"ट्रॉय और विवाहेतर संबंध"
✍ माधव कृष्ण
गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं, और मैं अच्छी फिल्मों को देखने की कोशिश कर रहा था। ट्रॉय के विषय में मैंने सुना था लेकिन कॉलेज में मैंने पढ़ाई और व्यायाम के सिवा कुछ और किया ही नहीं। इसलिए अब वह शौक पूरा कर रहा हूँ।
ट्रॉय और स्पार्टा दो राज्य हैं। दोनों के बीच संधि करने ट्रॉय के राजकुमार पेरिस और हेक्टर पहुँचते हैं। संधि हो जाती है। ग्रीस का महत्वाकांक्षी राजा इस संधि से खुश नहीं है क्योंकि वह ट्रॉय के स्वतंत्र राज्य को ग्रीक साम्राज्य में मिलाना चाहता है।
संधि के बाद उत्सव में ट्रॉय के छोटे राजकुमार पेरिस को स्पार्टा के वृद्ध राजा की नवयुवती पत्नी हेलेन को देखते ही प्रेम हो जाता है। दोनों में संबंध स्थापित हो जाता है, दोनों साथ जीने-मरने की कसमें खा लेते हैं। हेलेन पेरिस के साथ जहाज में छिपकर भाग जाती है। ट्रॉय जाने पर सभी को पता चलता है।
स्पार्टा का राजा मेनेलस ग्रीक सम्राट से सहायता माँगता है और सम्राट आगामेमन अपने सभी राजाओं से सेना लेकर ट्रॉय पर आक्रमण करने के लिए कहता है। इसके बाद जो हुआ, वह सभी जानते हैं। ट्रॉय मिट्टी में मिल गया। ट्रॉय के महान राजा प्रियम और उसका महान युद्ध हेक्टर मारे गये। ग्रीक राजा आगामेमन और महान योद्धा एकिलीस मारे गये।
यह सब किसलिए? एक विवाहिता को अपनी पत्नी बनाने के हठ में। एक्ट्रा मैरिटल अफेयर। विवाहेतर संबंध। आश्रम की प्रार्थना में कहते हैं, “निज आन मान मर्यादा का प्रभु ध्यान रहे, शुभ ज्ञान रहे।” विवाहेतर संबंध में वह मर्यादा धूल-धूसरित हो जाती है।
राजकुमार पेरिस अपने क्षणिक कामावेग को रोककर एक बड़े नरसंहार को रोक सकता था। लेकिन मनुष्य जाति अपने विस्मरण के लिए प्रसिद्ध है। वह भूल जाता है, अपना इतिहास, अपनी मर्यादा और परिणाम होता है ट्रॉय जैसे युद्ध। हमारे भारतीय राजाओं की अधिकांश लड़ाइयाँ स्त्रियों पर नियंत्रण के लिए होती रही।
सोशल मीडिया के समय में यह किसी से छिपा नहीं है कि व्यक्तिगत स्तर पर भी आज ऐसे संबंधों की कमी नहीं है। इनके कारण हत्याएँ हो रही हैं। अभी एक दिल दहलाने वाला वीडियो आया है जिसमें एक नशेड़ी नवयुवक एक बच्चे को आठ बार जमीन पर पटक कर मार रहा है, क्योंकि वह उसकी माँ से विवाह करना चाहता था।
जब उससे पुलिस ने पूछा कि तूने ऐसा क्यों किया, तो उसका उत्तर था कि उसकी माँ से पूछो। ये घटनाएँ अखबार और सोशल मीडिया की खबरें बनकर आए दिन मानवता को शर्मसार कर रही हैं। लोगों ने प्रेम का अनर्थ खोज लिया है। प्रेम का अर्थ है, सबसे प्रेम होना। प्रेम करने वाला किसी एक से प्रेम के लिए अन्य सभी से घृणा कैसे कर सकता है?
श्रीमद्भगवद्गीता के शब्दों में—
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्
शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥
जो मनुष्य इसी जीवन में, शरीर के नष्ट होने से पहले, काम और क्रोध से उत्पन्न जीव आवेगों को सहन और नियंत्रित कर लेता है, वही वास्तव में योगयुक्त और सुखी मनुष्य है। आत्मसंयम केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि भीतर उठने वाले आवेगों पर विजय है। मुक्ति मृत्यु के बाद की वस्तु मात्र नहीं, बल्कि जीवन में ही मन की शांति प्राप्त करना है।







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