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रविवार, 30 अगस्त 2026

क्या जातिविहीन समाज संभव है: एक विमर्श- लेखक डॉ. श्रीकान्त पाण्डेय

"क्या जातिविहीन समाज संभव है: एक विमर्श"

भारत की स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति की घटना नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न भी थी जिसमें मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, उसकी नागरिकता, प्रतिभा, श्रम और मानवीय गरिमा से तय हो। स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक मंच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनी और उसकी विशेषता यह थी कि उसमें अनेक विचारधाराओं, सामाजिक समूहों और राजनीतिक प्रवृत्तियों का संगम था। गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाषचंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, आंबेडकर सहित अनेक धाराओं के लोगों ने अलग-अलग दृष्टियों से आधुनिक भारत की कल्पना को आकार दिया। इसलिए स्वतंत्र भारत का संविधान किसी एक व्यक्ति या एक विचारधारा की कृति नहीं, बल्कि संविधान सभा की दीर्घ बहसों, समितियों, उपसमितियों और विभिन्न राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टियों के बीच बनी सामूहिक सहमति का परिणाम था। डॉ. भीमराव आंबेडकर इस विराट प्रक्रिया के प्रमुख शिल्पकारों में अवश्य थे, लेकिन संविधान को केवल उनका बनाया हुआ कहना उसके सामूहिक चरित्र को सीमित करना होगा।

आंबेडकर का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है कि उन्होंने भारतीय समाज की उस सबसे गहरी बीमारी को स्वयं भोगा था जिसे हम जाति और अस्पृश्यता के नाम से जानते हैं। उन्होंने जाति को केवल सामाजिक विभाजन नहीं माना, बल्कि इसे मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के रास्ते में मूल बाधा के रूप में देखा। उनकी प्रसिद्ध अवधारणा थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिकाऊ नहीं हो सकता जब तक सामाजिक लोकतंत्र उसके साथ न हो। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व उनके लिए अलग-अलग मूल्य नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए लोकतांत्रिक जीवन के आधार थे। इसी कारण उनका लक्ष्य केवल दलितों को कुछ सुविधाएं दिलाना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक संरचना को बदलना था जिसमें जन्म मनुष्य की सामाजिक हैसियत निर्धारित करता है।

यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अंतर समझना आवश्यक है। आंबेडकर ने वंचित वर्गों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और रोजगार में अवसर तथा राज्य की सक्रिय भूमिका का समर्थन किया, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य जातियों को स्थायी राजनीतिक पहचान में बदलना नहीं था। उनकी 1945 की पुस्तक "States and Minorities" में राज्य समाजवाद और आर्थिक लोकतंत्र की एक विस्तृत रूपरेखा दिखाई देती है, लेकिन उसे भारतीय संविधान का प्रत्यक्ष और पूर्णतः अंगीकृत स्वरूप मानना ठीक नहीं होगा। इसी प्रकार संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रतिनिधित्व तथा सेवाओं में विशेष प्रावधान ऐतिहासिक वंचना को दूर करने के उपाय थे, जाति व्यवस्था को स्थायी बनाने की घोषणा नहीं।

आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी इसी जटिलता को समझने में सहायता करती है। ब्रिटिश काल में पृथक निर्वाचक मंडलों और प्रतिनिधित्व की बहस से लेकर कम्युनल अवॉर्ड और फिर पूना पैक्ट तक वंचित समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न विकसित हुआ। स्वतंत्र भारत में संविधान ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सेवाओं में विशेष अवसरों की व्यवस्था की। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए भी संवैधानिक आधार निर्मित किया गया। अनुच्छेद 15 और 16 में विशेष प्रावधानों की गुंजाइश तथा नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 46 राज्य को कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की विशेष देखभाल का दायित्व देता है। बाद में मंडल आयोग और उसके क्रियान्वयन ने पिछड़े वर्गों के आरक्षण को भारतीय राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बना दिया।

विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक असमानता को कम करके अंततः समान अवसर का समाज बनाना था, वही धीरे-धीरे स्वयं राजनीतिक लामबंदी का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम बन गई। जाति समाप्त होने के बजाय जातीय पहचान अधिक संगठित होती गई। प्रत्येक समुदाय अपने महापुरुष, अपना इतिहास, अपनी संख्या और अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी खोजने लगा। लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व स्वाभाविक रूप से आवश्यक है, लेकिन जब प्रतिनिधित्व का प्राथमिक आधार नागरिकता के बजाय जातीय गणित बन जाए, तब लोकतंत्र सामाजिक न्याय का साधन होने के साथ-साथ पहचान की प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन सकता है।

आज भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा इसी विरोधाभास के भीतर काम कर रहा है। एक ओर संविधान जाति-विहीन समान नागरिकता की दिशा दिखाता है, दूसरी ओर चुनावी राजनीति जातीय पहचान को संगठित करके सत्ता में हिस्सेदारी का रास्ता बनाती है। हर राजनीतिक दल जातीय सामाजिक समीकरणों की गणना करता है और लगभग हर बड़ा सामाजिक समूह अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संख्या के अनुपात में देखने लगा है। इसे सामाजिक सहभागिता और प्रतिनिधित्व का नाम देना कुछ हद तक उचित है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम अंततः ऐसी राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें जाति कमजोर होगी या और अधिक राजनीतिक रूप से संस्थाबद्ध होगी?

आरक्षण के प्रश्न को भी इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। आरक्षण को केवल सुविधा या विशेषाधिकार समझना ऐतिहासिक अन्याय की उपेक्षा होगी। सदियों की सामाजिक वंचना को केवल वर्तमान आय से नहीं मापा जा सकता। दूसरी ओर यह प्रश्न भी वैध है कि क्या आरक्षण अनंतकाल तक उसी रूप में चलता रहना चाहिए और क्या आर्थिक तथा शैक्षणिक रूप से अपेक्षाकृत सशक्त परिवारों तथा अत्यंत वंचित परिवारों के बीच पर्याप्त अंतर किया जाना चाहिए। यहां सामाजिक पिछड़ेपन, ऐतिहासिक भेदभाव, आर्थिक स्थिति, शिक्षा और अवसरों के वास्तविक अभाव को साथ रखकर अधिक सूक्ष्म नीति की आवश्यकता है। आरक्षण और व्यापक सामाजिक संरक्षण को एक ही चीज मानना भी उचित नहीं होगा। आरक्षण प्रतिनिधित्व का एक औजार है, जबकि सामाजिक संरक्षण का दायरा शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, कौशल, रोजगार और आर्थिक सुरक्षा तक फैला हुआ है।

इस पूरे प्रश्न का एक दूसरा पक्ष भारत की बदलती अर्थव्यवस्था है। स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशकों में राज्य एक बड़े नियोक्ता, नियोजक और कल्याणकारी संस्था के रूप में उपस्थित था। सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी नौकरियां सामाजिक गतिशीलता का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं। लेकिन उदारीकरण के बाद अर्थव्यवस्था में बाजार की भूमिका तेजी से बढ़ी और आज सरकारी रोजगार की तुलना में निजी क्षेत्र का महत्व बहुत अधिक है। सरकारी नौकरियों का आकार सीमित होता जा रहा है, जबकि आरक्षण की राजनीति मुख्यतः उन्हीं अवसरों के इर्द-गिर्द घूमती है। परिणाम यह है कि जिस रोजगार क्षेत्र में अवसर सीमित हैं, उसी के लिए जातीय प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इससे स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति को केवल सरकारी नौकरियों के प्रतिशत तक सीमित रखने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, उद्यमिता, निजी क्षेत्र में निष्पक्ष अवसर और सामाजिक सुरक्षा तक क्यों नहीं विस्तारित किया जाए?

भारत का दूसरा बड़ा अंतर्विरोध धर्म और आधुनिकता के बीच दिखाई देता है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और आस्था को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन राज्य की दृष्टि से सभी नागरिक समान हैं। धार्मिक स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण में अनिवार्य विरोध नहीं है। व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक आस्था रखने की स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक नीति, शिक्षा, चिकित्सा, कानून और शासन का आधार प्रमाण, तर्क और वैज्ञानिक विवेक होना चाहिए। आस्था निजी जीवन में सम्मानित हो सकती है, लेकिन उसे वैज्ञानिक सत्य का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

यहीं आधुनिक भारत का एक अद्भुत अंतर्विरोध सामने आता है। हम अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, जैव प्रौद्योगिकी और आधुनिक चिकित्सा की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन सामाजिक चेतना के अनेक हिस्सों में मध्ययुगीन पहचानें अब भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। मनुष्य के पास स्मार्टफोन है, लेकिन सामाजिक संबंधों में जाति पूछी जाती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा होती है, लेकिन विवाह में गोत्र, जाति और समुदाय की सीमाएं खड़ी की जाती हैं। हम वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक जीवन में जन्म आधारित पहचान को अभी भी निर्णायक मानते हैं। यह आधुनिकता और मध्ययुगीन चेतना का असाधारण संगम है।

धर्म और जाति के प्रश्न को केवल हिंदू समाज तक सीमित करना भी ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं होगा। जाति जैसी सामाजिक संरचनाएं भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक समुदायों में विभिन्न रूपों में दिखाई देती रही हैं। बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं ने सामाजिक असमानताओं और कर्मकांडीय वर्चस्व के विरुद्ध महत्वपूर्ण वैकल्पिक दृष्टियां प्रस्तुत कीं, लेकिन सामाजिक जीवन से जातीय पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों में भी स्थानीय सामाजिक संरचनाओं का प्रभाव दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि जाति केवल किसी एक धर्म का धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि भारतीय समाज की एक गहरी सामाजिक संस्था है, जिसने धर्म की सीमाओं को भी अनेक बार पार किया है।

इसलिए जाति उन्मूलन का अर्थ किसी धर्म का विरोध करना नहीं हो सकता। इसका वास्तविक अर्थ जन्म आधारित सामाजिक श्रेणीकरण का अंत होना है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आस्था में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध रहना चाहता है तो उसे इसकी पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, नागरिक अधिकार, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक अवसर उसके जन्म से निर्धारित नहीं होने चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता और जाति उन्मूलन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि दोनों आधुनिक नागरिकता के अलग-अलग आयाम हैं।

अब प्रश्न यह है कि क्या कानून बनाकर जाति को समाप्त किया जा सकता है? यहां सावधानी जरूरी है। केवल सरनेम हटाने का कानून बना देने से जाति समाप्त नहीं होगी। नाम बदलने से सामाजिक संरचना नहीं बदलती। भारत में अनेक लोग बिना जातिसूचक उपनाम के रहते हैं और फिर भी उनकी जाति सामाजिक संबंधों, विवाह, स्थानीय नेटवर्क और कभी-कभी प्रशासनिक अभिलेखों से पहचानी जाती है। दूसरी ओर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे संवैधानिक संरक्षणों के लिए जातीय पहचान को प्रशासनिक रूप से दर्ज करना आवश्यक भी है। इसलिए एक तरफ जाति पहचान समाप्त करने की इच्छा और दूसरी तरफ ऐतिहासिक वंचना के उपचार के लिए जाति की पहचान की आवश्यकता, दोनों के बीच वास्तविक संवैधानिक तनाव मौजूद है।

अंतरजातीय विवाह इस समस्या का एक महत्वपूर्ण रास्ता अवश्य हो सकता है, लेकिन उससे भी जाति अपने आप समाप्त नहीं होती। भारतीय कानून में बच्चे की जाति का निर्धारण केवल इस सरल सिद्धांत से नहीं होता कि माता या पिता में से जो पालन-पोषण करे, बच्चे को उसी की जाति मिल जाएगी। विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय तथा प्रशासनिक नियमों ने परिस्थितियों, सामाजिक परिवेश और वास्तविक सामाजिक स्थिति को महत्व दिया है। इसलिए अंतरजातीय विवाह जाति की दीवार को कमजोर करने वाला महत्वपूर्ण सामाजिक माध्यम है, लेकिन उसके साथ कानूनी और सामाजिक परिस्थितियां भी जुड़ी हैं।

असल चुनौती यह है कि क्या हम जाति को केवल प्रशासनिक श्रेणी के रूप में सीमित कर सकते हैं और सामाजिक जीवन से धीरे-धीरे उसका प्रभाव समाप्त कर सकते हैं। शायद यही अधिक व्यावहारिक रास्ता होगा। जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानताएं बनी हुई हैं, तब तक ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों की पहचान मिटा देना न्यायपूर्ण नहीं होगा। लेकिन उस पहचान को स्थायी राजनीतिक अस्मिता बना देना भी जाति उन्मूलन के लक्ष्य के विपरीत जा सकता है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि संरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे कम हो और समान अवसरों की वास्तविकता धीरे-धीरे बढ़े।

इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं होगा। विद्यालयों में जाति आधारित अलगाव और भेदभाव पर कठोर निगरानी, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा, उच्च शिक्षा तक समान पहुंच, ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आर्थिक अवसर, अंतरजातीय विवाह को वास्तविक सामाजिक सुरक्षा, भेदभाव विरोधी प्रभावी संस्थाएं और श्रम की प्रतिष्ठा जैसे अनेक मोर्चों पर काम करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सरकारी व्यवस्था को जाति की पहचान का राजनीतिक उपयोग कम करने और नागरिक अधिकारों को अधिक सार्वभौमिक बनाने की दिशा में बढ़ना होगा।

हमें यह भी समझना होगा कि जाति केवल ऊपर से थोपी हुई व्यवस्था नहीं है। वह परिवार, विवाह, भोजन, सामाजिक संबंध, स्थानीय सत्ता और सांस्कृतिक स्मृति में भी पुनरुत्पादित होती है। इसलिए राज्य कानून बनाकर जाति की घोषणा तो प्रतिबंधित कर सकता है, लेकिन परिवार को यह नहीं सिखा सकता कि वह अपने बेटे या बेटी के विवाह के लिए जाति न पूछे। जाति का वास्तविक अंत तब होगा जब जाति सामाजिक लाभ और सम्मान की मुद्रा रहना बंद करेगी।

यही बात राजनीति पर भी लागू होती है। राजनीति किसी समूह को संगठित करती है और अक्सर उसके लिए एक साझा हित या साझा विरोधी का निर्माण करती है। यह लोकतंत्र का सामान्य तत्व है। समस्या तब शुरू होती है जब लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा नागरिक हितों के बजाय स्थायी जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण पर निर्भर हो जाए। तब बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, पर्यावरण, कृषि संकट, श्रमिक अधिकार और आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं और पहचान स्वयं राजनीतिक मुद्दा बन जाती है।

धर्म आधारित ध्रुवीकरण इस समस्या को और जटिल करता है। किसी भी धार्मिक समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन लोकतांत्रिक राज्य किसी एक धर्म की सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर आधारित नहीं हो सकता। भारतीय संविधान का मूल आग्रह नागरिक समानता है। बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का सम्मान और अल्पसंख्यक नागरिक की समान गरिमा, दोनों एक साथ संभव हैं। वास्तव में यही भारतीय धर्मनिरपेक्षता की कसौटी है।

भारत के सामने इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन सत्ता में है। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार का समाज बनना चाहते हैं। क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें मनुष्य पहले हिंदू, मुस्लिम, ब्राह्मण, दलित, यादव, राजपूत, कुर्मी, जाटव, कायस्थ या किसी अन्य पहचान का प्रतिनिधि हो और बाद में नागरिक? या ऐसी व्यवस्था जिसमें उसकी सामाजिक पहचान निजी और सांस्कृतिक स्तर पर रह सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उसकी प्राथमिक पहचान एक समान अधिकारों वाले भारतीय नागरिक की हो?

जाति उन्मूलन का अर्थ इतिहास को मिटाना नहीं है। इतिहास को याद रखना इसलिए आवश्यक है कि जिन अन्यायों ने समाज को बनाया, वे फिर न दोहराए जाएं। लेकिन इतिहास की स्मृति को स्थायी वैमनस्य में बदल देना भी उचित नहीं। सामाजिक न्याय का सर्वोच्च लक्ष्य यह होना चाहिए कि एक दिन आरक्षण की आवश्यकता स्वयं कम हो जाए, क्योंकि समाज में अवसर इतने समान हो चुके हों कि जन्म किसी की नियति तय न करता हो। उस दिन आरक्षण की समाप्ति किसी अधिकार की हार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की सफलता होगी।

इसी तरह वैज्ञानिक चेतना का अर्थ आस्था का दमन नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि सार्वजनिक जीवन में सत्य का निर्धारण तर्क, प्रमाण और अनुभव से हो। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या किसी अन्य धार्मिक स्थल में व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार जाए, लेकिन अस्पताल में इलाज विज्ञान से हो, विद्यालय में ज्ञान प्रमाण पर आधारित हो, न्यायालय में निर्णय संविधान और कानून से हो और सरकार की नीतियां आंकड़ों तथा तर्क पर आधारित हों। यही आधुनिकता का वास्तविक अर्थ है।

शायद स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी ऐतिहासिक चुनौती यही थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक स्वतंत्रता में बदला जाए। हमने विदेशी शासन समाप्त कर दिया, लेकिन जन्म आधारित असमानताओं को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सके। हमने लोकतंत्र स्थापित किया, लेकिन लोकतांत्रिक चेतना अभी भी पहचान की राजनीति से मुक्त नहीं हुई। हमने आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाया, लेकिन सामाजिक चेतना में अंधविश्वास और मध्ययुगीन पूर्वाग्रह अभी भी जीवित हैं। हमने संविधान में समानता लिख दी, लेकिन सामाजिक व्यवहार में समानता अभी अधूरी है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी जाति के विरुद्ध अभियान की नहीं, बल्कि जाति की सामाजिक उपयोगिता समाप्त करने की है। आवश्यकता किसी धर्म को कमजोर करने की नहीं, बल्कि धर्म को निजी आस्था और नागरिकता को सार्वजनिक समानता के क्षेत्र में रखने की है। आवश्यकता आरक्षण को अचानक समाप्त करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यापक सामाजिक और आर्थिक नीतियां बनाने की है जिनसे एक दिन आरक्षण की आवश्यकता ही न्यूनतम रह जाए। आवश्यकता पहचान को मिटाने की नहीं, बल्कि पहचान को अधिकार और अवसर का स्थायी आधार बनने से रोकने की है।

भारत यदि वास्तव में 21वीं सदी की वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और विकसित सभ्यता बनना चाहता है तो उसे केवल सड़कों, पुलों, डिजिटल तकनीक और सकल घरेलू उत्पाद में आधुनिक नहीं होना होगा। उसे अपनी सामाजिक चेतना में भी आधुनिक होना पड़ेगा। आधुनिक राष्ट्र वह नहीं जिसमें केवल मशीनें आधुनिक हों, बल्कि वह है जिसमें मनुष्य का मूल्य जन्म से ऊपर हो, श्रम को सम्मान मिले, स्त्री और पुरुष समान नागरिक हों, शिक्षा और स्वास्थ्य अधिकार की तरह उपलब्ध हों, धर्म व्यक्ति की स्वतंत्रता हो और राज्य किसी धर्म, जाति या समुदाय की श्रेष्ठता का उपकरण न बने।

भारत की वास्तविक राष्ट्रीय चेतना शायद वहीं से जन्म लेगी जहां जातीय अस्मिता और धार्मिक पहचान के ऊपर नागरिकता की समान पहचान खड़ी होगी। तब राजनीति जातीय जोड़-घटाव और धार्मिक ध्रुवीकरण से निकलकर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, उत्पादकता, श्रम की प्रतिष्ठा, वैज्ञानिक सोच और विवेकपूर्ण आर्थिक समानता जैसे वास्तविक प्रश्नों पर केंद्रित हो सकेगी। तब विकास केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा का विस्तार होगा।

स्वतंत्रता आंदोलन ने हमें राजनीतिक आजादी दी, संविधान ने हमें समान नागरिक बनने का रास्ता दिया। अब अगली ऐतिहासिक यात्रा सामाजिक मुक्ति की है। जाति से मुक्ति, भेदभाव से मुक्ति, अंधविश्वास से मुक्ति और उस राजनीति से मुक्ति जो नागरिक को पहले किसी समूह का सदस्य और बाद में मनुष्य मानती है। यही वह अधूरा काम है जिसे पूरा किए बिना आधुनिक भारत की परियोजना पूरी नहीं होगी। और शायद आंबेडकर की सबसे बड़ी प्रासंगिकता भी आज यही है कि संविधान को केवल पढ़ा न जाए,
बल्कि उसके मूल आदर्शों, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय को सामाजिक जीवन का वास्तविक आधार बनाया जाए।

डॉ. श्रीकान्त पाण्डेय
अव.प्राप्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र
पी. जी. कॉलेज
गाजीपुर ( उत्तर प्रदेश )


सोमवार, 24 अगस्त 2026

Muscular Dystrophy में LGMD क्या है

Muscular Dystrophy में LGMD क्या है?

LGMD (Limb-Girdle Muscular Dystrophy) मांसपेशियों की एक आनुवंशिक (Genetic/वंशानुगत) बीमारी है। इसमें मुख्य रूप से शरीर के केंद्र के पास की मांसपेशियाँ—विशेषकर कंधे, ऊपरी भुजाएँ, कूल्हे और जांघें—धीरे-धीरे कमजोर होती हैं और उनका आकार कम हो सकता है। यह पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित कर सकती है।

1. LGMD के मुख्य लक्षण

  • चलने और दौड़ने में कठिनाई
  • सीढ़ियाँ चढ़ने में परेशानी
  • जमीन या कुर्सी से उठने में हाथों का सहारा लेना
  • कूल्हे और जांघों की कमजोरी
  • कंधों और बाजुओं की कमजोरी
  • बार-बार गिरना या संतुलन में परेशानी
  • चलने का ढंग बदलना, जैसे डगमगाकर चलना
  • मांसपेशियों का धीरे-धीरे कमजोर या पतला होना
  • कुछ प्रकारों में पिंडलियों की मांसपेशियाँ बड़ी दिखाई दे सकती हैं
  • कुछ LGMD प्रकारों में हृदय और श्वसन मांसपेशियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं।

2. LGMD क्यों होता है?

LGMD किसी एक बीमारी का नाम नहीं, बल्कि कई आनुवंशिक मांसपेशी रोगों का समूह है। अलग-अलग जीन में परिवर्तन (mutation) के कारण मांसपेशियों के लिए आवश्यक प्रोटीन ठीक से काम नहीं कर पाते। इससे समय के साथ मांसपेशियों की कमजोरी बढ़ सकती है। 30 से अधिक आनुवंशिक प्रकार पहचाने जा चुके हैं।

3. LGMD के प्रकार

वर्तमान नामकरण में इन्हें मुख्यतः दो समूहों में समझा जाता है:

  • LGMD-D (Dominant): दोषपूर्ण जीन की एक प्रति से बीमारी हो सकती है।
  • LGMD-R (Recessive): आमतौर पर संबंधित जीन की दोनों प्रतियों में परिवर्तन होने पर बीमारी होती है।

पुराने नाम जैसे LGMD1 और LGMD2 भी कई पुरानी रिपोर्टों में मिलते हैं। उदाहरण के लिए, पुराने LGMD2A को नए नामकरण में LGMD R1 calpain3-related कहा जाता है।

4. LGMD की शुरुआत किस उम्र में होती है?

यह बीमारी बचपन, किशोरावस्था या वयस्क अवस्था में शुरू हो सकती है। शुरुआत की उम्र और बीमारी की गति उसके विशिष्ट आनुवंशिक प्रकार पर निर्भर करती है। कुछ प्रकार बहुत धीरे बढ़ते हैं, जबकि कुछ में कमजोरी अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ सकती है।

5. LGMD की जाँच कैसे होती है?

सही निदान के लिए आमतौर पर निम्न जाँचों का उपयोग किया जा सकता है:

  1. न्यूरोलॉजिस्ट/न्यूरोमस्कुलर विशेषज्ञ द्वारा शारीरिक परीक्षण
  2. CK या CPK (Creatine Kinase) रक्त जाँच — मांसपेशियों के नुकसान का संकेत दे सकती है, लेकिन केवल CK से LGMD का प्रकार निश्चित नहीं होता।
  3. Genetic Testing / NGS Gene Panel — आज LGMD के प्रकार की पुष्टि में बहुत महत्वपूर्ण है।
  4. आवश्यकता होने पर EMG/NCS
  5. Muscle MRI
  6. कुछ मामलों में Muscle Biopsy
  7. विशेष प्रकार के अनुसार ECG, Echocardiography तथा Pulmonary Function Test (PFT) भी किए जा सकते हैं।

महत्वपूर्ण बात

LGMD का सही subtype जानने के लिए Genetic Test सबसे महत्वपूर्ण जाँचों में से एक है। इससे रोग की प्रकृति, संभावित हृदय/फेफड़े की जटिलताओं और परिवार के अन्य सदस्यों के आनुवंशिक जोखिम को समझने में मदद मिलती है।

6. क्या LGMD का इलाज है?

अभी अधिकांश LGMD प्रकारों के लिए ऐसा एक सार्वभौमिक उपचार उपलब्ध नहीं है जो हर व्यक्ति में बीमारी को पूरी तरह समाप्त कर दे। उपचार मुख्यतः लक्षणों, कार्यक्षमता और जटिलताओं के प्रबंधन पर आधारित होता है।

उपचार और देखभाल में शामिल हो सकते हैं:

  • विशेषज्ञ की सलाह से फिजियोथेरेपी और सुरक्षित व्यायाम
  • मांसपेशियों और जोड़ों की गति बनाए रखना
  • जरूरत पड़ने पर walking aid, brace, wheelchair या अन्य सहायक उपकरण
  • गिरने से बचाव
  • नियमित हृदय जाँच, यदि subtype में हृदय जोखिम हो
  • श्वसन क्षमता की जाँच, यदि subtype में जोखिम हो
  • पोषण, वजन और दैनिक गतिविधियों का उचित प्रबंधन
  • न्यूरोलॉजिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट आदि की multidisciplinary care

7. क्या सभी LGMD रोगियों की स्थिति एक जैसी होती है?

नहीं। LGMD में व्यक्ति-विशेष और subtype के अनुसार बहुत अंतर हो सकता है। किसी व्यक्ति में बीमारी धीरे बढ़ सकती है, जबकि दूसरे में कमजोरी अधिक तेजी से बढ़ सकती है। इसलिए केवल नाम “LGMD” के आधार पर भविष्य की स्थिति बताना उचित नहीं है; exact genetic subtype जानना आवश्यक होता है।

संक्षेप में

LGMD = कंधे और कूल्हे के आसपास की मांसपेशियों को प्रमुख रूप से प्रभावित करने वाली आनुवंशिक Muscular Dystrophy का समूह।

सबसे महत्वपूर्ण कदम:
CK/CPK रिपोर्ट + Genetic Test की रिपोर्ट + वर्तमान लक्षण को किसी अनुभवी Neurologist या Neuromuscular specialist को दिखाकर exact LGMD subtype की पुष्टि कराना।

CK/CPK, Genetic Test, Muscle Biopsy या किसी अन्य जाँच की रिपोर्ट है,  उसे LGMD की पूर्ण रूप से पुष्टि की जा सकती है



जातिगत आरक्षण को हटाने के लिए सामान्य वर्ग का कोई भी सांसद विधायक और नेता सामने नहीं आया- लव तिवारी गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

देश में हिन्दुत्व के होल सोल ब्रैंड अंबेसडर, सामान्य वर्ग को सरकार ने लात मार मारकर ये समझाया कि देशभक्ति नहीं जाति भक्ति करने में ही फायदा है । जब मोदी जी का दिल आया गधी पर... तो परी क्या चीज है ?

मित्रों हिन्दू धर्म बड़े खतरे में है । ये समय था कि हम सभी लोग गजवा-ए-हिंद के खिलाफ तैयारी करते लेकिन अफसोस कि हिन्दुओं ने एकजुट होकर जिसको अपना नेता बनाया, उस नेता ने ही हिन्दू एकता की पीठ में छुरा घोंप दिया । कई सदियों के बाद हिंदुओं को प्रचंड सत्ता मिली, लेकिन जिनको सत्ता दी गई वो चढ़ावा चोरी जैसे घृणित कामों में लिप्त पाए गए । ये राम मंदिर की मर्यादा 5 साल तक भी अक्षुण्ण नहीं रख सके, हिंदुत्व तो बहुत बड़ा विषय है और बहुत गंभीर जटिल मुद्दे हैं ।

जब से देश की राजनीति हिंदुत्व के दौर में प्रवेश करती है।
तो सिर्फ सामान्य वर्ग की जातियां ही ऐसी थी जिन्होंने जाति भक्ति छोड़कर राष्ट्रभक्ति और हिंदुत्व भक्ति के नाम पर बीजेपी को वोट दिया। बाकी हर जाति ने अपनी अपनी पार्टी बनाई और अपने ही वर्ग की अन्य जातियों से गठजोड़ करके मुख्यमंत्री के पद तक भी पहुंच गए ।

जैसे यादवों ने अपनी पार्टी बनाई सपा और आरजेडी

जाटवों ने अपनी पार्टी बनाई बसपा

यूपी, राजस्थान और हरियाणा में जाट लोगों ने भी अपनी अलग अलग पार्टियां बनाई, RLD इत्यादि

उत्तर प्रदेश में कुर्मियों ने बनाया अपना दल

राजभरों ने बनाई सुहलदेव समाज पार्टी

बिहार के पासवानों ने बनाई LJP

बिहार के कुर्मियों ने जनता दल

यूपी में निषादों की भी अलग पार्टी है ।

सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण... सोचने लायक बात यह है की लाख कोशिशों के बाद भी बीजेपी इन जाति के लोगों को हिंदुत्व के नाम पर अपनी पार्टी के अंदर विलय कराने में कामयाब नहीं हो सकी । इन जातियों में जाति भक्ति इतनी ज्यादा है कि ये अगर बीजेपी में आए भी तो अपनी पार्टी के गठबंधन के साथ ही आए। इन जातियों के नेता भी सत्ता की मलाई काटने के लिए बीजेपी के साथ हो लिए, लेकिन आज भी हिंदुत्व पर इनकी जुबान नहीं खुलती है ।

अब हिंदुत्व के लिए इतने लंबे समय से बैटिंग करने का काम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कर रहे थे और सही मायने में गजवा ए हिंद से मुकाबला करने के लिए देश को तैयार करने में जी जान से लगे हुए थे तब इन सभी सामान्य वर्ग की जातियों की पीठ में मोदी जी ने यूजीसी लाकर छुरा घोंप दिया । जब सामान्य वर्ग की नींद टूटी तो उसको समझ में आया कि हिंदुत्व की घुट्टी पिलाकर उसके साथ बड़ा अन्याय किया जा रहा है। अब ये सब जातीय बवाल और जन भावनाओं के उफान को रोकना हमारे हाथ में नहीं है, सरकार ने हिमालयन ब्लंडर किया है । दुख इसी बात का है, ये सब जो हो रहा है इसकी टाइमिंग बहुत खराब है ये समय हिंदुओं को तैयार करने का था लेकिन मोदी ने आपस में हिंदुओं को ही लड़वाकर देश के इस्लामीकरण का रास्ता खोल दिया ।

अगर मोदी और संघ चाहते तो यादव, कुर्मी, पासवान अन्य सभी जातियों में मौजूद ऐसे महानायकों को आदर्श बना सकते थे जिन्होंने मुगलों के खिलाफ महान युद्ध लड़े और हिन्दुत्व के आदर्श स्थापित किए लेकिन बीजेपी और मोदी ने ऐसे अंग्रेजों के पिट्ठुओं को अपना आदर्श बना लिया है जो अपनी किताबों में ये लिखते हैं कि ब्रह्मा जी रंडीबाज थे ।

यानी जब मोदी जी का दिल आया गधी पर तो परी क्या चीज है?
और यही आज इस वक्त देश का दुर्भाग्य है और देश की बड़ी विडंबना भी है ।

विदुर नीति में विदुर लिखते हैं कि जहर एक व्यक्ति को मार सकता है, लेकिन राजा की एक गलत नीति पूरे राष्ट्र का संहार कर सकती है ।

तो अगर इस राष्ट्र को बचाना चाहते हो तो इसका एक ही उपाय है इस त्रिपुंडधारी फर्जी चक्रवर्ती सम्राट को उखाड़ फेंकने के लिए भीषण संकल्प लो और किसी योग्य हिन्दू नेता को आगे कर समाज में फिर से समरसता का माहौल स्थापित करो और सब जातियों में बराबरी स्थापित करो। किसी के साथ कोई अन्याय ना हो । किसी का तुष्टीकरण न हो । क्योंकि हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, कहीं जाति की लड़ाई में हम वो अमूल्य समय ना खो दें जो इस राष्ट्र को बचाने के लिए आवश्यक है ।
साभार

- लव तिवारी





शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

लावारिस लाशो के वारिस- आदरणीय श्री कुंवर वीरेंद्र सिंह जी गाजीपुर उत्तर प्रदेश

गाजीपुर की एक सड़क...
बारिश... अंधेरा... और एक लावारिस लाश

लोग बहुत थे। पर तमाशा देख रहे थे।
फोन एक का बजा।
"वीरेंद्र भैया... आ जाइए"

25 मिनट में भीगते हुआ पहुंचा।

भीड़ बोली - *"पुलिस आएगी, पंचनामा होगा"*
वो बोला - *"3 घंटे हो गए। सड़ रही है। पहले मर्चेंरी मे रखा जाएगा, फिर कागज बनेगा"*

पुलिस के सहयोग से उठाया... और चल दिया।


वो कौन था?
नाम - कुंवर वीरेंद्र सिंह
पहचान - "लावारिसों का वारिस"

कहानी क्या है?

2015... Tata Memorial।
माँ कैंसर का इलाज शुरू हुआ और इलाज के दौरान 8 अक्टूबर 2018को मृत्यु हो गईं। माँ के आखिरी शब्द थे - *"बेटा... अकेला मत छोड़ना किसी को"*

उसी दिन वीरेंद्र ने दुनिया की हर लाश को "माँ" कह दिया।

*14 साल से हिसाब लगाइए...*

*रातें* = जागते हुए बीतीं
*त्योहार* = शमशान में बीते
*रिश्ते* = लावारिसों के साथ बने
*पैसे* = मिट्टी, लकड़ी, कफन में उड़े

*हिन्दू है* - तो _कृष्ण कुमार, जमुना, भोले नाथ, रविन्द्र, रामू_ के साथ मुखाग्नि
*मुस्लिम है* - तो _अतीक, गुड्डू, शेर अली, नौसाद_ के साथ जनाजा

72 घंटे इंतजार।
पहचान न हो तो भी... नाम "इंसान" लिखकर संस्कार।

---
एक पत्रकार ने पूछा - "डर नहीं लगता?"*
वीरेंद्र हंसे और बोले- *"68 बार रक्तदान कर चुका हूँ।"
बोले - "डर उस दिन लगा था जब माँ तड़प रही थी और मैं कुछ नहीं कर पाया।
आज डरने की उम्र नहीं रही... निभाने की उम्र है"

गाजीपुर के कई नेताओ ने कहा - "राजनीति कर रहे हो?"
वीरेन्द्र बोले - *"राजनीति लाशों से नहीं होती सर।
राजनीति वोट से होती है। मैं तो बस दुआ कमा रहा हूं"*

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सबसे बड़ी बात क्या है पता है?

वीरेंद्र जी शादी नहीं किए।
बोले - "बीवी-बच्चे होंगे तो रात 2 बजे लाश के पास कैसे जाऊंगा?
मेरी शादी तो इंसानियत से हो चुकी हैं।"
उनका बस एक सपना है...

"जब मैं मरूं ना...
तो मेरी अर्थी पर कोई रोए नहीं।
बल्कि हजारों कहें - 'ये वही है जिसने मेरे बाप का कोई कहे मेरे माँ अन्तिम दाह संस्कार किया था'"

"मरूं तो लोगों के दिलों में बसूं"

_जय माशान बाबा_
_कुंवर वीरेंद्र सिंह - गाजीपुर_



मंगलवार, 11 अगस्त 2026

चालीस के बाद- 11 अगस्त जन्मदिवस विशेष लेखक लव तिवारी

चालीस के बाद

एक उम्र के बाद
आदमी को कुछ नहीं चाहिए होता
न कोई जीत,
न कोई प्रमाण,
न कोई ताली।

बस एक ऐसी जगह चाहिए होती है
जहाँ उससे कोई सवाल न किया जाए।

जहाँ उसे हर बात के लिए
अपने होने का कारण न बताना पड़े।

शायद चालीस के आसपास
आदमी पहली बार समझता है
कि थकान शरीर में नहीं होती,
थकान उन तमाम जवाबों में होती है
जो उसने पूरी ज़िंदगी देते-देते जमा कर लिए हैं।

बचपन में
माँ ने पूछा
“इतनी देर से क्यों आए?”

पिता ने पूछा
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”

स्कूल ने पूछा
“कितने नंबर आए?”

रिश्तेदारों ने पूछा
“बड़े होकर क्या बनोगे?”

और वह हर बार
एक नया जवाब लेकर खड़ा हो गया।

फिर जवानी आई।

तब सवाल बदल गए

“कमा कितना लेते हो?”

“कहाँ काम करते हो?”

“अपना घर कब होगा?”

“शादी कब करोगे?”

“बच्चे कब होंगे?”

और उसने फिर
अपनी ज़िंदगी को
उन सवालों के हिसाब से काट-छाँटकर
एक ऐसा आदमी बनाने की कोशिश की
जिसे दुनिया स्वीकार कर सके।

फिर प्रेम आया।

वहाँ सवाल और कठिन थे

“तुम मुझसे कितना प्यार करते हो?”

“तुम्हें मेरी परवाह क्यों नहीं दिखती?”

“तुमने ऐसा क्यों कहा?”

“तुमने वैसा क्यों नहीं किया?”

और उसने सीखा
कि कभी-कभी प्यार करने से ज्यादा मुश्किल होता है
अपने प्यार को समझाना।

उसने समझाया।

बहुत समझाया।

कभी शब्दों से,
कभी चुप रहकर,
कभी अपनी गलतियाँ मानकर,
कभी अपनी सही बात छोड़कर।

फिर घर आया।

फिर बच्चे आए।

फिर जिम्मेदारियाँ आईं।

फिर उसने जाना
कि पुरुष होना शायद
हर बार मजबूत होने का नाम नहीं है

बल्कि
हर बार टूटकर भी
सुबह उठ जाने का नाम है।

वह गिरा भी होगा,
डरा भी होगा,
कई रातें ऐसी भी रही होंगी
जब उसने छत को देखते हुए सोचा होगा

“क्या मैं सही कर रहा हूँ?”

लेकिन सुबह
उसने वही चेहरा पहना
जिस पर सबको भरोसा था।

क्योंकि घर में
पिता का डर
बच्चों के लिए कोई विकल्प नहीं होता।

उसने कमाया।

हार गया।

फिर कमाया।

कुछ लोगों को खोया।

कुछ रिश्ते बचाए।

कुछ रिश्तों को
बहुत कोशिश करके भी नहीं बचा पाया।

कुछ दोस्त
सिर्फ़ पुराने फोटो में रह गए।

कुछ सपने
बैंक बैलेंस, EMI, स्कूल फीस
और जिम्मेदारियों के नीचे दब गए।

और कुछ सपने
आज भी उसके भीतर
चुपचाप साँस लेते हैं।

फिर चालीस आई।

और अचानक
उसे एहसास हुआ

अब वह हर बात का जवाब नहीं देना चाहता।

किसी ने गलत समझ लिया
तो समझ लिया।

किसी ने उसकी नीयत पर शक किया
तो किया।

किसी को उसका मौन अहंकार लगा
तो लगे।

किसी को उसका व्यस्त रहना बेरुखी लगा
तो लगे।

अब उसमें
हर गलतफहमी को ठीक करने की ऊर्जा नहीं बची।

क्योंकि उसने पूरी ज़िंदगी
लोगों को समझाते हुए बिताई है
कि वह बुरा नहीं है।

अब वह बस इतना जानता है

जिसे मेरे साथ रहना है,
वह मेरे मौन को भी पढ़ लेगा।

और जिसे हर बार
मेरे शब्दों की गवाही चाहिए,
शायद उसे मैं कभी समझा ही नहीं पाऊँगा।

चालीस के बाद
पुरुष प्रेम करना नहीं छोड़ता।

बस प्रेम का शोर छोड़ देता है।

वह अब
किसी के पीछे भागकर
अपनी जगह नहीं माँगता।

वह अब
हर बहस जीतना नहीं चाहता।

वह अब
हर रिश्ता बचाना नहीं चाहता।

वह अब
हर चोट का हिसाब नहीं रखता।

वह बस चाहता है

सुबह की एक चाय।

अपने लोगों की सलामती।

बच्चों की हँसी।

अपने कमरे में कुछ घंटे की ख़ामोशी।

शरीर में थोड़ी ताकत।

मन में थोड़ा सुकून।

और कोई ऐसा इंसान
जिसके सामने उसे
अपने मन की सफाई देने की जरूरत न पड़े।

क्योंकि चालीस का पुरुष
बहुत कुछ देख चुका होता है।

उसे मालूम होता है
कि हर बहस का अंत समझ नहीं होता।

हर माफ़ी के बाद रिश्ता नहीं बचता।

हर सच पर विश्वास नहीं किया जाता।

और हर अच्छा आदमी
हर किसी के लिए अच्छा साबित नहीं हो सकता।

इसलिए अब
वह चुप रहता है।

यह चुप्पी हार नहीं है।

यह उस आदमी की
आखिरी बची हुई ताकत है
जिसने जिंदगी भर
सब कुछ ठीक करने की कोशिश की है।

बचपन में
उसे कहा गया था
“मर्द बनो।”

उसने बनकर दिखाया।

जिम्मेदारियाँ उठाईं।

घर संभाला।

लोगों को संभाला।

अपने आँसू संभाले।

अपने डर संभाले।

अपने सपने तक संभालकर रखे।

अब चालीस पर
वह पहली बार
अपने लिए कुछ माँगता है

मुझे मत समझाओ।

मुझसे मत पूछो कि मैं ऐसा क्यों हूँ।

मुझे हर बात साबित मत करने दो।

मैं थक चुका हूँ
अपने होने का प्रमाण देते-देते।

अब अगर तुम मेरे पास हो,
तो बस मेरे पास रहो।

मेरी हर चुप्पी का अर्थ मत खोजो।

हर दूरी को नाराज़गी मत समझो।

हर थकान को बेरुखी मत कहो।

कभी-कभी
एक आदमी बस थका हुआ होता है।

और कभी-कभी
उसकी चुप्पी में
पूरी ज़िंदगी बोल रही होती है।

चालीस के बाद
उसे दुनिया जीतनी नहीं होती।

उसे बस
अपने भीतर बचा हुआ आदमी
बचाना होता है।

और शायद यही
उम्र का सबसे कठिन सत्य है

एक उम्र के बाद पुरुष शांति नहीं माँगता…
वह सिर्फ़ उन चीज़ों से दूर हो जाता है
जो उसकी शांति छीनती हैं।

क्योंकि अब उसके पास
समय कम नहीं हुआ है

बस
वह पहली बार समझ गया है
कि उसका समय
उसका अपना भी है।





सोमवार, 27 जुलाई 2026

चाक सी नाचती जिंदगी संघर्ष जीवटता और मानवीय संवेदनाओं का प्रतिबिंब- योगिता सिंह भदौरिया

चाक सी नाचती जिंदगी"
(संघर्ष, जीवटता और मानवीय संवेदनाओं का प्रतिबिंब)
…… योगिता सिंह भदौरिया

प्रस्तावना
मेरे आदरणीय श्री राजेश कुमार सिंह 'श्रेयस' जी द्वारा रचित उपन्यास *"चाक सी नाचती ज़िन्दगी"* केवल कागज़ पर उकेरी गई कोई कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस निम्न-मध्यम वर्ग का जीवंत दस्तावेज़ है, जो अभावों की मार झेलते हुए भी अपनी गरिमा बनाए रखता है। लेखक ने मिट्टी के चाक की गति और जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच जो दार्शनिक सामंजस्य स्थापित किया है, वह पाठक को आदि से अंत तक बांधे रखने में सक्षम है।
कथानक का संक्षिप्त सार
कहानी का केंद्र बिंदु *श्यामु* है, जो एक कुम्हार परिवार का युवक है। अपने दादा भुवन के साथ मिट्टी को आकार देते हुए उसका जीवन सहज चल रहा होता है, परंतु नियति उसे एक गंभीर बीमारी (क्रोनिक सिरदर्द) के जाल में झोंक देती है। जागरूकता के अभाव और निर्धनता के कारण वह झोलाछाप डॉक्टरों के कुचक्र में फंस जाता है। दर्द निवारक दवाओं (डाइक्लोफेनेक) के अत्यधिक सेवन की लापरवाही अंततः उसकी दोनों किडनियों को विफल कर देती है। यहाँ से श्यामु का जीवन एक ऐसी परीक्षा बन जाता है, जहाँ हर कदम पर मौत और उम्मीद के बीच द्वंद्व चलता है।
पात्रों की संवेगात्मक गहराई
* *श्यामु:* वह केवल एक रोगी नहीं, बल्कि अदम्य साहस का प्रतीक है। शारीरिक यंत्रणा के बावजूद वह हार नहीं मानता और कंप्यूटर व डिजाइनिंग जैसे आधुनिक कौशल सीखकर आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करता है।
* *सुनैनी:* श्यामु की पत्नी भारतीय नारी के उस स्वरूप को दर्शाती है जो त्याग और शक्ति का पुंज है। वह न केवल अपनी किडनी देने का संकल्प लेती है, बल्कि हर विपरीत परिस्थिति में परिवार के लिए एक अभेद्य ढाल बनकर खड़ी रहती है।
सहायक पात्र
भवानी सेठ और राकेश दिनकर जैसे पात्र समाज के उस उजले पक्ष को दर्शाते हैं, जो निःस्वार्थ सेवा और आर्थिक सहयोग के माध्यम से मानवता में विश्वास जगाते हैं।
उपन्यास का विशेष महत्व: एक विस्तृत विश्लेषण
यह कृति साहित्यिक आनंद के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सामाजिक संदेशों को समाहित किए हुए है, जिसका विस्तार निम्नलिखित है:
1. ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी सच्चाई
यह उपन्यास ग्रामीण भारत में चिकित्सा सुविधाओं की बदहाली और झोलाछाप डॉक्टरों के बढ़ते प्रभाव पर कड़ा प्रहार करता है। यह दिखाता है कि कैसे उचित मार्गदर्शन के अभाव में एक सामान्य बीमारी जानलेवा बन जाती है। यह समाज को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने की चेतावनी देता है।
2. मध्यम वर्ग का आर्थिक और मनोवैज्ञानिक संघर्ष
लेखक ने बहुत सूक्ष्मता से उकेरा है कि कैसे एक लंबी बीमारी किसी हंसते-खेलते परिवार की आर्थिक कमर तोड़ देती है। यह मध्यम वर्ग की उस विवशता का चित्रण है जहाँ इलाज के खर्च और सम्मानजनक जीवन के बीच एक निरंतर युद्ध चलता है।
3. रिश्तों की अटूट डोर
तकनीकी और भौतिकवादी युग में यह कहानी हमें याद दिलाती है कि संकट के समय केवल 'अपने' ही साथ खड़े होते हैं। श्यामु और सुनैनी का संबंध प्रेम, निष्ठा और एक-दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पण की पराकाष्ठा है।
4. प्रेरणा और जीवटता (Resilience)
उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी सकारात्मकता है। यह संदेश देता है कि "जीवन का चाक" चाहे कितनी भी प्रतिकूल दिशा में घूमे, यदि मन में दृढ़ निश्चय हो, तो राख से भी उठकर खड़ा हुआ जा सकता है।

निष्कर्ष एवं पाठक की अनुगूँज
"चाक सी नाचती ज़िन्दगी” हमें सिखाती है कि जीवन की सार्थकता केवल सुख भोगने में नहीं, बल्कि कठिनाइयों से मुस्कुराकर लड़ने में है। यह कृति पाठकों के हृदय में करुणा का संचार करती है और उन्हें संघर्ष करने की नई ऊर्जा से भर देती है।
> *"यह उपन्यास हर उस व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य पाठ है, जो जीवन की चुनौतियों के सामने स्वयं को असहाय महसूस करता है।"*

योगिता सिंह भदौरिया
प्रयागराज,उत्तर प्रदेश


शनिवार, 25 जुलाई 2026

नेक इंसान लघु कथा -राजेश कुमार सिंह श्रेयस कवि लेखक एवं समीक्षक लखनऊ उ.प्र.

#नेक_इन्सान ( लघुकथा )

आज सुबह से ही काफी बरसात हो रही थी। वैसे तो नन्हा छोटू रुई वाली मिठाई की स्टिक लेकर सुबह ही घर से निकल गया था,लेकिन आज ग्राहक नदारत थे । सुबह से बरसात शुरू हुई तो बंद होने का नाम नहीं ले रही थी । मनोहरलाल के समोसे वाली दुकान के आगे लगे टिन सेड में रखे बेंच का किनारा पकड़े छोटू बरसात के रुकने का इंतजार करता रहा । बरसात बिल्कुल ही बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी ।सुबह से घर से निकले छोटू को बड़ी तेज भूख लगी थी, लेकिन पाकेट में एक भी रुपया नही था कि कुछ खरीद कर खा ले । पॉकेट में पैसा कहां से होता,उसकी तो अब तक एक भी मिठाई नहीं बिकी थी।

मनोहरलाल की दुकान पर बरसात के मौसम में चटक समोसे खाने वालों की लाइन लगी हुई थी।
अबे, यहां क्या बैठा है, हट किनारे,... एक साहब ने उसे डांटे हुए कहा ।
बेचारा छोटू क्या ही जवाब देता। उसने थोड़ा सा सरकने में ही भलाई समझी । इसी बीच कार पर सवार तीन चार लोग मनोहरलाल की दुकान पर समोसे खाने के लिए उतरे । उन्हें देखते हैं, मनोहरलाल उनकी आव भगत में लग गया। उसकी सक्रियता को देखकर ऐसा लग रहा था कि ये लोग जरूर कोई विशेष लोग होंगे । उनके बैठने का इंतजाम मनोहरलाल को करना था सो मनोहरलाल सो उसने कड़े तेवर दिखाते हुए छोटू को डांटते हुए कहा..
अबे,बार-बार कह रहा हूँ कि भाग यहां से, यह नालायक जाने का नाम नही ले रहा है ..
कैसे जाऊँ चाचा.. इतनी तेज बरसात हो रही है भीग जाऊँगा, मेरी मिठाईयाँ भीग जाएगीं।
तेरी मिठाईयाँ भींग जाएगीं, इससे मुझे क्या लेना देना,.. हता है कि नही । चाचा यह मेरी भी तो दुकान थी.. छोटू के इतना कहते ही मनोहरलाल ने उसे एक तगड़ा सा थप्पड़ नन्हें छोटू के गाल पर जड़ दिया ।
नन्हा छोटू तिलमिला कर बेंच से नीचे गिर गया। उसके कपड़े कीचड़ में सन उठे। उसकी रुई वाली मिठाई कीचड में गिर कर पिचक गयी और ख़राब हो गयी । उस छोटे बच्चे की छोटी सी पूँजी बर्बाद हो गयी ।
जमीन पर लुढ़का छोटू कभी खुद को देखता,तो कभी अपनी बर्बाद हो चुकी, रुई वाली मिठाई को देखता। उसने आरत दृष्टि से मनोहरलाल की ओर देखा। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा फूट पड़ी । वह बिल्कुल बेचारा और विवश था। वह कर ही क्या सकता था ।
आइये बाबूजी,आपलोग लोग बैठिए, ऐसा बोलते हुए मनोहरलाल ने कार से उतरे चारों लोगों को बेंच पर बैठने का अनुरोध किया। जगह की दिक्कत जैसी की तैसी थी। ग्राहकों से सारे बेंच भरे हुए थे।

मनोहरलाल की इस गंदी सी हरकत को देखकर कार से उतरे भद्र से दिखते सज्जन का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा .. अरे मनोहरलाल ! तुमसे इस लड़के को मारा क्यों ? यह लड़का किसका है?... शायद उस सज्जन ने बच्चे की यह बात सुन ली थी कि "चाचा यह मेरी भी दुकान तो थी ।"
मनोहरलाल अब क्या ही जवाब देता, वह उस व्यक्ति का मुँह देखने लगा । थोड़ा हिचकते हुए बोला, साहब ! ये महेश का लड़का है । सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगे।
अरे मनोहरलाल..महेश कहाँ है? क्या वह दुकान पर बिल्कुल नहीं आता ? उसको देखे तो मुझे महीना हो गए । तूँ उसकी दुकान पर काम करता था, मैं यह समझ रहा था कि महेश तुम पर बहुत विश्वास करता है, इसलिए सारी दुकान तुम्हारी जिम्मेदारी पर छोड़ रखा है ।
उस सज्जन ने जब दुबारा डांटते हुए मनोहरलाल से पूछा तो मनोहरलाल ने सारी बातें उस नेक इंसान को बता दी ..
बाबूजी,महेश अब इस दुनिया में नहीं है । उसके गुजरे लगभग छः महीने से ऊपर हो गए। यह लड़का महेश का ही लड़का है।
महेश का लड़का है !..अरे महेश की पत्नी भी तो बरसों पहले गुजर गई थी। और उसका यह लड़का इस हाल में । अब तो यह बिल्कुल अकेला और अनाथ हो गया होगा ।

अबे नालायक तुम अपने मालिक से इस तरह की वफादारी निभा रहे हो। उसके बेटे की जिम्मेदारी निभाने की जगह, तुम इस छोटे लड़के से ऐसा व्यवहार कर रहे हो, उसको इस तरह से पीट रहे हो ।
अभी के अभी खाली कर दे इस गुमटी को, नहीं तो तुम्हारी हड्डी पसली तोड़ दूँगा। बिल्कुल अभी के दफा हो जा यहाँ से,नहीं तो पुलिस बुलाकर तुम्हें बंद करता हूँ । मैंने यह दुकान ( बड़ी सी गुमटी ) तुम्हें नहीं दी थी, मैंने यह दुकान उस महेश को दी थी जो की एक नेक और सज्जन इंसान था। मेरे बचपन का दोस्त था।

उस सज्जन ने छोटे छोटू के दोनों हाथों को पड़कर उठाया और उसे अपने बाहों में समेट लिया। उनके कपड़े गंदे हो गए लेकिन उनको इससे कुछ लेना देना नहीं था। इस वक्त तो उसके बचपन के दोस्त महेश का बेटा, छोटू उसकी बाहों में था। छोटू और वह सज्जन दोनों ही रो रहे थे। धूर्त मनोहरलाल दुकान छोड़कर फरार हो चुका था। दुकान में बैठे अन्य ग्राहक इस नेकइंसान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे ।

©® राजेश 'श्रेयस'
( राजेश कुमार सिंह 'श्रेयस')
कवि लेखक एवं समीक्षक
लखनऊ, उ.प्र. (भारत )
दिनांक 23 जुलाई 2026


शुक्रवार, 26 जून 2026

ट्रॉय और विवाहेतर संबंध - श्री माधव कृष्ण गाजीपुर उत्तरप्रदेश

"ट्रॉय और विवाहेतर संबंध"

✍ माधव कृष्ण

गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं, और मैं अच्छी फिल्मों को देखने की कोशिश कर रहा था। ट्रॉय के विषय में मैंने सुना था लेकिन कॉलेज में मैंने पढ़ाई और व्यायाम के सिवा कुछ और किया ही नहीं। इसलिए अब वह शौक पूरा कर रहा हूँ।

ट्रॉय और स्पार्टा दो राज्य हैं। दोनों के बीच संधि करने ट्रॉय के राजकुमार पेरिस और हेक्टर पहुँचते हैं। संधि हो जाती है। ग्रीस का महत्वाकांक्षी राजा इस संधि से खुश नहीं है क्योंकि वह ट्रॉय के स्वतंत्र राज्य को ग्रीक साम्राज्य में मिलाना चाहता है।

संधि के बाद उत्सव में ट्रॉय के छोटे राजकुमार पेरिस को स्पार्टा के वृद्ध राजा की नवयुवती पत्नी हेलेन को देखते ही प्रेम हो जाता है। दोनों में संबंध स्थापित हो जाता है, दोनों साथ जीने-मरने की कसमें खा लेते हैं। हेलेन पेरिस के साथ जहाज में छिपकर भाग जाती है। ट्रॉय जाने पर सभी को पता चलता है।

स्पार्टा का राजा मेनेलस ग्रीक सम्राट से सहायता माँगता है और सम्राट आगामेमन अपने सभी राजाओं से सेना लेकर ट्रॉय पर आक्रमण करने के लिए कहता है। इसके बाद जो हुआ, वह सभी जानते हैं। ट्रॉय मिट्टी में मिल गया। ट्रॉय के महान राजा प्रियम और उसका महान युद्ध हेक्टर मारे गये। ग्रीक राजा आगामेमन और महान योद्धा एकिलीस मारे गये।

यह सब किसलिए? एक विवाहिता को अपनी पत्नी बनाने के हठ में। एक्ट्रा मैरिटल अफेयर। विवाहेतर संबंध। आश्रम की प्रार्थना में कहते हैं, “निज आन मान मर्यादा का प्रभु ध्यान रहे, शुभ ज्ञान रहे।” विवाहेतर संबंध में वह मर्यादा धूल-धूसरित हो जाती है।

राजकुमार पेरिस अपने क्षणिक कामावेग को रोककर एक बड़े नरसंहार को रोक सकता था। लेकिन मनुष्य जाति अपने विस्मरण के लिए प्रसिद्ध है। वह भूल जाता है, अपना इतिहास, अपनी मर्यादा और परिणाम होता है ट्रॉय जैसे युद्ध। हमारे भारतीय राजाओं की अधिकांश लड़ाइयाँ स्त्रियों पर नियंत्रण के लिए होती रही।

सोशल मीडिया के समय में यह किसी से छिपा नहीं है कि व्यक्तिगत स्तर पर भी आज ऐसे संबंधों की कमी नहीं है। इनके कारण हत्याएँ हो रही हैं। अभी एक दिल दहलाने वाला वीडियो आया है जिसमें एक नशेड़ी नवयुवक एक बच्चे को आठ बार जमीन पर पटक कर मार रहा है, क्योंकि वह उसकी माँ से विवाह करना चाहता था।

जब उससे पुलिस ने पूछा कि तूने ऐसा क्यों किया, तो उसका उत्तर था कि उसकी माँ से पूछो। ये घटनाएँ अखबार और सोशल मीडिया की खबरें बनकर आए दिन मानवता को शर्मसार कर रही हैं। लोगों ने प्रेम का अनर्थ खोज लिया है। प्रेम का अर्थ है, सबसे प्रेम होना। प्रेम करने वाला किसी एक से प्रेम के लिए अन्य सभी से घृणा कैसे कर सकता है?

श्रीमद्भगवद्गीता के शब्दों में—

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्

शरीरविमोक्षणात्।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥

जो मनुष्य इसी जीवन में, शरीर के नष्ट होने से पहले, काम और क्रोध से उत्पन्न जीव आवेगों को सहन और नियंत्रित कर लेता है, वही वास्तव में योगयुक्त और सुखी मनुष्य है। आत्मसंयम केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि भीतर उठने वाले आवेगों पर विजय है। मुक्ति मृत्यु के बाद की वस्तु मात्र नहीं, बल्कि जीवन में ही मन की शांति प्राप्त करना है।



फरिश्ता लघुकथा लेखक आदरणीय राजेश श्रेयस

फरिश्ता ( लघुकथा ) ✍️

बेशर्म गर्मी को इतनी भी शर्म नहीं कि किसी के रोजी-रोटी और पेट पर लात मार न दे। रोड के किनारे पड़ी मौरंग की बोरियों को तीसरे माले तक ले जा रहे अचल का पसीना सिर से एड़ी की तरफ उतर रहा था। इतनी गर्मी में बेचारे अचल को लगातार चलना ही पड़ रहा था । और चले भी क्यों नहीं। घर के लिए तेल- नमक का जुगाड़ करने के साथ साथ,छोटे बेटे सोमेश के दवाई के लिए पैसे का इंतजाम करना उसकी मजबूरी थी।

आज अचल जब घर से चला, तो सोमेश ने धीरे से कहा था बाबूजी ! आज जल्दी घर आना। मुझे आज किसी डॉक्टर के पास जरूर ले चलो। सोमेश की ये बातें अचल के मजबूर कानों में बार-बार गूंज रही थी
डॉ. प्रवीण अपने निर्माणाधीन कोठी को देखने के लिए आए हुए थे । सारे मिस्त्री मजदूर उनके पास जमा हो गए थे । शायद आज डॉ. प्रवीण में मजदूरों के लिए कोका कोला वाला कोल्ड ड्रिंक का इंतजाम करके लाए थे ।इस प्रकार चिलचिलाती गर्मी में इस कोठी के मालिक ने अपने मजदूरों के लिए कुछ राहत का इंतजाम किया था ।

सारे मजदूर ठंडी कोल्ड ड्रिंक का मजा ले रहे थे । ठीक उसी वक्त अचल धूप में किनारे खड़ा चंदन के फोन से अपने बेटे सोमेश से बातें कर रहा था। बात करते-करते वह रो पड़ा । बेटा मैं अभी आता हूँ, मेरे लाल ! अब मत रोवो, मैं आ ही रहा हूँ ।
ऐसा कहते हुए उसने छोटे वाले की पैड फोन को अचल को चंदन को पकड़ाते हुए कहा। भाई चंदन! मैं घर जा रहा हूँ । मेरे बेटे की तबीयत बहुत खराब है । अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है । तुम्हारे जेब में क्या दो - तीन सौ रूपये पड़े हैं । यदि पड़े हो तो भईया मुझे दे दो । मैं मेहनत मजदूरी करके मय ब्याज तुमको चुकता कर दूंगा । मुझे अपने भैया को डॉक्टर से दिखाना जरूरी है ।
चंदन ने जब अपना जेब टटोला तो मुश्किल से उसकी जेब में डेढ -पौने दो सौ रुपए पड़े थे। उसने उन रूपयो को अचल को पकड़ाते हुए, कहां भाई यह पकड़ो, आज भईया को हर हाल में डॉक्टर के पास ले जाओ । अचल के चेहरे की रंगत बदल गयी, थोड़ी सी खुशी तो चेहरे पर झलक पड़ी थी ।
उसने सुपरवाइजर राकेश से घर जाने के लिए छुट्टी मांगी । एकाएक एक कड़कती आवाज में सबका ध्यान उसकी तरफ खींच लिया।
कहाँ बे कहाँ जाएगा ?
तुम्हें कहीं नहीं जाना है,शाम को जाना है ?
मुझे इससे लेना देना नहीं कि तुम्हारा बेटा बीमार है या मर..%%
अचल को जैसे लकवा मार गया हो, वह भरभरा कर जमीन पर गिर पड़ा। सारे मजदूर उसकी तरफ दौड़े ।
डॉ. प्रवीण दूर से इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे । उन्होंने अचल और चंदन की बात को भी सुन लिया था । उन्हें इस बात का पता भी लग गया था कि सुपरवाइजर तेज आवाज में सिर्फ इसलिए बोल रहा है की मालिक डॉक्टर प्रवीण यह जान जाए कि वह अपने दायित्वों के प्रति कितना जागरुक है ।
डॉ. प्रवीण अचल की ओर बढ़े । बड़े ही प्रेम से बिना इस बात की फिक्र किया कि उनके कपड़े गंदे हो जाएंगे, उन्होंने अचल को अपनी बाहों में उठा लिया और बोला चाचा ! आप बिल्कुल परेशान न हो । आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको आपके घर ले चलता हूँ । मैं आपके बच्चे को ले आऊंगा और आपके बच्चे का इलाज कोई दूसरा नहीं करेगा, मैं स्वयं करूंगा। रूपए पैसे की चिंता बिल्कुल छोड़िए और आपने ये जो थोड़े से पैसे उस लड़के से उधार लिए है उसे वापस कर दीजिए ।
ऐसा कहते हुए डॉ.प्रवीण ने अचल को अपनी कार में बैठाया, और अचल के घर की तरफ चल दिए।
कुछ ही घंटे बाद अचल का बेटा सोमेश डॉ प्रवीण की क्लीनिक पहुंच चुका था। उसने दवा खा ली थी । उसका बुखार उतर गया था। एसी की ठंडी ठंडी हवाएं, उसके बदन को राहत पहुंचा रही थी। अचल स्तब्ध होकर डॉ प्रवीण को निहार रहा था। वह उन्हें ऐसे देख रहा था कि मानो कोई फरिश्ता उसके सामने बैठा हो ।
डॉ. प्रवीण भी सामने बैठे अचल को एकटक निहार रहे थे । वे अतीत के उन दिनों की यादों खो गए थे, जब बचपन में वे एक बार बहुत बीमार थे। उनका भी शरीर तेज ज्वर से जल रहा था। उस समय उनके पिताजी जो नोएडा के एक छोटे से कारखाने में बतौर मजदूर काम करते थे, वे भी अपने सुपरवाइजर के डांट की परवाह किए बगैर अपने प्रवीण के लिए दोपहर में काम छोड़कर वापस घर आ गए थे ।

©® राजेश श्रेयस
दिनांक : 26-06-2026



शनिवार, 13 जून 2026

पंडित जवाहर लाल नेहरू बनाम श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी - लेखक श्री माधव कृष्ण गाज़ीपुर उत्तरप्रदेश

नेहरू बनाम मोदी

निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी नेहरू जी के कार्यकाल से आगे निकल गए। यह बड़ी बात है। इसके लिए उनके राजनैतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता को दाद दी जानी चाहिए।

जनसंघ या भाजपा को वर्षों बाद एक राजनैतिक व्यक्तित्व मिला है जिसे राजनीति की समझ है, जिसने जमीन पर वर्षों कार्य किया है और प्रधानमंत्री पद पर आने से पहले मुख्यमंत्री के रूप में जिसने प्रशासनिक कौशल का परिचय भी दिया है।

देश की सीमाओं की रक्षा, आतंकवादियों को देश की भूमि से दूर रखने, देश को एक कुशल नेतृत्व देने के लिए मैं मोदी जी का प्रशंसक हूं और रहूंगा। देश के डिजिटाइजेशन, आत्मनिर्भरता, धारा ३७० जैसी अनेक निर्णायक नीतियों के कारण वह इतिहास में सम्मिलित हो चुके हैं।

मोदी जी द्वारा अपनी विचारधारा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति खुला प्रेम भी उनकी महानता का द्योतक है अन्यथा शीर्ष पर पहुँचने के बाद अनेक लोग स्टेट्समैन बनने के लोभ में वैचारिक दूरी बनाने लगते हैं। लेकिन आज का विषय कुछ और है।

यह बात तो हुई समय सीमा की, मोदी जी की और उनकी राजनैतिक कुशलता की। लेकिन इस आधार पर प्रधानमंत्री नेहरू जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को कम करके आंकना किसी की भी भूल होगी। वह महामानव थे, इसमें कोई संदेह नहीं।

संघ के विद्यालय में पढ़ने के कारण और पारिवारिक परिवेश के कारण मुझे अपने देश के महापुरुषों पर गर्व है, उनमें अटूट श्रद्धा है। जब कोई नेहरू के के व्यक्तित्व और कृतित्व पर कीचड़ उछालता है तो मुझे पीड़ा होती है।

क्या हम नेहरू जी को छोटा करने लायक पर्याप्त बड़े बन चुके हैं? क्या हम नेहरू जी का अध्ययन कर चुके हैं? क्या उनका इस देश के स्वाधीनता संग्राम में कोई योगदान नहीं है? क्या उन्होंने स्वतंत्रता के बाद इस देश को कुछ नहीं दिया?

नेहरू जी का मूल्यांकन करते समय इन प्रश्नों पर अवश्य विचार होना चाहिए, और अच्छे से विचार होना चाहिए। जब देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा था, और जब यह विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली देश का उपनिवेश था, उस समय नेहरू जी एक समृद्ध परिवार के उत्तराधिकारी थे।

उनका आनंद भवन आज भी उनकी समृद्धि की गाथा गाता है। वह आनंद भवन उनके पिता और पुत्री ने देश को दे देने में जरा भी संकोच नहीं किया। नेहरू जी ने अपने पिता द्वारा इतनी बड़ी संपत्ति कांग्रेस को देने पर कभी विरोध नहीं किया। (परिशिष्ट)

उन्होंने विदेश से पढ़ाई की, सीधे उच्च न्यायालय से प्रैक्टिस शुरू की लेकिन उसी वर्ष १९१२ में उन्होंने अपना जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया। २३ वर्ष की उम्र! और राष्ट्र के लिए यह समर्पण! क्या उनकी देशभक्ति पर प्रश्न उठाना देशभक्ति है?

और हमें यह भी याद रखना होगा कि उस समय की राजनीति आज की तरह सत्ता और धन के लिए नहीं थी। उस समय कांग्रेस में सम्मिलित होने का अर्थ था, जेल आंदोलन अंग्रेजों का विरोध और घर की बर्बादी। और उद्देश्य: एकमात्र देश की स्वाधीनता।

पंडित नेहरू नेता सुभाष चंद्र बोस को अत्यंत प्रिय थे। 1939 के पुनर्निर्वाचन में नेहरू ने बोस का सक्रिय समर्थन नहीं किया, पर वे उनके कट्टर विरोधी भी नहीं थे। उन्होंने चुनाव के बाद कांग्रेस की एकता बनाए रखने और बोस-गांधी समझौते का प्रयास किया। नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने नेहरू ब्रिगेड नाम क्यों रखा था? केवल सतही स्तर पर इतना समझ लेना भी नेहरू और बोस के प्रेम को समझने के लिए पर्याप्त होगा। (परिशिष्ट)

वह पंडित नेहरू ही थे जिन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को सत्ता के केंद्र में रखा। उन्होंने अपनी पुत्री के स्थान पर शास्त्री जी को दीर्घकाल के लिए राजनैतिक संरक्षण और विश्वास दिया, उन्हें प्रांतीय नेता से राष्ट्रीय नेता बनाया। आज हम सबके चहेते प्रधानमंत्री शास्त्री जी नेहरू के कारण उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन गए। (परिशिष्ट)

पंडित नेहरू के प्रति मेरी अटूट श्रद्धा वैसी ही है जैसी किसी और राष्ट्रभक्त महापुरुष के प्रति। यह तो केवल कुछ छोटे उदाहरण हैं जो उनके विषय में फैलायी जा रही सोशल मीडिया भ्रांतियों के विरुद्ध टिककर सोचने के लिए एक आधार देती हैं।

उनकी नीतियों की आलोचना हो सकती है, विशेषकर उनके चीन युद्ध की तैयारियों को लेकर, लेकिन इतिहास का यह मूल्यांकन इतिहास के उस बिंदु पर खड़े रहकर करना होगा। औए मूल्यांकन से कोई अछूता नहीं रहता। लेकिन एक बिंदु किसी के सर्वस्व को नष्ट नहीं कर सकता।

परिशिष्ट:
१. नेहरू परिवार का पुराना घर स्वराज भवन (जो पहले आनंद भवन कहलाता था)। पंडित मोतीलाल नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लगभग 1930 में समर्पित कर दिया था। इसके बाद नए बने घर का नाम आनंद भवन रखा गया। वर्तमान आनंद भवन को बाद में इंदिरा गांधी ने नवंबर 1970 में राष्ट्र को समर्पित किया और इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया।

२. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इंग्लैंड के इनर टेम्पल (Inner Temple) में कानून की पढ़ाई की। वे 1912 में बार-एट-लॉ (Barrister-at-Law) बने और उसी वर्ष भारत लौटकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। सार्वजनिक जीवन (राजनीति) में उनका प्रवेश भी लगभग इसी समय शुरू हो गया। भारत लौटने के बाद वे 1912 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बांकीपुर अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। बाद के वर्षों में उनका राजनीतिक जुड़ाव बढ़ता गया और 1919 के होम रूल आंदोलन तथा 1920 के असहयोग आंदोलन के दौरान वे पूर्णकालिक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे।

३. 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष नेता जी ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया और उसके अध्यक्ष के रूप में नेहरू जी को नियुक्त किया।
1939 में बोस और कांग्रेस नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद हुए, जिसके परिणामस्वरूप बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। इसके बावजूद नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने रहे और समिति का कार्य आगे बढ़ाते रहे। 1939 में नेहरू द्वारा बोस को लिखे पत्रों में भी वे समिति के कार्य का उल्लेख करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे उससे अलग नहीं हुए थे।

४. लाल बहादुर शास्त्री को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र में लाने की प्रक्रिया धीरे-धीरे हुई, लेकिन निर्णायक मोड़ 1951–52 में आया।
1951 में जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) का महासचिव बनाया। शास्त्री ने 1951-52 के पहले आम चुनावों के संगठन और प्रत्याशी चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1952 में, जबकि वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रभावशाली मंत्री थे, नेहरू ने उन्हें राज्य में न रखकर दिल्ली बुलाया और अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल में रेल एवं परिवहन मंत्री बनाया। इसे शास्त्री को राष्ट्रीय नेतृत्व की पंक्ति में लाने का सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
इसके बाद नेहरू ने उन्हें लगातार महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए—रेलवे, परिवहन एवं संचार, वाणिज्य एवं उद्योग, और अंततः गृह मंत्रालय। इससे उनका कद कांग्रेस और सरकार दोनों में बढ़ता गया।
1964 में नेहरू की तबीयत खराब होने पर उन्होंने शास्त्री को बिना विभाग के मंत्री के रूप में फिर मंत्रिमंडल में लाकर अपने निकटतम सहयोगियों में रखा।

५. 1939 के कांग्रेस अध्यक्षीय चुनाव (त्रिपुरी संकट) में नेहरू जी की भूमिका जटिल थी। वे न तो पूरी तरह नेता जी के साथ खड़े हुए, न ही गांधीवादी खेमे के सक्रिय चुनाव-प्रबंधक बने।
५.1. नेहरू ने बोस की उम्मीदवारी का खुला समर्थन नहीं किया। गांधीजी और उनके निकट सहयोगी पट्टाभि सीतारमैया को उम्मीदवार बनाना चाहते थे। नेहरू बोस की कई नीतियों से सहानुभूति रखते थे, लेकिन वे गांधीजी से टकराव के पक्ष में नहीं थे।
५.2. नेहरू गांधी खेमे के साथ रहे, लेकिन बोस-विरोधी अभियान के प्रमुख नेता नहीं बने। कांग्रेस कार्यसमिति के कई सदस्य बोस के पुनर्निर्वाचन के विरुद्ध सक्रिय थे, जबकि नेहरू अपेक्षाकृत मध्यस्थ भूमिका में रहे।
५.3. बोस की जीत के बाद नेहरू ने समझौता कराने का प्रयास किया। जब बोस चुनाव जीत गए और कांग्रेस में संकट गहरा गया, तब नेहरू ने दोनों पक्षों के बीच मेल-मिलाप की कोशिश की। बाद में उन्होंने बोस से इस्तीफा वापस लेने की अपील भी की थी।
५.4. नेहरू बोस की कुछ बातों से सहमत थे, पर उनकी रणनीति से नहीं। दोनों समाजवादी झुकाव रखते थे, लेकिन यूरोप की परिस्थितियों, कांग्रेस संगठन और स्वतंत्रता संघर्ष की रणनीति पर उनके मतभेद थे।
संक्षेप में, 1939 के पुनर्निर्वाचन में नेहरू ने बोस का सक्रिय समर्थन नहीं किया, पर वे उनके कट्टर विरोधी भी नहीं थे। उन्होंने चुनाव के बाद कांग्रेस की एकता बनाए रखने और बोस-गांधी समझौते का प्रयास किया।

६. 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष Subhas Chandra Bose ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया और उसके अध्यक्ष के रूप में नेहरू जी को नियुक्त किया।
1939 में बोस और कांग्रेस नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद हुए, जिसके परिणामस्वरूप बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
इसके बावजूद नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने रहे और समिति का कार्य आगे बढ़ाते रहे। 1939 में नेहरू द्वारा बोस को लिखे पत्रों में भी वे समिति के कार्य का उल्लेख करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे उससे अलग नहीं हुए थे।

माधव कृष्ण, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल