"क्या जातिविहीन समाज संभव है: एक विमर्श"
भारत की स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति की घटना नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न भी थी जिसमें मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, उसकी नागरिकता, प्रतिभा, श्रम और मानवीय गरिमा से तय हो। स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक मंच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनी और उसकी विशेषता यह थी कि उसमें अनेक विचारधाराओं, सामाजिक समूहों और राजनीतिक प्रवृत्तियों का संगम था। गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाषचंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, आंबेडकर सहित अनेक धाराओं के लोगों ने अलग-अलग दृष्टियों से आधुनिक भारत की कल्पना को आकार दिया। इसलिए स्वतंत्र भारत का संविधान किसी एक व्यक्ति या एक विचारधारा की कृति नहीं, बल्कि संविधान सभा की दीर्घ बहसों, समितियों, उपसमितियों और विभिन्न राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टियों के बीच बनी सामूहिक सहमति का परिणाम था। डॉ. भीमराव आंबेडकर इस विराट प्रक्रिया के प्रमुख शिल्पकारों में अवश्य थे, लेकिन संविधान को केवल उनका बनाया हुआ कहना उसके सामूहिक चरित्र को सीमित करना होगा।
आंबेडकर का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है कि उन्होंने भारतीय समाज की उस सबसे गहरी बीमारी को स्वयं भोगा था जिसे हम जाति और अस्पृश्यता के नाम से जानते हैं। उन्होंने जाति को केवल सामाजिक विभाजन नहीं माना, बल्कि इसे मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के रास्ते में मूल बाधा के रूप में देखा। उनकी प्रसिद्ध अवधारणा थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिकाऊ नहीं हो सकता जब तक सामाजिक लोकतंत्र उसके साथ न हो। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व उनके लिए अलग-अलग मूल्य नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए लोकतांत्रिक जीवन के आधार थे। इसी कारण उनका लक्ष्य केवल दलितों को कुछ सुविधाएं दिलाना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक संरचना को बदलना था जिसमें जन्म मनुष्य की सामाजिक हैसियत निर्धारित करता है।
यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अंतर समझना आवश्यक है। आंबेडकर ने वंचित वर्गों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और रोजगार में अवसर तथा राज्य की सक्रिय भूमिका का समर्थन किया, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य जातियों को स्थायी राजनीतिक पहचान में बदलना नहीं था। उनकी 1945 की पुस्तक "States and Minorities" में राज्य समाजवाद और आर्थिक लोकतंत्र की एक विस्तृत रूपरेखा दिखाई देती है, लेकिन उसे भारतीय संविधान का प्रत्यक्ष और पूर्णतः अंगीकृत स्वरूप मानना ठीक नहीं होगा। इसी प्रकार संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रतिनिधित्व तथा सेवाओं में विशेष प्रावधान ऐतिहासिक वंचना को दूर करने के उपाय थे, जाति व्यवस्था को स्थायी बनाने की घोषणा नहीं।
आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी इसी जटिलता को समझने में सहायता करती है। ब्रिटिश काल में पृथक निर्वाचक मंडलों और प्रतिनिधित्व की बहस से लेकर कम्युनल अवॉर्ड और फिर पूना पैक्ट तक वंचित समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न विकसित हुआ। स्वतंत्र भारत में संविधान ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सेवाओं में विशेष अवसरों की व्यवस्था की। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए भी संवैधानिक आधार निर्मित किया गया। अनुच्छेद 15 और 16 में विशेष प्रावधानों की गुंजाइश तथा नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 46 राज्य को कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की विशेष देखभाल का दायित्व देता है। बाद में मंडल आयोग और उसके क्रियान्वयन ने पिछड़े वर्गों के आरक्षण को भारतीय राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बना दिया।
विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक असमानता को कम करके अंततः समान अवसर का समाज बनाना था, वही धीरे-धीरे स्वयं राजनीतिक लामबंदी का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम बन गई। जाति समाप्त होने के बजाय जातीय पहचान अधिक संगठित होती गई। प्रत्येक समुदाय अपने महापुरुष, अपना इतिहास, अपनी संख्या और अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी खोजने लगा। लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व स्वाभाविक रूप से आवश्यक है, लेकिन जब प्रतिनिधित्व का प्राथमिक आधार नागरिकता के बजाय जातीय गणित बन जाए, तब लोकतंत्र सामाजिक न्याय का साधन होने के साथ-साथ पहचान की प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन सकता है।
आज भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा इसी विरोधाभास के भीतर काम कर रहा है। एक ओर संविधान जाति-विहीन समान नागरिकता की दिशा दिखाता है, दूसरी ओर चुनावी राजनीति जातीय पहचान को संगठित करके सत्ता में हिस्सेदारी का रास्ता बनाती है। हर राजनीतिक दल जातीय सामाजिक समीकरणों की गणना करता है और लगभग हर बड़ा सामाजिक समूह अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संख्या के अनुपात में देखने लगा है। इसे सामाजिक सहभागिता और प्रतिनिधित्व का नाम देना कुछ हद तक उचित है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम अंततः ऐसी राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें जाति कमजोर होगी या और अधिक राजनीतिक रूप से संस्थाबद्ध होगी?
आरक्षण के प्रश्न को भी इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। आरक्षण को केवल सुविधा या विशेषाधिकार समझना ऐतिहासिक अन्याय की उपेक्षा होगी। सदियों की सामाजिक वंचना को केवल वर्तमान आय से नहीं मापा जा सकता। दूसरी ओर यह प्रश्न भी वैध है कि क्या आरक्षण अनंतकाल तक उसी रूप में चलता रहना चाहिए और क्या आर्थिक तथा शैक्षणिक रूप से अपेक्षाकृत सशक्त परिवारों तथा अत्यंत वंचित परिवारों के बीच पर्याप्त अंतर किया जाना चाहिए। यहां सामाजिक पिछड़ेपन, ऐतिहासिक भेदभाव, आर्थिक स्थिति, शिक्षा और अवसरों के वास्तविक अभाव को साथ रखकर अधिक सूक्ष्म नीति की आवश्यकता है। आरक्षण और व्यापक सामाजिक संरक्षण को एक ही चीज मानना भी उचित नहीं होगा। आरक्षण प्रतिनिधित्व का एक औजार है, जबकि सामाजिक संरक्षण का दायरा शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, कौशल, रोजगार और आर्थिक सुरक्षा तक फैला हुआ है।
इस पूरे प्रश्न का एक दूसरा पक्ष भारत की बदलती अर्थव्यवस्था है। स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशकों में राज्य एक बड़े नियोक्ता, नियोजक और कल्याणकारी संस्था के रूप में उपस्थित था। सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी नौकरियां सामाजिक गतिशीलता का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं। लेकिन उदारीकरण के बाद अर्थव्यवस्था में बाजार की भूमिका तेजी से बढ़ी और आज सरकारी रोजगार की तुलना में निजी क्षेत्र का महत्व बहुत अधिक है। सरकारी नौकरियों का आकार सीमित होता जा रहा है, जबकि आरक्षण की राजनीति मुख्यतः उन्हीं अवसरों के इर्द-गिर्द घूमती है। परिणाम यह है कि जिस रोजगार क्षेत्र में अवसर सीमित हैं, उसी के लिए जातीय प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इससे स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति को केवल सरकारी नौकरियों के प्रतिशत तक सीमित रखने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, उद्यमिता, निजी क्षेत्र में निष्पक्ष अवसर और सामाजिक सुरक्षा तक क्यों नहीं विस्तारित किया जाए?
भारत का दूसरा बड़ा अंतर्विरोध धर्म और आधुनिकता के बीच दिखाई देता है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और आस्था को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन राज्य की दृष्टि से सभी नागरिक समान हैं। धार्मिक स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण में अनिवार्य विरोध नहीं है। व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक आस्था रखने की स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक नीति, शिक्षा, चिकित्सा, कानून और शासन का आधार प्रमाण, तर्क और वैज्ञानिक विवेक होना चाहिए। आस्था निजी जीवन में सम्मानित हो सकती है, लेकिन उसे वैज्ञानिक सत्य का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
यहीं आधुनिक भारत का एक अद्भुत अंतर्विरोध सामने आता है। हम अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, जैव प्रौद्योगिकी और आधुनिक चिकित्सा की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन सामाजिक चेतना के अनेक हिस्सों में मध्ययुगीन पहचानें अब भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। मनुष्य के पास स्मार्टफोन है, लेकिन सामाजिक संबंधों में जाति पूछी जाती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा होती है, लेकिन विवाह में गोत्र, जाति और समुदाय की सीमाएं खड़ी की जाती हैं। हम वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक जीवन में जन्म आधारित पहचान को अभी भी निर्णायक मानते हैं। यह आधुनिकता और मध्ययुगीन चेतना का असाधारण संगम है।
धर्म और जाति के प्रश्न को केवल हिंदू समाज तक सीमित करना भी ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं होगा। जाति जैसी सामाजिक संरचनाएं भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक समुदायों में विभिन्न रूपों में दिखाई देती रही हैं। बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं ने सामाजिक असमानताओं और कर्मकांडीय वर्चस्व के विरुद्ध महत्वपूर्ण वैकल्पिक दृष्टियां प्रस्तुत कीं, लेकिन सामाजिक जीवन से जातीय पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों में भी स्थानीय सामाजिक संरचनाओं का प्रभाव दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि जाति केवल किसी एक धर्म का धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि भारतीय समाज की एक गहरी सामाजिक संस्था है, जिसने धर्म की सीमाओं को भी अनेक बार पार किया है।
इसलिए जाति उन्मूलन का अर्थ किसी धर्म का विरोध करना नहीं हो सकता। इसका वास्तविक अर्थ जन्म आधारित सामाजिक श्रेणीकरण का अंत होना है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आस्था में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध रहना चाहता है तो उसे इसकी पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, नागरिक अधिकार, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक अवसर उसके जन्म से निर्धारित नहीं होने चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता और जाति उन्मूलन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि दोनों आधुनिक नागरिकता के अलग-अलग आयाम हैं।
अब प्रश्न यह है कि क्या कानून बनाकर जाति को समाप्त किया जा सकता है? यहां सावधानी जरूरी है। केवल सरनेम हटाने का कानून बना देने से जाति समाप्त नहीं होगी। नाम बदलने से सामाजिक संरचना नहीं बदलती। भारत में अनेक लोग बिना जातिसूचक उपनाम के रहते हैं और फिर भी उनकी जाति सामाजिक संबंधों, विवाह, स्थानीय नेटवर्क और कभी-कभी प्रशासनिक अभिलेखों से पहचानी जाती है। दूसरी ओर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे संवैधानिक संरक्षणों के लिए जातीय पहचान को प्रशासनिक रूप से दर्ज करना आवश्यक भी है। इसलिए एक तरफ जाति पहचान समाप्त करने की इच्छा और दूसरी तरफ ऐतिहासिक वंचना के उपचार के लिए जाति की पहचान की आवश्यकता, दोनों के बीच वास्तविक संवैधानिक तनाव मौजूद है।
अंतरजातीय विवाह इस समस्या का एक महत्वपूर्ण रास्ता अवश्य हो सकता है, लेकिन उससे भी जाति अपने आप समाप्त नहीं होती। भारतीय कानून में बच्चे की जाति का निर्धारण केवल इस सरल सिद्धांत से नहीं होता कि माता या पिता में से जो पालन-पोषण करे, बच्चे को उसी की जाति मिल जाएगी। विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय तथा प्रशासनिक नियमों ने परिस्थितियों, सामाजिक परिवेश और वास्तविक सामाजिक स्थिति को महत्व दिया है। इसलिए अंतरजातीय विवाह जाति की दीवार को कमजोर करने वाला महत्वपूर्ण सामाजिक माध्यम है, लेकिन उसके साथ कानूनी और सामाजिक परिस्थितियां भी जुड़ी हैं।
असल चुनौती यह है कि क्या हम जाति को केवल प्रशासनिक श्रेणी के रूप में सीमित कर सकते हैं और सामाजिक जीवन से धीरे-धीरे उसका प्रभाव समाप्त कर सकते हैं। शायद यही अधिक व्यावहारिक रास्ता होगा। जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानताएं बनी हुई हैं, तब तक ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों की पहचान मिटा देना न्यायपूर्ण नहीं होगा। लेकिन उस पहचान को स्थायी राजनीतिक अस्मिता बना देना भी जाति उन्मूलन के लक्ष्य के विपरीत जा सकता है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि संरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे कम हो और समान अवसरों की वास्तविकता धीरे-धीरे बढ़े।
इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं होगा। विद्यालयों में जाति आधारित अलगाव और भेदभाव पर कठोर निगरानी, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा, उच्च शिक्षा तक समान पहुंच, ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आर्थिक अवसर, अंतरजातीय विवाह को वास्तविक सामाजिक सुरक्षा, भेदभाव विरोधी प्रभावी संस्थाएं और श्रम की प्रतिष्ठा जैसे अनेक मोर्चों पर काम करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सरकारी व्यवस्था को जाति की पहचान का राजनीतिक उपयोग कम करने और नागरिक अधिकारों को अधिक सार्वभौमिक बनाने की दिशा में बढ़ना होगा।
हमें यह भी समझना होगा कि जाति केवल ऊपर से थोपी हुई व्यवस्था नहीं है। वह परिवार, विवाह, भोजन, सामाजिक संबंध, स्थानीय सत्ता और सांस्कृतिक स्मृति में भी पुनरुत्पादित होती है। इसलिए राज्य कानून बनाकर जाति की घोषणा तो प्रतिबंधित कर सकता है, लेकिन परिवार को यह नहीं सिखा सकता कि वह अपने बेटे या बेटी के विवाह के लिए जाति न पूछे। जाति का वास्तविक अंत तब होगा जब जाति सामाजिक लाभ और सम्मान की मुद्रा रहना बंद करेगी।
यही बात राजनीति पर भी लागू होती है। राजनीति किसी समूह को संगठित करती है और अक्सर उसके लिए एक साझा हित या साझा विरोधी का निर्माण करती है। यह लोकतंत्र का सामान्य तत्व है। समस्या तब शुरू होती है जब लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा नागरिक हितों के बजाय स्थायी जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण पर निर्भर हो जाए। तब बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, पर्यावरण, कृषि संकट, श्रमिक अधिकार और आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं और पहचान स्वयं राजनीतिक मुद्दा बन जाती है।
धर्म आधारित ध्रुवीकरण इस समस्या को और जटिल करता है। किसी भी धार्मिक समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन लोकतांत्रिक राज्य किसी एक धर्म की सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर आधारित नहीं हो सकता। भारतीय संविधान का मूल आग्रह नागरिक समानता है। बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का सम्मान और अल्पसंख्यक नागरिक की समान गरिमा, दोनों एक साथ संभव हैं। वास्तव में यही भारतीय धर्मनिरपेक्षता की कसौटी है।
भारत के सामने इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन सत्ता में है। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार का समाज बनना चाहते हैं। क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें मनुष्य पहले हिंदू, मुस्लिम, ब्राह्मण, दलित, यादव, राजपूत, कुर्मी, जाटव, कायस्थ या किसी अन्य पहचान का प्रतिनिधि हो और बाद में नागरिक? या ऐसी व्यवस्था जिसमें उसकी सामाजिक पहचान निजी और सांस्कृतिक स्तर पर रह सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उसकी प्राथमिक पहचान एक समान अधिकारों वाले भारतीय नागरिक की हो?
जाति उन्मूलन का अर्थ इतिहास को मिटाना नहीं है। इतिहास को याद रखना इसलिए आवश्यक है कि जिन अन्यायों ने समाज को बनाया, वे फिर न दोहराए जाएं। लेकिन इतिहास की स्मृति को स्थायी वैमनस्य में बदल देना भी उचित नहीं। सामाजिक न्याय का सर्वोच्च लक्ष्य यह होना चाहिए कि एक दिन आरक्षण की आवश्यकता स्वयं कम हो जाए, क्योंकि समाज में अवसर इतने समान हो चुके हों कि जन्म किसी की नियति तय न करता हो। उस दिन आरक्षण की समाप्ति किसी अधिकार की हार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की सफलता होगी।
इसी तरह वैज्ञानिक चेतना का अर्थ आस्था का दमन नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि सार्वजनिक जीवन में सत्य का निर्धारण तर्क, प्रमाण और अनुभव से हो। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या किसी अन्य धार्मिक स्थल में व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार जाए, लेकिन अस्पताल में इलाज विज्ञान से हो, विद्यालय में ज्ञान प्रमाण पर आधारित हो, न्यायालय में निर्णय संविधान और कानून से हो और सरकार की नीतियां आंकड़ों तथा तर्क पर आधारित हों। यही आधुनिकता का वास्तविक अर्थ है।
शायद स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी ऐतिहासिक चुनौती यही थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक स्वतंत्रता में बदला जाए। हमने विदेशी शासन समाप्त कर दिया, लेकिन जन्म आधारित असमानताओं को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सके। हमने लोकतंत्र स्थापित किया, लेकिन लोकतांत्रिक चेतना अभी भी पहचान की राजनीति से मुक्त नहीं हुई। हमने आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाया, लेकिन सामाजिक चेतना में अंधविश्वास और मध्ययुगीन पूर्वाग्रह अभी भी जीवित हैं। हमने संविधान में समानता लिख दी, लेकिन सामाजिक व्यवहार में समानता अभी अधूरी है।
इसलिए आज आवश्यकता किसी जाति के विरुद्ध अभियान की नहीं, बल्कि जाति की सामाजिक उपयोगिता समाप्त करने की है। आवश्यकता किसी धर्म को कमजोर करने की नहीं, बल्कि धर्म को निजी आस्था और नागरिकता को सार्वजनिक समानता के क्षेत्र में रखने की है। आवश्यकता आरक्षण को अचानक समाप्त करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यापक सामाजिक और आर्थिक नीतियां बनाने की है जिनसे एक दिन आरक्षण की आवश्यकता ही न्यूनतम रह जाए। आवश्यकता पहचान को मिटाने की नहीं, बल्कि पहचान को अधिकार और अवसर का स्थायी आधार बनने से रोकने की है।
भारत यदि वास्तव में 21वीं सदी की वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और विकसित सभ्यता बनना चाहता है तो उसे केवल सड़कों, पुलों, डिजिटल तकनीक और सकल घरेलू उत्पाद में आधुनिक नहीं होना होगा। उसे अपनी सामाजिक चेतना में भी आधुनिक होना पड़ेगा। आधुनिक राष्ट्र वह नहीं जिसमें केवल मशीनें आधुनिक हों, बल्कि वह है जिसमें मनुष्य का मूल्य जन्म से ऊपर हो, श्रम को सम्मान मिले, स्त्री और पुरुष समान नागरिक हों, शिक्षा और स्वास्थ्य अधिकार की तरह उपलब्ध हों, धर्म व्यक्ति की स्वतंत्रता हो और राज्य किसी धर्म, जाति या समुदाय की श्रेष्ठता का उपकरण न बने।
भारत की वास्तविक राष्ट्रीय चेतना शायद वहीं से जन्म लेगी जहां जातीय अस्मिता और धार्मिक पहचान के ऊपर नागरिकता की समान पहचान खड़ी होगी। तब राजनीति जातीय जोड़-घटाव और धार्मिक ध्रुवीकरण से निकलकर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, उत्पादकता, श्रम की प्रतिष्ठा, वैज्ञानिक सोच और विवेकपूर्ण आर्थिक समानता जैसे वास्तविक प्रश्नों पर केंद्रित हो सकेगी। तब विकास केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा का विस्तार होगा।
स्वतंत्रता आंदोलन ने हमें राजनीतिक आजादी दी, संविधान ने हमें समान नागरिक बनने का रास्ता दिया। अब अगली ऐतिहासिक यात्रा सामाजिक मुक्ति की है। जाति से मुक्ति, भेदभाव से मुक्ति, अंधविश्वास से मुक्ति और उस राजनीति से मुक्ति जो नागरिक को पहले किसी समूह का सदस्य और बाद में मनुष्य मानती है। यही वह अधूरा काम है जिसे पूरा किए बिना आधुनिक भारत की परियोजना पूरी नहीं होगी। और शायद आंबेडकर की सबसे बड़ी प्रासंगिकता भी आज यही है कि संविधान को केवल पढ़ा न जाए,
बल्कि उसके मूल आदर्शों, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय को सामाजिक जीवन का वास्तविक आधार बनाया जाए।
डॉ. श्रीकान्त पाण्डेय
अव.प्राप्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र
पी. जी. कॉलेज
गाजीपुर ( उत्तर प्रदेश )