समग्रता-बोध के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण
(मेरे शीघ्र प्रकाश्य निबन्ध संकलन का एक निबन्ध)
मैंने जब भी इस प्रश्न पर विचार किया है कि धर्मभूमि भारत कैसे विदेशी आक्रान्ताओं की गुलाम बनती गयी, और कैसे इसका क्षेत्रफल संकुचित होता गया; तब मुझे एक ही उत्तर मिला है- धर्म और शास्त्रों की अधूरी समझ. बाबा साहेब की इस उक्ति को यहाँ उद्धृत करना विषयांतर नहीं होगा. ‘जाति का विनाश’ निबंध में उन्होंने कहा कि, “It is no use seeking refuge in quibbles. It is no use telling people that the Shastras do not say what they are believed to say, grammatically read or logically interpreted. What matters is how the Shastras have been understood by the people.” लोगों ने वास्तव में शास्त्र गलत समझे, इसलिए भारतभूमि जातिवाद, भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता की भूमि हो गयी.
हस्तिनापुर की कुरुसभा में बालों से घसीटकर लाई गयी द्रौपदी महारानी का प्रश्न था: धर्म के अनुसार मैं जीती गयी हूँ या नहीं? (जिताम् वाप्यजिताम् वा). उनका देवर दु:शासन बल से झकझोरकर जोर-जोर से हँसते हुए उन्हें दासी बुलाता था और कर्ण उसकी सराहना करता था. यहाँ एक और प्रश्न उठता है. रश्मिरथी कर्ण क्या वास्तव में प्रशंसा योग्य है? कर्ण के सामर्थ्य का गुणगान करने वाले लोग उसके साथ हुए भेदभाव पर आक्रोश व्यक्त करते हैं लेकिन वे भूल जाते हैं कि अपने साथ हुए भेदभाव को हथियार बनाकर दूसरों पर अन्याय करने वाले लोग कभी भी प्रशंसनीय नहीं हो सकते. वास्तव में, महाभारत की हिंसा के केंद्र में धृतराष्ट्र का अंधा पुत्रमोह और कर्ण की अंधी सामर्थ्य है.
कर्ण जैसा खलनायक आज जातिवादी राजनीतिज्ञों और विचारकों का खिलौना बना हुआ है. द्रौपदी के इस प्रश्न पर सभी मौन रह गए लेकिन धर्म की समझ रखने वाले भीष्म ने कहा कि, “युधिष्ठिर से अधिक धर्म की समझ किसी को नहीं है, इसलिए तुम्हारे प्रश्न की विवेचना संभव नहीं है.” यह बात भी समझ के बाहर है कि धर्म की व्याख्या के लिए लोग किसी एक मनुष्य के आचरण को सर्वस्व मान ले. सभी मनुष्यों के पास मस्तिष्क है, फिर भी वे उसका प्रयोग करने के स्थान पर युधिष्ठिर जैसे लोगों को देखते हैं.
(धर्मराज युधिष्ठिर धन-समृद्धि से भरी हुई धरती त्याग सकते हैं लेकिन धर्म को नहीं छोड़ सकते; स्त्री सदा अपने स्वामी के अधीन रहती है और जब उन्होंने कह दिया कि मैं हार गया, तो मैं इस पर ठीक ठीक कुछ नहीं कह सकता हूँ). भारतभूमि में धर्म एक सूक्ष्म तत्त्व है, अणु से भी अधिक सूक्ष्म. कठोपनिषद कहता है, यह धर्म सरलता से समझ में नहीं आता है, यह अणु के समान सूक्ष्म है.
द्रौपदी को उत्तर देते समय भीष्म भी कहते हैं, धर्म की सूक्ष्मता के कारण मैं तुम्हारे प्रश्न की विवेचना नहीं कर सकता हूँ.
कितने आश्चर्य की बात है! एक स्त्री को पुरुषों की राजसभा में नग्न किया जा रहा हो, घसीटा जा रहा हो, गालियाँ दी जा रही हो, और महावीरों तथा विद्वानों से भरी सभा धर्म पर चर्चा कर रही हो! यही वह धर्म की समझ है जो आज के आलेख के केंद्र में है. अरब यात्री अल-बरुनी के यात्रा वृतान्त में सोमनाथ मंदिर का विवरण सुनकर महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२५ में लगभग ५००० साथियों के साथ सोमनाथ मन्दिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। ५०००० लोग मन्दिर के अन्दर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे या अपने धर्म की समझ का प्रदर्शन कर रहे थे, वे सभी मार दिये गये और भगवान् शिव उन्हें बचाने नहीं आये.
वे ५०००० लोग अपने इष्टदेव शंकर के प्रलयंकारी स्वरुप में आ गए होते तो सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की आवश्यकता नहीं होती. स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ऐसे धर्म को लात मारकर फेंक देने की आवश्यकता है जिसमें मनुष्य को उसके स्तर से उठाकर देवत्व में प्रतिष्ठित करने की सामर्थ्य न हो.
और भारतभूमि धर्म की ऐसी समझ से आच्छादित रही और सम्भवतः आज भी है जो मनुष्य को पलायनवादी, अहिंसक और कायर बना देती है. धर्म की अपनी समझ के कारण युधिष्ठिर को महाभारत में धर्मराज कहा गया लेकिन महाभारत का युद्ध भगवान् श्रीकृष्ण के सिद्धांतों के लिए जाना गया.
महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने से पहले शक्तिशाली बलराम तीर्थयात्रा के लिए निकल गए. जाने से पहले उन्होंने पांडवों से कहा कि, “मैंने श्रीकृष्ण से बार-बार कहा कि जैसे दुर्योधन है वैसे ही पांडव हैं, दोनों हमारे लिए एक हैं, इसलिए दुर्योधन की भी सहायता करो; लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी; भीमसेन और दुर्योधन दोनों ही मेरे शिष्य हैं अतः मैं इन दोनों पर एक जैसा स्नेह रखता हूँ.”
यह कहकर वह सरस्वती नदी के तटवर्ती तीर्थों के लिए चले गए और जाते-जाते उन्होंने यह भी कहा कि, “कुरुवंशियों को नष्ट होते देखकर मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर सकूंगा.”
श्रीकृष्ण ने महाभारत का युद्ध चुना और उस युद्ध में एक पक्ष चुना; बलराम देव ने तीर्थयात्रा चुनी. आज किसी भी सामान्य व्यक्ति से प्रचलित धर्म की समझ के आधार पर पूछा जाय कि, कौन धार्मिक था? सबका उत्तर होगा, बलराम! लेकिन लोक, शास्त्रज्ञों और विद्वानों ने श्रीकृष्ण को पूर्ण अवतार कहा, और बलराम जी को अंश अवतार.
धर्म की अधूरी, कोरी और थोथी मान्यताओं से हम आज भी जूझ रहे हैं. जब समाज अन्याय और चुनौतियों से जूझ रहा हो उस समय शांति और न्याय के लिए युद्ध करना ही तीर्थयात्रा है. उस समय तटस्थता केवल इसलिए कि, मेरा बिगाड़ न हो और मेरी दोनों पक्षों में जान-पहचान है, पापकर्म है. श्रीकृष्ण कहते हैं कि, “तटस्थ लोगों की शत्रुओं की भांति उपेक्षा की जानी चाहिए.”
जब महारथी द्रोणाचार्य ने नियमों के विपरीत पांडव सेना में ब्रह्मास्त्र न जानने वाले लोगों को भी समाप्त करना प्रारम्भ किया, तब वालखिल्य इत्यादि ऋषियों ने उनसे ऐसे क्रूर कर्म न करने को कहा. उनके न मानने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें समाप्त करने के लिए युधिष्ठिर से झूठ बोलने के लिए कहा कि, “अश्वत्थामा मारा गया.”
कोरी सत्यवादिता को धर्म मानने वाले धर्मराज को श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में समझाया, “प्राणरक्षा के लिए बोला गया असत्य मनुष्य को पाप-विद्ध नहीं करता है.” बाबा साहेब ‘जाति का विनाश’ में महात्मा गांधी के संत और राजनीतिज्ञ रूपों पर कटाक्ष करते हुए लिखते हैं, “A politician must know that Society cannot bear the whole truth and that he must not speak the whole truth; if he is speaking the whole truth it is bad for his politics.”
हमारे राजाओं ने अन्धकार युग में ऐसी अनेक मूर्खताएं कीं जिनका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं था. यदि वे श्रीकृष्ण और श्रीराम के जीवन को ही अच्छे से समझ लेते तो उन्हें सफलता मिलती. पीठ दिखाकर भागते हुए शत्रु को मारना पाप है या युद्ध में पीठ दिखाना पाप है: इस नियम का पालन करते हुए पृथ्वीराज चौहान जैसे राजा यह भूल गए कि सम्पूर्व विजय ही युद्ध का एकमात्र पुण्य निष्कर्ष है.
दुर्योधन के भाग जाने पर भी श्रीकृष्ण द्वैपायन सरोवर जाते हैं और अन्तिम युद्ध के लिए ललकारते हैं. भगवान् श्रीकृष्ण कालयवन से युद्ध करते समय भाग जाने के कारण रणछोड़ भी कहे जाते हैं. आत्मरक्षा भी एक धर्म है. कर्ण और दुर्योधन अपने अंतिम समय में श्रीकृष्ण से धर्मयुक्त कृपा की याचना करते हैं, लेकिन भगवान् श्रीकृष्ण ने एक बार शुरू किये गए युद्ध को पूरी तरह से समाप्त करना ही धर्म माना.
“अधिक शक्तिशाली शत्रुओं को कूटनीति और अनेक उपायों से मार डालना चाहिए.” और इस नियम का पालन करते हुए शत्रु के खेमे में खड़े बड़े से बड़े पुण्यात्मा भी समाप्त करवा दिया. वह कैसा महात्मा यदि उसकी निष्ठा अन्याय और अधर्म के साथ है!
खर दूषण भगवान् श्री राम के साथ युद्ध से पहले उन्हें अपमानजनक शांति प्रस्ताव भेजते हैं कि, अपनी पत्नी को हमें सौंपकर वापस चले जाओ. और भगवान् श्रीराम का उत्तर था, “रण में शत्रुओं पर कृपा करने से बड़ी कायरता नहीं है.” अनेक लोग कहते हैं भगवान् राम ने सभी राक्षसों को मारने का प्रण क्यों लिया?
उन्होंने निसिचरहीन मही का प्रण लिया क्योंकि निशा है अन्धकार, अन्धकार है अज्ञान; और अज्ञानता के कारण गलत कृत्य करने वालों को अज्ञानी समझकर छोड़ देने से ‘निसिचरों’ को बल मिलता है.
भारतीय संविधान की इस दोषपूर्ण धारा के कारण १८ वर्ष से कम आयु के लोगों द्वारा आपराधिक घटनाओं में वृद्धि हुई है. वास्तव में किसी भी उम्र के जघन्य अपराधी को सुधार के लिए दण्ड की आवश्यकता है. भगवान् राम को पता था कि, अकेला रावण अपराधी नहीं है, उसका साथ देने वालों ने उसे अपनी शक्ति और संसाधन देकर अपराधी बनाया है.
राजनीति के अपराधीकरण पर बात करते समय उन राजनेताओं को छोड़ देना हमारी मूर्खता रही है जिन्होंने अपराधियों को अपने दलों और सरकार में प्रश्रय दिया है. अपराधियों को दण्डित करते समय उन राजनेताओं को भी दण्डित करना चाहिए. धर्मराज युधिष्ठिर के रथ पर न बैठकर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ पर बैठते हैं और युद्ध लड़ते हैं. यह घटना एक बहुत बड़ा संकेत है.
श्रीकृष्ण यूं ही ईश्वर या अवतार नहीं बन गए या घोषित किये गए. उन्होंने धर्म के दर्पण पर पड़ी हुई धूल साफ़ की जिसमें लोग अपने आप को देख सकें; और यह करने के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया. उन्होंने धर्म की प्रचलित मान्यताएं बदल डालीं. धर्म का तत्त्व सूक्ष्म है.
भारतीय बात-बात में पाप-पुण्य का विचार करने लगे. आक्रमण होते रहे, मंदिर, संपत्तियां और स्त्रियाँ लुटती रहीं, और धर्मभीरु भारत अकर्मण्य बना रहा, अर्चना करता रहा, आर्तनाद करता रहा. धर्म का एकमात्र तात्पर्य मंदिरों में पूजा-अर्चना, गरीबी, दासता और अपमान सहना हो गया.
लोगों के धर्म से सम्बंधित प्रश्न केवल आहार-विहार-विचार तक सीमित रह गए. कर्म का क्षेत्र अछूता रहा. यदि धर्म कर्म और आचरण के क्षेत्र तक पहुंचा भी तो ‘अगरबत्ती कितनी बार दिखानी है, भोग दाहिने हाथ से लगाना है या बाएं हाथ से, एक मंदिर में यदि ४ देवता प्रतिष्ठित हैं तो सबके आगे झुकने से क्या कोई नाराज हो जाएगा’ इत्यादि बचकाने प्रश्नों तक ही रह गया. जीवन के मूलभूत प्रश्नों, सामाजिक और सामुदायिक आचरण और कर्म पर धर्म का कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं दिखा.
यहीं पर भगवान् राम और भगवान् कृष्ण प्रासंगिक हो उठते हैं. उन्होंने धर्म को सामुदायिक कर्म और आचरण से जोड़ दिया. उनका जनजागरण अभियान आजीवन चलता रहा. उन्होंने धर्म के नाम पर फैले भ्रम को अपने व्यावहारिक कर्म से तोड़ दिया.
लोगों ने कहा समुद्र लांघने से मनुष्य नरकगामी होता है, और भगवान् श्रीकृष्ण ने समुद्र के बीच में ही द्वारका नगरी बसा ली और उनसे मिलने के लिए किसी को भी किसी न किसी रूप में समुद्र लांघना ही पड़ता था. लोगों ने कहा धार्मिक लोगों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, तो भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्म और राजनीति में कभी कोई अंतर नहीं किया. उन्होंने जीवन के साधारणीकरण में एक बड़ी भूमिका निभाई.
बात-बात में धर्म के सिद्धांतों को जानने की इच्छा रखने वालों को उन्होंने कहा कि, दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए. यज्ञ के लिए भी आग जलाने पर धुआं तो आयेगा ही. इस कारण से यज्ञ करना बंद नहीं करते. उसी तरह से सभी कर्मों में कुछ न कुछ दोष हैं. हितकर भाषण देने वाला व्यक्ति भी अनजाने अनेक जीवाणुओं की हत्या कर रहा है लेकिन वह एक महत्तर उद्देश्य जनजागरण का कार्य कर रहा है.
महत्तर उद्देश्य के लिए किया गया कर्म ही धर्म है. यह एक बड़ा सूत्र है: सहज कर्म करो. तुम्हारी पत्नी का अपमान हो रहा हो तो धर्म के विषय में न सोचो. उस सहज क्रोध को अपना अस्त्र बनाकर उसका अपमान रोको. हमने गलती कि, सहज कर्म करने बंद कर दिए और बड़ी-बड़ी सैद्धांतिकी को अपना जीवन बना लिया. स्वामी विवेकानन्द का व्यवहारिक वेदान्त यही है, “One ounce of practice is worth twenty thousand tons of big talk.”
स्वामी विवेकानंद के अनुसार निष्काम कर्म की अवधारणा भगवान् श्रीकृष्ण की पूरे संसार को मौलिक देन है. उनसे पहले किसी ने ऐसा नहीं कहा, कर्म के लिए कर्म, प्रेम के लिए प्रेम! लेकिन निष्काम कर्म के धरातल पर उतरना बहुत कठिन है. तो क्या जो लोग इस धरातल पर नहीं उतर सकते, उन्हें कर्म करने से रोकना चाहिए?
श्रीकृष्ण के वज्रगम्भीर वाणी में उत्तर मिलता है, “नहीं! जो लोग कर्म में आसक्त हैं, उनकी बुद्धि में भ्रम पैदा न करें. जैसे वे जमकर कर्म करते हैं उसी प्रकार विद्वान लोगों को भी अच्छे से कर्म करना चाहिए और ऐसे लोगों से करने के लिए कहना चाहिए.” धर्म के बड़े-बड़े सिद्धांत उन लोगों के लिए हैं जो विचारवान है. सामान्य मनुष्यों से केवल कर्म की बात करनी चाहिए.
जनसंख्या और प्रचार की दृष्टि से सेमेटिक धर्म अधिक सफल दिखाई देते हैं क्योंकि वहां के सिद्धांत बहुत गूढ़ और पेंचीदे नहीं हैं. उन्हें अपने धर्म को शक्तिशाली बनाना है, भले इसके लिए हिंसा का आश्रय लेना पड़े या प्रलोभन का या आतंक का. आहार की पेंचीदगी में नहीं घुसा गया. लोग धार्मिक भी होना चाहते हैं, आसान राह भी देखते हैं और दुर्गुण भी नहीं छोड़ना चाहते.
छिछलेपन का विस्तार होता है. गहराई और विस्तार दोनों गुण दुर्लभ होते हैं. यह तो एकमात्र महासागर का गुण है: गहराई और विस्तार। भारत में समय-समय पर संत लोगों को युगानुकूल धर्म सिखाते रहते हैं. जैसे सन्त रामानन्द की परम्परा के बाबा गंगारामदास ने कहा कि, “प्राणप्रतिष्ठित सत्यस्वरूपा समष्टि हेतु अर्पित कर्त्तव्य कर्म ही धर्म है. शास्त्रोक्ति, गुरुवचन एवं आत्मानुभूति की साकारता ही सत्य है. सत्यजनित धर्मों (कर्त्तव्य कर्मों) की व्यवस्था का प्रतिफल ही न्याय है.”
परम्पराओं का पुनर्मूल्यांकन और परिष्कार आवश्यक है. श्रीकृष्ण भगवान् के जीवन में एक बड़ी घटना है: गोवर्धन धारण. इसके अतिमानवीय पक्षों को छोड़ दिया जाय तो इस प्रसंग में कुछ बेहद खूबसूरत बिन्दु हैं जो श्रीकृष्ण के क्रान्तिधर्मी और सत्यनिष्ठ स्वरूप का परिचय देते हैं.
उन्होंने नन्द बाबा से कहा, कुछ लोग कर्मों को भलीभांति समझकर करते हैं, और कुछ लोग बिना जाने. जानने वालों का कर्म सफल होता है, न जानने वालों का नहीं. आप इंद्र के लिए जिस क्रियायोग का अनुष्ठान कर रहे हैं, वह सुविचारित है अथवा केवल परम्पराओं के अनुसार लौकिक अनुकरण?
नन्द बाबा स्वीकार करते हैं कि वह ऐसा पारम्पर्यागत धर्म के कारण कर रहे हैं. उन्हें विश्वास है कि इस के पालन से मेघराज इंद्र वर्षा करेंगे जो त्रिवर्गफल (धर्म, अर्थ, काम) में सहायक है. सच तो यही है कि हम सभी प्रायः सुचिन्तित, सुपठित और सुविचारित होने के लिए अध्यवसाय नहीं करते हैं।
श्रीकृष्ण भगवान् ने नन्द बाबा की आध्यात्मिक समझ के केंद्र में कर्म को रखते हुए कहा, “कर्म से ही जन्म और मृत्यु होते हैं. कर्म ही सुख, सुख, भय और क्षेम या कल्याण को नियमित करता है. यदि कोई तर्क करता है कि कर्म का फल देने के लिए कर्म से अलग कोई भगवान बैठा है तो वह ईश्वर भी केवल उन्हीं कर्मों का फल देता है जो किये गए हैं; उस व्यक्ति को कोई फल नहीं मिलता है जिसने कर्म ही न किये हों.”
कर्म की इतनी सुंदर प्रतिष्ठा, वह भी परम्पराओं, देवताओं और कर्मकाण्डों के ऊपर, श्रीकृष्ण से पहले किसी आचार्य ने नहीं की। उन्होने यहाँ तक कह दिया कि, “जब सभी प्राणी अपने अपने कर्मों का ही फ़ल भोग रहे हैं तब हमें इन्द्र की क्या आवश्यकता है? जब वे पूर्व संस्कार के अनुसार प्राप्त होने वाले मनुष्यों के कर्म-फल को नहीं बदल सकते हैं तब उनसे क्या प्रयोजन?...कर्म ही गुरु है और कर्म ही ईश्वर।“
श्रमण परम्परा का यही प्रस्थान बिन्दु है। आचरण को धर्म मानकर साधना, तप और पुरुषार्थ के द्वारा आत्म-उत्कर्ष का प्रयास ही श्रमण परम्परा है जबकि ज्ञान, वेद, यज्ञ, धर्म और आध्यात्मिक चिन्तन के द्वारा आत्म-उत्कर्ष का मार्ग ब्राह्मण परम्परा है।
श्रीकृष्ण ने नन्द बाबा से आगे कहा कि, “अपने स्वभाव के अनुसार वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म का पालन करते हुए कर्म का आदर करना चाहिए। जिससे हमारी जीविका सुगमता से चलती है, वही हमारा इष्टदेव होना चाहिए। जैसे अपना भरण पोषण करने वाले पति को छोड़कर एक व्यभिचारिणी स्त्री किसी और पुरुष से प्रेम करके कभी शान्ति नहीं पाती है, उसी प्रकार अपनी आजीविका चलाने वाले कर्म को छोड़कर किसी दूसरे को ईश्वर मानकर उसकी उपासना करने वाले को कभी सुख नहीं मिलता।“
कितना सामयिक प्रासंगिक युगानुकूल बिन्दु है यह! आज सरकारें उन कर्मचारियों से परेशान हैं जो काम से भागते हैं। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में कक्षाएं न लेने वाले आचार्य और सहायक आचार्य, प्राथमिक विद्यालयों में कक्षाएं न लेने वाले अध्यापक शिक्षा में नासूर बने हुए हैं। जबकि इन सभी की आजीविका शिक्षण कर्म से चलने हैं। इन लोगों तक श्रीकृष्ण के इस समझ को ले जाना चाहिए, और उनके न मानने पर उन्हें व्यभिचारी आचार्य या अध्यापक या कर्मचारी की सार्वजनिक उपाधि दे देनी चाहिए।
आज वर्ण और आश्रम धर्म का अन्ध-विरोध हो रहा है, क्रान्ति और आधुनिकता के नाम पर। श्रीकृष्ण से बड़ा क्रांतिकारी आज तक नहीं हुआ लेकिन उन्होने अन्ध विरोध के स्थान पर समग्र बोध का मार्ग चुना। उन्होने वर्ण का सही अर्थ समझाते हुए नन्द बाबा से कहा कि, “ब्राह्मण वेदों के अध्ययन-अध्यापन से, क्षत्रिय पृथ्वी की रक्षा से, वैश्य वार्तावृत्ति से और शूद्र इन तीन वर्णों की सेवा से अपनी जीविका का निर्वाह करते हैं।“
वार्तावृत्ति का अर्थ है, समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला व्यवसाय। श्रीकृष्ण ने किसी स्थान पर भी वर्ण को जन्म या जाति से नहीं जोड़ा। ब्राह्मण को सर्वोच्च जाति मानने वाली कल्पनाओं पर विराम लगाते हुए श्रीकृष्ण ने बड़ी ईमानदारी से अपने आप को वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर वैश्य बताया, “ वैश्य चार प्रकार से जीविका चलाते हैं: खेती, व्यापार, गो पालन और ब्याज पर धन देना। हम लोग इन चारों में से एक गोपालन हमेशा से करते आए हैं... हम लोग सदा-सदा के वनवासी हैं, वन और पहाड़ ही हमारे घर हैं। इसलिए गायों, ब्राह्मणों और गिरिराज गोवर्धन के यज्ञ की तैयारी कीजिये।“
गायें, क्योंकि उनके दूध, दही, मक्खन इत्यादि के बेचने से हमारी जीविका चलती है; ब्राह्मण क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों जैसे चिकित्सक, गायों के चिकित्सक, शिक्षक इत्यादि से हम जीविका कमाने में समर्थ हे हैं; गिरिराज गोवर्धन क्योंकि उनके कारण हमारी गायों और हम सभी को पेड़-पौधे, पानी, फल, घास इत्यादि प्रचुरता से मिलते हैं।
इस प्रकार यज्ञ की एक नितांत मौलिक अवधारणा विकसित की गयी या पुनः प्रकाशित की गयी। यज्ञ में उन लोगों को भी नहीं भूलना चाहिए जो हमारे समाज के अंग हैं लेकिन गरीब हैं: चांडाल, पतित और कुत्तों भी यथायोग्य वस्तुएं देकर संतुष्ट किया जाय। ऐसा यज्ञ ही ईश्वर को प्रिय है।
यह भारतभूमि सौभाग्यशाली है कि यहाँ धर्म-अध्यात्म-संसार को समग्रता से जानने और जीने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। जिसका जन्म ही इस संसार में दु;खमय परिस्थितियों में हुआ, उसके जीवन में ईर्ष्या, द्वेष, भेदभाव, प्रतिशोध कभी देखे ही नहीं गए; जिसने जीवन, प्रेम, युद्ध, पलायन, बालपन, युवावस्था, वृद्धावस्था, गरीबी और समृद्धि सबको एक उत्सव बना दिया, उस भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में मेरी अनुरक्ति सदा-सदा के लिए बनी रहे और मैं उनके प्रेमाभक्ति के अतिरिक्त किसी और वस्तु की कामना न करूँ!
Madhav Krishna