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2026 ~ Lav Tiwari ( लव तिवारी )

Lav Tiwari On Mahuaa Chanel

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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

हुस्न से इश्क का सदियों से ये रिश्ता है कैसा, खाक होने के लिए हम एक-दूजे से प्यार कर बैठे-

सनम की आंखों में हम अपना दीदार कर बैठे,
उनके रूबरू हम नजरों से यूं तकरार कर बैठे..

मत कहिए जमाने से कि लगा है दिल का रोग,
वो कहेंगे न था कोई काम तो ये रोजगार कर बैठे..

दर्द की आदत से अब यूं मजबूर हो चुके हैं हम,
अश्कों के खातिर तेरी यादों का जुगाड़ कर बैठे..

हुस्न से इश्क का सदियों से ये रिश्ता है कैसा,
खाक होने के लिए हम एक-दूजे से प्यार कर बैठे..





रविवार, 15 मार्च 2026

दुःखद, सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी

सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी और इसी के साथ नारीवादी दीदियों का गुबार फुट पड़ा....
ये कितना सही है इसपर विचार बिना हम बस इसे महिलाओं के खिलाफ मानकर विरोध पर उतर आए हैं।

हां पीरियड्स सामान्य दिनों से अलग होते हैं और विस्पर, स्टेय-फ़्री या सोफी के पैड्स लेने पर भी जैसे विज्ञापन में दिखाते हैं सैनेटरी पैड्स लेते ही लड़की ओलंपिक में पदक जीत लेती है, पिकनिक इंजॉय करती है, एग्जाम टॉप करती है या फिर मैराथन दौड़ जाती है ऐसा कुछ नहीं होता क्योंकि पैड्स महावारी के रक्त प्रवाह को सौखते हैं दर्द, क्रैम्प, थकान और जकड़न से राहत नहीं देते।
और सारी समस्याओं के साथ जांघों का छिल जाना माहवारी के बाद भी दो तीन दिन तक दर्द देता है।

पुराने समय मे महिलाओं को आराम मिल सके इसलिए चूल्हे चौके से छुट्टी दी जाती थी पर घर की बड़ी औरतों ने माहवारी की छुट्टी को एक्स्ट्रा काम का अवसर बना दिया और इन दिनों में घर की बहुये कपड़े धोना, आंगन लीपना, पत्थर फोड़ना, अनाज साफ करना, उपले बनाना मवेशियों का बाड़ा साफ करना और खेतीबाड़ी के वो भारी काम करती हैं जो आदमी अपने सामान्य दिनों में करते हैं।

उन्हें किसी ने एहसास ही नहीं दिलाया कि ये आराम का समय है तो कभी दिमाग मे आया भी नहीं कि माहवारी में आराम करना है...
धीरे धीरे महिलाओं ने खुद इसे परंपरा बना लिया कि घर के सारे अनुपयोगी काम महावारी के दिनों में करने हैं क्योंकि रसोई में नहीं खपना है।

सुप्रीम कोर्ट में बैठे जजों और आम समाज के लोगों ने अपनी दादी-नानियों को माहवारी में वही काम करते देखा है इसलिए इन्होंने आंकलन कर लिया कि माहवारी में छुट्टी देने से महिलाओं की प्रोग्रेस, कार्यक्षमता और संख्याबल कम हो जाएगा जो एक तरह से तार्किक भी है।

क्योंकि आप छुट्टी अनिवार्य कर सकते हो पर हर एक ऑफिस, विभाग और कम्पनी मालिक को महिलाओं को नोकरी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।

फिर जब किसी को पूरे तीस दिन बिना छुट्टी मांगे पूरी क्षमता से काम करने वाला आदमी मिल रहा है तो वो क्यों किसी महिला को काम पर रखेगा जिसे मासिक धर्म के नाम पर बिना वेतन काटे छुट्टी देना पड़े।

ये विषय संवेदना और नैतिकता का है,
कि जिन महिलाओं को पीरियड्स में ज्यादा समस्या हो उन्हें ऑफिस वाले संवेदना दिखाते हुए छुट्टी दें जबकि अनिवार्य करने से लोग महिलाओं को नोकरी देने से ही कतराने लगेंगे क्योंकि 90 प्रतिशत लोगों ने अपनी पुरानी पीढ़ी में महिलाओं को माहवारी में दुगना काम करते देखा है और उन्हें ये छुट्टी बस बहाना लगती है।
#NewsUpdate
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#feminist
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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बीएचयू में भर्ती पद्मश्री डॉ. टी.के.लाहिड़ी

#बीएचयू में भर्ती पद्मश्री डॉ. टी.के.लाहिड़ी के प्रति क्यों है इतना प्रेम। कैसे प्रधानमंत्री और कुलपति को भी मिलने से कर दिया था मना--कहा कि मैं मरीजों से सिर्फ ओपीडी में मिलता हूं, 20-25 की थाली किसी छोटे से होटल में खाते हैं, आइए आज सबकुछ पढ़ें।

त्याग, तपस्या और सेवा का दुर्लभ उदाहरण।आचरण, सादगी, प्रतिबद्धता और मानव सेवा से चिकित्सा पेशे को गौरवान्वित किया है, तो वह नाम है पद्मश्री प्रो. डॉ. तपन कुमार लाहिड़ी (टी.के. लाहिड़ी)।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विख्यात कार्डियोथोरेसिक सर्जन और लाखों मरीजों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं।

वाराणसी की जनता उन्हें ‘धरती का भगवान’ कहकर पुकारती है। यह उपाधि यूँ ही नहीं मिली। बीएचयू के सामान्य अस्पताल की गलियों में रोज एक परिचित दृश्य नजर आता है, एक हाथ में बैग और दूसरे हाथ में काली छतरी लिए, एक वृद्ध डॉक्टर पैदल चलते हुए अस्पताल की ओर आने वाला।वही साधारण-सा वृद्ध दरअसल दुनिया के ख्यातिप्राप्त कार्डियोथोरेसिक सर्जन—डॉ. टी.के. लाहिड़ी होते हैं।

साल 1994 से उन्होंने अपनी पूरी तनख्वाह गरीब मरीजों की मदद के लिए समर्पित कर दी। 2003 में सेवानिवृत्ति के बाद भी यह क्रम नहीं टूटा
वे आज भी उतनी ही पेंशन अपने पास रखते हैं, जिससे उनका साधारण जीवन चल सके। बाकी पूरी राशि बीएचयू के गरीब मरीज सहायता कोष में जमा कर दी जाती है।

उन्होंने अपने भविष्य निधि (पीएफ) तक का पैसा विश्वविद्यालय को दान कर दिया—ताकि किसी गरीब की जान बच सके। 35 वर्ष की सेवा, सैकड़ों डॉक्टर तैयार, पर खुद के लिए एक वाहन तक नहीं। 1974 में बीएचयू में मात्र 250 रुपये मासिक वेतन पर लेक्चरर नियुक्त हुए। 

जिनके शिष्य आज देश-विदेश के बड़े अस्पतालों का नेतृत्व कर रहे हैं, उसी शिक्षक ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी एक कार तक नहीं खरीदी। आज भी वे पैदल ही अस्पताल जाते थे—गर्मी, सर्दी या बारिश, मौसम कोई भी हो।

उनकी सादगी जितनी प्रेरणादायक है, उनकी ईमानदारी और सिद्धांतों पर अडिग रहने की क्षमता उतनी ही दुर्लभ।  एक बार देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर वाराणसी आए और किसी कारणवश उनसे निजी तौर पर मिलना चाहते थे।

 डॉ. लाहिड़ी ने घर पर मिलने से मना कर दिया और साफ कहा
“मैं मरीजों से केवल ओपीडी में ही मिलता हूँ। इसी तरह, बीएचयू के एक बीमार कुलपति को घर जाकर देखने से उन्होंने इनकार किया।
उनकी नजर में हर मरीज समान, चाहे वह प्रधानमंत्री हो या सामान्य श्रमिक।

उनका पूरा जीवन सादगी से भरा है। वाराणसी की गलियों में उन्हें अक्सर अन्नपूर्णा होटल में 20–25 रुपये की थाली खाते देखा जा सकता है।
न कोई दिखावा, न कोई विशेष सुविधा। बीएचयू से मिलने वाला साधारण आवास ही उनकी दुनिया है। उन्होंने गरीब मरीजों की सेवा में इतना समर्पण दिखाया कि जीवनभर विवाह तक नहीं किया।कहते हैं कि वे परिवार की जिम्मेदारियों में बंधकर अपने सेवा-कार्य में कमी नहीं आने देना चाहते थे।

सेवानिवृत्ति के बाद अमेरिका के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों ने उन्हें भारी-भरकम पैकेज पर काम करने का प्रस्ताव दिया। लेकिन उन्होंने एक ही वाक्य में सारे प्रस्ताव वापस कर दिए—“मैं भारत और अपने गरीब मरीजों की सेवा से दूर नहीं जा सकता।”

बीएचयू में लोग कहते हैं कि जो भी व्यक्ति समय जानना चाहता है, वह डॉ. लाहिड़ी की ओर नजर कर ले—समय का अंदाजा हो जाता है।
वे सुबह ठीक 6 बजे अस्पताल पहुंचते हैं, तीन घंटे की सेवा के बाद घर लौटते हैं और शाम को फिर अस्पताल आते हैं।उम्र 75 के पार है, पर उनका अनुशासन वही है जो युवा दिनों में था।

उनकी ओपन-हार्ट सर्जरी की क्षमता और शल्य चिकित्सा कौशल के कारण हजारों गरीब मरीजों की जान बची। जो मरीज आर्थिक अभाव में महंगे अस्पतालों में इलाज नहीं करा पाते थे, उनके लिए डॉ. लाहिड़ी किसी फरिश्ते की तरह आए। बीएचयू में आज भी लोग कहते हैं—“जिस मरीज को लाहिड़ी सर देख लेते हैं, उसकी जान बचने की उम्मीद बढ़ जाती है।”
#DrLahari
#Drtlahiri
#banarashinduuniversity
#varanasi

रविवार, 18 जनवरी 2026

ए आर रहमान यह कैसा संगीत- श्री माधव कृष्ण

ए आर रहमान: यह कैसा संगीत!

जिस रहमान साहब के ऑस्कर जीतने पर मैं झूम उठा था, हर भारतीय गर्व का अनुभव कर रहा था, जिनके हर संगीत पर हम तालियां बजाते थे, उन्होंने यह कैसा राग छेड़ दिया?

अभी बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए एक इंटरव्यू में रहमान ने कहा था, 'पिछले 8 सालों में शायद सत्ता का बदलाव हुआ है और जो रचनात्मक नहीं हैं. वे फैसले ले रहे हैं. शायद साम्प्रदायिक बात भी रही हो लेकिन मेरे सामने किसी ने नहीं कहा.

हां, कुछ व्हिस्पर सुनाई देती हैं. जैसे आपको बुक किया था लेकिन दूसरी म्यूजिक कंपनी ने फिल्म फंड की, और अपने संगीतकार ले आए. मैं कहता हूं ठीक है. मैं आराम करूंगा.'

यह अच्छा हुआ कि, आज उन्होंने अपने वक्तव्य पर यू टर्न ले लिए लेकिन उनके पिछले बयान ने भारतीय क्रिकेट टीम के भूतपूर्व कप्तान और बाद में सांसद रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन की याद दिला दी।

मैच फिक्सिंग में नाम आने के बाद उन्होंने कहा था कि, एक मुस्लिम होने के नाते उन्हें टारगेट किया जा रहा है। १० साल तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी जिन्हें भारत का डिप्लोमेट रहने का गौरव भी था, ने विदाई समारोह में कहा था कि, भारत में अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।

हम सबके प्रिय अभिनेता थे आमिर खान ने २०१५ में वक्तव्य दिया था कि, उनकी पत्नी किरण राव को भारत में असुरक्षा के कारण भय लगता है और वह बच्चों के लिए भारत को छोड़ने का मन बना रही हैं।

इत्यादि। ये सभी बयान अखबारों में और न्यूज चैनल्स में प्रमुखता से प्रकाशित हुए थे। एक बार मेरे एक मुस्लिम बुद्धिजीवी मित्र ने कहा था कि, भारत में मुस्लिमों को हमेशा सिद्ध करना पड़ता रहेगा कि हम राष्ट्रभक्त हैं।

इन विषयों पर लिखना दुखद तो है, लेकिन लिखना भी पड़ेगा। उस मित्र के बयान को ही उल्टा करके यह भी सोचा जा सकता है कि, क्या भारत को भी हमेशा सिद्ध करना पड़ेगा कि भारत मुस्लिमों से भी उतना ही प्रेम करता है जितना हिन्दुओं से।

और मुझे लगता है कि रहमान, अंसारी, अजहर और आमिर जैसे कुछ गिने चुने लोगों की व्यक्तिगत भावनाओं के विरुद्ध इस देश में करोड़ों मुस्लिम भरे हुए हैं जो भारत में सुरक्षित हैं और भारत में रहना पसंद करते हैं।

हम भारत के लोग! इस देश ने हमें क्या दिया, यह सबका सामान्य प्रश्न होता है। लेकिन हम इस देश को क्या दे रहे हैं? अधिकार और कर्त्तव्य का यक्ष प्रश्न हमेशा बना रहेगा।

इस देश ने आपको क्या दिया, यदि यह हम भूल भी जाएं तो भी केवल दशमेश गुरु गोबिंद सिंह जी को याद रखें जिन्होंने जिस देश और जिन देशवासियों के लिए अपना सब कुछ खो दिया, उन लोगों ने उनके अंतिम समय में उनका साथ छोड़ दिया।

कोई ए आर रहमान तक स्वामी विवेकानंद का यह संदेश भेज दे:

धर्म के लिए, दलितों और पीड़ितों के लिए, अपना और अपने सबसे प्रिय और करीबी लोगों का रक्त बहाने के बाद, यहाँ तक कि उन लोगों द्वारा त्याग दिए जाने पर भी जिनके लिए यह रक्त बहाया गया था, उन्होंने अपने देश या अपने लोगों के खिलाफ एक शब्द भी शिकायत किए बिना, एक शब्द भी बड़बड़ाए बिना दक्षिण की ओर प्रस्थान किया।”

“भारत के पुनः गौरवान्वित होने के लिए, आप में से प्रत्येक को गुरु गोविंद सिंह बनना होगा – उनका सच्चा अनुयायी बनना होगा।”

माधव कृष्ण, १८.१.२६