मेरी माँ....मेरा बचपन....मेरा सामाजिक जीवन..मेरा साहित्यिक संसार.. मेरी एक दुनियां एवं मेरे जीवन के विविध आयाम ।
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साहित्य और अध्यात्म की बेल कहीं न कहीं से मेरे मन में, मेरी माँ के द्वारा ही विरोपित की गई थी । उनकी ( माँ ) यह अभिरुचि कब मेरी अभिरुचि बन गई यह नहीं कह सकता लेकिन मैंने बचपन मे अपने माँ के सानिध्य में रहते हुए इस चीज को तो अवश्य महसूस किया था कि पढ़ना,आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होना और उसके अनुरूप अपने जीवन में उसे उतारना, हमारे संस्कारों की यात्रा है । जहाँ तक मैं जब इस वीडियो को आपको दिखा रहा था तो वीतराग महात्मा श्री श्री 1008 श्री स्वामी स्वतंत्रतानंद जी महाराज द्वारा रचित तत्वदर्शनी गीता टीका की पवित्र पुस्तक मेरे हाथ में थी और मैं जो बात मै कर रहा था और जिस श्री सूर्य नारायण सिंह की बात कर रहा था, वह कोई और नहीं थे, वे मेरे नाना जी थे और मेरे नाना जी के संस्कार और उनकी रुचि और उनके जीवन जीने की शैली इस सब का प्रभाव मेरी माँ पर पड़ा और माँ के बाद शायद मुझे लगता है कि ये सारी चीजे इस तरह से नीचे उतर कर चली आयीं । मेरा बचपन माँ के साथ बीता तो मुझे लगता है कि जो कुछ भी मैं आज लिखता हूँ या अपनी कलम चलाता हूँ तो उस साहित्य में आध्यात्मिक पुट और अध्यात्मिक दर्शन जो दर्शन होते हैं,वह सब बचपन में माँ के सानिध्य में उसके द्वारा पढ़े गए गीतों, भजन, श्रीमद् भागवत गीता के प्रति उसकी आकर्षण रामायण, नारी कल्याण, श्री रामचरितमानस, श्री राधेश्याम रामायण आदि का वाचन यह सब कुछ, मुझे अपने माँ से मिला। आज संयोग से मातृ दिवस है मातृ दिवस के इस अवसर पर मैं अपनी पूज्यनीया मां को प्रणाम करता हूँ ।
एक वार्ता के दौरान डॉ.शिवम तिवारी ने जब मुझसे पूछा , या एक लंबी प्रश्नावली के माध्यम से मेरे मार्गदर्शक साहित्यिक प्रेरणा स्रोत डॉ. महेश दिवाकर जी ने जब यह जानना चाहा था कि मेरे अंदर यह साहित्य कहाँ से आया, तो मैंने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि आज मेरा साहित्य जो कुछ भी है वह मेरी माँ के कारण ही है। यह मेरी माँ में कहां से आया तो वह उसका पूरा श्रेय मेरे नाना जी तक जाता है । मेरा ननिहाल उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया के तहसील रुद्रपुर के सन्नीकट ग्राम अकटहा में है , जो श्रीनेत वंशीय ( सूर्यवंशी) क्षत्रियों का गांव है।
मेरा जन्म संवरा बलिया में हुआ जहाँ हमारी पारिवारिक विरासत थी । यहां पर खेती-बारी, अध्ययन अध्यापन, के साथ-साथ कुश्ती पहलवानी या फिर सामाजिक रूप से अपने रुतबे को एक ऐसे आदर्श के रूप में रखने की परंपरा थी, जिसकी सुगंध कोसों तक जाए। यानि परिवार का संस्कार इतना उच्च हो कि उसे और उस परिवार को कई कोसो तक लोग जाने । कुछ ऐसी ही परंपरा का परिवार मेरे गांव का परिवार था । मेरे बाबाजी और विशेष रूप से मेरे छोटे चाचा जी श्री उदय शंकर सिंह जो हमारे गांव संवरा के अट्ठारह वर्षो तक प्रधान रहे, उनकी जीवन शैली और उनके कार्य करने की पद्धति और मेरे ननिहाल पक्ष की संस्कृति कुछ अलग थी।
इन दोनों संस्कारों और संस्कृतियों का प्रभाव मैं कहीं न कहीं अपने जीवन में पाता हूँ । मेरे भीतर जो सामाजिकता है वह मुझे मेरे परिवार यानी मेरे पिताजी के पक्ष से मिला, जहां हर छोटे बड़े तबके के लोगों के साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हुए सब की भावनाओं का आदर करते हुए, सब के दुख सुख में भागीदारी करते हुए, अपने को स्थापित किया जाता है यह सब मुझे अपने पितृ पक्ष यानी अपने पिताजी के परिवार से मिला, पूर्वजों के समय में शायद हमारे परिवार में एक मलिकार बाबा होते थे उनके पास ऐसे संस्कार थे और फिर यदि अपनी पीढ़ी में कहें तो मुझे थोड़ा बहुत जो सीखने को मिला यह मुझे मेरे अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला।
यदि मैं बौद्धिक ज्ञान की बात करूं तो बौद्धिक ज्ञान मुझे अपने चाचा श्री शिवशंकर सिंह श्री शिवजी सिंह से मिला और सामाजिक ज्ञान अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह से मिला । मेरे छोटे चाचा श्री उदयशंकर सिंह जी जैसा व्यक्तित्व का व्यक्ति बिरले,ही पैदा होते हैं यह मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूं ।
अपने परिवार के दो संस्कारों की अगर बात करे तो हमारा परिवार में जो कि एक कलचुरी बंशीय क्षत्रिय परिवार है, इसमें आदर करने का भाव जबरदस्त था । हमारे परिवार में ब्राह्मण के प्रति बहुत सम्मान था और ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय होते थे। हमें ब्राह्मण का कितना सम्मान करना चाहिए, किस प्रकार करना चाहिए इसका ज्ञान मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जी से मिला। यही कारण है कि मेरे मन में भी ब्राह्मण एवं गुरुजनों के प्रति असीम स्नेह है ।
होली जैसे त्योहारों पर पंडित जी को आदर के साथ अपने घर बुलाना, उन्हें बैठना, उनको प्रसाद ग्रहण कराना और फिर उनको विदा करना, ये सारे संस्कार, मेरे चाचा शिवजी सिंह से मिले थे।
वही समाज के हर एक वर्ग के प्रति चिंता करना, उनके दुख दर्द को महसूस करना,उनकी मदद करना, हर छोटे -बड़े गरीब अमीर के घर जाना,जाति बिरादरी के विभेद से दूर होकर, सबकी मदद करना, और सबका प्रिय होना, यह सामाजिक ज्ञान मुझे अपने सबसे छोटे जैसा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला ।
उनके आहाते में कौन व्यक्ति कहाँ का है, किस बिरादरी का है, किस गांव का है,कितने लोग बैठे हुए हैं,यह समझ पाना और सबको एक साथ, लेकर चलना उनसे सीखा जा सकता था।
छोटी-छोटी गतिविधियों और क्रियाकलाप हमारे संस्कारों को परिवार को श्रेष्ठता प्रदान करती है । उदाहरण स्वरूप, मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जब रोड से घर की तरफ चलते थे तो उस समय उनके पाकेट में कुछ चॉकलेट,कुछ सिक्के हुआ करते थे । गाँव छोटे-छोटे बच्चे जो छोटे -छोते घरों से, हर तपके के लोगों के बच्चे होते थे जिनकी उम्र यही 2 साल 3 साल 4 साल 5 साल 6 साल होती थी वह उनके पास आते थे, उनको पैर छु कर प्रणाम करते थे, वे उनको एक टॉफी देते थे, या पैसे पढ़ते थे या आशीर्वाद दे देते थे । वे सबसे मिलते हुए चलते थे ।इस प्रकार वे बच्चों के भी लोकप्रिय थे ।
गांव के किसी भी जाति बिरादरी उच्च नीच,अमीर गरीब किसी के घर में जब शादी होती थी तो शादी में बेटी के अंतिम सिंदूरदान तक रुकना, सारे ब्राह्मणजन और पौनी जन को दक्षिण दिलाना, बाहर से आए हुए किसी भी जाति बिरादरी के बाराती को बराती से ज्यादा अपने गांव का अतिथि समझ कर सम्मान देना, मेरे चाचा की सबसे बड़ी विशेषता होती थी ।
वहीं मेरे छोटे चाचा की मदद का तरीका कुछ और होता था किस रूप में शारीरिक या आर्थिक रूप से, कहां और कैसा मदद कर रहे हैं, यह कोई जान नहीं पता था लेकिन मदद तो करते थे, यही कारण था कि यह सारे लोग उनके मुरीद हो जाते थे । हर जाति और वर्ग के लोगो का प्रेम कैसे पाया जाता है, कोई उनसे सीखे ।
शायद मेरे जीवन में भी इसका बड़ा प्रभाव रहा जब तक मैं जनपद बलिया में रहा हर छोटे-बड़े के दुख सुख में जाना और कौन बीमार है, किसको दवा की जरूरत,है किसको क्या मदद की जा सकती है,यह सब कुछ संस्कार मुझे मेरे अपने परिवार से ही मिला है ।अपने चाचा और अपने परिवार के इन्हीं संस्कारों का प्रभाव शायद मेरे व्यक्तित्व पर पड़ा होगा इसीलिए मैं मेरे मन में प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समाज के हर एक व्यक्ति के प्रति विशेष प्रेम अनुराग आज भी है । यदि मैं बहुत नजदीक जाकर अपने व्यक्तिगत जीवन को देखूं तो मेरे जीवन में मेरे भाई श्री चंदेश्वर प्रताप सिंह जिन्हें मैं पिता तुल्य मानता हूं उनका अपरोक्ष सहयोग सदैव मिला । वह मेरे लिए ध्वज दंड के स्वरूप है । जिस प्रकार एक दंड ( डंडा ) ध्वज के भीतर छिपा रहता है, ध्वज फहरता है । लेकिन वह ध्वज कहीं न कहीं उस दंड के सहारे ही फहरता है ।
यदि सामाजिक प्रतिष्ठा की बात करें तो उम्र कम होने के बावजूद भी गांव के इर्द-गिर्द के सम्मानित लोगों के बीच बैठना, उनसे बात करना, उनके प्रति अपने मन के आदर भाव को प्रदर्शित करना मेरा व्यक्तिगत स्वभाव होता था । आसपास के गांव के सम्मानित जान जिनकी उम्र मुझे काफी अधिक हुआ करती थी लेकिन वह भी हमसे बहुत प्रेम करते थे और हमारे मन में उनके प्रति बहुत आदर था ।
विभाग और विभाग से जुड़े हुए लोग मुझसे बहुत प्रिय प्रेम करते थे। यह नहीं की जो फार्मासिस्ट है वही प्रेम करें, स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति बहुत स्नेह करता था । बलिया से स्वास्थ्य विभाग का कोई अधिकारी कर्मचारी कोई व्यक्ति जिसकी गाड़ी लखनऊ की तरफ, रसड़ा की तरफ या अन्य किसी तरफ जा रही हो और रास्ते में यदि संवरा चट्टी आ गई तो वह गाडी रुकती थी, वे लोग हमारे गांव की दुकान पर चाय पीते थे, और कहते थे कि यह किसका गांव है यह राजेश सिंह का गांव है । मैं उसे वक्त रहूं या ना रहूं श्याम लाल की दुकान तो रहेगी न, धूमन तो रहेंगे न। यह सब कहीं ना कहीं मुझे समाज से जोड़ता था । मेरे नामौजूदगी में बड़े भैया डॉक्टर शमशेर सिंह और मेरे और दूसरे भाई श्री कमलेश्वर प्रताप सिंह ( मुन्नू भईया,) जो अब इस दुनिया में नहीं रहे वे बिना कुछ समझे,केवल यह जान जाते थे कि मेरा परिचित कोई आ रहा है तो उसको वही आव भगत मिलता था जो मेरे रहने पर मिलता था । इस कार्य को मेरे भतीजे.डा पंकज कुमार सिंह, आज भी बाखूबी निभाते हैं।
मुझे एक वाकया याद है एक बार श्री बीपी मिश्रा जी और मेरे यूनियन के महासचिव डा. के के सचान,बलिया एक दौरे पर जा रहे थे और मैं लखनऊ में था मैंने उनसे कहा कि बीच में मेरा गांव पड़ता है आप वहां रुक सकते हैं । वे लोग वहां रुके, और जिस प्रकार का आदर्श सम्मान उनको मिला उसकी चर्चा वे बाद तक करते रहे ।
अभी विगत दिनों में गांव गया था और मैंने अपने गाड़ी का खलीलपुर की तरफ मोड़ दिया मेरी इच्छा थी कि उस पीढ़ी को जिस पीढ़ी के साथ हमने बहुत सीखा था, जिनमें से बहुत थोड़े लोग आज भी है उनसे मिलना और उनसे मिलकर बात करना मुझे अच्छा लगता है । मैं खलीलपुर पहुंच गया खलीलपुर के प्रधान जी श्री रमाशंकर सिंह जी घर पर थे गौरीशंकर सिंह जी से मुलाकात नहीं हो पायी । परिवार के बच्चे हमारे कुल पुरोहित चौबे जी, और परिवारजन वहां मौजूद थे, वास्तव बड़ी सुखद अनुभूति हो रही थी । या तो हमारे पिता पक्ष का प्रभाव था ।
दूसरा पक्ष, मेरे ननिहाल पक्ष का है जहां पर शिक्षा, जीवन शैली, पहनावा वेशभूषा, बात करने की तौर तरीके, सब कुछ कहीं ना कहीं भिन्न थे, लेकिन यह सारे गुण मेरे भी अंदर कहीं न कहीं वहीं से आए । सबसे खास और विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष तो ननिहाल से ही आया। यानी मेरे साहित्य के पीछे कहीं न कहीं मेरे ननिहाल पक्ष मेरे मेरे नाना जी का प्रभाव है ।
आज वर्तमान में मैं जिस जिंदगी को जी रहा हूं या अपनी सेवा अवधि जहां समाप्त करने के मोड पर खड़ा हूं , यहां दो प्रकार के व्यक्तियों का समावेश रहा । दो प्रकार के बौद्धिक साथियों का साथ रहा जिसमें एक वर्ग फार्मासिस्ट है । राजकीय सेवा में आने के बाद में डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन से जुड़ गया और जनपद इकाई बलिया के डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन का अध्यक्ष 12 वर्षों तक रहा, प्रदेश उपाध्यक्ष रहा, प्रदेश संगठन मंत्री रहा। आप इसे समझ सकते हैं कि फार्मासिस्टों के बीच मेरी पकड़, उनके साथ मेरा बात- व्यवहार किस हद तक कितना था और वे लोग कितने मेरे प्रिय थे,यह मेरा दिल ही समझता है।
यद्यपि आजकल मैं उस दिशा में उतना सक्रिय नहीं हूँ, यह यू कहिए कि मैं संगठन अभी काफी दूर हूँ और साहित्य एवं क्षय उन्मूलन प्रोग्राम के नजदीक हूँ । ऐसे में स्वाभाविक सी बात है कि क्षय उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े हुए मेरे प्यारे साथियों का सहयोग मुझे मिलता है उनसे बात करता हूँ साथ ही साथ साहित्य दुनिया से जुड़े हुए लोग भी मेरे मित्र हैं।
यदि मैं उत्तर प्रदेश की टीबी ड्रग टीम की बात करूं तो ड्रग टीम के जो जनपदों के साथी हैं, वह मेरे लिए कोई हमारे सरकारी विभाग में काम करने वाले साथियों के साथ जो संबंध है उसके कारण नहीं है। उनके साथ मेरे संबंध आत्मिक एवं पारिवारिक संबंधों जैसे संबंध है । पिता पुत्र, भाई-भाई, मित्र जैसे संबंध है। जिसका कारण यह है कि वह मुझसे बात करना चाहते हैं,मैं उनसे बात करना चाहता हूं,वह मुझे देखना चाहते हैं,मै उनको देखना चाहता हूं, वह मेरे पास रहना पसंद करते हैं, मुझे सुनना पसंद करते हैं यही सब सामाजिकता है । यही सब चीज आती तक याद की जाएगी सेवानिवृत्ति के बाद भी मेरे जेहन में बनी रहेगी मेरे साहित्य में बनी रहेगी मेरे कलम के साथ चलती रहेगी ।
यदि मैं साहित्यिक दुनिया की बात करूँ तो साहित्य में श्री रामदेव धुरंधर जी जैसे अनेकों ऐसे साहित्यकार मेरे जीवन में आए जिन्होंने मुझे साहित्यिक कलम पकड़ा दी और आज जो कुछ भी लिख रहा हूँ या यह कहिए कि इस आलेख को ही यदि लिख रहा हूं तो इसके पीछे इन बड़े साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका है । इनकी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि मैं सबका नाम नहीं ले सकता, लेकिन मेरी कृतज्ञता उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में आधार है, जिन्होंने मुझे साहित्य ज्ञान एवं संबल प्रदान किया ।
इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि विविध आयामों के साथ मेरी एक दुनिया है। जो अत्यंत दिव्य, भव्य और चीरकाल तक याद रखने वाली, दुनिया है।
सादर
©® राजेश श्रेयस