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lav Lav Tiwari ( लव तिवारी )

Lav Tiwari On Mahuaa Chanel

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मंगलवार, 5 मई 2026

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन श्री माधव कृष्ण ग़ाज़ीपुर

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन

हम किस पार्टी के समर्थक हैं, से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब लोकतंत्र का हाथी अंगड़ाई लेना शुरू करता है तो यह कहना कठिन होता है कि वह कहां जाकर बैठेगा। और इसे स्वीकार करना लोकतन्त्र है। तमिलनाडु में एक फिल्मी अभिनेता पहली बार चुनाव लड़ता है और जनता उसे हाथो हाथ ले लेती है। आप कैसे कहेंगे कि जनता मूर्ख है? इस अहंकार से मुक्त होने के लिए लोकतंत्र की जमीन की तरफ देखना होगा।

(१)
आज बात पश्चिम बंगाल की, और उस जमीन की जिसे मैंने अपनी बंगाल यात्रा के दौरान छूकर महसूस किया था! कोलकाता में मैं होटल ग्रैंड हयात में रुका था। फाइव स्टार होटल, फाइव स्टार क्षेत्र, लेकिन सामने सड़क की दूसरी तरफ अनधिकृत चॉल, बिल्कुल फुटपाथ पर। और एक या दो नहीं, लंबी चौड़ी कई किलोमीटर तक फैली हुई। हर चाल में कुछ कैरम खेलते लोग, फुटबॉल का छोटा सा मैदान और तृणमूल कांग्रेस का कार्यालय।

एक सप्ताह के अंदर कम से कम ३ जुलूस देखा जो उन चालों से निकलकर तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सड़कों पर चलता था। चाय पीने के लिए जब हम बाहर दुकानों पर जाते थे तो पता चलता था कि आमजन इन लोगों से कितने त्रस्त हैं! यहां पर वर्ग संघर्ष की बात नहीं है, क्योंकि ये बातें चाय की छोटी छोटी दुकानों पर होती थीं, ये बंगला भाषी सामान्य गरीब लोग थे। उनका कहना था कि ये लोग बांग्लादेश से आकर यहां बसाए गए हैं और उनकी विवशता है तृणमूल कांग्रेस को अपना समर्थन दिखाना रोज रोज।

(२)
श्रील चैतन्य महाप्रभु के नवद्वीप और नदिया का दर्शन करते समय हम लोग चम्पाहाटी गए। यह एक जंगल जैसा ग्रामीण क्षेत्र था। यहां चैतन्य महाप्रभु अपने प्रिय पार्षद गदाधर के साथ श्रीकृष्ण-चिंतन करने आते थे। वहां एक बड़ा सा मंदिर है। उस मंदिर के चारों तरफ इस्लाम मतावलंबी लोगों का गांव बसता जा रहा है। वहां के पुजारी जी ने बताया था कि इन लोगों को सरकार यहां लाकर बसा रही है।

समस्या इस्लाम से नहीं। भारत के मुसलमान हैं तो कहीं भी जाकर बस सकते हैं। लेकिन पुजारी जी ने बताया कि बांग्लादेश के मुस्लिमों को यहां बसाया जा रहा है। वे आए दिन परेशान भी करते हैं। जब हम वहां से निकल रहे थे तो हमने वहां एक बड़ा सा बोर्ड देखा, एक कार्यालय के बाहर। उस पर लिखा था, रिफ्यूजी सेटलमेंट कमिश्नर। अर्थात शरणार्थियों को बसाने वाले विभाग के आयुक्त। फिर हमें समझ में आया कि पुजारी जी सही कह रहे हैं और तृणमूल कांग्रेस की सरकार बड़े सुनियोजित तरीके से यह काम कर रही है।

(३)
कोलकाता में रहने वाली एक गाजीपुर की बिटिया ने अपने बेटी का एडमिशन केवल एक साल के लिए द प्रेसीडियम में करवाया। उनके पिता जी मेरे बड़े भाई के सदृश हैं। मैंने केवल एक साल का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि, उनकी कॉलोनी के किसी लड़के का बाहर के किसी मुस्लिम से झगड़ा हो गया। सिक्योरिटी होने के बावजूद अवैध कॉलोनी में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थी झुंड बनाकर उनकी कॉलोनी में आए और हर घर पर पथराव किया।

पुलिस ने कुछ नहीं किया। उनके पति इतने डर गए थे कि उन्होंने एक साल के लिए अपने परिवार को गाजीपुर में भेज दिया। उनकी नौकरी थी इसलिए वे नौकरी छोड़ नहीं सकते थे। ये तीन मेरे व्यक्तिगत अनुभव हैं लेकिन समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, चैनल में हमने जो कुछ सुना देखा है, यदि उसे गोदी मीडिया कहकर खारिज भी कर दें, तो आखिर क्या वहां से आ रहे दृश्य, वीडियो, मुर्शिदाबाद के दंगे, विस्थापन, मृत्यु के आंकड़े, क्या ये सब गलत हैं?

बहुत अच्छा हुआ कि केंद्र सरकार ने चुनावी हिंसा के कारण प्रदेश सरकार को बर्खास्त नहीं किया जबकि इसकी मांगें उठती रहीं। केंद्र सरकार यदि ऐसा करती तो वह जनभावनाओं के विपरीत होता और केवल अपने वोटबैंक की भावनाओं अनुकूल होता। लगभग ८० प्रतिशत सीटें जीतने के लिए यह आवश्यक था कि बंगाल का सामान्य जन समुदाय उस सरकार के कार्यों और नीतियों को अपनी आंखों से देख सके, कानों से सुन सकें और आत्मा से महसूस कर सके। भाजपा और संघ जमीनी लड़ाई लड़ते रहे, लोकतांत्रिक तरीकों से जमीन तलाश करते रहे और जनजागरण करते रहे।

पंद्रह वर्षों तक ममता सरकार के साथ खड़े रहने के बाद जनता को परिवर्तन की आवश्यकता महसूस हुई। मुझे पिछले चुनाव के समय, वागर्थ के संपादक शंभूनाथ जी के साथ हुआ अपना फेसबुकिया संवाद भी याद आ रहा है। चुनावी हिंसा के समर्थन में लिखे उनके एक पोस्ट पर मैंने प्रश्न किया कि, क्या आप इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं। उनका उत्तर था कि, तृणमूल वाले बैठकर केवल ताली तो नहीं बजाएंगे। जब मैंने उनसे पूछा कि, क्या वामपंथी हिंसक चरित्र को तृणमूल में अपनी हिंसा का विकल्प दिखाई दे रहा है?

उन्होंने मुझे ब्लॉक कर दिया और यही अनुभव मेरठ विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर विद्या सागर सिंह के साथ भी हुआ। उन्हें भी वागर्थ के माध्यम से संवाद, विमर्श और ऊंची बातें करने वाले शंभूनाथ जी ने असहज प्रश्नों पर ब्लॉक कर दिया। बहरहाल, इसी बहाने मेरी विद्यासागर सर से बौद्धिक मित्रता हो गई। और वागर्थ के संपादकीय की निरर्थकता समझ में आ गई। एक प्रसंग से कितने प्रसंग जुड़े रहते हैं! सब याद आ जाता है।

और आज, लोकतंत्र के हाथी के नृत्य का पर्व है। कुछ भी अकारण नहीं होता, हमें अपनी आंखों को खुला रखना होगा और खुद देखना होगा।

माधव कृष्ण, द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी बड़ी बाग लंका गाजीपुर



मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

मैं वह सूरज हूं न डूबेगी जिसकी किरन रात होगी तो सितारों मे बिखर जाऊंगा शायर खामोश गाज़ीपुरी लेखक उबैदुर्रहमान सिद्दीकी

मैं वह सूरज हूं न डूबेगी जिसकी किरन
रात होगी तो सितारों मे बिखर जाऊंगा

शायर खामोश गाज़ीपुरी ..... 🔮
उबैदुर्रहमान सिद्दीकी

शहर के मुहल्ला सट्टी मस्जिद में खामोश ग़ाज़ीपुरी के घर का सामने मैं खड़ा हूँ. बचपन से उन्हें कमरे में बैठे देखता, कभी कुछ लिखते, कभी गुनगुनाते हुए सुनता या किसी गजल को सजाने संवारने में उनपर नजर पड़ती. यह हमारे जनपद के एक शलाखा शायर खामोश गाज़ीपुरी थे. असल नाम मुज़फ्फर हुसैन था और पिताश्री मुनव्वर अली थे.

खामोश गाजीपुरी का जन्म 25 अप्रैल 1932 में मोहल्ला सट्टी मस्जिद के एक सामान परिवार मे हुआ. उनके उस्ताद कलीम गाजीपुरी ने "नया दौर " नामक पत्रिका मे लिखा कि "खामोश कोई बड़े बाप के बेटे नहीं थे, बल्कि एक मेहनतकश मां बाप के बेटे थे. मैने उन्हें उंगली पकड़ कर 1939/40 में चश्मय रहमत ओरिएंटल कालेज मे प्रवेश कराया, लिखाया पढ़ाया. सरोश मछलीशाहरी के शागिर्द थे और उन्ही के सानिध्य मे रहकर शेर शायरी के उतार चढाव के फन को सीखा. फिर वह 1945 से 1980 तक कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों की धड़कन बनकर उभरे. उनकी गजल रचना की विशेषता थीं कि वह ऐसे शब्दों को चुनते जिसे एक आम आदमी या रिक्शा चालाने वाला भी समझ सके. यही विशेषता उनकी लोकप्रियता का कारण बना. फिर ऐसी लोकप्रियता थीं कि गाजीपुर के किसी अन्य शायरों के नसीब में नहीं आई. राही मासूम रज़ा के बाद आप इकलौते शायर थे जिन्होंने गाजीपुर के नाम को कवि सम्मेलन और मुशायरे की दुनिया में स्थापित किया.

खामोश ग़ाज़ीपुरी का यह शेर जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ :

कभी उनका छुप के हंसना कभी खुल कर मुस्कराना
मेरी आंख डबडबायी, उन्हें मिल गया बहाना

जब मुझको न पाएगा पैमाना पुकारेगी
साकी न सही लेकिन मयखाना पुकारेगा
अफसोस नहीं मुझको कुछ शमा के बुझने का
ग़म यह है कि अब किसको परवाना पुकारेगा

खामोश साहब हमेशा जिंदगी की उलझनों से झूझते रहे और आगे बढ़ते रहे. उनके जीवन में एक ऐसा लम्हा भी आया जब उन्हें बेरोजगार होना पड़ा. धन अर्जन के लिए एकमात्र सहारा कवि सम्मेलन तथा मुशायरे था. कम समय में उन्हें हिन्दुस्तान के बड़े कवि सम्मेलनों और मुशायरों के मंचों पर अग्रिम पंक्तियों के शायरों में जैसे कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, मजरूह सुल्तानपुरी जिनकी तूती बोलती थी, साथ लाखड़ा किया. शकील बदायूनी और साहिर लुधियानवी के चाहितें बने. जहाँ मुशयरा या कवि सम्मेलन होता, खामोश को बुलाते थे.

खामोश की विशेषता थीं कि जैसी ग़ज़ल होती, अपनी लय को उसी स्केल मे ढाल देते थे और वही लय ग़ज़ल की अंतिम पंक्ति तक बनी रहती. और यही कंठ से फूटी उनकी लय मन के अन्तःस्थल को छू जाया करती.गज़ले पढ़ने की उनकी अपनी एक शैली थीं.

उनके समय दरी पर बैठकर कवि सम्मलेन और मुशायरा सुनने का रवाज था. ज़ब वह मंच पर आते, लोकप्रियता का आलम यह था किपंडाल मे बैठे लोग खडे होकर उन्हें सम्मान देते थे. मैने उन्हें 1978/79 तथा 1980 में आयोजित मुशायरों में सुना है. रिक्शा चलाने वाले उनकी कविताओं को कई दिनों तक चलाते समय गाते रहते थे. वह लिखते है :

यह महकता हुआ संदल की तरह उनका बदन
जैसे खुशबू भी इक इंसान बना दी जाए.
रात अँधेरी अगर है तो गलती रात की है
किया सितम है कि चिरागो को सजा दी जाए

आगे लिखते हैँ :

इक हूक उठ रही है दिले बेक़रार मे
कौन आ रहा है छुप के लिबास- बहार मे
अच्छा हुआ कि दर्द ने चौका दिया मुझे
कुछ नींद आ चली थीं शबे इंतिज़ार मे
खामोश क्यूँ चमन कि फ़िज़ा है धुआँ धुआँ
जलता ना हो किसी का नशेमन बहार मे

कहा जाता है कि खामोश साहब किसी युवति को दिल दे बैठे थे. कुछ दिनों के बाद उन्हें पता चला कि उसने शहर के एक धनाढ्य व्यपारी से शादी रचा ली, इस खबर से उनका दिल टूट गया, फिर कई गज़ले लिखी. उसी मे यह भी एक थीं:

डूब जाने दो मेरे दिल को पयमाने मे
ज़िन्दगी क्या है यह सोचूंगा तो मर जाऊंगा

खामोश साहब की यह भी एक ग़ज़ल थीं :

हमें काश तुम से मुहब्बत न होती
कहानी हमारी हक़ीकत न होती
न दिल तुम को देते न मजबूर होते
न दुनिया न दुनिया के दस्तूर होते
क़यामत से पहले क़यामत न होती
हमीं बढ़ गये इश्क़ में हद से आगे
ज़माने ने ठोकर लगायी तो जागे
अगर मर भी जाते तो हैरत न होती
तुम्हीं फूँक देते नशेमन हमारा
मुहब्बत पे अहसान होता तुम्हारा
ज़माने से कोइ शिकायत न होती

यह ग़ज़ल तत्कालीन प्रसिद्ध पत्रिका " शमा ", दिल्ली, अंक अक्टूबर 1952 मे प्रकाशित हुई. ज़ब फ़िल्म मुग़ल आज़म सिनेमाहाल मे लगी तो उसके सभी गाने हिट हुए थे. बगैर बताये शकील बदायूनी ने खामोश साहब की प्रकाशित ग़ज़ल को अपने लिखें गानों के तौर पर लिया. ज़ब उपरोक्त खामोश की ग़ज़ल फ़िल्म के गाना के तौर पर रिलीज हुआ तो खामोश साहब को और उनके मित्रो को मालूम हुआ.

उनके परम मित्रों में उआ समय वकील भैरोनाथ वर्मा, वकील कमलाकांत चौबे, मुफलिस गाज़ीपुरी, डाक्टर उमाशंकर तिवारी, वकील इशरत जाफरी, खलिश ग़ाज़ीपुरी आदि लोगो ने मिलकर रेजिस्टर्ड डाक से शकील बदायूनी मुंबई को एक नोटिस भेजा," क्यूँ ना आपके खिलाफ कोर्ट केस किया जाए." नोटिस पाते ही तुरंत शकील बदायूंनी ने अपने आदमियों को मुंबई से गाजीपुर भेजा जो आकर खामोश से मिले. 3500 रुपिया का एक लिफाफा उन्हें दिया, जिसमे अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए लिखा कि "मेरी इज़्ज़त तुम चाहे उछाल दो या बदनामी से मुझे बचा लो, अब तुम्हारे हाथ मे है. निःसंदेह यह गजल तुम्हारी है लेकिन फिल्म "मुगल आजम" के सीन के अनुसार गाने की डिमांड थी, इसलिए लें लिया ".

खामोश चुंकि मन के बड़े उदार और सज्जन शायर थे. जवाब लिखा कि, " मैंने लाख अपने मित्रों को मना किया, मुझे बगैर बताय न जाने कब नोटिस भेज दिया, आप परेशान न हों, मै उनसे बात करता हूं.".

1962 में हिंद चीन युद्ध के समय लाल किला दिल्ली में मुशायरा का एक आयोजन हुआ जिसमें लता मंगेशकर के साथ नामचीन कवियों और शायरो का जमावड़ा था. खामोश गाजीपुरी ने ज़ब यह कविता पढ़ी तो लोग जोश मे आकर उठ खड़े हो गए तथा एक एक बंद को कई बार सुना :

ताज - अजंता के निगहबान हैं हम
न हिले जो किसी ताकत से वह चट्टान है हम
न उलझ हमसे की ठहरा हुआ तूफान हैं हम
जो भी तूफान से उलझता है कुचल जाता है
जो भी चट्टान से लड़ता है मसल जाता है
तू भी टकराएगा हमसे मसल जाएगा
जंग की आग से खेलेगा तो जल जाएगा
सारा कस बल तेरी फौजों का निकल जाएगा
तुझको गुलशन की कोई शाख नहीं दे सकते
जान दे सकते हैं लद्दाख नहीं दे सकते हैं.

हास्यस्पद बात यह रही कि शहर के लोगो ने उनका मज़ाक भी खूब उड़ाया जैसे डाक्टर राही मासूम रज़ा का  (1952 तक ) टांग मे टीबी होजाने से भचक के चला करते थे, उनका भी उपहास उड़ाते रहे. उआ समय अधिकतर शायर - कवि माईक पर जाने से पहले थोड़ा सा जाम लें लिया करते थे, इसपर खामोश साहब का भी राह चलते मज़ाक उड़ाते, यह पंक्तिया लिखी :

लोगो की फितरत क्या कहिए अब मुझको शराबी कहते हैं
हालांकि मुझे मयखाने की खुद राह दिखाई लोगों ने

खामोश साहब की कई ऐसी गजलें है जो देश विदेश मे लोकप्रिय हुई थी. बेहतरीन गजल गायकों ने उनकी गज़लो को सुरों मे ढाला है जैसे मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने उनकी कई गज़ले गई, उनमे एक यह है :

उम्र जलवों में बसर हो यह जरूरी तो नहीं
हर शबे ग़म की सहर हो यह जरूरी तो नहीं
सबकी नजरों में हो साकी यह जरूरी है मगर
सब पे साकी की नज़र हो यह जरूरी तो नहीं
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है
उनकी आगोश में सर हो यह जरूरी तो नहीं

जगजीत सिंह ने खामोश साहब की इस गजल को गाकर अमर कर दिया:

देर व हरम में बसने वालों
मायखवारों में फूट न डालो 
आरिज लब सादा रहने दो
ताजमहल पे रंग न डालो

उबैदुर्रहमान
गाजीपुर


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

गांव कटरिया ब्लॉक करण्डा जिला ग़ाज़ीपुर की दुर्घटना- श्री माधव कृष्ण



कटरिया गांव की दुर्घटना

अभी तक इस दुर्घटना पर जितने भी पोस्ट पढ़े हैं, उनमें से अधिकतम या तो किसी जाति के विरुद्ध हैं या किसी पार्टी के विरुद्ध हैं या किसी व्यक्ति के विरुद्ध हैं!

तो जो लोग इसे ब्राह्मण या विश्वकर्मा या ठाकुर की दृष्टि से देख रहे हैं, वे गलत हैं। जो लोग इसे भाजपा या सपा की दृष्टि से देख रहे हैं वे भी गलत हैं।

जब दुर्घटना हो चुकी है तो इसको जातीय दृष्टिकोण से देखना बंद करना होगा। पीड़ित पक्ष को न्याय और अपराधी को सजा, यही न्यायसंगत है। लेकिन यह तय कौन करेगा?

निःसंदेह, यह तय करना पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका का कार्य है। फिर राजनैतिक दलों की क्या भूमिका है? राजनैतिक दलों की एकमात्र भूमिका है, यह सुनिश्चित करना कि किसी की आवाज न दबे।

लेकिन यह कार्य कैसे करना होगा? क्या संख्या और शक्ति का प्रदर्शन करके? या बड़े संवेदनशील तरीके से शांतिपूर्वक सौहार्द्र को बनाए रखते हुए? किसी भी कार्य को करने का कौशल ही मुख्य है।

शक्ति प्रदर्शन की तो इतनी बुरी स्थिति है कि अब लोग शादियों में भी उन नेताओं को बुलाते हैं जिनसे उनका कोई संबंध नहीं, और नेता जी लोगों को शादियों में जा जाकर हाजिरी लगानी पड़ रही है।

बहरहाल, काम तो सब कर लेते हैं। लेकिन कुछ लोग काम को कुशलता से करते हैं, सोच समझकर करते हैं, समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखकर करते हैं।

जो लोग मीडिया या सोशल मीडिया ट्रायल कर रहे हैं, उनके पास सूचनाएं नहीं हैं, तथ्य नहीं हैं, सही कौन है और गलत कौन है इसका ज्ञान भी नहीं है, लेकिन उनके पोस्ट्स में विष भरा हुआ है।

यह समय है सतर्क रहने का, सावधान रहने का, साथ रहने का, और वह साथ है सत्य न्याय धर्म का। पुलिस अपना काम कैसे करेगी यदि वह इस घटना पर हो रहे बवाल में ही अपनी ऊर्जा क्षय कर रही है?

पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से काम करने दीजिए। सोशल मीडिया पर बिना किसी तथ्य के विष वमन मत कीजिए। यदि आप पीड़ित के लिए न्याय और अपराधी के लिए सजा चाहते हैं तो आपको भी अपना दायित्व निभाना होगा।

तमाशबीन बनिए लेकिन बिना मतलब के भ्रम मत पैदा कीजिए। हम जब प्रमाणपत्र देना शुरू करते हैं किसी जाति या दल या व्यक्ति को, तो समझ लीजिए कि हम स्वयंभू ईश्वर बनना चाहते हैं लेकिन ईश्वर तो ईश्वर है।

इतना भरोसा तो रखना पड़ेगा कि उसके घर देर है अंधेर नहीं। और यह भी कि बाबा साहब के संविधान से किसी का अहित नहीं होगा। शक्ति प्रदर्शन के बेहतर रास्ते तलाशने होंगे।

माधव कृष्ण, २३.४.२६


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

हुस्न से इश्क का सदियों से ये रिश्ता है कैसा, खाक होने के लिए हम एक-दूजे से प्यार कर बैठे-

सनम की आंखों में हम अपना दीदार कर बैठे,
उनके रूबरू हम नजरों से यूं तकरार कर बैठे..

मत कहिए जमाने से कि लगा है दिल का रोग,
वो कहेंगे न था कोई काम तो ये रोजगार कर बैठे..

दर्द की आदत से अब यूं मजबूर हो चुके हैं हम,
अश्कों के खातिर तेरी यादों का जुगाड़ कर बैठे..

हुस्न से इश्क का सदियों से ये रिश्ता है कैसा,
खाक होने के लिए हम एक-दूजे से प्यार कर बैठे..





रविवार, 15 मार्च 2026

दुःखद, सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी

सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी और इसी के साथ नारीवादी दीदियों का गुबार फुट पड़ा....
ये कितना सही है इसपर विचार बिना हम बस इसे महिलाओं के खिलाफ मानकर विरोध पर उतर आए हैं।

हां पीरियड्स सामान्य दिनों से अलग होते हैं और विस्पर, स्टेय-फ़्री या सोफी के पैड्स लेने पर भी जैसे विज्ञापन में दिखाते हैं सैनेटरी पैड्स लेते ही लड़की ओलंपिक में पदक जीत लेती है, पिकनिक इंजॉय करती है, एग्जाम टॉप करती है या फिर मैराथन दौड़ जाती है ऐसा कुछ नहीं होता क्योंकि पैड्स महावारी के रक्त प्रवाह को सौखते हैं दर्द, क्रैम्प, थकान और जकड़न से राहत नहीं देते।
और सारी समस्याओं के साथ जांघों का छिल जाना माहवारी के बाद भी दो तीन दिन तक दर्द देता है।

पुराने समय मे महिलाओं को आराम मिल सके इसलिए चूल्हे चौके से छुट्टी दी जाती थी पर घर की बड़ी औरतों ने माहवारी की छुट्टी को एक्स्ट्रा काम का अवसर बना दिया और इन दिनों में घर की बहुये कपड़े धोना, आंगन लीपना, पत्थर फोड़ना, अनाज साफ करना, उपले बनाना मवेशियों का बाड़ा साफ करना और खेतीबाड़ी के वो भारी काम करती हैं जो आदमी अपने सामान्य दिनों में करते हैं।

उन्हें किसी ने एहसास ही नहीं दिलाया कि ये आराम का समय है तो कभी दिमाग मे आया भी नहीं कि माहवारी में आराम करना है...
धीरे धीरे महिलाओं ने खुद इसे परंपरा बना लिया कि घर के सारे अनुपयोगी काम महावारी के दिनों में करने हैं क्योंकि रसोई में नहीं खपना है।

सुप्रीम कोर्ट में बैठे जजों और आम समाज के लोगों ने अपनी दादी-नानियों को माहवारी में वही काम करते देखा है इसलिए इन्होंने आंकलन कर लिया कि माहवारी में छुट्टी देने से महिलाओं की प्रोग्रेस, कार्यक्षमता और संख्याबल कम हो जाएगा जो एक तरह से तार्किक भी है।

क्योंकि आप छुट्टी अनिवार्य कर सकते हो पर हर एक ऑफिस, विभाग और कम्पनी मालिक को महिलाओं को नोकरी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।

फिर जब किसी को पूरे तीस दिन बिना छुट्टी मांगे पूरी क्षमता से काम करने वाला आदमी मिल रहा है तो वो क्यों किसी महिला को काम पर रखेगा जिसे मासिक धर्म के नाम पर बिना वेतन काटे छुट्टी देना पड़े।

ये विषय संवेदना और नैतिकता का है,
कि जिन महिलाओं को पीरियड्स में ज्यादा समस्या हो उन्हें ऑफिस वाले संवेदना दिखाते हुए छुट्टी दें जबकि अनिवार्य करने से लोग महिलाओं को नोकरी देने से ही कतराने लगेंगे क्योंकि 90 प्रतिशत लोगों ने अपनी पुरानी पीढ़ी में महिलाओं को माहवारी में दुगना काम करते देखा है और उन्हें ये छुट्टी बस बहाना लगती है।
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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बीएचयू में भर्ती पद्मश्री डॉ. टी.के.लाहिड़ी

#बीएचयू में भर्ती पद्मश्री डॉ. टी.के.लाहिड़ी के प्रति क्यों है इतना प्रेम। कैसे प्रधानमंत्री और कुलपति को भी मिलने से कर दिया था मना--कहा कि मैं मरीजों से सिर्फ ओपीडी में मिलता हूं, 20-25 की थाली किसी छोटे से होटल में खाते हैं, आइए आज सबकुछ पढ़ें।

त्याग, तपस्या और सेवा का दुर्लभ उदाहरण।आचरण, सादगी, प्रतिबद्धता और मानव सेवा से चिकित्सा पेशे को गौरवान्वित किया है, तो वह नाम है पद्मश्री प्रो. डॉ. तपन कुमार लाहिड़ी (टी.के. लाहिड़ी)।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विख्यात कार्डियोथोरेसिक सर्जन और लाखों मरीजों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं।

वाराणसी की जनता उन्हें ‘धरती का भगवान’ कहकर पुकारती है। यह उपाधि यूँ ही नहीं मिली। बीएचयू के सामान्य अस्पताल की गलियों में रोज एक परिचित दृश्य नजर आता है, एक हाथ में बैग और दूसरे हाथ में काली छतरी लिए, एक वृद्ध डॉक्टर पैदल चलते हुए अस्पताल की ओर आने वाला।वही साधारण-सा वृद्ध दरअसल दुनिया के ख्यातिप्राप्त कार्डियोथोरेसिक सर्जन—डॉ. टी.के. लाहिड़ी होते हैं।

साल 1994 से उन्होंने अपनी पूरी तनख्वाह गरीब मरीजों की मदद के लिए समर्पित कर दी। 2003 में सेवानिवृत्ति के बाद भी यह क्रम नहीं टूटा
वे आज भी उतनी ही पेंशन अपने पास रखते हैं, जिससे उनका साधारण जीवन चल सके। बाकी पूरी राशि बीएचयू के गरीब मरीज सहायता कोष में जमा कर दी जाती है।

उन्होंने अपने भविष्य निधि (पीएफ) तक का पैसा विश्वविद्यालय को दान कर दिया—ताकि किसी गरीब की जान बच सके। 35 वर्ष की सेवा, सैकड़ों डॉक्टर तैयार, पर खुद के लिए एक वाहन तक नहीं। 1974 में बीएचयू में मात्र 250 रुपये मासिक वेतन पर लेक्चरर नियुक्त हुए। 

जिनके शिष्य आज देश-विदेश के बड़े अस्पतालों का नेतृत्व कर रहे हैं, उसी शिक्षक ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी एक कार तक नहीं खरीदी। आज भी वे पैदल ही अस्पताल जाते थे—गर्मी, सर्दी या बारिश, मौसम कोई भी हो।

उनकी सादगी जितनी प्रेरणादायक है, उनकी ईमानदारी और सिद्धांतों पर अडिग रहने की क्षमता उतनी ही दुर्लभ।  एक बार देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर वाराणसी आए और किसी कारणवश उनसे निजी तौर पर मिलना चाहते थे।

 डॉ. लाहिड़ी ने घर पर मिलने से मना कर दिया और साफ कहा
“मैं मरीजों से केवल ओपीडी में ही मिलता हूँ। इसी तरह, बीएचयू के एक बीमार कुलपति को घर जाकर देखने से उन्होंने इनकार किया।
उनकी नजर में हर मरीज समान, चाहे वह प्रधानमंत्री हो या सामान्य श्रमिक।

उनका पूरा जीवन सादगी से भरा है। वाराणसी की गलियों में उन्हें अक्सर अन्नपूर्णा होटल में 20–25 रुपये की थाली खाते देखा जा सकता है।
न कोई दिखावा, न कोई विशेष सुविधा। बीएचयू से मिलने वाला साधारण आवास ही उनकी दुनिया है। उन्होंने गरीब मरीजों की सेवा में इतना समर्पण दिखाया कि जीवनभर विवाह तक नहीं किया।कहते हैं कि वे परिवार की जिम्मेदारियों में बंधकर अपने सेवा-कार्य में कमी नहीं आने देना चाहते थे।

सेवानिवृत्ति के बाद अमेरिका के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों ने उन्हें भारी-भरकम पैकेज पर काम करने का प्रस्ताव दिया। लेकिन उन्होंने एक ही वाक्य में सारे प्रस्ताव वापस कर दिए—“मैं भारत और अपने गरीब मरीजों की सेवा से दूर नहीं जा सकता।”

बीएचयू में लोग कहते हैं कि जो भी व्यक्ति समय जानना चाहता है, वह डॉ. लाहिड़ी की ओर नजर कर ले—समय का अंदाजा हो जाता है।
वे सुबह ठीक 6 बजे अस्पताल पहुंचते हैं, तीन घंटे की सेवा के बाद घर लौटते हैं और शाम को फिर अस्पताल आते हैं।उम्र 75 के पार है, पर उनका अनुशासन वही है जो युवा दिनों में था।

उनकी ओपन-हार्ट सर्जरी की क्षमता और शल्य चिकित्सा कौशल के कारण हजारों गरीब मरीजों की जान बची। जो मरीज आर्थिक अभाव में महंगे अस्पतालों में इलाज नहीं करा पाते थे, उनके लिए डॉ. लाहिड़ी किसी फरिश्ते की तरह आए। बीएचयू में आज भी लोग कहते हैं—“जिस मरीज को लाहिड़ी सर देख लेते हैं, उसकी जान बचने की उम्मीद बढ़ जाती है।”
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#banarashinduuniversity
#varanasi

रविवार, 18 जनवरी 2026

ए आर रहमान यह कैसा संगीत- श्री माधव कृष्ण

ए आर रहमान: यह कैसा संगीत!

जिस रहमान साहब के ऑस्कर जीतने पर मैं झूम उठा था, हर भारतीय गर्व का अनुभव कर रहा था, जिनके हर संगीत पर हम तालियां बजाते थे, उन्होंने यह कैसा राग छेड़ दिया?

अभी बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए एक इंटरव्यू में रहमान ने कहा था, 'पिछले 8 सालों में शायद सत्ता का बदलाव हुआ है और जो रचनात्मक नहीं हैं. वे फैसले ले रहे हैं. शायद साम्प्रदायिक बात भी रही हो लेकिन मेरे सामने किसी ने नहीं कहा.

हां, कुछ व्हिस्पर सुनाई देती हैं. जैसे आपको बुक किया था लेकिन दूसरी म्यूजिक कंपनी ने फिल्म फंड की, और अपने संगीतकार ले आए. मैं कहता हूं ठीक है. मैं आराम करूंगा.'

यह अच्छा हुआ कि, आज उन्होंने अपने वक्तव्य पर यू टर्न ले लिए लेकिन उनके पिछले बयान ने भारतीय क्रिकेट टीम के भूतपूर्व कप्तान और बाद में सांसद रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन की याद दिला दी।

मैच फिक्सिंग में नाम आने के बाद उन्होंने कहा था कि, एक मुस्लिम होने के नाते उन्हें टारगेट किया जा रहा है। १० साल तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी जिन्हें भारत का डिप्लोमेट रहने का गौरव भी था, ने विदाई समारोह में कहा था कि, भारत में अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।

हम सबके प्रिय अभिनेता थे आमिर खान ने २०१५ में वक्तव्य दिया था कि, उनकी पत्नी किरण राव को भारत में असुरक्षा के कारण भय लगता है और वह बच्चों के लिए भारत को छोड़ने का मन बना रही हैं।

इत्यादि। ये सभी बयान अखबारों में और न्यूज चैनल्स में प्रमुखता से प्रकाशित हुए थे। एक बार मेरे एक मुस्लिम बुद्धिजीवी मित्र ने कहा था कि, भारत में मुस्लिमों को हमेशा सिद्ध करना पड़ता रहेगा कि हम राष्ट्रभक्त हैं।

इन विषयों पर लिखना दुखद तो है, लेकिन लिखना भी पड़ेगा। उस मित्र के बयान को ही उल्टा करके यह भी सोचा जा सकता है कि, क्या भारत को भी हमेशा सिद्ध करना पड़ेगा कि भारत मुस्लिमों से भी उतना ही प्रेम करता है जितना हिन्दुओं से।

और मुझे लगता है कि रहमान, अंसारी, अजहर और आमिर जैसे कुछ गिने चुने लोगों की व्यक्तिगत भावनाओं के विरुद्ध इस देश में करोड़ों मुस्लिम भरे हुए हैं जो भारत में सुरक्षित हैं और भारत में रहना पसंद करते हैं।

हम भारत के लोग! इस देश ने हमें क्या दिया, यह सबका सामान्य प्रश्न होता है। लेकिन हम इस देश को क्या दे रहे हैं? अधिकार और कर्त्तव्य का यक्ष प्रश्न हमेशा बना रहेगा।

इस देश ने आपको क्या दिया, यदि यह हम भूल भी जाएं तो भी केवल दशमेश गुरु गोबिंद सिंह जी को याद रखें जिन्होंने जिस देश और जिन देशवासियों के लिए अपना सब कुछ खो दिया, उन लोगों ने उनके अंतिम समय में उनका साथ छोड़ दिया।

कोई ए आर रहमान तक स्वामी विवेकानंद का यह संदेश भेज दे:

धर्म के लिए, दलितों और पीड़ितों के लिए, अपना और अपने सबसे प्रिय और करीबी लोगों का रक्त बहाने के बाद, यहाँ तक कि उन लोगों द्वारा त्याग दिए जाने पर भी जिनके लिए यह रक्त बहाया गया था, उन्होंने अपने देश या अपने लोगों के खिलाफ एक शब्द भी शिकायत किए बिना, एक शब्द भी बड़बड़ाए बिना दक्षिण की ओर प्रस्थान किया।”

“भारत के पुनः गौरवान्वित होने के लिए, आप में से प्रत्येक को गुरु गोविंद सिंह बनना होगा – उनका सच्चा अनुयायी बनना होगा।”

माधव कृष्ण, १८.१.२६


शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

उत्तरदायित्व श्री माधव कृष्ण अष्टभुजी कॉलोनी बड़ी बाग लंका गाजीपुर

उत्तरदायित्व

आप कहते हैं यहां पर मैं सही हूं सब गलत हैं
पर गलत होगा कहीं तो आप जिम्मेदार हैं

काट डाला एक बूढ़े पेड़ को सरकार ने कल
जहर होती हवा में सब लोग हिस्सेदार हैं

पुल बनाना था समन्दर पर गिलहरी चल पड़ी
एक दूजे के दुखों में सभी साझेदार हैं

गधों को अगुवा बनाने का नतीजा देखकर
भी अगर चुपचाप हैं तो निरर्थक किरदार हैं

जमीं पर नफरत भरी है जल रहे हैं घर अगर
धर्म की या ध्यान की हर बात लच्छेदार है

जंग में मोबाइलों का काम रत्ती भर नहीं है
सामने जब दुश्मनों के हाथ में तलवार है

फैल जायेगी नहीं यूं ही मोहब्बत की लहर
गर नहीं हलचल मचाने के लिए तैयार हैं

आपके दो पैर हैं उन पर चलो लेकिन चलो
प्लेन से चक्कर लगाते जहर के फनकार हैं

माचिसों से डीजलों से आग को बुझना नहीं है
अग्निरोधक पुलिस की इस देश को दरकार है

आज सोते रहा गए गर देर तक बिस्तरों में तो
तयशुदा यह उठ न पाएगा कभी संसार है

तोड़ने पर तुले हैं वे खनखनाते बर्तनों को
बुलाओ उन सभी को जो प्यार के कुम्हार हैं

माधव कृष्ण, द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी बड़ी बाग लंका गाजीपुर, ५.१२.२५



बुधवार, 3 दिसंबर 2025

समन्दर की थाह लेने चला तो था कहां इस एक्वेरियम में फंस गया हूं

समन्दर की थाह लेने चला तो था
कहां इस एक्वेरियम में फंस गया हूं

चकित हूं सब जानते हैं छल
जाल को ही समझते हैं जल
शाक्यमुनि को देखकर भी हम
पूछते हैं मछेरों से हल 
गुत्थियां जिनकी नहीं सुलझीं 
लिख रहे हैं सत्य की गाथा
प्रबल मन की शक्ति के आगे
घूमते हम लिए बल आधा

सूर्य तक की राह मेरी सरल ही थी 
जुगनुओं के गांव में मैं बस गया हूं

पारितोषिक प्रशंसा से दूर
स्वयंदीपक टिमटिमाता है
अप्रतिम संसार बोध भरा
साधना में झिलमिलाता है
नाद इस ब्रह्माण्ड का उर में
अकेला ही खिलखिलाता है
भर्तृहरि को मुक्त हंसता देख
अहम अंदर तिलमिलाता है

मैं अपरिचित हूं स्वयं से ही अभी तक
परिचयों के दलदलों में धंस गया हूं

जंगलों में रात कटनी थी
और फिर घर को निकलना था
सुजाता की खीर खाकर ही
भूख का सागर निगलना था
देखना था दूर से बाजार
घूमकर सौदा न करना था
नहर घर तक खोद डाली जब
ग्राह तो घर में उतरना था

मोह की बरसात ने इतना भिगोया
पुरानी दीवाल जैसा भस गया हूं

गंध देता मुस्कुराता है
फूल विज्ञापन नहीं करता
निखरता है झूमता हिलता
टूटने से भी नहीं डरता 
और हम नजरें बचाते हैं
नजर लगना भी हमारा भय
क्या मनुज ही श्रेष्ठतम कृति है
हो रहा है अब मुझे विस्मय

नदी के इस पार पल भर रुकी नौका
और मैं तट के किनारे बस गया हूं

छोड़ना होगा किसी दिन तट 
फूट जायेगा किसी दिन घट
छिपाएंगे कब तलक पहचान
किसी दिन तो उठेगा घूंघट
यात्रा का लक्ष्य है अनुभव
पराभव के साथ है उद्भव
सत्य इनसे परे कितना है
निरंजन निर्दोष औ नीरव

काटने के लिए बेड़ी वक्त सबको है
और कारागार में ही बस गया हूं 

माधव कृष्ण, द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी बड़ी बाग लंका गाजीपुर, गोवर्धन पूजा २०२५



ब्राह्मण बेटियां, मानसिक रोगी संतोष वर्मा और सवर्ण विरोध का गिरता स्तर- श्री माधव कृष्ण

ब्राह्मण बेटियां, मानसिक रोगी संतोष वर्मा और सवर्ण विरोध का गिरता स्तर

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में वरिष्ठ IAS अधिकारी संतोष वर्मा के आरक्षण पर दिए गए विवादित बयान ने इस देश में जातीय विद्वेष को फिर से केंद्र में रख दिया है। 23 नवंबर को सेकेंड स्टॉप स्थित अंबेडकर मैदान में आयोजित AJJAKS (अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ) के प्रांतीय अधिवेशन में उन्हें प्रांताध्यक्ष का पदभार दिया गया।

वर्मा ने मंच से कहा था कि “एक परिवार में एक व्यक्ति को आरक्षण तब तक मिलते रहना चाहिए, जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान में न दे, या उससे संबंध न बन जाए।” सैद्धांतिक रूप से आज बात करने का समय नहीं है क्योंकि सैद्धांतिक रूप से मैं जाति पर आधारित किसी भी संगठन और व्यवस्था का घोर विरोधी हूं। सैद्धांतिक रूप से जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र भी नहीं होता।

सैद्धांतिक रूप से मैं अपशब्दों के प्रयोग का भी विरोधी हूं और व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं का भी विरोधी हूं। बहुतेरे बुद्धिमान लोग गधों का जवान देने से परहेज करते हैं क्योंकि उनके अनुसार गधे सुनते नहीं हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि गधे भले न सुनें लेकिन यदि गधों का उत्तर न दिया जाए तो गधों की बातें सुनकर और इसे निर्विवाद समझकर बहुत से लोग गधे जरूर बन जाते हैं।

इसलिए आवश्यक है कि समाज को गधों के प्रकोप से बचाने के लिए ऐसी बातों का तार्किक उत्तर दिया जाय। तो पहले सीधी बात लेते हैं कि, आज के समाज में व्यावहारिक रूप से ब्राह्मण जन्म पर आधारित एक समुदाय है। किसी समुदाय की बेटी के विषय में ऐसी बातें करना पूरे समुदाय का अपमान है और संवैधानिक सामुदायिक सौहार्द्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

यह तो ब्राह्मणों की सहिष्णुता और उनका संविधान प्रेम है कि अभी तक वे सड़कों पर नहीं उतरे अन्यथा वर्मा जैसे लोगों का स्थान भारत सरकार में नहीं, बल्कि कारागार में है। अंतरजातीय विवाह का महत्व है लेकिन उसमें प्रेम का केंद्रीय स्थान है। इस तरह के वक्तव्य अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित तो नहीं करेंगे, बल्कि समुदायों को और संकीर्णता की तरफ जरूर धकेलेंगे।

प्रोफेसर अवधेश प्रधान जी अभी कर्मेंदु शिशिर जी की एक पुस्तक के विषय में लिखते हुए अपने फेसबुक पोस्ट में बता रहे थे कि वीरेंद्र यादव जैसे समालोचक भी रानी लक्ष्मीबाई की देह यष्टि के विषय में घृणित विचार रखते हैं। समालोचक नन्द किशोर नवल अपने निबंध में एक ऐसे ही जातीय आलोचक की पुस्तक में वर्णित निराधार संस्कृति विरोध पर आश्चर्य जताते हैं।

प्रोफेसर अवधेश प्रधान के पोस्ट की वे पंक्तियां इस प्रकार हैं, "वीरेंद्र यादव ने एक अंग्रेज वकील के हवाले से लक्ष्मी बाई की "देहयष्टि और कसे स्तनों तक का वर्णन किया है और अपना कोई रोष प्रकट नहीं किया है। " कर्मेंदु शिशिर ने इस पर टिप्पणी की है, " एक वीरांगना के प्रति कुत्सा सिर्फ इसलिए कि वे सवर्ण थीं? जाहिर है यह खुद विचारक की अपनी कुंठा है।"

जो सरकारी प्रशासक या सार्वजनिक जीवन जीने वाले विचारक या प्रोफेसर या नेता हैं, उन्हें समदर्शी होना ही पड़ेगा। यदि उनके अंदर इतनी कुत्सित विचारधारा है तो वे समाज की सेवा कैसे करेंगे और आज तक उन्होंने क्या किया होगा? यह भी समझ में नहीं आता कि जन्मना ब्राह्मणों से सभी को समस्या क्यों है? ब्राह्मणों की बहुसंख्यक आबादी ने भला ही किया है। उन्होंने भारतीय संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा और शास्त्रों को जीवित रखा है।

यदि ब्राह्मण नहीं रहते तो इस देश की शुद्धतावादी परंपराएं आक्रांताओं के हाथों लगकर प्रदूषित हो जातीं। उन्हें मारा गया, जनेऊ काटे गए, चोटी काटी गई लेकिन ब्राह्मणों ने अपने धर्म, शास्त्र, संस्कृति और परम्पराओं की पवित्रता को प्रदूषित नहीं होने दिया और इसीलिए आज भारतीय धर्म सिर उठाकर खड़ा है। १९८५ से लेकर २०२५ तक मुस्लिम जनसंख्या स्वीडन में १% से बढ़कर 25% तक पहुंच चुकी है।

लेकिन यदि भारत में मुस्लिम जनसंख्या 1000 वर्षों में 1% से 21% तक ही पहुंची है तो इसके पीछे भी ज्ञानेश्वर, एकनाथ, समर्थ गुरु रामदास, रामकृष्ण परमहंस, तुलसीदास, दयानंद जैसे महान ब्राह्मणों का हाथ है जिन्होंने सनातन धर्म और संस्कृति को गतिशील बनाए रखे। इसलिए इन पर आक्रमण करने से समूचे भारत को समाप्त करने की धारणा और विश्वास ही ऐसे बयानों का मूल है।

जैसे औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को मुस्लिम बनाकर पूरे भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का स्वप्न देखा था, लेकिन गुरुदेव के बलिदान ने पूरे भारत को आंदोलित कर दिया। वैसे ही आज के भारत के निर्माण में गुमनामी के साथ बलिदान देने वाले ब्राह्मणों के योगदान को उपेक्षित कर के ऐसे व्यक्त देना एक ऑर्केस्ट्रेटेड नैरेटिव का हिस्सा है।

समाज के सभी वर्गों, जातियों और धर्मों से यही अपेक्षा है कि इस तरह के वक्तव्य देने वाले वर्मा जैसे लोगों को नौकरी, समाज और मंचों से बहिष्कृत किया जाय, कारागार में भेजा जाय ताकि यह संक्रामक रोग समाज को संक्रमित न करे। जातियों पर और धर्मों पर आधारित संगठनों को नेपथ्य में भेजा जाय और उनकी जवाबदेही तय की जाय तथा किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता न दी जाए।

संविधान की रट लगाने वाले संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और संविधान की किताबों को ऐसे वक्तव्यों की आग में जला रहे हैं। यह देश बेहतर मनुष्यों, बेहतर नेताओं, बेहतर अधिकारियों और बेहतर साधुओं को डिजर्व करता है। मनोरंजन के लिए ऐसे वक्तव्य देने वालों को सर्कस में गधों के स्थान पर खड़ा करने की जरूरत है। ज्ञान और संवेदना के अभाव में ऐसा बयान देने वाले लोगों को मानसिक चिकित्सालय में डालने की जरूरत है।

माधव कृष्ण, द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी बड़ी बाग लंका गाजीपुर, 27 नवम्बर 2025


सेक्स, जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर और श्रीमदभगवदगीता -माधव कृष्ण

सेक्स, जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर और  श्रीमदभगवदगीता 
-माधव कृष्ण

जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर (२२ अप्रैल १९०४ - १८ फ़रवरी १९६७) एक सैद्धान्तिक भौतिकविद् एवं अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कली) में भौतिकी के प्राध्यापक थे. वह परमाणु बम के जनक के रूप में विख्यात हैं। वह द्वितीय विश्वयुद्ध के समय परमाणु बम के निर्माण के लिये आरम्भ की गयी मैनहट्टन परियोजना के वैज्ञानिक निदेशक थे। न्यू मैक्सिको में जब ट्रिनिटी टेस्ट हुआ और इनकी टीम ने पहला परमाणु परीक्षण किया तो उनके मुंह से श्रीमदभगवदगीता का एक श्लोक निकल पड़ा:
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद् भासस्तस्य महात्मनः॥११.१२॥
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।।११.३२।।

इसका अनुवाद कुछ इस प्रकार है:
अगर आकाश में एक साथ हजारों सूर्य उदित हो जायँ, तो भी उन सबका प्रकाश मिलकर उस महात्मा-(विराट् रूप परमात्मा-) के प्रकाश के समान शायद ही हो।
श्रीभगवान् ने कहा -मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुम्हारे प्रतिपक्षमें जो योद्धा लोग खड़े हैं, वे सब तुम्हारे युद्ध किये बिना भी जीवित नहीं रहेंगे।

स्पष्ट रूप से, ओपेनहाइमर विश्व के दार्शनिकों और विचारकों को समझने के लिए प्रयत्नशील रहते थे. वह संस्कृत सीखने का प्रयास भी कर रहे थे, और यह प्रकरण ही इस समय उनके ऊपर आधारित फिल्म ‘ओपेनहाइमर’ (निर्देशक: क्रिस्टोफर नोलन, अभिनेता : सिलियन मर्फी, २०२३) पर आये संकट का कारण बन गया है. इस फिल्म में गीता के श्लोक ११.३२ को वैज्ञानिक ओपेनहाइमर ने दो बार पढ़ा. पहली बार, जब उनकी प्रेमिका जीन उनके साथ सम्भोग कर रही हैं, वह बीच में अलग होती हैं, उनकी पुस्तकों में से एक पुस्तक निकलती हैं, उनके ऊपर आती हैं, पुस्तक खोलती हैं और उसका अर्थ पूछती है. ओपेनहाइमर कहते हैं, मैं काल हूँ, दुनियां का विनाशक. दूसरी बार, जब परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक हो जाता है, वह पुनः गीता का श्लोक पढ़ते हैं.

मैं पहले दिन यह शो देखने गया था. परमाणु बम के जनक के वैचारिक अंतर्द्वंद्व को दिखाती इस फिल्म की गंभीर विषय-वस्तु को देखते हुए बहुत भीड़ नहीं थी, थिएटर में लगभग १५ की संख्या थी. इसमें ओपेनहाइमर के तीन पक्षों को दिखाया गया है. पहला, परमाणु बम द्वारा अमेरिका को द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी बनाने का प्रयास करने वाले एक देशभक्त का; दूसरा, अपनी यहूदी जाति के लोगों का नरसंहार करने वाले हिटलर के जर्मनी से प्रतिशोध लेने का स्वप्न देखने वाले एक जातिभक्त का. फिल्म में वह कहते हैं कि इस परमाणु बम की खोज पहले हो जाती तो इसे जर्मनी पर प्रयोग करते. 

तीसरा, जापान में परमाणु बम के बाद मारे गए लाखों लोगों का दर्द सुनकर अमेरिका की परमाणु प्रसार नीति का मुखर विरोध करने वाले मानवीय चेतना से सम्पन्न एक संवेदनशील मनुष्य का पक्ष. इस फिल्म का आधार इन तीनों पक्षों के बीच चल रहा अंतर्द्वन्द्व और मानवीय चेतना का भौतिकता के साथ संघर्ष है. इस कारण उनके ऊपर अमेरिकी सरकार द्वारा जांच बैठती है, यह देखने के लिए कि कहीं वह सोवियत सरकार के साथ तो नहीं खड़े हैं! यही इस फिल्म की पटकथा है.

सम्भोग के क्षणों में श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक का एक अर्थ पढ़ने पर विवाद इतना बढ़ चुका है कि केंद्र सरकार ने इस दृश्य को हटाने का आदेश दे दिया है. किसी आनंद प्रकाश के फेसबुक वाल पर लिखे एक लम्बे चौड़े विरोध के बाद निष्कर्ष था, “अगर इस डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन में हिम्मत है तो, बाइबल का कोई अंश या कुरान की कोई आयत इस  बेहूदे अश्लील रूप से अपनी फ़िल्मों में दिखाए। इतने जूते पड़ेंगे कि गिनना भूल जाएगा और अगर पाकिस्तान चला गया तो बगैर मुकदमे सूली पर चढ़ा दिया जाएगा।“

मुझे भारतीय दर्शन और संस्कृति से प्रेम है, लेकिन मैं अपने दर्शन और संस्कृति को इस्लामिक या अन्य कट्टरपंथियों के स्तर पर नहीं ले जाना चाहूँगा. मुझे मेरा धर्म और दर्शन उसकी तात्त्विक गाम्भीर्य, उदारता, समावेशी स्वरूप और शास्त्रार्थ की परम्परा के लिए पसंद है. मैं अपने दर्शन के पक्ष में शास्त्रार्थ करता हूँ क्योंकि मैं इसके विरोध में खड़े लोगों के छिछलेपन को देख सकता हूँ और उन्हें सही अर्थ और संदर्भ समझा सकता हूँ. लेकिन मैं यह निर्धारित नहीं करना चाहूंगा कि गीता और उपनिषद को पढ़ने का समय क्या हो! गीता और उपनिषद मनुष्य मात्र के लिए कहा गया शाश्वत ज्ञान है.

क्या हम यह कहना चाहते हैं कि श्रीकृष्ण जिन्हें वासुदेव कहते हैं, जिनका सर्वत्र वास है, जो समूची सृष्टि को एक अंश से  व्याप्त कर के भी पूर्ण और परे हैं, वह भगवान् श्रीकृष्ण जीवन के किसी क्षण में व्याप्त नहीं है? श्रीमद्भगवद्गीता युद्ध के क्षेत्र में कही गयी, लेकिन उसमें एक सूत्र आता है: प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः (१०.२८). आदि शंकराचार्य ने इस पर भाष्य लिखते हुए कहते हैं, प्रजनः प्रजनयिता अस्मि कंदर्पः कामः, प्रजा को उत्पन्न करने वाला कामदेव मैं हूँ. सृष्टि की सर्वाधिक शक्तिशाली काम ऊर्जा का स्रोत भी दैवीय है. 

इसलिए भारतीय दर्शन, धर्म और संस्कृति में सेक्स या सम्भोग या प्रजनन को अधर्म या पाप घोषित नहीं किया गया. इस पर चर्चा की गयी, इसके सूत्र दिए गए और इसका नियमन किया गया. यह अपलायनवाद ही सनातन धर्म है, भारतीय दर्शन का मूल है. यहाँ कुछ भी श्रीकृष्ण से अलग नहीं है. विश्व की प्रथम यौन संहिता कामसूत्र इसी भारतभूमि पर और इसी सनातन धर्म के अनुयायी द्वारा रची गयी. उसे हमने पथभ्रष्ट घोषित कर पत्थर नहीं मारे. हमने उन्हें यौन प्रेम के मनोशारीरिक सिद्धान्तों तथा प्रयोग की विस्तृत व्याख्या एवं विवेचना करने के कारण महर्षि वात्स्यायन कहा.

वात्स्यायन ने कामसूत्र में मुख्यतया धर्म, अर्थ और काम की व्याख्या की है। उन्होने धर्म-अर्थ-काम को नमस्कार करते हुए ग्रन्थारम्भ किया है। धर्म, अर्थ और काम को 'त्रयी' कहा जाता है। वात्स्यायन का कहना है कि धर्म परमार्थ का सम्पादन करता है, इसलिए धर्म का बोध कराने वाले शास्त्र का होना आवश्यक है। अर्थ-सिद्धि के लिए तरह-तरह के उपाय करने पड़ते हैं इसलिए उन उपायों को बताने वाले अर्थशास्त्र की आवश्यकता पड़ती है और सम्भोग के पराधीन होने के कारण स्त्री और पुरुष को उस पराधीनता से बचने के लिए कामशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है। 

महर्षि के कामसूत्र ने न केवल दाम्पत्य जीवन का शृंगार किया है वरन कला, शिल्पकला एवं साहित्य को भी सम्पदित किया है। राजस्थान की दुर्लभ यौन चित्रकारी तथा खजुराहो, कोणार्क आदि की जीवन्त शिल्पकला भी कामसूत्र से अनुप्राणित है। रीतिकालीन कवियों ने कामसूत्र की मनोहारी झाँकियाँ प्रस्तुत की हैं तो गीत गोविन्द के गायक जयदेव ने अपनी लघु पुस्तिका ‘रतिमंजरी’ में कामसूत्र का सार संक्षेप प्रस्तुत कर अपने काव्य कौशल का अद्भुत परिचय दिया है. महाकवि जयदेव स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक थे और भक्त कवियों में अपूर्व सम्मानजनक स्थान रखते हैं.

भगवान श्रीकृष्ण ने एक अन्य सूत्र में धर्म के अविरोधी या धर्मानुकूल कामना को अपनी विभूति या स्वरूप बताया है: धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।७.११।। आदि शंकराचार्य ने इसका भाष्य लिखते हुए कहा, किञ्च धर्माविरुद्धः धर्मेण शास्त्रार्थेन अविरुद्धो यः प्राणिषु भूतेषु कामः यथा देहधारणमात्राद्यर्थः अशनपानादिविषयः स कामः अस्मि. प्राणियोंमें जो धर्म के अविरुद्ध शास्त्रानुकूल कामना है जैसे देहधारण मात्र के लिये खाने-पीने की इच्छा आदि. वह (इच्छारूप) काम भी मैं ही हूँ। इस पहले सूत्र के माध्यम से श्रीभगवान ने सेक्स या सम्भोग को हीन या हेय या निकृष्ट न मानते हुए, उसके उद्देश्य को स्पष्ट कर दिया: प्रजा उत्पत्ति. 

दूसरे सूत्र में उन्होंने कामनापरक गतिविधियों का सीमांकन कर दिया. सेक्स या सम्भोग अनियंत्रित, असामाजिक, लोकमत और वेदमत के विरुद्ध नहीं होना चाहिए. भारतीय दर्शन के आश्रम व्यवस्था का गृहस्थ मार्ग और तंत्र मार्ग, सम्भोग के मार्ग से गुजरते हुए स्वाभाविक और प्राकृतिक काम इच्छा के स्वतः समाप्त होने का मार्ग हैं. इसे ही दार्शनिक ओशो ने सम्भोग से समाधि कहा. विवाह की अभूतपूर्व भारतीय संस्था भी कामेच्छा को नियमित करते हुए सामाजिक जीवन में गतिशील और क्रियाशील बने रहने की प्रेरणा देती है.

इसलिए, यह तर्क कि, यदि ऐसा फिल्मांकन कुरआन या बाइबिल का होता, तो उन्हें सूली चढ़ा दिया गया होता, हिन्दुओं के लिए स्वीकार्य नहीं है. हम विमर्श वाली प्रजाति हैं. हमने सदियों से तर्क किया हैं, चिन्तन किया है और शास्त्रार्थ किया है और आज भी कर रहे हैं. मैं हमेशा गीता का चिन्तन करता रहता हूँ, और उन स्थानों पर और उन अवस्थाओं में भी मनन करता हूँ जिन्हें हम अशौच कहते हैं. गीता ने मेरा त्याग नहीं किया, लेकिन अनन्य चिन्तन के कारण गीता अद्भुत रूप से मेरे समक्ष अपने अर्थों को नए नए तरीकों से प्रकट करती रहती है.

यह कट्टरपंथी विरोध तब शोभा देता जब गीता के किसी अर्थ का अनर्थ किया गया होता या गीता जलाई जाती या गीता के महानायक भगवान श्रीकृष्ण के विद्रूपण का प्रयास होता. लेकिन यह विरोध इसलिए शोभा नहीं देता कि ओपेनहाइमर इसका एक सूत्र अपने इंटिमेट क्षणों में कहते हैं. हरि व्यापक सर्वत्र समाना. अंततः सर्वोत्कृष्ट श्रीकृष्ण के शब्दों में, यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।६.३०।। (जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।)

चर्चा तो इस बात की होनी चाहिए कि श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने और चिन्तन करने वालों में से हम लोग महाबाहु अर्जुन, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, स्वामी सहजानंद सरस्वती, टी एस इलियट, शोपेन्होवर, ओपेनहाइमर, ए पी जे अब्दुल कलाम, टैगोर बनने के कितने करीब हैं!

-माधव कृष्ण
२८.७.२३


शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

लोगों को अपना टैलेंट दिखाइये निजी अंग नही- लव तिवारी

प्रकृति ने नारी के शरीर पर स्तन दिए, ताकि वह अपनी संतान को स्तनपान करा कर उसका पालन पोषण कर सके।पर. पिछले कुछ वर्षों से असंख्य महिलाओं ने अपने स्तनों को सोशल मीडिया पर फॉलोवर्स बढ़ाने का माध्यम बना लिया हैं।एक देश इजरायल है जहां लड़कियां देश की सुरक्षा के लिए कदम से कदम मिलाकर लड रही है।एक देश हमारा भारत है जहां ज्यादातर लड़कियां यूट्यूब,इंस्टाग्राम पर नंगी होकर मुजरा कर रही है और दुःख इस बात का है मां-बाप / पति उन्हें मना करने के बजाय बहुत खुश हो रहें हैं और उनकी हौसला अफजाई कर रहे हैं!!Subscribers और Like करने वाले भाई इनके मजे ले रहे हैं और वाह वाह कर रहे हैं।कुछ लोग कह रहे हैं कि इसमें कुछ ग़लत नहीं है आपकी सोच ग़लत है, उनको मैं बताना चाहती हूं कि समाज की कुछ मर्यादाएं भी होती हैं जिनका पालन करना सबके लिए अनिवार्य होता है !
ऐसे लोगों से मेरा प्रश्न है कि - मान लीजिए आप अपनी बहिन बेटियों की बहुत इज्जत करते हैं, आपकी सोच भी गंदी नहीं है तो क्या आपकी बहिन बेटियां आपके सामने निर्वस्त्र घूम सकती हैं ? नहीं ना ?इसलिए सामाजिक नियमों का पालन कीजिए, बच्चों को नैतिकता की शिक्षा दीजिए, व्यभिचार से दूर रहिए और देश की संस्कृति बचाने में अपना योगदान दीजिए🙏सार्वजनिक जीवन में अश्लीलता का विरोध सदैव होगा, वीडियो ही बनाना है तो कुछ अच्छे वीडियो बनाएं, ऐसे वीडियो जो परिवार संग देखे जा सके! लोगों को अपना टैलेंट दिखाना है, अपने निजी अंग नही..✍️
जय हिंद 


मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

लागल चुनरिया में दागी रे, तनी देखबे धोबिनिया- तारकेश्वर मिश्र राही

पाती आइल पिव के दुअरा खड़ा सवारी बा।

कैसे गवने जाइ रे सखिया, चुंदरी मईल हमारी बा।।

गोरा चेहरा चांद सा मुखड़ा नैन बेसरमत मतवारी बा।

कैसे सेज चड़ब पियवा के दाग लगल मोरे साड़ी बा।।


अरे लागल चुनरिया में दागी रे, तनी देखबे धोबिनिया-४

देखब देखब देखब धोबिनिया

लागल चुनरिया में दागी रे, तनी देखबे धोबिनिया

फाटल रहीत कथई सिअईती ताग लेती अपने से तागी रे

लागल चुनरिया में दागी रे, तनी देखबे धोबिनिया-४


गंगा घाट पर पटकी पटकी के साज सवेरे धोवनी,

रंग रजवा के पाँव पकड़ीके बहुत देर ले रोवनी-२

कहवा ले जाई कहवा लुकवाई-२ कवानी नगरिया में भागी रे

तनी देखबे धोबिनिया

लागल चुनरिया में दागी रे, तनी देखबे धोबिनिया


बाटे संग में पुलिस पियागा दुलहिन इहा न अकेल

राही बलमुआ संग में रहिह के पेठवइह जेल

समय रहे दुल्हन नाही चेतली-२ लागल करमवा में आगी रे

तनी देखबे धोबिनिया

लागल चुनरिया में दागी रे, तनी देखबे धोबिनिया


लागल चुनरिया में दागी रे, तनी देखबे धोबिनिया

फाटल रहीत कथई सिअईती ताग लेती अपने से तागी रे

लागल चुनरिया में दागी रे, तनी देखबे धोबिनिया-४




धन्य है भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा अद्भुत अकल्पनीय प्रयागराज संगम- डॉ निशा कान्त द्विवेदी

 को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ।

       कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।। ......

धन्य है भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा। अद्भुत, अकल्पनीय....। संसार का सार समेटे सनातन संस्कृति और सभ्यता .... मानो समस्त संसार को आस्था के अथाह सागर में डुबो देना चाहता है..... भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का हिस्सा होने का गर्व यूँ ही नहीं है... ये वह देश है जहाँ देव भी जन्म पाने को लालायित रहते हैं... धन्य है.....

जब-जब प्रयागराज के विषय में कुछ लिखने को सोचता हूँ , तब-तब बाबा तुलसीदास की ये पंक्ति - 'को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ....' मानो कसौटी की रेखा खींच देती है। मानो जब बाबा तुलसीदास जी के लिए प्रयाग के प्रभाव का वर्णन करना इतना सहज नहीं है, तो फिर हम जैसे सामान्य जीव के लिए तो यह कार्य सोचा भी नहीं जा सकता। हो भी क्यों न...। उसके बाद रुक जाता हूँ। उनकी ये पंक्ति संदेश देती है कि प्रयागराज की महिमा के विषय में कुछ लिखना किसी के चित्त चेतना से परे है। यह तुलसीदास जी की अपनी शैली है कि जब किसी वर्णन प्रसंग में सर्वोच्च रेखा खींचनी हो तो उसका वर्णन कुछ ऐसा ही होता है। 
एक और उदाहरण देखिए -
'सब उपमा कवि रहे जुठारी।
   केहिं पटतरौं विदेह कुमारी।। 

अर्थात् सीता जी की तुलना किससे करूं , सारी उपमाओं को तो कवियों ने जूठा कर दिया है। स्पष्ट है कि सीता की तुलना किसी से हो ही नहीं सकती थी, अतः उन्होंने ऐसा कहा। कुछ इसी तरह का भाव प्रयाग महिमा के विषय में तुलसीदास जी व्यक्त करना चाहते हैं , उसे सर्वोच्च रखना चाहते हैं। कितना अद्भुत, अकल्पनीय है इसकी महिमा...!
‌‌आज माघ मास की पूर्णिमा तिथि है। अब तक महाकुंभ में लगभग 50 करोड़ के आस पास लोग सनातन संस्कृति के इस अद्भुत संयोग के साक्षी बनकर पुण्य की डुबकी लगा चुके हैं । जहाँ लगभग प्रति दिन औसतन 1.5 करोड़ लोग महाकुंभ में स्नान कर रहे हैं, वहां तक लोगों को पहुंचने में कुछ कठिनाई अनुभव करना स्वाभाविक है। आप सोचिए, इतनी श्रद्धालु संख्या के अलावा प्रयागराज की अपनी दैनिक दिनचर्या , सरकारी, प्रशासनिक कार्यालयों की व्यस्तता, व्यवस्था इन सबके साथ संपन्न हो रही है। प्रयागराज वासियों के लिए भी इस दौरान सहज नहीं रहा है। कठिनाइयों का सामना उन्होंने भी पर्याप्त किया है। एक जगह से दूसरी जगह जाना सहज नहीं रहा है। किन्तु फिर भी महाकुंभ के इस अद्भुत, अकल्पनीय सांस्कृतिक संयोग के हर्ष के आगे वे सब कठिनाइयाँ भी हम लोग भूल गए हैं। यद्यपि सरकार और प्रशासन ने व्यवस्था बहुत की है, फिर भी एक शहर के एक क्षेत्र विशेष में प्रतिदिन लगभग दो करोड़ लोगों का प्रबंधन, और वह भी लगातार एक महीने से ऊपर हो रहा है, करते रहना सहज नहीं है। व्यवस्था के अंतर्गत गाडियाँ दूर रोकी जा रही हैं, ताकि लोग कम से कम पैदल तो चल सकें। और यही कारण है कि इतने श्रद्धालुओं को पैदल भी अधिक चलना पड़ा है। देखकर प्रयागराज वासियों को भी कष्ट होता है। किन्तु इतनी बड़ी व्यवस्था में ये विवशता ही है। सहज नहीं होता इतना। फिर भी आस्था का समुद्र हमने आप सभी श्रद्धालुओं में देखा है। उसी शक्ति के सहारे माँ गंगा की कृपा सब पर बनी रहती है और वे अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं।

प्रयागराज संगम का यह क्षेत्र कल्पवास का क्षेत्र है। यहाँ लोग अपनी घर-गृहस्थी, सुख सुविधा से दूर, एक झोपड़ी में, टेंट में मास पर्यंत प्रवास करते हैं। धनी, निर्धन का भेद मिट जाता है। सभी गंगा, यमुना, सरस्वती की गोद शय्या में/ रेत में भगवद्भजन में लीन रहते हैं। हमारे पास पैसा कितना है, सुख के साधन कितने हैं? ये भाव यहाँ मिट जाता है। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को जब देखता हूँ कि सारे साधनों के बावजूद किसी को पैदल लंबी यात्रा करके वहाँ तक पहुंचना पड़ रहा है, तो कोई मंहगी गाड़ी के दंभ को किसी पार्किंग में पार्क करके थोड़ी दूर के लिए ट्राली मिल गई तो उसी का सहारा ले रहा है। ऐसा लगता है कि एक दो दिन के लिए भी आने वालों को माँ गंगा संगम की रेती में कल्पवास करने वालों जैसी अनुभूति करा देती हैं। शायद यह संकेत होता है कि यहाँ मोह, माया और आसक्ति की गठरी को छोड़ने का अभ्यास कराया जाता है।
कुछ परिचित लोग भी यहाँ पहुंचे, किन्तु व्यवस्था और यातायात की स्थिति के कारण उनसे मिल पाना भी संभव न हो सका। इस समय पूरा भारत ही नहीं बल्कि विश्व के सैकड़ों देशों के प्रतिनिधि भी इस अद्भुत काल के साक्षी हो रहे हैं। इतने बड़े आयोजन में आप सभी की अनुभूतियाँ अच्छी, बुरी हर तरह की होंगी। समाज में जिस तरह लोग अच्छे और कम अच्छे हर तरह के होते हैं, वैसे ही हमें अनुभूति भी होती है। प्रार्थना सब से यही है कि आप लोग अच्छी स्मृतियों को संजोकर रखिएगा। बाकी को भुला दीजिएगा। यह सोच लीजिएगा कि पुण्य की डुबकी के आगे पथ की परेशानियाँ सब नगण्य हैं। माँ गंगा, यमुना और सरस्वती से प्रार्थना है कि आप सभी के दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों प्रकार के ताप (कष्ट) को नष्ट करें और मन को निर्मल बनाएँ। निर्मल मन ही भगवान को प्रिय है:

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

अपने भारत को अपने शहर में पाना हम सभी के लिए गर्व का विषय है। प्रयागराज वासी आप सभी के स्नेह सान्निध्य से अभिभूत हैं। इतने साधु महात्माओं, पुण्यात्माओं की चरण रज पाकर प्रयागराज धन्य है। अहोभाग्य है हमारा ...।
✍️ डॉ निशा कान्त द्विवेदी 🙏



मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

गाँव के थाती के मिलल जगन्नाथ सिंह पुरस्कार - लेखक श्री राम बहादुर राय

#गाँव के #थाती के मिलल #जगन्नाथ #सिंह #पुरस्कार !
भोजपुरी में लिखल हमार किताब #गाँव के #थाती वास्तव में एगो भोजपुरिया खातिर खेत-खरिहान,बाग बगइचा,किसानी, गाँव-गिराँव के संस्कृति, संस्कार, रहन-सहन के बारे में पुरनकी पीढ़ी के जाने खातिर बहुत बड़ आधार हवुए। एह किताब में अइसन अइसन गूढ़ बातन के सब्दन के मोती में पिरोवल गइल बाटे कि नवका लोग इहे बूझी कि ई कवनो कोरा कल्पना कइल गइल बाटे लेकिन ई हकीकत बाटे।
एह किताब के हम नइखे लिखले बलुक साक्षात माई सुरसती आ महादेव के किरिपा से लिखाइल बाटे।
परम आदरणीय डाॅ श्री #ब्रजभूषण मिश्र जी( भूमिका),आशीर्वाद,आदरणीय डाॅ श्री जयकांत सिंह जी के आशीर्वाद आदरणीय श्री पराग जी (शुभकामना संदेश), आदरणीय डाॅ श्री चन्द्रेश्वर जी (शुभकामना संदेश), डाॅ राणा अवधूत कुमार जी त बहुते योगदान बाटे।
पटना ,13 अक्टूबर, 2025,
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अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अमनौर , सारन , बिहार में आयोजित होखे वाला २८ वां अधिवेशन (२८-२९ नवम्बर २०२५) में दिहल जाये वाला साहित्यिक-सांस्कृतिक सम्मान/पुरस्कारन के घोषणा कर दिहल गइल बा। सम्मेलन के सम्मान/पुरस्कार चयन-समिति के पटना में सम्पन्न बैठक में लिहल गइल सर्वसम्मत निर्णय के अनुसार.......

'#जगन्नाथ #सिंह #पुरस्कार '(विविध/1988 से नाटक हेतु)-'#गाँव #के #थाती'-#राम #बहादुर #राय( #बलिया , उ० प्र०) को ।
उक्त जानकारी 'अ० भा० भो० सा० स० ' के प्रवर समिति के संयोजक आदरणीय श्री भगवती प्रसाद द्विवेदी जी दिहले बानी।उहां के अनुसार सम्मेलन के अमनौर , सारन , बिहार में आयोजित होखे वाला अठाइसवाँ अधिवेशन में पुरस्कार/सम्मान, प्रमाण पत्र , अंगवस्त्र, पुरस्कार- राशि एवं स्मृति-(चिह्न सहित प्रदान दिहल जाई।
पुरस्कार/सम्मान प्राप्त करे वाला साहित्यकार/कलाकार लोगन के सम्मेलन के अध्यक्ष आदरणीय डाॅ.ब्रजभूषण मिश्र, कार्यकारी अध्यक्ष आदरणीय श्री महामाया प्रसाद विनोद,महामंत्री आदरणीय डाॅ श्री जयकांत सिंह'जय' ,कोषाध्यक्ष-आदरणीय श्री जितेन्द्र कुमार सहित सब पदाधिकारी आ वरिष्ठ साहित्यकार लोगन के बहुत बहुत धन्यवाद। सादर आभार।
सादर प्रणाम !
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राम बहादुर राय
भरौली,बलिया, उत्तर प्रदेश
#पुरस्कार
#highlight
#भोजपुरी


शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

हम धर्म परिवर्तन को ऐच्छिक विषय मानते हैं प्रलोभन देकर धर्म बदलवाना अपराध है-

शिया मुस्लिम बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने सनातन धर्म अपनाया था और अपना नाम जितेंद्र त्यागी रख लिया था !उन्हें हिन्दू धर्म में आकर क्या मिला इसका जवाब शंकराचार्यों, महामंडलेश्वरों और अखाड़ों को देना चाहिए?

रिजवी कुरान पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में जेल काट रहे हैं, बाहर आएंगे तो किसी दिन सर तन से जुदा हो सकता है !
कोई मठाधीश उनकी सुध नहीं ले रहा, जिस दोयम दर्जे की कथित धर्मसंसद में उन्होंने आपत्तिजनक भाषण दिया था, उन्होंने भी वसीम का साथ छोड़ दिया है !
वह दिन दूर नहीं जब उनका परिवार बर्बादी की गर्द में छिप जाएगा और सनातनधर्म में लौटने का ख़्वाब फिर कोई नहीं देखेगा !

बीमारी के कारण तीन महीने इलाज कराकर वसीम रिजवी लौटे तो काफी उदास थे। एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में उन्होंने अपना दर्द बताते हुए स्वीकार किया कि सबने किनारा कर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। बेहद मायूस जितेंद्र त्यागी ने आत्महत्या तक की इच्छा जताई। उनकी बिखर रही मानसिकता यदि उन्हें एक बार फिर इस्लाम में वापस ले जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

बड़े बड़े अखाड़ों, सैकड़ों आश्रमों और अध्यात्म की इस भूमि पर वसीम रिजवी अकेले नहीं, जो धर्म बदलकर उपेक्षा का यह दंश भोग रहे हैं। अपनी बस्ती के निवासी स्वर्गीय शांतिप्रिय आर्य और उनके परिवार को अच्छी तरह जानता हूँ। साठ साल पहले आर्यसमाज जाकर हिन्दू धर्म अपनाया था, किसी हिंदू ने सुध न ली, पूरा परिवार घोर गरीबी में जीवन यापन कर रहा है।

हम धर्म परिवर्तन को ऐच्छिक विषय मानते हैं। प्रलोभन देकर धर्म बदलवाना अपराध है, स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन संविधान सम्मत है। हाल ही में आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने कहा था कि भारत के मुसलमानों का डीएनए एक जैसा है। पर उनकी बात मानकर यदि कोई मुस्लिम, हिन्दू धर्म में वापस आए तो क्या संघ परिवार उसके साथ खड़ा होगा?

वसीम रिज़वी के साथ न तो आरएसएस आया, न विश्व हिंदू परिषद, न बजरंग दल और न कथित हिन्दू सेना? देश का कोई धर्माचार्य उन्हें समाहित नहीं कर पा रहा। सर्वे भवन्तु सुखिनः के जयघोष करने वाले बड़े बड़े संत उन्हें अपने आश्रम में बुलाकर किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते। वे जितेंद्र त्यागी तो बन गए, परंतु त्यागी समाज ने ही उन्हें कहाँ अपनाया? हाल ही में नोएडा में सांसद महेश शर्मा के विरोध में महापंचायत करने वाले त्यागी समाज को जितेंद्र त्यागी की याद नहीं आई।

वसीम रिजवी मुस्लिम धर्म पर तल्ख बयानबाजी कथित धर्मसंसद में न करते तो आराम से रहते। यद्यपि वे शिया हैं और मुस्लिम जगत में शियाओं को अधूरा मुसलमान माना जाता है। जिस धर्म में उनका जन्म हुआ उसकी सबसे पवित्र किताब पर टिप्पणी करने की उन्हें कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन कुछ उग्र साधुओं के जाल में फँसकर वे भी उग्र हो उठे। खैर, जो होना था वह हुआ। अब हिंदू समाज और संत समाज का दायित्व है कि रिजवी को अपनाएं। नहीं अपनाना चाहते तो रिजवी पश्चाताप करें और इस्लाम में वापस लौट जाएं।



गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

वरदान विफल हो सकता है लेकिन आशीर्वाद नहीं- लेखक श्री माधव कृष्ण ग़ाज़ीपुर उत्तरप्रदेश

साप्ताहिक मानव धर्म संगोष्ठी

स्थान: द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल योग कक्ष, अष्टभुजी कॉलोनी, बड़ी बाग, लंका, गाजीपुर
समय: शाम 6:30 बजे से 9:30 बजे तक
आयोजक: नगर शाखा, श्री गंगा आश्रम, मानव धर्म प्रसार

गोष्ठी के निष्कर्ष व मनन के कुछ बिंदु:

१.. वरदान विफल हो सकता है लेकिन आशीर्वाद नहीं। इसलिए सदैव बड़ों से आशीष लेने का प्रयास करना है।

२. मन से दुविधा और संशय दूर करना है। इसके रहते मनुष्य सफल नहीं हो सकता। इसलिए गुरु से प्राप्त ज्ञान की गुदरी ओढ़कर मनुष्य संकल्प के साथ सन्मार्ग पर आगे बढ़ता है। संशयात्मा विनश्यति।

३. ॐ परमात्मा है, सर्वव्यापी है, ईश्वर है। ॐ का रहस्य अनंत है। ॐ का जप करने वाले ब्रह्मवादी की जाते हैं। विष्णु सहस्रनाम में उनका पहला नाम ॐ है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में ॐ को ईश्वर का वाचक बताया है। भगवान श्रीकृष्ण ने ॐ को एक अक्षर ब्रह्म बताया है। ॐ में संसार के सभी शब्द समाहित हैं। सभी के अंदर ॐ है इसलिए सभी का सम्मान और सेवा निष्काम भाव से करना चाहिए।

४. ईश्वर और भक्तों के चरित्र और गुण में से किसी एक सूत्र को पकड़ कर अपने आचरण में आजीवन उतार लेने से ही ईश्वर प्राप्ति हो जाती है। बाबा गोरखनाथ कहते थे कि चादर के एक कोने को पकड़ लेने से पूरी चादर खींची जा सकती है। इसी तरह से सत्य, अहिंसा या किसी भी एक गुण को धारण कर लेने से सभी आध्यात्मिक गुण स्वतः आ जाते हैं।

५. भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भाव से मनुष्य की पहचान होती है। वह भाषा बोलनी है, लिखनी है, वह वेश भूषा धारण करनी है, वही भोजन करना है और वही भाव रखना है जिससे भजन में सरलता हो।

६. धन का अर्जन आवश्यकता हो सकती है, लेकिन यह लक्ष्य नहीं हो सकता है। लक्ष्य तो केवल शांति और प्रेम ही हैं। इसीलिए सब कुछ होने के बाद भी मनुष्य ईश्वर की शरण में न रहने के कारण अशांत रहते हैं।

७. अपने आपको स्वीकार करने से अपनी गलती स्पष्ट दिखने लगती है। उस गलती को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। अपनी कमी को अपनी शक्ति बनाकर गुरु के कार्य में लग जाना चाहिए।

गोष्ठी में कुछ विषयों के संदर्भ निम्नवत हैं:
ज्ञान - गुदरी
अलख पुरुष जब किया विचारा,लख चौरासी धागा डाला |
पांच तत्व से गुदरी बीना,तीन गुनन से ठाढी कीन्हा ||
तामे जीव ब्रह्म अरु माया ,समरथ ऐसा खेल बनाया |
जीवन पांच पचीसों लागा ,काम क्रोध ममता मद पागा ||
काया गुदरी का विस्तारा ,देखो संतो अगम सिंगारा |
चंद सूर दोउ पेवन लागे ,गुरु प्रताप से सोवत जागे ||
शब्द की सुई सुरति का धागा ,ज्ञान टोप से सीयन लागा |
अब गुदरी की कर हुशियारी ,दाग न लागे देखू विचारी ||
सुमति की साबुन सिरजन धोई ,कुमति मैल को डारो खोई |
जिन गुदरी का किया विचारा ,तिनको मिला सिर्जन हारा ||
धीरज धुनी ध्यान करू आसन ,यत की कोपीन सत्य सिंहासन |
युक्ति कमंडल कर गहि लीन्हा ,प्रेम फावडी मुरशिद चीन्हा ||
सेली शील विवेक की माला ,दया की टोपी तन धर्मशाला |
मेहर मतंग मत बैशाखी ,मृगछाला मनही की राखी ||
निश्चय धोती पवन जनेऊ ,अजपा जपे सो जाने भेऊ |
रहे निरन्तर सद् गुरु दाया,साधु संगति करके कछु पाया ||
लौ कर लकुटी हृदया झोरी,क्षमा खडाऊ पहिर बहोरी |
मुक्ति मेखला सुरती शखिनी ,प्रेम पियाला पीवै मौनी ||
उदासी कुबरी कलह निवारी ,ममता कुत्ती को ललकारी |
युक्ति जंजीर बांधी जब लीन्हा ,अगम अगोचर खिरकी चीन्हा ||
वैराग त्याग विज्ञान निधाना ,तत्व तिलक निर्भय निरबाना |
गुरु गम चकमक मनसा तूला,ब्रम्ह अग्नि परगत कर मूला ||
संशय शोक सकल भ्रम जारा,पाँच पचीसों प्रगटे मारा |
दिल का दर्पण दुविधा खोई ,सो वैरागी पक्का होई ||
शून्य महल में फेरी देई ,अमृत रस की भिक्षा लेई |
दुःख सुख मेला जग के भाऊ ,तिरवेनी के घाट नहाऊ ||
तन मन शोधि रहे गलताना,सो लखी पावैं पुरुष पुराना |
अष्ट कमल दाल चक्कर शोधे ,योगी आप-आप में बोधे ||
इंगला के घर पिंगला जाई,सुषमनी सुरति रहै लौ लाई |
वोहं सोहं तत्व विचारा,बंक नाल में किया संभारा||
मन को मारि गगन चढ़ी जाई ,ममन सरोवर पैठी नहाई |
छुट गए कसमल मिले अलेखा ,यहि नैनन साहब को देखा ||
अनहद नाद शब्द की पूजा , गुरु समान कोई देव न दूजा ||
अहंकार अभिमान विहारा ,घाट का चौका किया उजियारा |
चित करू चन्दन तुलसी फूला ,हित करू सम्पुट तुलसी मूला ||
श्रद्धा चंवर प्रीति का धूपा ,नूतन नाभ साहेब का रूपा |
गुदरी पहिरे आप आलेख ,जिन यह प्रगट चलायो भेषा ||
साहब कबीर बख्श जब दीन्हा ,सुर नर मुनि सब गुदरी लीन्हा |
ज्ञान गुदरी पढ़े प्रभाता जनम जनम के पातक जाता ||
ज्ञान गुदरी पढ़े मध्याना ,सो लखी पावै पद निरबाना |
साँझा सुमिरन जो नर करै ,कहै कबीर भाव सागर तरै ||

माला टोपी सुमिरनी ,गुरु दिया बखशीश |
पल पल गुरु को बंदगी चरण नवावो शीश।।
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पितृ यज्ञ हिंदू धर्म के पंच-महायज्ञों में से एक है, जो अपने पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के लिए किया जाता है. इसमें तर्पण, पिंडदान, और श्राद्ध जैसे कार्य शामिल हैं, जिनके माध्यम से पूर्वजों को जल, अन्न आदि अर्पित किए जाते हैं. यह न केवल पितरों के प्रति सम्मान है, बल्कि संतानोत्पत्ति और उनकी सही शिक्षा-दीक्षा से पितृ ऋण चुकाने का भी एक तरीका है.
पितृ यज्ञ का अर्थ
पूर्वजों का सम्मान:
पितृ यज्ञ अपने पितरों, माता-पिता और गुरुजनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक माध्यम है.
श्राद्ध और तर्पण:
यह अपने मृत पूर्वजों को जल, अन्न, दूध और अन्य वस्तुएं अर्पित करने की क्रिया है, जिसे श्राद्ध और तर्पण कहा जाता है.
पितृ ऋण से मुक्ति:
पितृ यज्ञ को संतानोत्पत्ति और बच्चों की अच्छी परवरिश के माध्यम से चुकाए जाने वाले पितृ ऋण से मुक्ति के रूप में भी देखा जाता है.
पितृ यज्ञ कैसे किया जाता है
तर्पण:
इसमें जल और अन्य सामग्री लेकर पूर्वजों को अर्पण किया जाता है, यह मानते हुए कि इससे वे तृप्त होते हैं.
पिंडदान:
यह पूर्वजों को चावल के गोल पिंड अर्पित करने की प्रथा है, जिससे आत्माओं को शांति मिलती है.
श्राद्ध:
यह एक विस्तृत अनुष्ठान है, जिसमें ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है.
महत्व
पूर्वजों का आशीर्वाद:
पितृ यज्ञ करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो जीवन में सुख और समृद्धि लाता है.
जीवन में प्रगति:
यह पूजा जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करती है और पेशेवर तथा करियर के क्षेत्र में प्रगति के अवसर प्रदान करती है.
नकारात्मक कर्मों का प्रभाव कम होना:
माना जाता है कि पूर्वजों से मिले नकारात्मक कर्म संस्कारों के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए पितृ यज्ञ एक प्रभावी तरीका है.
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यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।9.25।।

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka

।।9.25।।जो भक्त अन्य देवताओंकी भक्ितके रूपमें अविधिपूर्वक भी मेरा पूजन करते हैं उनको भी यज्ञका फल अवश्य मिलता है। कैसे ( सो कहा जाता है -- )

जिनका नियम और भक्ित देवोंके लिये ही है वे देवउपासकगण देवोंको प्राप्त होते हैं। श्राद्ध आदि क्रियाके परायण हुए पितृभक्त अग्निष्वात्तादि पितरोंको पाते हैं। भूतोंकी पूजा करनेवाले विनायक? षोडशमातृकागण और चतुर्भगिनी आदि भूतगणोंको पाते हैं तथा मेरा पूजन करनेवाले वैष्णव भक्त अवश्यमेव मुझे ही पाते हैं। अभिप्राय यह कि समान परिश्रम होनेपर भी वे ( अन्यदेवोपासक ) अज्ञानके कारण केवल मुझ परमेश्वरको ही नहीं भजते इसीसे वे अल्प फलके भागी होते हैं।