐसे संस्कार थे और फिर यदि अपनी पीढ़ी में कहें तो मुझे थोड़ा बहुत जो सीखने को मिला यह मुझे मेरे अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला।

यदि मैं बौद्धिक ज्ञान की बात करूं तो बौद्धिक ज्ञान मुझे अपने चाचा श्री शिवशंकर सिंह श्री शिवजी सिंह से मिला और सामाजिक ज्ञान अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह से मिला । मेरे छोटे चाचा श्री उदयशंकर सिंह जी जैसा व्यक्तित्व का व्यक्ति बिरले,ही पैदा होते हैं यह मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूं ।

 अपने परिवार के दो संस्कारों की अगर बात करे तो हमारा परिवार में जो कि एक कलचुरी बंशीय क्षत्रिय परिवार है, इसमें आदर करने का भाव जबरदस्त था । हमारे परिवार में ब्राह्मण के प्रति बहुत सम्मान था और ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय होते थे। हमें ब्राह्मण का कितना सम्मान करना चाहिए, किस प्रकार करना चाहिए इसका ज्ञान मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जी से मिला। यही कारण है कि मेरे मन में भी ब्राह्मण एवं गुरुजनों के प्रति असीम स्नेह है ।

 होली जैसे त्योहारों पर पंडित जी को आदर के साथ अपने घर बुलाना, उन्हें बैठना, उनको प्रसाद ग्रहण कराना और फिर उनको विदा करना, ये सारे संस्कार, मेरे चाचा शिवजी सिंह से मिले थे।
 वही समाज के हर एक वर्ग के प्रति चिंता करना, उनके दुख दर्द को महसूस करना,उनकी मदद करना, हर छोटे -बड़े गरीब अमीर के घर जाना,जाति बिरादरी के विभेद से दूर होकर, सबकी मदद करना, और सबका प्रिय होना, यह सामाजिक ज्ञान मुझे अपने सबसे छोटे जैसा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला ।
 उनके आहाते में कौन व्यक्ति कहाँ का है,  किस बिरादरी का है, किस गांव का है,कितने लोग बैठे हुए हैं,यह समझ पाना और सबको एक साथ, लेकर चलना उनसे सीखा जा सकता था। 
 छोटी-छोटी गतिविधियों और क्रियाकलाप हमारे संस्कारों को परिवार को श्रेष्ठता प्रदान करती है । उदाहरण  स्वरूप, मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जब रोड से घर की तरफ चलते थे तो उस समय उनके पाकेट में कुछ चॉकलेट,कुछ सिक्के हुआ करते थे । गाँव छोटे-छोटे बच्चे जो छोटे -छोते घरों से, हर तपके के लोगों के बच्चे होते थे जिनकी उम्र यही 2 साल 3 साल 4 साल 5 साल 6 साल होती थी वह उनके पास आते थे,  उनको पैर छु कर प्रणाम करते थे, वे उनको एक टॉफी देते थे, या पैसे पढ़ते थे या आशीर्वाद दे देते थे । वे सबसे मिलते हुए चलते थे ।इस प्रकार वे बच्चों के भी लोकप्रिय थे ।

 गांव के किसी भी जाति बिरादरी उच्च नीच,अमीर गरीब किसी के घर में जब शादी होती थी तो शादी में  बेटी के अंतिम सिंदूरदान तक रुकना, सारे  ब्राह्मणजन और पौनी जन को दक्षिण दिलाना, बाहर से आए हुए किसी भी जाति बिरादरी के बाराती को बराती से ज्यादा अपने गांव का अतिथि समझ कर सम्मान देना,   मेरे चाचा की सबसे बड़ी विशेषता होती थी ।
 वहीं मेरे छोटे चाचा की मदद का तरीका कुछ और होता था किस रूप में शारीरिक या आर्थिक रूप से, कहां और कैसा मदद कर रहे हैं, यह कोई जान नहीं पता था लेकिन मदद तो करते थे, यही कारण था कि यह सारे लोग उनके मुरीद हो जाते थे । हर जाति और वर्ग के लोगो का प्रेम कैसे पाया जाता है, कोई उनसे सीखे ।

 शायद मेरे जीवन में भी इसका बड़ा प्रभाव रहा जब तक मैं जनपद बलिया में रहा हर छोटे-बड़े के दुख सुख में जाना और कौन बीमार है, किसको दवा की जरूरत,है किसको क्या मदद की जा सकती है,यह सब कुछ संस्कार मुझे मेरे अपने परिवार से ही मिला है ।अपने चाचा और अपने परिवार के इन्हीं संस्कारों का प्रभाव शायद मेरे व्यक्तित्व पर पड़ा होगा इसीलिए मैं मेरे मन में प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समाज के हर एक व्यक्ति के प्रति विशेष प्रेम अनुराग आज भी है । यदि मैं बहुत नजदीक जाकर अपने व्यक्तिगत जीवन को देखूं तो मेरे जीवन में मेरे भाई श्री चंदेश्वर प्रताप सिंह जिन्हें मैं पिता तुल्य मानता हूं उनका अपरोक्ष सहयोग सदैव मिला । वह मेरे लिए ध्वज दंड के स्वरूप है । जिस प्रकार एक दंड ( डंडा ) ध्वज के भीतर छिपा रहता है, ध्वज फहरता है । लेकिन वह ध्वज कहीं न कहीं उस दंड के सहारे ही फहरता है । 

 यदि सामाजिक प्रतिष्ठा की बात करें तो उम्र कम होने के बावजूद भी गांव के इर्द-गिर्द के सम्मानित लोगों के बीच बैठना,  उनसे बात करना, उनके प्रति अपने मन के आदर भाव को प्रदर्शित करना मेरा व्यक्तिगत स्वभाव होता था । आसपास के गांव के सम्मानित जान जिनकी उम्र मुझे काफी अधिक हुआ करती थी लेकिन वह भी हमसे बहुत प्रेम करते थे और हमारे मन में उनके प्रति बहुत आदर था । 

 विभाग और विभाग से जुड़े हुए लोग मुझसे बहुत प्रिय प्रेम करते थे। यह नहीं की जो फार्मासिस्ट है वही प्रेम करें, स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति बहुत स्नेह करता था । बलिया से स्वास्थ्य विभाग का कोई अधिकारी कर्मचारी कोई व्यक्ति जिसकी गाड़ी लखनऊ की तरफ, रसड़ा की तरफ या अन्य किसी तरफ जा रही हो और रास्ते में यदि संवरा चट्टी आ गई तो वह गाडी रुकती थी, वे लोग हमारे गांव की दुकान पर चाय पीते थे, और कहते थे कि यह किसका गांव है यह राजेश सिंह का गांव है । मैं उसे वक्त रहूं या ना रहूं श्याम लाल की दुकान तो रहेगी न,  धूमन तो रहेंगे न। यह सब कहीं ना कहीं मुझे समाज से जोड़ता था । मेरे नामौजूदगी में  बड़े भैया डॉक्टर शमशेर सिंह और मेरे और दूसरे भाई श्री कमलेश्वर प्रताप सिंह ( मुन्नू भईया,) जो अब इस दुनिया में नहीं रहे वे बिना कुछ समझे,केवल यह जान जाते थे कि मेरा परिचित कोई आ रहा है तो उसको वही आव भगत मिलता था जो मेरे रहने पर मिलता था । इस कार्य को मेरे भतीजे.डा पंकज कुमार सिंह, आज भी बाखूबी निभाते हैं।
 मुझे एक वाकया याद है एक बार श्री बीपी मिश्रा जी और मेरे यूनियन के महासचिव डा. के के सचान,बलिया एक दौरे पर जा रहे थे और मैं लखनऊ में था मैंने उनसे कहा कि बीच में मेरा गांव पड़ता है आप वहां रुक सकते हैं । वे लोग वहां रुके, और जिस प्रकार का आदर्श सम्मान उनको मिला उसकी चर्चा वे बाद तक करते रहे ।

 अभी विगत दिनों में गांव गया था और मैंने अपने गाड़ी का खलीलपुर की तरफ मोड़ दिया मेरी इच्छा थी कि उस पीढ़ी को जिस पीढ़ी के साथ हमने बहुत सीखा था, जिनमें से बहुत थोड़े लोग आज भी है उनसे मिलना और उनसे मिलकर बात करना मुझे अच्छा लगता है । मैं खलीलपुर पहुंच गया खलीलपुर के प्रधान जी श्री रमाशंकर सिंह जी घर पर थे गौरीशंकर सिंह जी से मुलाकात नहीं हो पायी । परिवार के बच्चे हमारे कुल पुरोहित चौबे जी, और परिवारजन वहां मौजूद थे, वास्तव बड़ी सुखद अनुभूति हो रही थी ।  या तो हमारे पिता पक्ष का प्रभाव था ।
 दूसरा पक्ष, मेरे ननिहाल पक्ष का है जहां पर शिक्षा, जीवन शैली, पहनावा वेशभूषा, बात करने की तौर तरीके, सब कुछ कहीं ना कहीं भिन्न थे, लेकिन यह सारे गुण मेरे भी अंदर कहीं न कहीं वहीं से आए । सबसे खास और विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष तो ननिहाल से ही आया। यानी मेरे साहित्य के पीछे कहीं न कहीं   मेरे ननिहाल पक्ष मेरे मेरे नाना जी का प्रभाव है ।

 आज वर्तमान में मैं जिस जिंदगी को जी रहा हूं या अपनी सेवा अवधि जहां समाप्त करने के मोड पर खड़ा हूं , यहां दो प्रकार के व्यक्तियों का समावेश रहा । दो प्रकार के बौद्धिक साथियों का साथ रहा जिसमें एक वर्ग फार्मासिस्ट है । राजकीय सेवा में आने के बाद में डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन से जुड़ गया और जनपद इकाई बलिया के डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन का अध्यक्ष 12 वर्षों तक रहा, प्रदेश उपाध्यक्ष रहा, प्रदेश संगठन मंत्री रहा।   आप इसे समझ सकते हैं कि फार्मासिस्टों के बीच मेरी पकड़, उनके साथ मेरा बात- व्यवहार किस हद तक कितना  था और वे लोग कितने मेरे प्रिय थे,यह मेरा दिल ही समझता है।  
 यद्यपि आजकल मैं  उस दिशा में उतना सक्रिय नहीं हूँ, यह यू कहिए कि मैं संगठन अभी काफी दूर हूँ और साहित्य एवं क्षय उन्मूलन प्रोग्राम के नजदीक हूँ । ऐसे में स्वाभाविक सी बात है कि क्षय उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े हुए मेरे प्यारे साथियों का सहयोग मुझे मिलता है उनसे बात करता हूँ साथ ही साथ साहित्य दुनिया से जुड़े हुए लोग भी मेरे मित्र हैं।  
 यदि मैं उत्तर प्रदेश की टीबी ड्रग टीम की बात करूं तो ड्रग टीम के जो जनपदों के साथी हैं, वह मेरे लिए कोई हमारे सरकारी विभाग में काम करने वाले साथियों के साथ जो संबंध है उसके कारण नहीं है।  उनके साथ मेरे संबंध आत्मिक एवं पारिवारिक संबंधों जैसे संबंध है ।  पिता पुत्र, भाई-भाई, मित्र जैसे संबंध है। जिसका कारण यह है कि वह मुझसे बात करना चाहते हैं,मैं उनसे बात करना चाहता हूं,वह मुझे देखना चाहते हैं,मै उनको देखना चाहता हूं,  वह मेरे पास रहना पसंद करते हैं, मुझे सुनना पसंद करते हैं यही सब सामाजिकता है । यही सब चीज आती तक याद की जाएगी सेवानिवृत्ति के बाद भी मेरे जेहन में बनी रहेगी मेरे साहित्य में बनी रहेगी मेरे कलम के साथ चलती रहेगी ।
 यदि मैं साहित्यिक दुनिया की बात करूँ तो साहित्य में श्री रामदेव धुरंधर जी जैसे अनेकों ऐसे साहित्यकार मेरे जीवन में आए जिन्होंने मुझे साहित्यिक कलम पकड़ा दी और आज जो कुछ भी लिख रहा हूँ या यह कहिए कि इस आलेख को ही यदि लिख रहा हूं तो इसके पीछे इन बड़े साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका है । इनकी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि मैं सबका नाम नहीं ले सकता, लेकिन मेरी कृतज्ञता उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में आधार है, जिन्होंने मुझे साहित्य ज्ञान एवं संबल प्रदान किया । 
 इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि विविध आयामों के साथ मेरी एक दुनिया है। जो अत्यंत दिव्य, भव्य और चीरकाल तक याद रखने वाली, दुनिया है।

सादर
©® राजेश श्रेयस


शनिवार, 9 मई 2026

माँ के होने का मतलब - लेखक डॉ अक्षय पाण्डेय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

माँ के होने का मतलब
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दिनभर की भाग-दौड़ के बाद जब मन अपने भीतर के किसी शांत कोने की तलाश में भटकता है, तभी अचानक स्क्रीन पर एक तस्वीर उभर आती है- सोशल मीडिया की असंख्य सूचनाओं के बीच ठहरी हुई, पर भीतर गहरे तक उतर जाने वाली। पानी के अथाह विस्तार में एक माँ अपने बच्चे को बाँहों में भींचे हुए है। दोनों के शरीर पर लाइफ जैकेट है, मानो जीवन को बचाए रखने का अंतिम भरोसा। लेकिन उस दृश्य में सबसे अधिक प्रभावशाली जो है, वह यह कृत्रिम सुरक्षा नहीं, बल्कि वह आलिंगन है, माँ का वह अंतिम, अटूट, निरुपाय और फिर भी अदम्य आलिंगन।
पहली दृष्टि में यह एक दुर्घटना का दृश्य है, एक खबर, एक त्रासदी, जिसे लोग साझा कर रहे हैं, उस पर अपने शब्दों की श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे उस तस्वीर पर दृष्टि गहराती है, वह केवल एक घटना नहीं रह जाती; वह एक भाव-दर्शन में बदल जाती है। वहाँ कोई शोर नहीं है, कोई संवाद नहीं, कोई नाटकीयता नहीं, केवल एक माँ है, जो अपने बच्चे को ऐसे थामे हुए है, जैसे वह उसे जीवन के अंतिम किनारे तक पहुँचाना चाहती हो, भले ही स्वयं उस पार न जा सके। कितनी विचित्र विडंबना है- लाइफ जैकेट, जो जीवन बचाने का प्रतीक है, वही उस दृश्य में एक मौन प्रश्न बनकर खड़ी है। वह कहती है कि मनुष्य ने अपने लिए कितनी व्यवस्थाएँ कर ली हैं, कितने साधन जुटा लिए हैं, पर जीवन के सबसे निर्णायक क्षणों में जो सबसे बड़ा सहारा होता है, वह किसी उपकरण का नहीं, बल्कि एक भावना का होता है।और वह है माँ का प्रेम। वह प्रेम, जो किसी तकनीक से नहीं उपजता, किसी प्रशिक्षण से नहीं आता, बल्कि अस्तित्व की जड़ों में रचा-बसा होता है।
कल्पना कीजिए उस क्षण की, चारों ओर पानी का अनंत फैलाव, साँसों का टूटता हुआ क्रम, देह की सीमाएँ धीरे-धीरे जवाब देती हुईं। ऐसे में मनुष्य का स्वभाव है कि वह स्वयं को बचाने की चेष्टा करे। पर यहाँ एक माँ है, जो अपने अस्तित्व के अंतिम क्षण में भी स्वयं को नहीं, अपने बच्चे को प्राथमिकता देती है। उसकी बाँहें उस बच्चे के चारों ओर इस तरह कस जाती हैं, जैसे वह अपने भीतर की सारी शक्ति, सारी ऊष्मा, सारी चेतना उसी में स्थानांतरित कर देना चाहती हो। यह दृश्य केवल करुणा का नहीं, बल्कि विस्मय का भी है। क्योंकि यह हमें उस मूल सत्य के सामने खड़ा कर देता है, जिसे हम जानते तो हैं, पर अक्सर उसकी गहराई को समझ नहीं पाते; माँ का प्रेम स्वाभाविक नहीं, अलौकिक है। वह प्रकृति का एक ऐसा रहस्य है, जिसमें त्याग सहज हो जाता है, समर्पण स्वभाव बन जाता है, और 'मैं' का अस्तित्व 'तुम' में विलीन हो जाता है।
लोग उस तस्वीर को साझा कर रहे हैं- कोई लिखता है 'सलाम इस माँ को', कोई कहता है 'माँ महान है', कोई भावुक होकर आँसू की इमोजी लगा देता है। लेकिन क्या सचमुच इतने भर से उस दृश्य को समझा जा सकता है? क्या कुछ शब्द, कुछ वाक्य उस क्षण की गहराई को व्यक्त कर सकते हैं? शायद नहीं। क्योंकि वह क्षण भाषा की सीमा से बाहर है। वह अनुभव का वह प्रदेश है, जहाँ शब्द पहुँचते-पहुँचते थक जाते हैं। उस आलिंगन में एक इतिहास छिपा है,जन्म से लेकर उस अंतिम क्षण तक का इतिहास। वह वही माँ है, जिसने पहली बार उसे अपनी गोद में लिया होगा, उसकी पहली रोने की आवाज़ सुनी होगी, उसके पहले कदमों पर मुस्कुराई होगी, उसके हर दर्द को अपने भीतर महसूस किया होगा। और अब, उसी माँ की बाँहें उस बच्चे को वैसे ही थामे हुए हैं, बस अंतर इतना है कि अब यह आलिंगन विदा का है, एक अंतिम प्रयास का है।
यहाँ मातृत्व केवल एक भाव नहीं, एक तप है; एक निरंतर साधना, जो जीवन के हर मोड़ पर अपने को सिद्ध करती है। माँ अपने बच्चे के लिए जो करती है, वह किसी नियम, किसी कर्तव्य-बोध या किसी सामाजिक अपेक्षा से संचालित नहीं होता। वह एक सहज प्रवाह है, जैसे नदी का जल, जो बिना किसी आग्रह के बहता है, बिना किसी शर्त के देता है। और शायद यही कारण है कि जब ऐसी कोई घटना सामने आती है, तो वह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं रह जाती; वह समूची मानवता के भीतर एक कंपन पैदा कर देती है। हम सब अपने-अपने भीतर उस 'माँ' को याद करने लगते हैं, वह जो हमारे जीवन में है, या थी, या जिसकी स्मृति अब भी हमारे भीतर किसी दीप की तरह जल रही है।
यह तस्वीर हमें एक बार फिर उस मूल सत्य की ओर लौटाती है, जिसे हम अपने व्यस्त जीवन में कहीं पीछे छोड़ आए हैं कि मनुष्य होने का अर्थ केवल जीना नहीं, बल्कि किसी के लिए जीना है। और इस 'किसी' का सबसे शुद्ध, सबसे निस्वार्थ रूप 'माँ' है।
वह माँ, जो अपने बच्चे के लिए हर परिस्थिति में खड़ी रहती है, चाहे वह सुख का समय हो या दुःख का, चाहे वह उपलब्धि का क्षण हो या विफलता का। दुनिया के सारे संबंध समय के साथ बदल सकते हैं, परिस्थितियों के साथ ढल सकते हैं, पर माँ का संबंध एक स्थिर ध्रुव की तरह होता है, अपरिवर्तनीय, अडिग। इसलिए उस तस्वीर को देखकर केवल दुःख ही नहीं होता, एक गहरा सम्मान भी जागता है। वह सम्मान उस शक्ति के लिए है, जो इतनी सहजता से अपने को विसर्जित कर देती है। वह श्रद्धा उस प्रेम के लिए है, जो किसी भी सीमा को स्वीकार नहीं करता- न समय की, न परिस्थिति की, न जीवन और मृत्यु की। और तब, अनायास ही भीतर से पं.हरिराम द्विवेदी विरचित गीत का लोक-स्वर प्रस्फुटित होता-

माई अस केहू नाहीं माई, माई होले,
माई अँखियन में सुख कै ओहाईं होले।

ओकरा ममता मतिन कउनो ममता न बा,
जग में ओकर कतौं कउनो समता न बा,
उ सनेहिया के सीतल जोन्हाई होले।

यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि उस दृश्य का सार है, उस घटना का निष्कर्ष है। यह हमें बताता है कि माँ की तुलना किसी से नहीं की जा सकती, क्योंकि वह तुलना के दायरे से बाहर है। शायद इसीलिए, जब हम ऐसी घटनाओं के बारे में सोचते हैं, तो हमारे भीतर एक अजीब-सी शांति भी उतरती है- एक विश्वास कि इस संसार में अभी भी कुछ ऐसा है, जो शुद्ध है, जो सच्चा है, जो अविनाशी है। और वह है, माँ का प्रेम। वह प्रेम, जो जीवन के हर अंधकार में एक दीपक की तरह जलता है। वह प्रेम, जो हर संकट में एक सहारा बनता है। वह प्रेम, जो अंततः हमें यह सिखाता है कि मनुष्य होने का सबसे बड़ा अर्थ क्या है।
इस तस्वीर में एक माँ हारती हुई नहीं दिखती; वह अपने सबसे बड़े विजय-क्षण में दिखाई देती है, जहाँ उसने अपने अस्तित्व को अपने बच्चे के लिए समर्पित कर दिया। यह हार नहीं, यह प्रेम की पराकाष्ठा है। यह अंत नहीं, यह उस अमरता की शुरुआत है, जो केवल त्याग और ममता से जन्म लेती है। और शायद यही कारण है कि यह तस्वीर केवल एक घटना की स्मृति नहीं बनती, बल्कि एक शाश्वत प्रतीक बन जाती है, उस सत्य का, जिसे हम बार-बार देखते हैं, बार-बार महसूस करते हैं, और हर बार नए सिरे से स्वीकार करते हैं कि सचमुच,
इस दुनिया में माँ से बड़ा कोई नहीं।
०००

माँ के होने का मतलब
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दियाधरी, दरवाज़ा, खिड़की
छप्पर होता है,
माँ के होने का मतलब
पूरा घर होता है ।

चूल्हे से चौकठ तक माँ है
साँस-साँस बिखरी,
उसकी यादें जेठ-तपन में
नीर-भरी गगरी,
सबसे मीठा धरती पर
माँ का स्वर होता है ।

आँचल की छाया को छू ले
ऐसा ताप नहीं,
माँ के मन को माप सके
ऐसा परिमाप नहीं,
माँ की ममता से छोटा
भू-अम्बर होता है ।

ख़ुद रोती पर हमें
हसीं संसार सदा देती,
निराकार सपनों को माँ
आकार सदा देती,
माँ से बड़ा न पीर,औलिया
ईश्वर होता है ।
०००
- डॉ.अक्षय पाण्डेय
8887899462



मंगलवार, 5 मई 2026

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन श्री माधव कृष्ण ग़ाज़ीपुर

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन

हम किस पार्टी के समर्थक हैं, से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब लोकतंत्र का हाथी अंगड़ाई लेना शुरू करता है तो यह कहना कठिन होता है कि वह कहां जाकर बैठेगा। और इसे स्वीकार करना लोकतन्त्र है। तमिलनाडु में एक फिल्मी अभिनेता पहली बार चुनाव लड़ता है और जनता उसे हाथो हाथ ले लेती है। आप कैसे कहेंगे कि जनता मूर्ख है? इस अहंकार से मुक्त होने के लिए लोकतंत्र की जमीन की तरफ देखना होगा।

(१)
आज बात पश्चिम बंगाल की, और उस जमीन की जिसे मैंने अपनी बंगाल यात्रा के दौरान छूकर महसूस किया था! कोलकाता में मैं होटल ग्रैंड हयात में रुका था। फाइव स्टार होटल, फाइव स्टार क्षेत्र, लेकिन सामने सड़क की दूसरी तरफ अनधिकृत चॉल, बिल्कुल फुटपाथ पर। और एक या दो नहीं, लंबी चौड़ी कई किलोमीटर तक फैली हुई। हर चाल में कुछ कैरम खेलते लोग, फुटबॉल का छोटा सा मैदान और तृणमूल कांग्रेस का कार्यालय।

एक सप्ताह के अंदर कम से कम ३ जुलूस देखा जो उन चालों से निकलकर तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सड़कों पर चलता था। चाय पीने के लिए जब हम बाहर दुकानों पर जाते थे तो पता चलता था कि आमजन इन लोगों से कितने त्रस्त हैं! यहां पर वर्ग संघर्ष की बात नहीं है, क्योंकि ये बातें चाय की छोटी छोटी दुकानों पर होती थीं, ये बंगला भाषी सामान्य गरीब लोग थे। उनका कहना था कि ये लोग बांग्लादेश से आकर यहां बसाए गए हैं और उनकी विवशता है तृणमूल कांग्रेस को अपना समर्थन दिखाना रोज रोज।

(२)
श्रील चैतन्य महाप्रभु के नवद्वीप और नदिया का दर्शन करते समय हम लोग चम्पाहाटी गए। यह एक जंगल जैसा ग्रामीण क्षेत्र था। यहां चैतन्य महाप्रभु अपने प्रिय पार्षद गदाधर के साथ श्रीकृष्ण-चिंतन करने आते थे। वहां एक बड़ा सा मंदिर है। उस मंदिर के चारों तरफ इस्लाम मतावलंबी लोगों का गांव बसता जा रहा है। वहां के पुजारी जी ने बताया था कि इन लोगों को सरकार यहां लाकर बसा रही है।

समस्या इस्लाम से नहीं। भारत के मुसलमान हैं तो कहीं भी जाकर बस सकते हैं। लेकिन पुजारी जी ने बताया कि बांग्लादेश के मुस्लिमों को यहां बसाया जा रहा है। वे आए दिन परेशान भी करते हैं। जब हम वहां से निकल रहे थे तो हमने वहां एक बड़ा सा बोर्ड देखा, एक कार्यालय के बाहर। उस पर लिखा था, रिफ्यूजी सेटलमेंट कमिश्नर। अर्थात शरणार्थियों को बसाने वाले विभाग के आयुक्त। फिर हमें समझ में आया कि पुजारी जी सही कह रहे हैं और तृणमूल कांग्रेस की सरकार बड़े सुनियोजित तरीके से यह काम कर रही है।

(३)
कोलकाता में रहने वाली एक गाजीपुर की बिटिया ने अपने बेटी का एडमिशन केवल एक साल के लिए द प्रेसीडियम में करवाया। उनके पिता जी मेरे बड़े भाई के सदृश हैं। मैंने केवल एक साल का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि, उनकी कॉलोनी के किसी लड़के का बाहर के किसी मुस्लिम से झगड़ा हो गया। सिक्योरिटी होने के बावजूद अवैध कॉलोनी में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थी झुंड बनाकर उनकी कॉलोनी में आए और हर घर पर पथराव किया।

पुलिस ने कुछ नहीं किया। उनके पति इतने डर गए थे कि उन्होंने एक साल के लिए अपने परिवार को गाजीपुर में भेज दिया। उनकी नौकरी थी इसलिए वे नौकरी छोड़ नहीं सकते थे। ये तीन मेरे व्यक्तिगत अनुभव हैं लेकिन समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, चैनल में हमने जो कुछ सुना देखा है, यदि उसे गोदी मीडिया कहकर खारिज भी कर दें, तो आखिर क्या वहां से आ रहे दृश्य, वीडियो, मुर्शिदाबाद के दंगे, विस्थापन, मृत्यु के आंकड़े, क्या ये सब गलत हैं?

बहुत अच्छा हुआ कि केंद्र सरकार ने चुनावी हिंसा के कारण प्रदेश सरकार को बर्खास्त नहीं किया जबकि इसकी मांगें उठती रहीं। केंद्र सरकार यदि ऐसा करती तो वह जनभावनाओं के विपरीत होता और केवल अपने वोटबैंक की भावनाओं अनुकूल होता। लगभग ८० प्रतिशत सीटें जीतने के लिए यह आवश्यक था कि बंगाल का सामान्य जन समुदाय उस सरकार के कार्यों और नीतियों को अपनी आंखों से देख सके, कानों से सुन सकें और आत्मा से महसूस कर सके। भाजपा और संघ जमीनी लड़ाई लड़ते रहे, लोकतांत्रिक तरीकों से जमीन तलाश करते रहे और जनजागरण करते रहे।

पंद्रह वर्षों तक ममता सरकार के साथ खड़े रहने के बाद जनता को परिवर्तन की आवश्यकता महसूस हुई। मुझे पिछले चुनाव के समय, वागर्थ के संपादक शंभूनाथ जी के साथ हुआ अपना फेसबुकिया संवाद भी याद आ रहा है। चुनावी हिंसा के समर्थन में लिखे उनके एक पोस्ट पर मैंने प्रश्न किया कि, क्या आप इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं। उनका उत्तर था कि, तृणमूल वाले बैठकर केवल ताली तो नहीं बजाएंगे। जब मैंने उनसे पूछा कि, क्या वामपंथी हिंसक चरित्र को तृणमूल में अपनी हिंसा का विकल्प दिखाई दे रहा है?

उन्होंने मुझे ब्लॉक कर दिया और यही अनुभव मेरठ विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर विद्या सागर सिंह के साथ भी हुआ। उन्हें भी वागर्थ के माध्यम से संवाद, विमर्श और ऊंची बातें करने वाले शंभूनाथ जी ने असहज प्रश्नों पर ब्लॉक कर दिया। बहरहाल, इसी बहाने मेरी विद्यासागर सर से बौद्धिक मित्रता हो गई। और वागर्थ के संपादकीय की निरर्थकता समझ में आ गई। एक प्रसंग से कितने प्रसंग जुड़े रहते हैं! सब याद आ जाता है।

और आज, लोकतंत्र के हाथी के नृत्य का पर्व है। कुछ भी अकारण नहीं होता, हमें अपनी आंखों को खुला रखना होगा और खुद देखना होगा।

माधव कृष्ण, द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी बड़ी बाग लंका गाजीपुर



मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

मैं वह सूरज हूं न डूबेगी जिसकी किरन रात होगी तो सितारों मे बिखर जाऊंगा शायर खामोश गाज़ीपुरी लेखक उबैदुर्रहमान सिद्दीकी

मैं वह सूरज हूं न डूबेगी जिसकी किरन
रात होगी तो सितारों मे बिखर जाऊंगा

शायर खामोश गाज़ीपुरी ..... 🔮
उबैदुर्रहमान सिद्दीकी

शहर के मुहल्ला सट्टी मस्जिद में खामोश ग़ाज़ीपुरी के घर का सामने मैं खड़ा हूँ. बचपन से उन्हें कमरे में बैठे देखता, कभी कुछ लिखते, कभी गुनगुनाते हुए सुनता या किसी गजल को सजाने संवारने में उनपर नजर पड़ती. यह हमारे जनपद के एक शलाखा शायर खामोश गाज़ीपुरी थे. असल नाम मुज़फ्फर हुसैन था और पिताश्री मुनव्वर अली थे.

खामोश गाजीपुरी का जन्म 25 अप्रैल 1932 में मोहल्ला सट्टी मस्जिद के एक सामान परिवार मे हुआ. उनके उस्ताद कलीम गाजीपुरी ने "नया दौर " नामक पत्रिका मे लिखा कि "खामोश कोई बड़े बाप के बेटे नहीं थे, बल्कि एक मेहनतकश मां बाप के बेटे थे. मैने उन्हें उंगली पकड़ कर 1939/40 में चश्मय रहमत ओरिएंटल कालेज मे प्रवेश कराया, लिखाया पढ़ाया. सरोश मछलीशाहरी के शागिर्द थे और उन्ही के सानिध्य मे रहकर शेर शायरी के उतार चढाव के फन को सीखा. फिर वह 1945 से 1980 तक कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों की धड़कन बनकर उभरे. उनकी गजल रचना की विशेषता थीं कि वह ऐसे शब्दों को चुनते जिसे एक आम आदमी या रिक्शा चालाने वाला भी समझ सके. यही विशेषता उनकी लोकप्रियता का कारण बना. फिर ऐसी लोकप्रियता थीं कि गाजीपुर के किसी अन्य शायरों के नसीब में नहीं आई. राही मासूम रज़ा के बाद आप इकलौते शायर थे जिन्होंने गाजीपुर के नाम को कवि सम्मेलन और मुशायरे की दुनिया में स्थापित किया.

खामोश ग़ाज़ीपुरी का यह शेर जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ :

कभी उनका छुप के हंसना कभी खुल कर मुस्कराना
मेरी आंख डबडबायी, उन्हें मिल गया बहाना

जब मुझको न पाएगा पैमाना पुकारेगी
साकी न सही लेकिन मयखाना पुकारेगा
अफसोस नहीं मुझको कुछ शमा के बुझने का
ग़म यह है कि अब किसको परवाना पुकारेगा

खामोश साहब हमेशा जिंदगी की उलझनों से झूझते रहे और आगे बढ़ते रहे. उनके जीवन में एक ऐसा लम्हा भी आया जब उन्हें बेरोजगार होना पड़ा. धन अर्जन के लिए एकमात्र सहारा कवि सम्मेलन तथा मुशायरे था. कम समय में उन्हें हिन्दुस्तान के बड़े कवि सम्मेलनों और मुशायरों के मंचों पर अग्रिम पंक्तियों के शायरों में जैसे कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, मजरूह सुल्तानपुरी जिनकी तूती बोलती थी, साथ लाखड़ा किया. शकील बदायूनी और साहिर लुधियानवी के चाहितें बने. जहाँ मुशयरा या कवि सम्मेलन होता, खामोश को बुलाते थे.

खामोश की विशेषता थीं कि जैसी ग़ज़ल होती, अपनी लय को उसी स्केल मे ढाल देते थे और वही लय ग़ज़ल की अंतिम पंक्ति तक बनी रहती. और यही कंठ से फूटी उनकी लय मन के अन्तःस्थल को छू जाया करती.गज़ले पढ़ने की उनकी अपनी एक शैली थीं.

उनके समय दरी पर बैठकर कवि सम्मलेन और मुशायरा सुनने का रवाज था. ज़ब वह मंच पर आते, लोकप्रियता का आलम यह था किपंडाल मे बैठे लोग खडे होकर उन्हें सम्मान देते थे. मैने उन्हें 1978/79 तथा 1980 में आयोजित मुशायरों में सुना है. रिक्शा चलाने वाले उनकी कविताओं को कई दिनों तक चलाते समय गाते रहते थे. वह लिखते है :

यह महकता हुआ संदल की तरह उनका बदन
जैसे खुशबू भी इक इंसान बना दी जाए.
रात अँधेरी अगर है तो गलती रात की है
किया सितम है कि चिरागो को सजा दी जाए

आगे लिखते हैँ :

इक हूक उठ रही है दिले बेक़रार मे
कौन आ रहा है छुप के लिबास- बहार मे
अच्छा हुआ कि दर्द ने चौका दिया मुझे
कुछ नींद आ चली थीं शबे इंतिज़ार मे
खामोश क्यूँ चमन कि फ़िज़ा है धुआँ धुआँ
जलता ना हो किसी का नशेमन बहार मे

कहा जाता है कि खामोश साहब किसी युवति को दिल दे बैठे थे. कुछ दिनों के बाद उन्हें पता चला कि उसने शहर के एक धनाढ्य व्यपारी से शादी रचा ली, इस खबर से उनका दिल टूट गया, फिर कई गज़ले लिखी. उसी मे यह भी एक थीं:

डूब जाने दो मेरे दिल को पयमाने मे
ज़िन्दगी क्या है यह सोचूंगा तो मर जाऊंगा

खामोश साहब की यह भी एक ग़ज़ल थीं :

हमें काश तुम से मुहब्बत न होती
कहानी हमारी हक़ीकत न होती
न दिल तुम को देते न मजबूर होते
न दुनिया न दुनिया के दस्तूर होते
क़यामत से पहले क़यामत न होती
हमीं बढ़ गये इश्क़ में हद से आगे
ज़माने ने ठोकर लगायी तो जागे
अगर मर भी जाते तो हैरत न होती
तुम्हीं फूँक देते नशेमन हमारा
मुहब्बत पे अहसान होता तुम्हारा
ज़माने से कोइ शिकायत न होती

यह ग़ज़ल तत्कालीन प्रसिद्ध पत्रिका " शमा ", दिल्ली, अंक अक्टूबर 1952 मे प्रकाशित हुई. ज़ब फ़िल्म मुग़ल आज़म सिनेमाहाल मे लगी तो उसके सभी गाने हिट हुए थे. बगैर बताये शकील बदायूनी ने खामोश साहब की प्रकाशित ग़ज़ल को अपने लिखें गानों के तौर पर लिया. ज़ब उपरोक्त खामोश की ग़ज़ल फ़िल्म के गाना के तौर पर रिलीज हुआ तो खामोश साहब को और उनके मित्रो को मालूम हुआ.

उनके परम मित्रों में उआ समय वकील भैरोनाथ वर्मा, वकील कमलाकांत चौबे, मुफलिस गाज़ीपुरी, डाक्टर उमाशंकर तिवारी, वकील इशरत जाफरी, खलिश ग़ाज़ीपुरी आदि लोगो ने मिलकर रेजिस्टर्ड डाक से शकील बदायूनी मुंबई को एक नोटिस भेजा," क्यूँ ना आपके खिलाफ कोर्ट केस किया जाए." नोटिस पाते ही तुरंत शकील बदायूंनी ने अपने आदमियों को मुंबई से गाजीपुर भेजा जो आकर खामोश से मिले. 3500 रुपिया का एक लिफाफा उन्हें दिया, जिसमे अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए लिखा कि "मेरी इज़्ज़त तुम चाहे उछाल दो या बदनामी से मुझे बचा लो, अब तुम्हारे हाथ मे है. निःसंदेह यह गजल तुम्हारी है लेकिन फिल्म "मुगल आजम" के सीन के अनुसार गाने की डिमांड थी, इसलिए लें लिया ".

खामोश चुंकि मन के बड़े उदार और सज्जन शायर थे. जवाब लिखा कि, " मैंने लाख अपने मित्रों को मना किया, मुझे बगैर बताय न जाने कब नोटिस भेज दिया, आप परेशान न हों, मै उनसे बात करता हूं.".

1962 में हिंद चीन युद्ध के समय लाल किला दिल्ली में मुशायरा का एक आयोजन हुआ जिसमें लता मंगेशकर के साथ नामचीन कवियों और शायरो का जमावड़ा था. खामोश गाजीपुरी ने ज़ब यह कविता पढ़ी तो लोग जोश मे आकर उठ खड़े हो गए तथा एक एक बंद को कई बार सुना :

ताज - अजंता के निगहबान हैं हम
न हिले जो किसी ताकत से वह चट्टान है हम
न उलझ हमसे की ठहरा हुआ तूफान हैं हम
जो भी तूफान से उलझता है कुचल जाता है
जो भी चट्टान से लड़ता है मसल जाता है
तू भी टकराएगा हमसे मसल जाएगा
जंग की आग से खेलेगा तो जल जाएगा
सारा कस बल तेरी फौजों का निकल जाएगा
तुझको गुलशन की कोई शाख नहीं दे सकते
जान दे सकते हैं लद्दाख नहीं दे सकते हैं.

हास्यस्पद बात यह रही कि शहर के लोगो ने उनका मज़ाक भी खूब उड़ाया जैसे डाक्टर राही मासूम रज़ा का  (1952 तक ) टांग मे टीबी होजाने से भचक के चला करते थे, उनका भी उपहास उड़ाते रहे. उआ समय अधिकतर शायर - कवि माईक पर जाने से पहले थोड़ा सा जाम लें लिया करते थे, इसपर खामोश साहब का भी राह चलते मज़ाक उड़ाते, यह पंक्तिया लिखी :

लोगो की फितरत क्या कहिए अब मुझको शराबी कहते हैं
हालांकि मुझे मयखाने की खुद राह दिखाई लोगों ने

खामोश साहब की कई ऐसी गजलें है जो देश विदेश मे लोकप्रिय हुई थी. बेहतरीन गजल गायकों ने उनकी गज़लो को सुरों मे ढाला है जैसे मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने उनकी कई गज़ले गई, उनमे एक यह है :

उम्र जलवों में बसर हो यह जरूरी तो नहीं
हर शबे ग़म की सहर हो यह जरूरी तो नहीं
सबकी नजरों में हो साकी यह जरूरी है मगर
सब पे साकी की नज़र हो यह जरूरी तो नहीं
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है
उनकी आगोश में सर हो यह जरूरी तो नहीं

जगजीत सिंह ने खामोश साहब की इस गजल को गाकर अमर कर दिया:

देर व हरम में बसने वालों
मायखवारों में फूट न डालो 
आरिज लब सादा रहने दो
ताजमहल पे रंग न डालो

उबैदुर्रहमान
गाजीपुर


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

गांव कटरिया ब्लॉक करण्डा जिला ग़ाज़ीपुर की दुर्घटना- श्री माधव कृष्ण



कटरिया गांव की दुर्घटना

अभी तक इस दुर्घटना पर जितने भी पोस्ट पढ़े हैं, उनमें से अधिकतम या तो किसी जाति के विरुद्ध हैं या किसी पार्टी के विरुद्ध हैं या किसी व्यक्ति के विरुद्ध हैं!

तो जो लोग इसे ब्राह्मण या विश्वकर्मा या ठाकुर की दृष्टि से देख रहे हैं, वे गलत हैं। जो लोग इसे भाजपा या सपा की दृष्टि से देख रहे हैं वे भी गलत हैं।

जब दुर्घटना हो चुकी है तो इसको जातीय दृष्टिकोण से देखना बंद करना होगा। पीड़ित पक्ष को न्याय और अपराधी को सजा, यही न्यायसंगत है। लेकिन यह तय कौन करेगा?

निःसंदेह, यह तय करना पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका का कार्य है। फिर राजनैतिक दलों की क्या भूमिका है? राजनैतिक दलों की एकमात्र भूमिका है, यह सुनिश्चित करना कि किसी की आवाज न दबे।

लेकिन यह कार्य कैसे करना होगा? क्या संख्या और शक्ति का प्रदर्शन करके? या बड़े संवेदनशील तरीके से शांतिपूर्वक सौहार्द्र को बनाए रखते हुए? किसी भी कार्य को करने का कौशल ही मुख्य है।

शक्ति प्रदर्शन की तो इतनी बुरी स्थिति है कि अब लोग शादियों में भी उन नेताओं को बुलाते हैं जिनसे उनका कोई संबंध नहीं, और नेता जी लोगों को शादियों में जा जाकर हाजिरी लगानी पड़ रही है।

बहरहाल, काम तो सब कर लेते हैं। लेकिन कुछ लोग काम को कुशलता से करते हैं, सोच समझकर करते हैं, समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखकर करते हैं।

जो लोग मीडिया या सोशल मीडिया ट्रायल कर रहे हैं, उनके पास सूचनाएं नहीं हैं, तथ्य नहीं हैं, सही कौन है और गलत कौन है इसका ज्ञान भी नहीं है, लेकिन उनके पोस्ट्स में विष भरा हुआ है।

यह समय है सतर्क रहने का, सावधान रहने का, साथ रहने का, और वह साथ है सत्य न्याय धर्म का। पुलिस अपना काम कैसे करेगी यदि वह इस घटना पर हो रहे बवाल में ही अपनी ऊर्जा क्षय कर रही है?

पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से काम करने दीजिए। सोशल मीडिया पर बिना किसी तथ्य के विष वमन मत कीजिए। यदि आप पीड़ित के लिए न्याय और अपराधी के लिए सजा चाहते हैं तो आपको भी अपना दायित्व निभाना होगा।

तमाशबीन बनिए लेकिन बिना मतलब के भ्रम मत पैदा कीजिए। हम जब प्रमाणपत्र देना शुरू करते हैं किसी जाति या दल या व्यक्ति को, तो समझ लीजिए कि हम स्वयंभू ईश्वर बनना चाहते हैं लेकिन ईश्वर तो ईश्वर है।

इतना भरोसा तो रखना पड़ेगा कि उसके घर देर है अंधेर नहीं। और यह भी कि बाबा साहब के संविधान से किसी का अहित नहीं होगा। शक्ति प्रदर्शन के बेहतर रास्ते तलाशने होंगे।

माधव कृष्ण, २३.४.२६


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

हुस्न से इश्क का सदियों से ये रिश्ता है कैसा, खाक होने के लिए हम एक-दूजे से प्यार कर बैठे-

सनम की आंखों में हम अपना दीदार कर बैठे,
उनके रूबरू हम नजरों से यूं तकरार कर बैठे..

मत कहिए जमाने से कि लगा है दिल का रोग,
वो कहेंगे न था कोई काम तो ये रोजगार कर बैठे..

दर्द की आदत से अब यूं मजबूर हो चुके हैं हम,
अश्कों के खातिर तेरी यादों का जुगाड़ कर बैठे..

हुस्न से इश्क का सदियों से ये रिश्ता है कैसा,
खाक होने के लिए हम एक-दूजे से प्यार कर बैठे..





रविवार, 15 मार्च 2026

दुःखद, सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी

सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी और इसी के साथ नारीवादी दीदियों का गुबार फुट पड़ा....
ये कितना सही है इसपर विचार बिना हम बस इसे महिलाओं के खिलाफ मानकर विरोध पर उतर आए हैं।

हां पीरियड्स सामान्य दिनों से अलग होते हैं और विस्पर, स्टेय-फ़्री या सोफी के पैड्स लेने पर भी जैसे विज्ञापन में दिखाते हैं सैनेटरी पैड्स लेते ही लड़की ओलंपिक में पदक जीत लेती है, पिकनिक इंजॉय करती है, एग्जाम टॉप करती है या फिर मैराथन दौड़ जाती है ऐसा कुछ नहीं होता क्योंकि पैड्स महावारी के रक्त प्रवाह को सौखते हैं दर्द, क्रैम्प, थकान और जकड़न से राहत नहीं देते।
और सारी समस्याओं के साथ जांघों का छिल जाना माहवारी के बाद भी दो तीन दिन तक दर्द देता है।

पुराने समय मे महिलाओं को आराम मिल सके इसलिए चूल्हे चौके से छुट्टी दी जाती थी पर घर की बड़ी औरतों ने माहवारी की छुट्टी को एक्स्ट्रा काम का अवसर बना दिया और इन दिनों में घर की बहुये कपड़े धोना, आंगन लीपना, पत्थर फोड़ना, अनाज साफ करना, उपले बनाना मवेशियों का बाड़ा साफ करना और खेतीबाड़ी के वो भारी काम करती हैं जो आदमी अपने सामान्य दिनों में करते हैं।

उन्हें किसी ने एहसास ही नहीं दिलाया कि ये आराम का समय है तो कभी दिमाग मे आया भी नहीं कि माहवारी में आराम करना है...
धीरे धीरे महिलाओं ने खुद इसे परंपरा बना लिया कि घर के सारे अनुपयोगी काम महावारी के दिनों में करने हैं क्योंकि रसोई में नहीं खपना है।

सुप्रीम कोर्ट में बैठे जजों और आम समाज के लोगों ने अपनी दादी-नानियों को माहवारी में वही काम करते देखा है इसलिए इन्होंने आंकलन कर लिया कि माहवारी में छुट्टी देने से महिलाओं की प्रोग्रेस, कार्यक्षमता और संख्याबल कम हो जाएगा जो एक तरह से तार्किक भी है।

क्योंकि आप छुट्टी अनिवार्य कर सकते हो पर हर एक ऑफिस, विभाग और कम्पनी मालिक को महिलाओं को नोकरी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।

फिर जब किसी को पूरे तीस दिन बिना छुट्टी मांगे पूरी क्षमता से काम करने वाला आदमी मिल रहा है तो वो क्यों किसी महिला को काम पर रखेगा जिसे मासिक धर्म के नाम पर बिना वेतन काटे छुट्टी देना पड़े।

ये विषय संवेदना और नैतिकता का है,
कि जिन महिलाओं को पीरियड्स में ज्यादा समस्या हो उन्हें ऑफिस वाले संवेदना दिखाते हुए छुट्टी दें जबकि अनिवार्य करने से लोग महिलाओं को नोकरी देने से ही कतराने लगेंगे क्योंकि 90 प्रतिशत लोगों ने अपनी पुरानी पीढ़ी में महिलाओं को माहवारी में दुगना काम करते देखा है और उन्हें ये छुट्टी बस बहाना लगती है।



बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बीएचयू में भर्ती पद्मश्री डॉ. टी.के.लाहिड़ी

#बीएचयू में भर्ती पद्मश्री डॉ. टी.के.लाहिड़ी के प्रति क्यों है इतना प्रेम। कैसे प्रधानमंत्री और कुलपति को भी मिलने से कर दिया था मना--कहा कि मैं मरीजों से सिर्फ ओपीडी में मिलता हूं, 20-25 की थाली किसी छोटे से होटल में खाते हैं, आइए आज सबकुछ पढ़ें।

त्याग, तपस्या और सेवा का दुर्लभ उदाहरण।आचरण, सादगी, प्रतिबद्धता और मानव सेवा से चिकित्सा पेशे को गौरवान्वित किया है, तो वह नाम है पद्मश्री प्रो. डॉ. तपन कुमार लाहिड़ी (टी.के. लाहिड़ी)।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विख्यात कार्डियोथोरेसिक सर्जन और लाखों मरीजों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं।

वाराणसी की जनता उन्हें ‘धरती का भगवान’ कहकर पुकारती है। यह उपाधि यूँ ही नहीं मिली। बीएचयू के सामान्य अस्पताल की गलियों में रोज एक परिचित दृश्य नजर आता है, एक हाथ में बैग और दूसरे हाथ में काली छतरी लिए, एक वृद्ध डॉक्टर पैदल चलते हुए अस्पताल की ओर आने वाला।वही साधारण-सा वृद्ध दरअसल दुनिया के ख्यातिप्राप्त कार्डियोथोरेसिक सर्जन—डॉ. टी.के. लाहिड़ी होते हैं।

साल 1994 से उन्होंने अपनी पूरी तनख्वाह गरीब मरीजों की मदद के लिए समर्पित कर दी। 2003 में सेवानिवृत्ति के बाद भी यह क्रम नहीं टूटा
वे आज भी उतनी ही पेंशन अपने पास रखते हैं, जिससे उनका साधारण जीवन चल सके। बाकी पूरी राशि बीएचयू के गरीब मरीज सहायता कोष में जमा कर दी जाती है।

उन्होंने अपने भविष्य निधि (पीएफ) तक का पैसा विश्वविद्यालय को दान कर दिया—ताकि किसी गरीब की जान बच सके। 35 वर्ष की सेवा, सैकड़ों डॉक्टर तैयार, पर खुद के लिए एक वाहन तक नहीं। 1974 में बीएचयू में मात्र 250 रुपये मासिक वेतन पर लेक्चरर नियुक्त हुए। 

जिनके शिष्य आज देश-विदेश के बड़े अस्पतालों का नेतृत्व कर रहे हैं, उसी शिक्षक ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी एक कार तक नहीं खरीदी। आज भी वे पैदल ही अस्पताल जाते थे—गर्मी, सर्दी या बारिश, मौसम कोई भी हो।

उनकी सादगी जितनी प्रेरणादायक है, उनकी ईमानदारी और सिद्धांतों पर अडिग रहने की क्षमता उतनी ही दुर्लभ।  एक बार देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर वाराणसी आए और किसी कारणवश उनसे निजी तौर पर मिलना चाहते थे।

 डॉ. लाहिड़ी ने घर पर मिलने से मना कर दिया और साफ कहा
“मैं मरीजों से केवल ओपीडी में ही मिलता हूँ। इसी तरह, बीएचयू के एक बीमार कुलपति को घर जाकर देखने से उन्होंने इनकार किया।
उनकी नजर में हर मरीज समान, चाहे वह प्रधानमंत्री हो या सामान्य श्रमिक।

उनका पूरा जीवन सादगी से भरा है। वाराणसी की गलियों में उन्हें अक्सर अन्नपूर्णा होटल में 20–25 रुपये की थाली खाते देखा जा सकता है।
न कोई दिखावा, न कोई विशेष सुविधा। बीएचयू से मिलने वाला साधारण आवास ही उनकी दुनिया है। उन्होंने गरीब मरीजों की सेवा में इतना समर्पण दिखाया कि जीवनभर विवाह तक नहीं किया।कहते हैं कि वे परिवार की जिम्मेदारियों में बंधकर अपने सेवा-कार्य में कमी नहीं आने देना चाहते थे।

सेवानिवृत्ति के बाद अमेरिका के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों ने उन्हें भारी-भरकम पैकेज पर काम करने का प्रस्ताव दिया। लेकिन उन्होंने एक ही वाक्य में सारे प्रस्ताव वापस कर दिए—“मैं भारत और अपने गरीब मरीजों की सेवा से दूर नहीं जा सकता।”

बीएचयू में लोग कहते हैं कि जो भी व्यक्ति समय जानना चाहता है, वह डॉ. लाहिड़ी की ओर नजर कर ले—समय का अंदाजा हो जाता है।
वे सुबह ठीक 6 बजे अस्पताल पहुंचते हैं, तीन घंटे की सेवा के बाद घर लौटते हैं और शाम को फिर अस्पताल आते हैं।उम्र 75 के पार है, पर उनका अनुशासन वही है जो युवा दिनों में था।

उनकी ओपन-हार्ट सर्जरी की क्षमता और शल्य चिकित्सा कौशल के कारण हजारों गरीब मरीजों की जान बची। जो मरीज आर्थिक अभाव में महंगे अस्पतालों में इलाज नहीं करा पाते थे, उनके लिए डॉ. लाहिड़ी किसी फरिश्ते की तरह आए। बीएचयू में आज भी लोग कहते हैं—“जिस मरीज को लाहिड़ी सर देख लेते हैं, उसकी जान बचने की उम्मीद बढ़ जाती है।”

रविवार, 18 जनवरी 2026

ए आर रहमान यह कैसा संगीत- श्री माधव कृष्ण

ए आर रहमान: यह कैसा संगीत!

जिस रहमान साहब के ऑस्कर जीतने पर मैं झूम उठा था, हर भारतीय गर्व का अनुभव कर रहा था, जिनके हर संगीत पर हम तालियां बजाते थे, उन्होंने यह कैसा राग छेड़ दिया?

अभी बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए एक इंटरव्यू में रहमान ने कहा था, 'पिछले 8 सालों में शायद सत्ता का बदलाव हुआ है और जो रचनात्मक नहीं हैं. वे फैसले ले रहे हैं. शायद साम्प्रदायिक बात भी रही हो लेकिन मेरे सामने किसी ने नहीं कहा.

हां, कुछ व्हिस्पर सुनाई देती हैं. जैसे आपको बुक किया था लेकिन दूसरी म्यूजिक कंपनी ने फिल्म फंड की, और अपने संगीतकार ले आए. मैं कहता हूं ठीक है. मैं आराम करूंगा.'

यह अच्छा हुआ कि, आज उन्होंने अपने वक्तव्य पर यू टर्न ले लिए लेकिन उनके पिछले बयान ने भारतीय क्रिकेट टीम के भूतपूर्व कप्तान और बाद में सांसद रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन की याद दिला दी।

मैच फिक्सिंग में नाम आने के बाद उन्होंने कहा था कि, एक मुस्लिम होने के नाते उन्हें टारगेट किया जा रहा है। १० साल तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी जिन्हें भारत का डिप्लोमेट रहने का गौरव भी था, ने विदाई समारोह में कहा था कि, भारत में अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।

हम सबके प्रिय अभिनेता थे आमिर खान ने २०१५ में वक्तव्य दिया था कि, उनकी पत्नी किरण राव को भारत में असुरक्षा के कारण भय लगता है और वह बच्चों के लिए भारत को छोड़ने का मन बना रही हैं।

इत्यादि। ये सभी बयान अखबारों में और न्यूज चैनल्स में प्रमुखता से प्रकाशित हुए थे। एक बार मेरे एक मुस्लिम बुद्धिजीवी मित्र ने कहा था कि, भारत में मुस्लिमों को हमेशा सिद्ध करना पड़ता रहेगा कि हम राष्ट्रभक्त हैं।

इन विषयों पर लिखना दुखद तो है, लेकिन लिखना भी पड़ेगा। उस मित्र के बयान को ही उल्टा करके यह भी सोचा जा सकता है कि, क्या भारत को भी हमेशा सिद्ध करना पड़ेगा कि भारत मुस्लिमों से भी उतना ही प्रेम करता है जितना हिन्दुओं से।

और मुझे लगता है कि रहमान, अंसारी, अजहर और आमिर जैसे कुछ गिने चुने लोगों की व्यक्तिगत भावनाओं के विरुद्ध इस देश में करोड़ों मुस्लिम भरे हुए हैं जो भारत में सुरक्षित हैं और भारत में रहना पसंद करते हैं।

हम भारत के लोग! इस देश ने हमें क्या दिया, यह सबका सामान्य प्रश्न होता है। लेकिन हम इस देश को क्या दे रहे हैं? अधिकार और कर्त्तव्य का यक्ष प्रश्न हमेशा बना रहेगा।

इस देश ने आपको क्या दिया, यदि यह हम भूल भी जाएं तो भी केवल दशमेश गुरु गोबिंद सिंह जी को याद रखें जिन्होंने जिस देश और जिन देशवासियों के लिए अपना सब कुछ खो दिया, उन लोगों ने उनके अंतिम समय में उनका साथ छोड़ दिया।

कोई ए आर रहमान तक स्वामी विवेकानंद का यह संदेश भेज दे:

धर्म के लिए, दलितों और पीड़ितों के लिए, अपना और अपने सबसे प्रिय और करीबी लोगों का रक्त बहाने के बाद, यहाँ तक कि उन लोगों द्वारा त्याग दिए जाने पर भी जिनके लिए यह रक्त बहाया गया था, उन्होंने अपने देश या अपने लोगों के खिलाफ एक शब्द भी शिकायत किए बिना, एक शब्द भी बड़बड़ाए बिना दक्षिण की ओर प्रस्थान किया।”

“भारत के पुनः गौरवान्वित होने के लिए, आप में से प्रत्येक को गुरु गोविंद सिंह बनना होगा – उनका सच्चा अनुयायी बनना होगा।”

माधव कृष्ण, १८.१.२६