मेरा ब्लॉग मेरी रचना- लव तिवारी संपर्क सूत्र- +91-9458668566

lav Lav Tiwari ( लव तिवारी )

Lav Tiwari On Mahuaa Chanel

we are performing in bhail bihan program in mahuaa chanel

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

Flag Counter

Flag Counter

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

समग्रता-बोध के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण - लेखक श्री माधव कृष्ण गाज़ीपुर उत्तरप्रदेश

समग्रता-बोध के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण
(मेरे शीघ्र प्रकाश्य निबन्ध संकलन का एक निबन्ध)

मैंने जब भी इस प्रश्न पर विचार किया है कि धर्मभूमि भारत कैसे विदेशी आक्रान्ताओं की गुलाम बनती गयी, और कैसे इसका क्षेत्रफल संकुचित होता गया; तब मुझे एक ही उत्तर मिला है- धर्म और शास्त्रों की अधूरी समझ. बाबा साहेब की इस उक्ति को यहाँ उद्धृत करना विषयांतर नहीं होगा. ‘जाति का विनाश’ निबंध में उन्होंने कहा कि, “It is no use seeking refuge in quibbles. It is no use telling people that the Shastras do not say what they are believed to say, grammatically read or logically interpreted. What matters is how the Shastras have been understood by the people.” लोगों ने वास्तव में शास्त्र गलत समझे, इसलिए भारतभूमि जातिवाद, भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता की भूमि हो गयी.

हस्तिनापुर की कुरुसभा में बालों से घसीटकर लाई गयी द्रौपदी महारानी का प्रश्न था: धर्म के अनुसार मैं जीती गयी हूँ या नहीं? (जिताम् वाप्यजिताम् वा). उनका देवर दु:शासन बल से झकझोरकर जोर-जोर से हँसते हुए उन्हें दासी बुलाता था और कर्ण उसकी सराहना करता था. यहाँ एक और प्रश्न उठता है. रश्मिरथी कर्ण क्या वास्तव में प्रशंसा योग्य है? कर्ण के सामर्थ्य का गुणगान करने वाले लोग उसके साथ हुए भेदभाव पर आक्रोश व्यक्त करते हैं लेकिन वे भूल जाते हैं कि अपने साथ हुए भेदभाव को हथियार बनाकर दूसरों पर अन्याय करने वाले लोग कभी भी प्रशंसनीय नहीं हो सकते. वास्तव में, महाभारत की हिंसा के केंद्र में धृतराष्ट्र का अंधा पुत्रमोह और कर्ण की अंधी सामर्थ्य है.

कर्ण जैसा खलनायक आज जातिवादी राजनीतिज्ञों और विचारकों का खिलौना बना हुआ है. द्रौपदी के इस प्रश्न पर सभी मौन रह गए लेकिन धर्म की समझ रखने वाले भीष्म ने कहा कि, “युधिष्ठिर से अधिक धर्म की समझ किसी को नहीं है, इसलिए तुम्हारे प्रश्न की विवेचना संभव नहीं है.” यह बात भी समझ के बाहर है कि धर्म की व्याख्या के लिए लोग किसी एक मनुष्य के आचरण को सर्वस्व मान ले. सभी मनुष्यों के पास मस्तिष्क है, फिर भी वे उसका प्रयोग करने के स्थान पर युधिष्ठिर जैसे लोगों को देखते हैं.

(धर्मराज युधिष्ठिर धन-समृद्धि से भरी हुई धरती त्याग सकते हैं लेकिन धर्म को नहीं छोड़ सकते; स्त्री सदा अपने स्वामी के अधीन रहती है और जब उन्होंने कह दिया कि मैं हार गया, तो मैं इस पर ठीक ठीक कुछ नहीं कह सकता हूँ). भारतभूमि में धर्म एक सूक्ष्म तत्त्व है, अणु से भी अधिक सूक्ष्म. कठोपनिषद कहता है, यह धर्म सरलता से समझ में नहीं आता है, यह अणु के समान सूक्ष्म है.
द्रौपदी को उत्तर देते समय भीष्म भी कहते हैं, धर्म की सूक्ष्मता के कारण मैं तुम्हारे प्रश्न की विवेचना नहीं कर सकता हूँ.

कितने आश्चर्य की बात है! एक स्त्री को पुरुषों की राजसभा में नग्न किया जा रहा हो, घसीटा जा रहा हो, गालियाँ दी जा रही हो, और महावीरों तथा विद्वानों से भरी सभा धर्म पर चर्चा कर रही हो! यही वह धर्म की समझ है जो आज के आलेख के केंद्र में है. अरब यात्री अल-बरुनी के यात्रा वृतान्त में सोमनाथ मंदिर का विवरण सुनकर महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२५ में लगभग ५००० साथियों के साथ सोमनाथ मन्दिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। ५०००० लोग मन्दिर के अन्दर हाथ जोड़कर पूजा अर्चना कर रहे थे या अपने धर्म की समझ का प्रदर्शन कर रहे थे, वे सभी मार दिये गये और भगवान् शिव उन्हें बचाने नहीं आये.

वे ५०००० लोग अपने इष्टदेव शंकर के प्रलयंकारी स्वरुप में आ गए होते तो सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की आवश्यकता नहीं होती. स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ऐसे धर्म को लात मारकर फेंक देने की आवश्यकता है जिसमें मनुष्य को उसके स्तर से उठाकर देवत्व में प्रतिष्ठित करने की सामर्थ्य न हो.

और भारतभूमि धर्म की ऐसी समझ से आच्छादित रही और सम्भवतः आज भी है जो मनुष्य को पलायनवादी, अहिंसक और कायर बना देती है. धर्म की अपनी समझ के कारण युधिष्ठिर को महाभारत में धर्मराज कहा गया लेकिन महाभारत का युद्ध भगवान् श्रीकृष्ण के सिद्धांतों के लिए जाना गया.

महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने से पहले शक्तिशाली बलराम तीर्थयात्रा के लिए निकल गए. जाने से पहले उन्होंने पांडवों से कहा कि, “मैंने श्रीकृष्ण से बार-बार कहा कि जैसे दुर्योधन है वैसे ही पांडव हैं, दोनों हमारे लिए एक हैं, इसलिए दुर्योधन की भी सहायता करो; लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी; भीमसेन और दुर्योधन दोनों ही मेरे शिष्य हैं अतः मैं इन दोनों पर एक जैसा स्नेह रखता हूँ.”
यह कहकर वह सरस्वती नदी के तटवर्ती तीर्थों के लिए चले गए और जाते-जाते उन्होंने यह भी कहा कि, “कुरुवंशियों को नष्ट होते देखकर मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर सकूंगा.”

श्रीकृष्ण ने महाभारत का युद्ध चुना और उस युद्ध में एक पक्ष चुना; बलराम देव ने तीर्थयात्रा चुनी. आज किसी भी सामान्य व्यक्ति से प्रचलित धर्म की समझ के आधार पर पूछा जाय कि, कौन धार्मिक था? सबका उत्तर होगा, बलराम! लेकिन लोक, शास्त्रज्ञों और विद्वानों ने श्रीकृष्ण को पूर्ण अवतार कहा, और बलराम जी को अंश अवतार.

धर्म की अधूरी, कोरी और थोथी मान्यताओं से हम आज भी जूझ रहे हैं. जब समाज अन्याय और चुनौतियों से जूझ रहा हो उस समय शांति और न्याय के लिए युद्ध करना ही तीर्थयात्रा है. उस समय तटस्थता केवल इसलिए कि, मेरा बिगाड़ न हो और मेरी दोनों पक्षों में जान-पहचान है, पापकर्म है. श्रीकृष्ण कहते हैं कि, “तटस्थ लोगों की शत्रुओं की भांति उपेक्षा की जानी चाहिए.”

जब महारथी द्रोणाचार्य ने नियमों के विपरीत पांडव सेना में ब्रह्मास्त्र न जानने वाले लोगों को भी समाप्त करना प्रारम्भ किया, तब वालखिल्य इत्यादि ऋषियों ने उनसे ऐसे क्रूर कर्म न करने को कहा. उनके न मानने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें समाप्त करने के लिए युधिष्ठिर से झूठ बोलने के लिए कहा कि, “अश्वत्थामा मारा गया.”

कोरी सत्यवादिता को धर्म मानने वाले धर्मराज को श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में समझाया, “प्राणरक्षा के लिए बोला गया असत्य मनुष्य को पाप-विद्ध नहीं करता है.” बाबा साहेब ‘जाति का विनाश’ में महात्मा गांधी के संत और राजनीतिज्ञ रूपों पर कटाक्ष करते हुए लिखते हैं, “A politician must know that Society cannot bear the whole truth and that he must not speak the whole truth; if he is speaking the whole truth it is bad for his politics.”

हमारे राजाओं ने अन्धकार युग में ऐसी अनेक मूर्खताएं कीं जिनका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं था. यदि वे श्रीकृष्ण और श्रीराम के जीवन को ही अच्छे से समझ लेते तो उन्हें सफलता मिलती. पीठ दिखाकर भागते हुए शत्रु को मारना पाप है या युद्ध में पीठ दिखाना पाप है: इस नियम का पालन करते हुए पृथ्वीराज चौहान जैसे राजा यह भूल गए कि सम्पूर्व विजय ही युद्ध का एकमात्र पुण्य निष्कर्ष है.

दुर्योधन के भाग जाने पर भी श्रीकृष्ण द्वैपायन सरोवर जाते हैं और अन्तिम युद्ध के लिए ललकारते हैं. भगवान् श्रीकृष्ण कालयवन से युद्ध करते समय भाग जाने के कारण रणछोड़ भी कहे जाते हैं. आत्मरक्षा भी एक धर्म है. कर्ण और दुर्योधन अपने अंतिम समय में श्रीकृष्ण से धर्मयुक्त कृपा की याचना करते हैं, लेकिन भगवान् श्रीकृष्ण ने एक बार शुरू किये गए युद्ध को पूरी तरह से समाप्त करना ही धर्म माना.

“अधिक शक्तिशाली शत्रुओं को कूटनीति और अनेक उपायों से मार डालना चाहिए.” और इस नियम का पालन करते हुए शत्रु के खेमे में खड़े बड़े से बड़े पुण्यात्मा भी समाप्त करवा दिया. वह कैसा महात्मा यदि उसकी निष्ठा अन्याय और अधर्म के साथ है!

खर दूषण भगवान् श्री राम के साथ युद्ध से पहले उन्हें अपमानजनक शांति प्रस्ताव भेजते हैं कि, अपनी पत्नी को हमें सौंपकर वापस चले जाओ. और भगवान् श्रीराम का उत्तर था, “रण में शत्रुओं पर कृपा करने से बड़ी कायरता नहीं है.” अनेक लोग कहते हैं भगवान् राम ने सभी राक्षसों को मारने का प्रण क्यों लिया?
उन्होंने निसिचरहीन मही का प्रण लिया क्योंकि निशा है अन्धकार, अन्धकार है अज्ञान; और अज्ञानता के कारण गलत कृत्य करने वालों को अज्ञानी समझकर छोड़ देने से ‘निसिचरों’ को बल मिलता है.

भारतीय संविधान की इस दोषपूर्ण धारा के कारण १८ वर्ष से कम आयु के लोगों द्वारा आपराधिक घटनाओं में वृद्धि हुई है. वास्तव में किसी भी उम्र के जघन्य अपराधी को सुधार के लिए दण्ड की आवश्यकता है. भगवान् राम को पता था कि, अकेला रावण अपराधी नहीं है, उसका साथ देने वालों ने उसे अपनी शक्ति और संसाधन देकर अपराधी बनाया है.

राजनीति के अपराधीकरण पर बात करते समय उन राजनेताओं को छोड़ देना हमारी मूर्खता रही है जिन्होंने अपराधियों को अपने दलों और सरकार में प्रश्रय दिया है. अपराधियों को दण्डित करते समय उन राजनेताओं को भी दण्डित करना चाहिए. धर्मराज युधिष्ठिर के रथ पर न बैठकर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ पर बैठते हैं और युद्ध लड़ते हैं. यह घटना एक बहुत बड़ा संकेत है.

श्रीकृष्ण यूं ही ईश्वर या अवतार नहीं बन गए या घोषित किये गए. उन्होंने धर्म के दर्पण पर पड़ी हुई धूल साफ़ की जिसमें लोग अपने आप को देख सकें; और यह करने के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया. उन्होंने धर्म की प्रचलित मान्यताएं बदल डालीं. धर्म का तत्त्व सूक्ष्म है.

भारतीय बात-बात में पाप-पुण्य का विचार करने लगे. आक्रमण होते रहे, मंदिर, संपत्तियां और स्त्रियाँ लुटती रहीं, और धर्मभीरु भारत अकर्मण्य बना रहा, अर्चना करता रहा, आर्तनाद करता रहा. धर्म का एकमात्र तात्पर्य मंदिरों में पूजा-अर्चना, गरीबी, दासता और अपमान सहना हो गया.

लोगों के धर्म से सम्बंधित प्रश्न केवल आहार-विहार-विचार तक सीमित रह गए. कर्म का क्षेत्र अछूता रहा. यदि धर्म कर्म और आचरण के क्षेत्र तक पहुंचा भी तो ‘अगरबत्ती कितनी बार दिखानी है, भोग दाहिने हाथ से लगाना है या बाएं हाथ से, एक मंदिर में यदि ४ देवता प्रतिष्ठित हैं तो सबके आगे झुकने से क्या कोई नाराज हो जाएगा’ इत्यादि बचकाने प्रश्नों तक ही रह गया. जीवन के मूलभूत प्रश्नों, सामाजिक और सामुदायिक आचरण और कर्म पर धर्म का कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं दिखा.

यहीं पर भगवान् राम और भगवान् कृष्ण प्रासंगिक हो उठते हैं. उन्होंने धर्म को सामुदायिक कर्म और आचरण से जोड़ दिया. उनका जनजागरण अभियान आजीवन चलता रहा. उन्होंने धर्म के नाम पर फैले भ्रम को अपने व्यावहारिक कर्म से तोड़ दिया.

लोगों ने कहा समुद्र लांघने से मनुष्य नरकगामी होता है, और भगवान् श्रीकृष्ण ने समुद्र के बीच में ही द्वारका नगरी बसा ली और उनसे मिलने के लिए किसी को भी किसी न किसी रूप में समुद्र लांघना ही पड़ता था. लोगों ने कहा धार्मिक लोगों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, तो भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्म और राजनीति में कभी कोई अंतर नहीं किया. उन्होंने जीवन के साधारणीकरण में एक बड़ी भूमिका निभाई.

बात-बात में धर्म के सिद्धांतों को जानने की इच्छा रखने वालों को उन्होंने कहा कि, दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए. यज्ञ के लिए भी आग जलाने पर धुआं तो आयेगा ही. इस कारण से यज्ञ करना बंद नहीं करते. उसी तरह से सभी कर्मों में कुछ न कुछ दोष हैं. हितकर भाषण देने वाला व्यक्ति भी अनजाने अनेक जीवाणुओं की हत्या कर रहा है लेकिन वह एक महत्तर उद्देश्य जनजागरण का कार्य कर रहा है.

महत्तर उद्देश्य के लिए किया गया कर्म ही धर्म है. यह एक बड़ा सूत्र है: सहज कर्म करो. तुम्हारी पत्नी का अपमान हो रहा हो तो धर्म के विषय में न सोचो. उस सहज क्रोध को अपना अस्त्र बनाकर उसका अपमान रोको. हमने गलती कि, सहज कर्म करने बंद कर दिए और बड़ी-बड़ी सैद्धांतिकी को अपना जीवन बना लिया. स्वामी विवेकानन्द का व्यवहारिक वेदान्त यही है, “One ounce of practice is worth twenty thousand tons of big talk.”

स्वामी विवेकानंद के अनुसार निष्काम कर्म की अवधारणा भगवान् श्रीकृष्ण की पूरे संसार को मौलिक देन है. उनसे पहले किसी ने ऐसा नहीं कहा, कर्म के लिए कर्म, प्रेम के लिए प्रेम! लेकिन निष्काम कर्म के धरातल पर उतरना बहुत कठिन है. तो क्या जो लोग इस धरातल पर नहीं उतर सकते, उन्हें कर्म करने से रोकना चाहिए?

श्रीकृष्ण के वज्रगम्भीर वाणी में उत्तर मिलता है, “नहीं! जो लोग कर्म में आसक्त हैं, उनकी बुद्धि में भ्रम पैदा न करें. जैसे वे जमकर कर्म करते हैं उसी प्रकार विद्वान लोगों को भी अच्छे से कर्म करना चाहिए और ऐसे लोगों से करने के लिए कहना चाहिए.” धर्म के बड़े-बड़े सिद्धांत उन लोगों के लिए हैं जो विचारवान है. सामान्य मनुष्यों से केवल कर्म की बात करनी चाहिए.

जनसंख्या और प्रचार की दृष्टि से सेमेटिक धर्म अधिक सफल दिखाई देते हैं क्योंकि वहां के सिद्धांत बहुत गूढ़ और पेंचीदे नहीं हैं. उन्हें अपने धर्म को शक्तिशाली बनाना है, भले इसके लिए हिंसा का आश्रय लेना पड़े या प्रलोभन का या आतंक का. आहार की पेंचीदगी में नहीं घुसा गया. लोग धार्मिक भी होना चाहते हैं, आसान राह भी देखते हैं और दुर्गुण भी नहीं छोड़ना चाहते.

छिछलेपन का विस्तार होता है. गहराई और विस्तार दोनों गुण दुर्लभ होते हैं. यह तो एकमात्र महासागर का गुण है: गहराई और विस्तार। भारत में समय-समय पर संत लोगों को युगानुकूल धर्म सिखाते रहते हैं. जैसे सन्त रामानन्द की परम्परा के बाबा गंगारामदास ने कहा कि, “प्राणप्रतिष्ठित सत्यस्वरूपा समष्टि हेतु अर्पित कर्त्तव्य कर्म ही धर्म है. शास्त्रोक्ति, गुरुवचन एवं आत्मानुभूति की साकारता ही सत्य है. सत्यजनित धर्मों (कर्त्तव्य कर्मों) की व्यवस्था का प्रतिफल ही न्याय है.”

परम्पराओं का पुनर्मूल्यांकन और परिष्कार आवश्यक है. श्रीकृष्ण भगवान् के जीवन में एक बड़ी घटना है: गोवर्धन धारण. इसके अतिमानवीय पक्षों को छोड़ दिया जाय तो इस प्रसंग में कुछ बेहद खूबसूरत बिन्दु हैं जो श्रीकृष्ण के क्रान्तिधर्मी और सत्यनिष्ठ स्वरूप का परिचय देते हैं.

उन्होंने नन्द बाबा से कहा, कुछ लोग कर्मों को भलीभांति समझकर करते हैं, और कुछ लोग बिना जाने. जानने वालों का कर्म सफल होता है, न जानने वालों का नहीं. आप इंद्र के लिए जिस क्रियायोग का अनुष्ठान कर रहे हैं, वह सुविचारित है अथवा केवल परम्पराओं के अनुसार लौकिक अनुकरण?

नन्द बाबा स्वीकार करते हैं कि वह ऐसा पारम्पर्यागत धर्म के कारण कर रहे हैं. उन्हें विश्वास है कि इस के पालन से मेघराज इंद्र वर्षा करेंगे जो त्रिवर्गफल (धर्म, अर्थ, काम) में सहायक है. सच तो यही है कि हम सभी प्रायः सुचिन्तित, सुपठित और सुविचारित होने के लिए अध्यवसाय नहीं करते हैं।

श्रीकृष्ण भगवान् ने नन्द बाबा की आध्यात्मिक समझ के केंद्र में कर्म को रखते हुए कहा, “कर्म से ही जन्म और मृत्यु होते हैं. कर्म ही सुख, सुख, भय और क्षेम या कल्याण को नियमित करता है. यदि कोई तर्क करता है कि कर्म का फल देने के लिए कर्म से अलग कोई भगवान बैठा है तो वह ईश्वर भी केवल उन्हीं कर्मों का फल देता है जो किये गए हैं; उस व्यक्ति को कोई फल नहीं मिलता है जिसने कर्म ही न किये हों.”

कर्म की इतनी सुंदर प्रतिष्ठा, वह भी परम्पराओं, देवताओं और कर्मकाण्डों के ऊपर, श्रीकृष्ण से पहले किसी आचार्य ने नहीं की। उन्होने यहाँ तक कह दिया कि, “जब सभी प्राणी अपने अपने कर्मों का ही फ़ल भोग रहे हैं तब हमें इन्द्र की क्या आवश्यकता है? जब वे पूर्व संस्कार के अनुसार प्राप्त होने वाले मनुष्यों के कर्म-फल को नहीं बदल सकते हैं तब उनसे क्या प्रयोजन?...कर्म ही गुरु है और कर्म ही ईश्वर।“

श्रमण परम्परा का यही प्रस्थान बिन्दु है। आचरण को धर्म मानकर साधना, तप और पुरुषार्थ के द्वारा आत्म-उत्कर्ष का प्रयास ही श्रमण परम्परा है जबकि ज्ञान, वेद, यज्ञ, धर्म और आध्यात्मिक चिन्तन के द्वारा आत्म-उत्कर्ष का मार्ग ब्राह्मण परम्परा है।

श्रीकृष्ण ने नन्द बाबा से आगे कहा कि, “अपने स्वभाव के अनुसार वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म का पालन करते हुए कर्म का आदर करना चाहिए। जिससे हमारी जीविका सुगमता से चलती है, वही हमारा इष्टदेव होना चाहिए। जैसे अपना भरण पोषण करने वाले पति को छोड़कर एक व्यभिचारिणी स्त्री किसी और पुरुष से प्रेम करके कभी शान्ति नहीं पाती है, उसी प्रकार अपनी आजीविका चलाने वाले कर्म को छोड़कर किसी दूसरे को ईश्वर मानकर उसकी उपासना करने वाले को कभी सुख नहीं मिलता।“

कितना सामयिक प्रासंगिक युगानुकूल बिन्दु है यह! आज सरकारें उन कर्मचारियों से परेशान हैं जो काम से भागते हैं। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में कक्षाएं न लेने वाले आचार्य और सहायक आचार्य, प्राथमिक विद्यालयों में कक्षाएं न लेने वाले अध्यापक शिक्षा में नासूर बने हुए हैं। जबकि इन सभी की आजीविका शिक्षण कर्म से चलने हैं। इन लोगों तक श्रीकृष्ण के इस समझ को ले जाना चाहिए, और उनके न मानने पर उन्हें व्यभिचारी आचार्य या अध्यापक या कर्मचारी की सार्वजनिक उपाधि दे देनी चाहिए।

आज वर्ण और आश्रम धर्म का अन्ध-विरोध हो रहा है, क्रान्ति और आधुनिकता के नाम पर। श्रीकृष्ण से बड़ा क्रांतिकारी आज तक नहीं हुआ लेकिन उन्होने अन्ध विरोध के स्थान पर समग्र बोध का मार्ग चुना। उन्होने वर्ण का सही अर्थ समझाते हुए नन्द बाबा से कहा कि, “ब्राह्मण वेदों के अध्ययन-अध्यापन से, क्षत्रिय पृथ्वी की रक्षा से, वैश्य वार्तावृत्ति से और शूद्र इन तीन वर्णों की सेवा से अपनी जीविका का निर्वाह करते हैं।“

वार्तावृत्ति का अर्थ है, समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला व्यवसाय। श्रीकृष्ण ने किसी स्थान पर भी वर्ण को जन्म या जाति से नहीं जोड़ा। ब्राह्मण को सर्वोच्च जाति मानने वाली कल्पनाओं पर विराम लगाते हुए श्रीकृष्ण ने बड़ी ईमानदारी से अपने आप को वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर वैश्य बताया, “ वैश्य चार प्रकार से जीविका चलाते हैं: खेती, व्यापार, गो पालन और ब्याज पर धन देना। हम लोग इन चारों में से एक गोपालन हमेशा से करते आए हैं... हम लोग सदा-सदा के वनवासी हैं, वन और पहाड़ ही हमारे घर हैं। इसलिए गायों, ब्राह्मणों और गिरिराज गोवर्धन के यज्ञ की तैयारी कीजिये।“

गायें, क्योंकि उनके दूध, दही, मक्खन इत्यादि के बेचने से हमारी जीविका चलती है; ब्राह्मण क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों जैसे चिकित्सक, गायों के चिकित्सक, शिक्षक इत्यादि से हम जीविका कमाने में समर्थ हे हैं; गिरिराज गोवर्धन क्योंकि उनके कारण हमारी गायों और हम सभी को पेड़-पौधे, पानी, फल, घास इत्यादि प्रचुरता से मिलते हैं।

इस प्रकार यज्ञ की एक नितांत मौलिक अवधारणा विकसित की गयी या पुनः प्रकाशित की गयी। यज्ञ में उन लोगों को भी नहीं भूलना चाहिए जो हमारे समाज के अंग हैं लेकिन गरीब हैं: चांडाल, पतित और कुत्तों भी यथायोग्य वस्तुएं देकर संतुष्ट किया जाय। ऐसा यज्ञ ही ईश्वर को प्रिय है।

यह भारतभूमि सौभाग्यशाली है कि यहाँ धर्म-अध्यात्म-संसार को समग्रता से जानने और जीने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। जिसका जन्म ही इस संसार में दु;खमय परिस्थितियों में हुआ, उसके जीवन में ईर्ष्या, द्वेष, भेदभाव, प्रतिशोध कभी देखे ही नहीं गए; जिसने जीवन, प्रेम, युद्ध, पलायन, बालपन, युवावस्था, वृद्धावस्था, गरीबी और समृद्धि सबको एक उत्सव बना दिया, उस भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में मेरी अनुरक्ति सदा-सदा के लिए बनी रहे और मैं उनके प्रेमाभक्ति के अतिरिक्त किसी और वस्तु की कामना न करूँ!

Madhav Krishna


रविवार, 30 अगस्त 2026

क्या जातिविहीन समाज संभव है: एक विमर्श- लेखक डॉ. श्रीकान्त पाण्डेय

"क्या जातिविहीन समाज संभव है: एक विमर्श"

भारत की स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति की घटना नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न भी थी जिसमें मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, उसकी नागरिकता, प्रतिभा, श्रम और मानवीय गरिमा से तय हो। स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक मंच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनी और उसकी विशेषता यह थी कि उसमें अनेक विचारधाराओं, सामाजिक समूहों और राजनीतिक प्रवृत्तियों का संगम था। गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाषचंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, आंबेडकर सहित अनेक धाराओं के लोगों ने अलग-अलग दृष्टियों से आधुनिक भारत की कल्पना को आकार दिया। इसलिए स्वतंत्र भारत का संविधान किसी एक व्यक्ति या एक विचारधारा की कृति नहीं, बल्कि संविधान सभा की दीर्घ बहसों, समितियों, उपसमितियों और विभिन्न राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टियों के बीच बनी सामूहिक सहमति का परिणाम था। डॉ. भीमराव आंबेडकर इस विराट प्रक्रिया के प्रमुख शिल्पकारों में अवश्य थे, लेकिन संविधान को केवल उनका बनाया हुआ कहना उसके सामूहिक चरित्र को सीमित करना होगा।

आंबेडकर का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है कि उन्होंने भारतीय समाज की उस सबसे गहरी बीमारी को स्वयं भोगा था जिसे हम जाति और अस्पृश्यता के नाम से जानते हैं। उन्होंने जाति को केवल सामाजिक विभाजन नहीं माना, बल्कि इसे मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के रास्ते में मूल बाधा के रूप में देखा। उनकी प्रसिद्ध अवधारणा थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिकाऊ नहीं हो सकता जब तक सामाजिक लोकतंत्र उसके साथ न हो। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व उनके लिए अलग-अलग मूल्य नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए लोकतांत्रिक जीवन के आधार थे। इसी कारण उनका लक्ष्य केवल दलितों को कुछ सुविधाएं दिलाना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक संरचना को बदलना था जिसमें जन्म मनुष्य की सामाजिक हैसियत निर्धारित करता है।

यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अंतर समझना आवश्यक है। आंबेडकर ने वंचित वर्गों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और रोजगार में अवसर तथा राज्य की सक्रिय भूमिका का समर्थन किया, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य जातियों को स्थायी राजनीतिक पहचान में बदलना नहीं था। उनकी 1945 की पुस्तक "States and Minorities" में राज्य समाजवाद और आर्थिक लोकतंत्र की एक विस्तृत रूपरेखा दिखाई देती है, लेकिन उसे भारतीय संविधान का प्रत्यक्ष और पूर्णतः अंगीकृत स्वरूप मानना ठीक नहीं होगा। इसी प्रकार संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रतिनिधित्व तथा सेवाओं में विशेष प्रावधान ऐतिहासिक वंचना को दूर करने के उपाय थे, जाति व्यवस्था को स्थायी बनाने की घोषणा नहीं।

आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी इसी जटिलता को समझने में सहायता करती है। ब्रिटिश काल में पृथक निर्वाचक मंडलों और प्रतिनिधित्व की बहस से लेकर कम्युनल अवॉर्ड और फिर पूना पैक्ट तक वंचित समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न विकसित हुआ। स्वतंत्र भारत में संविधान ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सेवाओं में विशेष अवसरों की व्यवस्था की। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए भी संवैधानिक आधार निर्मित किया गया। अनुच्छेद 15 और 16 में विशेष प्रावधानों की गुंजाइश तथा नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 46 राज्य को कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की विशेष देखभाल का दायित्व देता है। बाद में मंडल आयोग और उसके क्रियान्वयन ने पिछड़े वर्गों के आरक्षण को भारतीय राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बना दिया।

विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक असमानता को कम करके अंततः समान अवसर का समाज बनाना था, वही धीरे-धीरे स्वयं राजनीतिक लामबंदी का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम बन गई। जाति समाप्त होने के बजाय जातीय पहचान अधिक संगठित होती गई। प्रत्येक समुदाय अपने महापुरुष, अपना इतिहास, अपनी संख्या और अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी खोजने लगा। लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व स्वाभाविक रूप से आवश्यक है, लेकिन जब प्रतिनिधित्व का प्राथमिक आधार नागरिकता के बजाय जातीय गणित बन जाए, तब लोकतंत्र सामाजिक न्याय का साधन होने के साथ-साथ पहचान की प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन सकता है।

आज भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा इसी विरोधाभास के भीतर काम कर रहा है। एक ओर संविधान जाति-विहीन समान नागरिकता की दिशा दिखाता है, दूसरी ओर चुनावी राजनीति जातीय पहचान को संगठित करके सत्ता में हिस्सेदारी का रास्ता बनाती है। हर राजनीतिक दल जातीय सामाजिक समीकरणों की गणना करता है और लगभग हर बड़ा सामाजिक समूह अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संख्या के अनुपात में देखने लगा है। इसे सामाजिक सहभागिता और प्रतिनिधित्व का नाम देना कुछ हद तक उचित है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम अंततः ऐसी राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें जाति कमजोर होगी या और अधिक राजनीतिक रूप से संस्थाबद्ध होगी?

आरक्षण के प्रश्न को भी इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। आरक्षण को केवल सुविधा या विशेषाधिकार समझना ऐतिहासिक अन्याय की उपेक्षा होगी। सदियों की सामाजिक वंचना को केवल वर्तमान आय से नहीं मापा जा सकता। दूसरी ओर यह प्रश्न भी वैध है कि क्या आरक्षण अनंतकाल तक उसी रूप में चलता रहना चाहिए और क्या आर्थिक तथा शैक्षणिक रूप से अपेक्षाकृत सशक्त परिवारों तथा अत्यंत वंचित परिवारों के बीच पर्याप्त अंतर किया जाना चाहिए। यहां सामाजिक पिछड़ेपन, ऐतिहासिक भेदभाव, आर्थिक स्थिति, शिक्षा और अवसरों के वास्तविक अभाव को साथ रखकर अधिक सूक्ष्म नीति की आवश्यकता है। आरक्षण और व्यापक सामाजिक संरक्षण को एक ही चीज मानना भी उचित नहीं होगा। आरक्षण प्रतिनिधित्व का एक औजार है, जबकि सामाजिक संरक्षण का दायरा शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, कौशल, रोजगार और आर्थिक सुरक्षा तक फैला हुआ है।

इस पूरे प्रश्न का एक दूसरा पक्ष भारत की बदलती अर्थव्यवस्था है। स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशकों में राज्य एक बड़े नियोक्ता, नियोजक और कल्याणकारी संस्था के रूप में उपस्थित था। सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी नौकरियां सामाजिक गतिशीलता का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं। लेकिन उदारीकरण के बाद अर्थव्यवस्था में बाजार की भूमिका तेजी से बढ़ी और आज सरकारी रोजगार की तुलना में निजी क्षेत्र का महत्व बहुत अधिक है। सरकारी नौकरियों का आकार सीमित होता जा रहा है, जबकि आरक्षण की राजनीति मुख्यतः उन्हीं अवसरों के इर्द-गिर्द घूमती है। परिणाम यह है कि जिस रोजगार क्षेत्र में अवसर सीमित हैं, उसी के लिए जातीय प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इससे स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति को केवल सरकारी नौकरियों के प्रतिशत तक सीमित रखने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, उद्यमिता, निजी क्षेत्र में निष्पक्ष अवसर और सामाजिक सुरक्षा तक क्यों नहीं विस्तारित किया जाए?

भारत का दूसरा बड़ा अंतर्विरोध धर्म और आधुनिकता के बीच दिखाई देता है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और आस्था को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन राज्य की दृष्टि से सभी नागरिक समान हैं। धार्मिक स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण में अनिवार्य विरोध नहीं है। व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक आस्था रखने की स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक नीति, शिक्षा, चिकित्सा, कानून और शासन का आधार प्रमाण, तर्क और वैज्ञानिक विवेक होना चाहिए। आस्था निजी जीवन में सम्मानित हो सकती है, लेकिन उसे वैज्ञानिक सत्य का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

यहीं आधुनिक भारत का एक अद्भुत अंतर्विरोध सामने आता है। हम अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, जैव प्रौद्योगिकी और आधुनिक चिकित्सा की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन सामाजिक चेतना के अनेक हिस्सों में मध्ययुगीन पहचानें अब भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। मनुष्य के पास स्मार्टफोन है, लेकिन सामाजिक संबंधों में जाति पूछी जाती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा होती है, लेकिन विवाह में गोत्र, जाति और समुदाय की सीमाएं खड़ी की जाती हैं। हम वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक जीवन में जन्म आधारित पहचान को अभी भी निर्णायक मानते हैं। यह आधुनिकता और मध्ययुगीन चेतना का असाधारण संगम है।

धर्म और जाति के प्रश्न को केवल हिंदू समाज तक सीमित करना भी ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं होगा। जाति जैसी सामाजिक संरचनाएं भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक समुदायों में विभिन्न रूपों में दिखाई देती रही हैं। बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं ने सामाजिक असमानताओं और कर्मकांडीय वर्चस्व के विरुद्ध महत्वपूर्ण वैकल्पिक दृष्टियां प्रस्तुत कीं, लेकिन सामाजिक जीवन से जातीय पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों में भी स्थानीय सामाजिक संरचनाओं का प्रभाव दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि जाति केवल किसी एक धर्म का धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि भारतीय समाज की एक गहरी सामाजिक संस्था है, जिसने धर्म की सीमाओं को भी अनेक बार पार किया है।

इसलिए जाति उन्मूलन का अर्थ किसी धर्म का विरोध करना नहीं हो सकता। इसका वास्तविक अर्थ जन्म आधारित सामाजिक श्रेणीकरण का अंत होना है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आस्था में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध रहना चाहता है तो उसे इसकी पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, नागरिक अधिकार, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक अवसर उसके जन्म से निर्धारित नहीं होने चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता और जाति उन्मूलन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि दोनों आधुनिक नागरिकता के अलग-अलग आयाम हैं।

अब प्रश्न यह है कि क्या कानून बनाकर जाति को समाप्त किया जा सकता है? यहां सावधानी जरूरी है। केवल सरनेम हटाने का कानून बना देने से जाति समाप्त नहीं होगी। नाम बदलने से सामाजिक संरचना नहीं बदलती। भारत में अनेक लोग बिना जातिसूचक उपनाम के रहते हैं और फिर भी उनकी जाति सामाजिक संबंधों, विवाह, स्थानीय नेटवर्क और कभी-कभी प्रशासनिक अभिलेखों से पहचानी जाती है। दूसरी ओर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे संवैधानिक संरक्षणों के लिए जातीय पहचान को प्रशासनिक रूप से दर्ज करना आवश्यक भी है। इसलिए एक तरफ जाति पहचान समाप्त करने की इच्छा और दूसरी तरफ ऐतिहासिक वंचना के उपचार के लिए जाति की पहचान की आवश्यकता, दोनों के बीच वास्तविक संवैधानिक तनाव मौजूद है।

अंतरजातीय विवाह इस समस्या का एक महत्वपूर्ण रास्ता अवश्य हो सकता है, लेकिन उससे भी जाति अपने आप समाप्त नहीं होती। भारतीय कानून में बच्चे की जाति का निर्धारण केवल इस सरल सिद्धांत से नहीं होता कि माता या पिता में से जो पालन-पोषण करे, बच्चे को उसी की जाति मिल जाएगी। विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय तथा प्रशासनिक नियमों ने परिस्थितियों, सामाजिक परिवेश और वास्तविक सामाजिक स्थिति को महत्व दिया है। इसलिए अंतरजातीय विवाह जाति की दीवार को कमजोर करने वाला महत्वपूर्ण सामाजिक माध्यम है, लेकिन उसके साथ कानूनी और सामाजिक परिस्थितियां भी जुड़ी हैं।

असल चुनौती यह है कि क्या हम जाति को केवल प्रशासनिक श्रेणी के रूप में सीमित कर सकते हैं और सामाजिक जीवन से धीरे-धीरे उसका प्रभाव समाप्त कर सकते हैं। शायद यही अधिक व्यावहारिक रास्ता होगा। जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानताएं बनी हुई हैं, तब तक ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों की पहचान मिटा देना न्यायपूर्ण नहीं होगा। लेकिन उस पहचान को स्थायी राजनीतिक अस्मिता बना देना भी जाति उन्मूलन के लक्ष्य के विपरीत जा सकता है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि संरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे कम हो और समान अवसरों की वास्तविकता धीरे-धीरे बढ़े।

इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं होगा। विद्यालयों में जाति आधारित अलगाव और भेदभाव पर कठोर निगरानी, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा, उच्च शिक्षा तक समान पहुंच, ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आर्थिक अवसर, अंतरजातीय विवाह को वास्तविक सामाजिक सुरक्षा, भेदभाव विरोधी प्रभावी संस्थाएं और श्रम की प्रतिष्ठा जैसे अनेक मोर्चों पर काम करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सरकारी व्यवस्था को जाति की पहचान का राजनीतिक उपयोग कम करने और नागरिक अधिकारों को अधिक सार्वभौमिक बनाने की दिशा में बढ़ना होगा।

हमें यह भी समझना होगा कि जाति केवल ऊपर से थोपी हुई व्यवस्था नहीं है। वह परिवार, विवाह, भोजन, सामाजिक संबंध, स्थानीय सत्ता और सांस्कृतिक स्मृति में भी पुनरुत्पादित होती है। इसलिए राज्य कानून बनाकर जाति की घोषणा तो प्रतिबंधित कर सकता है, लेकिन परिवार को यह नहीं सिखा सकता कि वह अपने बेटे या बेटी के विवाह के लिए जाति न पूछे। जाति का वास्तविक अंत तब होगा जब जाति सामाजिक लाभ और सम्मान की मुद्रा रहना बंद करेगी।

यही बात राजनीति पर भी लागू होती है। राजनीति किसी समूह को संगठित करती है और अक्सर उसके लिए एक साझा हित या साझा विरोधी का निर्माण करती है। यह लोकतंत्र का सामान्य तत्व है। समस्या तब शुरू होती है जब लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा नागरिक हितों के बजाय स्थायी जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण पर निर्भर हो जाए। तब बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, पर्यावरण, कृषि संकट, श्रमिक अधिकार और आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं और पहचान स्वयं राजनीतिक मुद्दा बन जाती है।

धर्म आधारित ध्रुवीकरण इस समस्या को और जटिल करता है। किसी भी धार्मिक समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन लोकतांत्रिक राज्य किसी एक धर्म की सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर आधारित नहीं हो सकता। भारतीय संविधान का मूल आग्रह नागरिक समानता है। बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का सम्मान और अल्पसंख्यक नागरिक की समान गरिमा, दोनों एक साथ संभव हैं। वास्तव में यही भारतीय धर्मनिरपेक्षता की कसौटी है।

भारत के सामने इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन सत्ता में है। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार का समाज बनना चाहते हैं। क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें मनुष्य पहले हिंदू, मुस्लिम, ब्राह्मण, दलित, यादव, राजपूत, कुर्मी, जाटव, कायस्थ या किसी अन्य पहचान का प्रतिनिधि हो और बाद में नागरिक? या ऐसी व्यवस्था जिसमें उसकी सामाजिक पहचान निजी और सांस्कृतिक स्तर पर रह सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उसकी प्राथमिक पहचान एक समान अधिकारों वाले भारतीय नागरिक की हो?

जाति उन्मूलन का अर्थ इतिहास को मिटाना नहीं है। इतिहास को याद रखना इसलिए आवश्यक है कि जिन अन्यायों ने समाज को बनाया, वे फिर न दोहराए जाएं। लेकिन इतिहास की स्मृति को स्थायी वैमनस्य में बदल देना भी उचित नहीं। सामाजिक न्याय का सर्वोच्च लक्ष्य यह होना चाहिए कि एक दिन आरक्षण की आवश्यकता स्वयं कम हो जाए, क्योंकि समाज में अवसर इतने समान हो चुके हों कि जन्म किसी की नियति तय न करता हो। उस दिन आरक्षण की समाप्ति किसी अधिकार की हार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की सफलता होगी।

इसी तरह वैज्ञानिक चेतना का अर्थ आस्था का दमन नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि सार्वजनिक जीवन में सत्य का निर्धारण तर्क, प्रमाण और अनुभव से हो। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या किसी अन्य धार्मिक स्थल में व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार जाए, लेकिन अस्पताल में इलाज विज्ञान से हो, विद्यालय में ज्ञान प्रमाण पर आधारित हो, न्यायालय में निर्णय संविधान और कानून से हो और सरकार की नीतियां आंकड़ों तथा तर्क पर आधारित हों। यही आधुनिकता का वास्तविक अर्थ है।

शायद स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी ऐतिहासिक चुनौती यही थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक स्वतंत्रता में बदला जाए। हमने विदेशी शासन समाप्त कर दिया, लेकिन जन्म आधारित असमानताओं को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सके। हमने लोकतंत्र स्थापित किया, लेकिन लोकतांत्रिक चेतना अभी भी पहचान की राजनीति से मुक्त नहीं हुई। हमने आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाया, लेकिन सामाजिक चेतना में अंधविश्वास और मध्ययुगीन पूर्वाग्रह अभी भी जीवित हैं। हमने संविधान में समानता लिख दी, लेकिन सामाजिक व्यवहार में समानता अभी अधूरी है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी जाति के विरुद्ध अभियान की नहीं, बल्कि जाति की सामाजिक उपयोगिता समाप्त करने की है। आवश्यकता किसी धर्म को कमजोर करने की नहीं, बल्कि धर्म को निजी आस्था और नागरिकता को सार्वजनिक समानता के क्षेत्र में रखने की है। आवश्यकता आरक्षण को अचानक समाप्त करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यापक सामाजिक और आर्थिक नीतियां बनाने की है जिनसे एक दिन आरक्षण की आवश्यकता ही न्यूनतम रह जाए। आवश्यकता पहचान को मिटाने की नहीं, बल्कि पहचान को अधिकार और अवसर का स्थायी आधार बनने से रोकने की है।

भारत यदि वास्तव में 21वीं सदी की वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और विकसित सभ्यता बनना चाहता है तो उसे केवल सड़कों, पुलों, डिजिटल तकनीक और सकल घरेलू उत्पाद में आधुनिक नहीं होना होगा। उसे अपनी सामाजिक चेतना में भी आधुनिक होना पड़ेगा। आधुनिक राष्ट्र वह नहीं जिसमें केवल मशीनें आधुनिक हों, बल्कि वह है जिसमें मनुष्य का मूल्य जन्म से ऊपर हो, श्रम को सम्मान मिले, स्त्री और पुरुष समान नागरिक हों, शिक्षा और स्वास्थ्य अधिकार की तरह उपलब्ध हों, धर्म व्यक्ति की स्वतंत्रता हो और राज्य किसी धर्म, जाति या समुदाय की श्रेष्ठता का उपकरण न बने।

भारत की वास्तविक राष्ट्रीय चेतना शायद वहीं से जन्म लेगी जहां जातीय अस्मिता और धार्मिक पहचान के ऊपर नागरिकता की समान पहचान खड़ी होगी। तब राजनीति जातीय जोड़-घटाव और धार्मिक ध्रुवीकरण से निकलकर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, उत्पादकता, श्रम की प्रतिष्ठा, वैज्ञानिक सोच और विवेकपूर्ण आर्थिक समानता जैसे वास्तविक प्रश्नों पर केंद्रित हो सकेगी। तब विकास केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा का विस्तार होगा।

स्वतंत्रता आंदोलन ने हमें राजनीतिक आजादी दी, संविधान ने हमें समान नागरिक बनने का रास्ता दिया। अब अगली ऐतिहासिक यात्रा सामाजिक मुक्ति की है। जाति से मुक्ति, भेदभाव से मुक्ति, अंधविश्वास से मुक्ति और उस राजनीति से मुक्ति जो नागरिक को पहले किसी समूह का सदस्य और बाद में मनुष्य मानती है। यही वह अधूरा काम है जिसे पूरा किए बिना आधुनिक भारत की परियोजना पूरी नहीं होगी। और शायद आंबेडकर की सबसे बड़ी प्रासंगिकता भी आज यही है कि संविधान को केवल पढ़ा न जाए,
बल्कि उसके मूल आदर्शों, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय को सामाजिक जीवन का वास्तविक आधार बनाया जाए।

डॉ. श्रीकान्त पाण्डेय
अव.प्राप्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र
पी. जी. कॉलेज
गाजीपुर ( उत्तर प्रदेश )


सोमवार, 24 अगस्त 2026

Muscular Dystrophy में LGMD क्या है

Muscular Dystrophy में LGMD क्या है?

LGMD (Limb-Girdle Muscular Dystrophy) मांसपेशियों की एक आनुवंशिक (Genetic/वंशानुगत) बीमारी है। इसमें मुख्य रूप से शरीर के केंद्र के पास की मांसपेशियाँ—विशेषकर कंधे, ऊपरी भुजाएँ, कूल्हे और जांघें—धीरे-धीरे कमजोर होती हैं और उनका आकार कम हो सकता है। यह पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित कर सकती है।

1. LGMD के मुख्य लक्षण

  • चलने और दौड़ने में कठिनाई
  • सीढ़ियाँ चढ़ने में परेशानी
  • जमीन या कुर्सी से उठने में हाथों का सहारा लेना
  • कूल्हे और जांघों की कमजोरी
  • कंधों और बाजुओं की कमजोरी
  • बार-बार गिरना या संतुलन में परेशानी
  • चलने का ढंग बदलना, जैसे डगमगाकर चलना
  • मांसपेशियों का धीरे-धीरे कमजोर या पतला होना
  • कुछ प्रकारों में पिंडलियों की मांसपेशियाँ बड़ी दिखाई दे सकती हैं
  • कुछ LGMD प्रकारों में हृदय और श्वसन मांसपेशियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं।

2. LGMD क्यों होता है?

LGMD किसी एक बीमारी का नाम नहीं, बल्कि कई आनुवंशिक मांसपेशी रोगों का समूह है। अलग-अलग जीन में परिवर्तन (mutation) के कारण मांसपेशियों के लिए आवश्यक प्रोटीन ठीक से काम नहीं कर पाते। इससे समय के साथ मांसपेशियों की कमजोरी बढ़ सकती है। 30 से अधिक आनुवंशिक प्रकार पहचाने जा चुके हैं।

3. LGMD के प्रकार

वर्तमान नामकरण में इन्हें मुख्यतः दो समूहों में समझा जाता है:

  • LGMD-D (Dominant): दोषपूर्ण जीन की एक प्रति से बीमारी हो सकती है।
  • LGMD-R (Recessive): आमतौर पर संबंधित जीन की दोनों प्रतियों में परिवर्तन होने पर बीमारी होती है।

पुराने नाम जैसे LGMD1 और LGMD2 भी कई पुरानी रिपोर्टों में मिलते हैं। उदाहरण के लिए, पुराने LGMD2A को नए नामकरण में LGMD R1 calpain3-related कहा जाता है।

4. LGMD की शुरुआत किस उम्र में होती है?

यह बीमारी बचपन, किशोरावस्था या वयस्क अवस्था में शुरू हो सकती है। शुरुआत की उम्र और बीमारी की गति उसके विशिष्ट आनुवंशिक प्रकार पर निर्भर करती है। कुछ प्रकार बहुत धीरे बढ़ते हैं, जबकि कुछ में कमजोरी अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ सकती है।

5. LGMD की जाँच कैसे होती है?

सही निदान के लिए आमतौर पर निम्न जाँचों का उपयोग किया जा सकता है:

  1. न्यूरोलॉजिस्ट/न्यूरोमस्कुलर विशेषज्ञ द्वारा शारीरिक परीक्षण
  2. CK या CPK (Creatine Kinase) रक्त जाँच — मांसपेशियों के नुकसान का संकेत दे सकती है, लेकिन केवल CK से LGMD का प्रकार निश्चित नहीं होता।
  3. Genetic Testing / NGS Gene Panel — आज LGMD के प्रकार की पुष्टि में बहुत महत्वपूर्ण है।
  4. आवश्यकता होने पर EMG/NCS
  5. Muscle MRI
  6. कुछ मामलों में Muscle Biopsy
  7. विशेष प्रकार के अनुसार ECG, Echocardiography तथा Pulmonary Function Test (PFT) भी किए जा सकते हैं।

महत्वपूर्ण बात

LGMD का सही subtype जानने के लिए Genetic Test सबसे महत्वपूर्ण जाँचों में से एक है। इससे रोग की प्रकृति, संभावित हृदय/फेफड़े की जटिलताओं और परिवार के अन्य सदस्यों के आनुवंशिक जोखिम को समझने में मदद मिलती है।

6. क्या LGMD का इलाज है?

अभी अधिकांश LGMD प्रकारों के लिए ऐसा एक सार्वभौमिक उपचार उपलब्ध नहीं है जो हर व्यक्ति में बीमारी को पूरी तरह समाप्त कर दे। उपचार मुख्यतः लक्षणों, कार्यक्षमता और जटिलताओं के प्रबंधन पर आधारित होता है।

उपचार और देखभाल में शामिल हो सकते हैं:

  • विशेषज्ञ की सलाह से फिजियोथेरेपी और सुरक्षित व्यायाम
  • मांसपेशियों और जोड़ों की गति बनाए रखना
  • जरूरत पड़ने पर walking aid, brace, wheelchair या अन्य सहायक उपकरण
  • गिरने से बचाव
  • नियमित हृदय जाँच, यदि subtype में हृदय जोखिम हो
  • श्वसन क्षमता की जाँच, यदि subtype में जोखिम हो
  • पोषण, वजन और दैनिक गतिविधियों का उचित प्रबंधन
  • न्यूरोलॉजिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट आदि की multidisciplinary care

7. क्या सभी LGMD रोगियों की स्थिति एक जैसी होती है?

नहीं। LGMD में व्यक्ति-विशेष और subtype के अनुसार बहुत अंतर हो सकता है। किसी व्यक्ति में बीमारी धीरे बढ़ सकती है, जबकि दूसरे में कमजोरी अधिक तेजी से बढ़ सकती है। इसलिए केवल नाम “LGMD” के आधार पर भविष्य की स्थिति बताना उचित नहीं है; exact genetic subtype जानना आवश्यक होता है।

संक्षेप में

LGMD = कंधे और कूल्हे के आसपास की मांसपेशियों को प्रमुख रूप से प्रभावित करने वाली आनुवंशिक Muscular Dystrophy का समूह।

सबसे महत्वपूर्ण कदम:
CK/CPK रिपोर्ट + Genetic Test की रिपोर्ट + वर्तमान लक्षण को किसी अनुभवी Neurologist या Neuromuscular specialist को दिखाकर exact LGMD subtype की पुष्टि कराना।

CK/CPK, Genetic Test, Muscle Biopsy या किसी अन्य जाँच की रिपोर्ट है,  उसे LGMD की पूर्ण रूप से पुष्टि की जा सकती है



जातिगत आरक्षण को हटाने के लिए सामान्य वर्ग का कोई भी सांसद विधायक और नेता सामने नहीं आया- लव तिवारी गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

देश में हिन्दुत्व के होल सोल ब्रैंड अंबेसडर, सामान्य वर्ग को सरकार ने लात मार मारकर ये समझाया कि देशभक्ति नहीं जाति भक्ति करने में ही फायदा है । जब मोदी जी का दिल आया गधी पर... तो परी क्या चीज है ?

मित्रों हिन्दू धर्म बड़े खतरे में है । ये समय था कि हम सभी लोग गजवा-ए-हिंद के खिलाफ तैयारी करते लेकिन अफसोस कि हिन्दुओं ने एकजुट होकर जिसको अपना नेता बनाया, उस नेता ने ही हिन्दू एकता की पीठ में छुरा घोंप दिया । कई सदियों के बाद हिंदुओं को प्रचंड सत्ता मिली, लेकिन जिनको सत्ता दी गई वो चढ़ावा चोरी जैसे घृणित कामों में लिप्त पाए गए । ये राम मंदिर की मर्यादा 5 साल तक भी अक्षुण्ण नहीं रख सके, हिंदुत्व तो बहुत बड़ा विषय है और बहुत गंभीर जटिल मुद्दे हैं ।

जब से देश की राजनीति हिंदुत्व के दौर में प्रवेश करती है।
तो सिर्फ सामान्य वर्ग की जातियां ही ऐसी थी जिन्होंने जाति भक्ति छोड़कर राष्ट्रभक्ति और हिंदुत्व भक्ति के नाम पर बीजेपी को वोट दिया। बाकी हर जाति ने अपनी अपनी पार्टी बनाई और अपने ही वर्ग की अन्य जातियों से गठजोड़ करके मुख्यमंत्री के पद तक भी पहुंच गए ।

जैसे यादवों ने अपनी पार्टी बनाई सपा और आरजेडी

जाटवों ने अपनी पार्टी बनाई बसपा

यूपी, राजस्थान और हरियाणा में जाट लोगों ने भी अपनी अलग अलग पार्टियां बनाई, RLD इत्यादि

उत्तर प्रदेश में कुर्मियों ने बनाया अपना दल

राजभरों ने बनाई सुहलदेव समाज पार्टी

बिहार के पासवानों ने बनाई LJP

बिहार के कुर्मियों ने जनता दल

यूपी में निषादों की भी अलग पार्टी है ।

सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण... सोचने लायक बात यह है की लाख कोशिशों के बाद भी बीजेपी इन जाति के लोगों को हिंदुत्व के नाम पर अपनी पार्टी के अंदर विलय कराने में कामयाब नहीं हो सकी । इन जातियों में जाति भक्ति इतनी ज्यादा है कि ये अगर बीजेपी में आए भी तो अपनी पार्टी के गठबंधन के साथ ही आए। इन जातियों के नेता भी सत्ता की मलाई काटने के लिए बीजेपी के साथ हो लिए, लेकिन आज भी हिंदुत्व पर इनकी जुबान नहीं खुलती है ।

अब हिंदुत्व के लिए इतने लंबे समय से बैटिंग करने का काम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कर रहे थे और सही मायने में गजवा ए हिंद से मुकाबला करने के लिए देश को तैयार करने में जी जान से लगे हुए थे तब इन सभी सामान्य वर्ग की जातियों की पीठ में मोदी जी ने यूजीसी लाकर छुरा घोंप दिया । जब सामान्य वर्ग की नींद टूटी तो उसको समझ में आया कि हिंदुत्व की घुट्टी पिलाकर उसके साथ बड़ा अन्याय किया जा रहा है। अब ये सब जातीय बवाल और जन भावनाओं के उफान को रोकना हमारे हाथ में नहीं है, सरकार ने हिमालयन ब्लंडर किया है । दुख इसी बात का है, ये सब जो हो रहा है इसकी टाइमिंग बहुत खराब है ये समय हिंदुओं को तैयार करने का था लेकिन मोदी ने आपस में हिंदुओं को ही लड़वाकर देश के इस्लामीकरण का रास्ता खोल दिया ।

अगर मोदी और संघ चाहते तो यादव, कुर्मी, पासवान अन्य सभी जातियों में मौजूद ऐसे महानायकों को आदर्श बना सकते थे जिन्होंने मुगलों के खिलाफ महान युद्ध लड़े और हिन्दुत्व के आदर्श स्थापित किए लेकिन बीजेपी और मोदी ने ऐसे अंग्रेजों के पिट्ठुओं को अपना आदर्श बना लिया है जो अपनी किताबों में ये लिखते हैं कि ब्रह्मा जी रंडीबाज थे ।

यानी जब मोदी जी का दिल आया गधी पर तो परी क्या चीज है?
और यही आज इस वक्त देश का दुर्भाग्य है और देश की बड़ी विडंबना भी है ।

विदुर नीति में विदुर लिखते हैं कि जहर एक व्यक्ति को मार सकता है, लेकिन राजा की एक गलत नीति पूरे राष्ट्र का संहार कर सकती है ।

तो अगर इस राष्ट्र को बचाना चाहते हो तो इसका एक ही उपाय है इस त्रिपुंडधारी फर्जी चक्रवर्ती सम्राट को उखाड़ फेंकने के लिए भीषण संकल्प लो और किसी योग्य हिन्दू नेता को आगे कर समाज में फिर से समरसता का माहौल स्थापित करो और सब जातियों में बराबरी स्थापित करो। किसी के साथ कोई अन्याय ना हो । किसी का तुष्टीकरण न हो । क्योंकि हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, कहीं जाति की लड़ाई में हम वो अमूल्य समय ना खो दें जो इस राष्ट्र को बचाने के लिए आवश्यक है ।
साभार

- लव तिवारी





शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

लावारिस लाशो के वारिस- आदरणीय श्री कुंवर वीरेंद्र सिंह जी गाजीपुर उत्तर प्रदेश

गाजीपुर की एक सड़क...
बारिश... अंधेरा... और एक लावारिस लाश

लोग बहुत थे। पर तमाशा देख रहे थे।
फोन एक का बजा।
"वीरेंद्र भैया... आ जाइए"

25 मिनट में भीगते हुआ पहुंचा।

भीड़ बोली - *"पुलिस आएगी, पंचनामा होगा"*
वो बोला - *"3 घंटे हो गए। सड़ रही है। पहले मर्चेंरी मे रखा जाएगा, फिर कागज बनेगा"*

पुलिस के सहयोग से उठाया... और चल दिया।


वो कौन था?
नाम - कुंवर वीरेंद्र सिंह
पहचान - "लावारिसों का वारिस"

कहानी क्या है?

2015... Tata Memorial।
माँ कैंसर का इलाज शुरू हुआ और इलाज के दौरान 8 अक्टूबर 2018को मृत्यु हो गईं। माँ के आखिरी शब्द थे - *"बेटा... अकेला मत छोड़ना किसी को"*

उसी दिन वीरेंद्र ने दुनिया की हर लाश को "माँ" कह दिया।

*14 साल से हिसाब लगाइए...*

*रातें* = जागते हुए बीतीं
*त्योहार* = शमशान में बीते
*रिश्ते* = लावारिसों के साथ बने
*पैसे* = मिट्टी, लकड़ी, कफन में उड़े

*हिन्दू है* - तो _कृष्ण कुमार, जमुना, भोले नाथ, रविन्द्र, रामू_ के साथ मुखाग्नि
*मुस्लिम है* - तो _अतीक, गुड्डू, शेर अली, नौसाद_ के साथ जनाजा

72 घंटे इंतजार।
पहचान न हो तो भी... नाम "इंसान" लिखकर संस्कार।

---
एक पत्रकार ने पूछा - "डर नहीं लगता?"*
वीरेंद्र हंसे और बोले- *"68 बार रक्तदान कर चुका हूँ।"
बोले - "डर उस दिन लगा था जब माँ तड़प रही थी और मैं कुछ नहीं कर पाया।
आज डरने की उम्र नहीं रही... निभाने की उम्र है"

गाजीपुर के कई नेताओ ने कहा - "राजनीति कर रहे हो?"
वीरेन्द्र बोले - *"राजनीति लाशों से नहीं होती सर।
राजनीति वोट से होती है। मैं तो बस दुआ कमा रहा हूं"*

---

सबसे बड़ी बात क्या है पता है?

वीरेंद्र जी शादी नहीं किए।
बोले - "बीवी-बच्चे होंगे तो रात 2 बजे लाश के पास कैसे जाऊंगा?
मेरी शादी तो इंसानियत से हो चुकी हैं।"
उनका बस एक सपना है...

"जब मैं मरूं ना...
तो मेरी अर्थी पर कोई रोए नहीं।
बल्कि हजारों कहें - 'ये वही है जिसने मेरे बाप का कोई कहे मेरे माँ अन्तिम दाह संस्कार किया था'"

"मरूं तो लोगों के दिलों में बसूं"

_जय माशान बाबा_
_कुंवर वीरेंद्र सिंह - गाजीपुर_



मंगलवार, 11 अगस्त 2026

चालीस के बाद- 11 अगस्त जन्मदिवस विशेष लेखक लव तिवारी

चालीस के बाद

एक उम्र के बाद
आदमी को कुछ नहीं चाहिए होता
न कोई जीत,
न कोई प्रमाण,
न कोई ताली।

बस एक ऐसी जगह चाहिए होती है
जहाँ उससे कोई सवाल न किया जाए।

जहाँ उसे हर बात के लिए
अपने होने का कारण न बताना पड़े।

शायद चालीस के आसपास
आदमी पहली बार समझता है
कि थकान शरीर में नहीं होती,
थकान उन तमाम जवाबों में होती है
जो उसने पूरी ज़िंदगी देते-देते जमा कर लिए हैं।

बचपन में
माँ ने पूछा
“इतनी देर से क्यों आए?”

पिता ने पूछा
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”

स्कूल ने पूछा
“कितने नंबर आए?”

रिश्तेदारों ने पूछा
“बड़े होकर क्या बनोगे?”

और वह हर बार
एक नया जवाब लेकर खड़ा हो गया।

फिर जवानी आई।

तब सवाल बदल गए

“कमा कितना लेते हो?”

“कहाँ काम करते हो?”

“अपना घर कब होगा?”

“शादी कब करोगे?”

“बच्चे कब होंगे?”

और उसने फिर
अपनी ज़िंदगी को
उन सवालों के हिसाब से काट-छाँटकर
एक ऐसा आदमी बनाने की कोशिश की
जिसे दुनिया स्वीकार कर सके।

फिर प्रेम आया।

वहाँ सवाल और कठिन थे

“तुम मुझसे कितना प्यार करते हो?”

“तुम्हें मेरी परवाह क्यों नहीं दिखती?”

“तुमने ऐसा क्यों कहा?”

“तुमने वैसा क्यों नहीं किया?”

और उसने सीखा
कि कभी-कभी प्यार करने से ज्यादा मुश्किल होता है
अपने प्यार को समझाना।

उसने समझाया।

बहुत समझाया।

कभी शब्दों से,
कभी चुप रहकर,
कभी अपनी गलतियाँ मानकर,
कभी अपनी सही बात छोड़कर।

फिर घर आया।

फिर बच्चे आए।

फिर जिम्मेदारियाँ आईं।

फिर उसने जाना
कि पुरुष होना शायद
हर बार मजबूत होने का नाम नहीं है

बल्कि
हर बार टूटकर भी
सुबह उठ जाने का नाम है।

वह गिरा भी होगा,
डरा भी होगा,
कई रातें ऐसी भी रही होंगी
जब उसने छत को देखते हुए सोचा होगा

“क्या मैं सही कर रहा हूँ?”

लेकिन सुबह
उसने वही चेहरा पहना
जिस पर सबको भरोसा था।

क्योंकि घर में
पिता का डर
बच्चों के लिए कोई विकल्प नहीं होता।

उसने कमाया।

हार गया।

फिर कमाया।

कुछ लोगों को खोया।

कुछ रिश्ते बचाए।

कुछ रिश्तों को
बहुत कोशिश करके भी नहीं बचा पाया।

कुछ दोस्त
सिर्फ़ पुराने फोटो में रह गए।

कुछ सपने
बैंक बैलेंस, EMI, स्कूल फीस
और जिम्मेदारियों के नीचे दब गए।

और कुछ सपने
आज भी उसके भीतर
चुपचाप साँस लेते हैं।

फिर चालीस आई।

और अचानक
उसे एहसास हुआ

अब वह हर बात का जवाब नहीं देना चाहता।

किसी ने गलत समझ लिया
तो समझ लिया।

किसी ने उसकी नीयत पर शक किया
तो किया।

किसी को उसका मौन अहंकार लगा
तो लगे।

किसी को उसका व्यस्त रहना बेरुखी लगा
तो लगे।

अब उसमें
हर गलतफहमी को ठीक करने की ऊर्जा नहीं बची।

क्योंकि उसने पूरी ज़िंदगी
लोगों को समझाते हुए बिताई है
कि वह बुरा नहीं है।

अब वह बस इतना जानता है

जिसे मेरे साथ रहना है,
वह मेरे मौन को भी पढ़ लेगा।

और जिसे हर बार
मेरे शब्दों की गवाही चाहिए,
शायद उसे मैं कभी समझा ही नहीं पाऊँगा।

चालीस के बाद
पुरुष प्रेम करना नहीं छोड़ता।

बस प्रेम का शोर छोड़ देता है।

वह अब
किसी के पीछे भागकर
अपनी जगह नहीं माँगता।

वह अब
हर बहस जीतना नहीं चाहता।

वह अब
हर रिश्ता बचाना नहीं चाहता।

वह अब
हर चोट का हिसाब नहीं रखता।

वह बस चाहता है

सुबह की एक चाय।

अपने लोगों की सलामती।

बच्चों की हँसी।

अपने कमरे में कुछ घंटे की ख़ामोशी।

शरीर में थोड़ी ताकत।

मन में थोड़ा सुकून।

और कोई ऐसा इंसान
जिसके सामने उसे
अपने मन की सफाई देने की जरूरत न पड़े।

क्योंकि चालीस का पुरुष
बहुत कुछ देख चुका होता है।

उसे मालूम होता है
कि हर बहस का अंत समझ नहीं होता।

हर माफ़ी के बाद रिश्ता नहीं बचता।

हर सच पर विश्वास नहीं किया जाता।

और हर अच्छा आदमी
हर किसी के लिए अच्छा साबित नहीं हो सकता।

इसलिए अब
वह चुप रहता है।

यह चुप्पी हार नहीं है।

यह उस आदमी की
आखिरी बची हुई ताकत है
जिसने जिंदगी भर
सब कुछ ठीक करने की कोशिश की है।

बचपन में
उसे कहा गया था
“मर्द बनो।”

उसने बनकर दिखाया।

जिम्मेदारियाँ उठाईं।

घर संभाला।

लोगों को संभाला।

अपने आँसू संभाले।

अपने डर संभाले।

अपने सपने तक संभालकर रखे।

अब चालीस पर
वह पहली बार
अपने लिए कुछ माँगता है

मुझे मत समझाओ।

मुझसे मत पूछो कि मैं ऐसा क्यों हूँ।

मुझे हर बात साबित मत करने दो।

मैं थक चुका हूँ
अपने होने का प्रमाण देते-देते।

अब अगर तुम मेरे पास हो,
तो बस मेरे पास रहो।

मेरी हर चुप्पी का अर्थ मत खोजो।

हर दूरी को नाराज़गी मत समझो।

हर थकान को बेरुखी मत कहो।

कभी-कभी
एक आदमी बस थका हुआ होता है।

और कभी-कभी
उसकी चुप्पी में
पूरी ज़िंदगी बोल रही होती है।

चालीस के बाद
उसे दुनिया जीतनी नहीं होती।

उसे बस
अपने भीतर बचा हुआ आदमी
बचाना होता है।

और शायद यही
उम्र का सबसे कठिन सत्य है

एक उम्र के बाद पुरुष शांति नहीं माँगता…
वह सिर्फ़ उन चीज़ों से दूर हो जाता है
जो उसकी शांति छीनती हैं।

क्योंकि अब उसके पास
समय कम नहीं हुआ है

बस
वह पहली बार समझ गया है
कि उसका समय
उसका अपना भी है।





सोमवार, 27 जुलाई 2026

चाक सी नाचती जिंदगी संघर्ष जीवटता और मानवीय संवेदनाओं का प्रतिबिंब- योगिता सिंह भदौरिया

चाक सी नाचती जिंदगी"
(संघर्ष, जीवटता और मानवीय संवेदनाओं का प्रतिबिंब)
…… योगिता सिंह भदौरिया

प्रस्तावना
मेरे आदरणीय श्री राजेश कुमार सिंह 'श्रेयस' जी द्वारा रचित उपन्यास *"चाक सी नाचती ज़िन्दगी"* केवल कागज़ पर उकेरी गई कोई कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस निम्न-मध्यम वर्ग का जीवंत दस्तावेज़ है, जो अभावों की मार झेलते हुए भी अपनी गरिमा बनाए रखता है। लेखक ने मिट्टी के चाक की गति और जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच जो दार्शनिक सामंजस्य स्थापित किया है, वह पाठक को आदि से अंत तक बांधे रखने में सक्षम है।
कथानक का संक्षिप्त सार
कहानी का केंद्र बिंदु *श्यामु* है, जो एक कुम्हार परिवार का युवक है। अपने दादा भुवन के साथ मिट्टी को आकार देते हुए उसका जीवन सहज चल रहा होता है, परंतु नियति उसे एक गंभीर बीमारी (क्रोनिक सिरदर्द) के जाल में झोंक देती है। जागरूकता के अभाव और निर्धनता के कारण वह झोलाछाप डॉक्टरों के कुचक्र में फंस जाता है। दर्द निवारक दवाओं (डाइक्लोफेनेक) के अत्यधिक सेवन की लापरवाही अंततः उसकी दोनों किडनियों को विफल कर देती है। यहाँ से श्यामु का जीवन एक ऐसी परीक्षा बन जाता है, जहाँ हर कदम पर मौत और उम्मीद के बीच द्वंद्व चलता है।
पात्रों की संवेगात्मक गहराई
* *श्यामु:* वह केवल एक रोगी नहीं, बल्कि अदम्य साहस का प्रतीक है। शारीरिक यंत्रणा के बावजूद वह हार नहीं मानता और कंप्यूटर व डिजाइनिंग जैसे आधुनिक कौशल सीखकर आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करता है।
* *सुनैनी:* श्यामु की पत्नी भारतीय नारी के उस स्वरूप को दर्शाती है जो त्याग और शक्ति का पुंज है। वह न केवल अपनी किडनी देने का संकल्प लेती है, बल्कि हर विपरीत परिस्थिति में परिवार के लिए एक अभेद्य ढाल बनकर खड़ी रहती है।
सहायक पात्र
भवानी सेठ और राकेश दिनकर जैसे पात्र समाज के उस उजले पक्ष को दर्शाते हैं, जो निःस्वार्थ सेवा और आर्थिक सहयोग के माध्यम से मानवता में विश्वास जगाते हैं।
उपन्यास का विशेष महत्व: एक विस्तृत विश्लेषण
यह कृति साहित्यिक आनंद के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सामाजिक संदेशों को समाहित किए हुए है, जिसका विस्तार निम्नलिखित है:
1. ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी सच्चाई
यह उपन्यास ग्रामीण भारत में चिकित्सा सुविधाओं की बदहाली और झोलाछाप डॉक्टरों के बढ़ते प्रभाव पर कड़ा प्रहार करता है। यह दिखाता है कि कैसे उचित मार्गदर्शन के अभाव में एक सामान्य बीमारी जानलेवा बन जाती है। यह समाज को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने की चेतावनी देता है।
2. मध्यम वर्ग का आर्थिक और मनोवैज्ञानिक संघर्ष
लेखक ने बहुत सूक्ष्मता से उकेरा है कि कैसे एक लंबी बीमारी किसी हंसते-खेलते परिवार की आर्थिक कमर तोड़ देती है। यह मध्यम वर्ग की उस विवशता का चित्रण है जहाँ इलाज के खर्च और सम्मानजनक जीवन के बीच एक निरंतर युद्ध चलता है।
3. रिश्तों की अटूट डोर
तकनीकी और भौतिकवादी युग में यह कहानी हमें याद दिलाती है कि संकट के समय केवल 'अपने' ही साथ खड़े होते हैं। श्यामु और सुनैनी का संबंध प्रेम, निष्ठा और एक-दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पण की पराकाष्ठा है।
4. प्रेरणा और जीवटता (Resilience)
उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी सकारात्मकता है। यह संदेश देता है कि "जीवन का चाक" चाहे कितनी भी प्रतिकूल दिशा में घूमे, यदि मन में दृढ़ निश्चय हो, तो राख से भी उठकर खड़ा हुआ जा सकता है।

निष्कर्ष एवं पाठक की अनुगूँज
"चाक सी नाचती ज़िन्दगी” हमें सिखाती है कि जीवन की सार्थकता केवल सुख भोगने में नहीं, बल्कि कठिनाइयों से मुस्कुराकर लड़ने में है। यह कृति पाठकों के हृदय में करुणा का संचार करती है और उन्हें संघर्ष करने की नई ऊर्जा से भर देती है।
> *"यह उपन्यास हर उस व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य पाठ है, जो जीवन की चुनौतियों के सामने स्वयं को असहाय महसूस करता है।"*

योगिता सिंह भदौरिया
प्रयागराज,उत्तर प्रदेश


शनिवार, 25 जुलाई 2026

नेक इंसान लघु कथा -राजेश कुमार सिंह श्रेयस कवि लेखक एवं समीक्षक लखनऊ उ.प्र.

#नेक_इन्सान ( लघुकथा )

आज सुबह से ही काफी बरसात हो रही थी। वैसे तो नन्हा छोटू रुई वाली मिठाई की स्टिक लेकर सुबह ही घर से निकल गया था,लेकिन आज ग्राहक नदारत थे । सुबह से बरसात शुरू हुई तो बंद होने का नाम नहीं ले रही थी । मनोहरलाल के समोसे वाली दुकान के आगे लगे टिन सेड में रखे बेंच का किनारा पकड़े छोटू बरसात के रुकने का इंतजार करता रहा । बरसात बिल्कुल ही बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी ।सुबह से घर से निकले छोटू को बड़ी तेज भूख लगी थी, लेकिन पाकेट में एक भी रुपया नही था कि कुछ खरीद कर खा ले । पॉकेट में पैसा कहां से होता,उसकी तो अब तक एक भी मिठाई नहीं बिकी थी।

मनोहरलाल की दुकान पर बरसात के मौसम में चटक समोसे खाने वालों की लाइन लगी हुई थी।
अबे, यहां क्या बैठा है, हट किनारे,... एक साहब ने उसे डांटे हुए कहा ।
बेचारा छोटू क्या ही जवाब देता। उसने थोड़ा सा सरकने में ही भलाई समझी । इसी बीच कार पर सवार तीन चार लोग मनोहरलाल की दुकान पर समोसे खाने के लिए उतरे । उन्हें देखते हैं, मनोहरलाल उनकी आव भगत में लग गया। उसकी सक्रियता को देखकर ऐसा लग रहा था कि ये लोग जरूर कोई विशेष लोग होंगे । उनके बैठने का इंतजाम मनोहरलाल को करना था सो मनोहरलाल सो उसने कड़े तेवर दिखाते हुए छोटू को डांटते हुए कहा..
अबे,बार-बार कह रहा हूँ कि भाग यहां से, यह नालायक जाने का नाम नही ले रहा है ..
कैसे जाऊँ चाचा.. इतनी तेज बरसात हो रही है भीग जाऊँगा, मेरी मिठाईयाँ भीग जाएगीं।
तेरी मिठाईयाँ भींग जाएगीं, इससे मुझे क्या लेना देना,.. हता है कि नही । चाचा यह मेरी भी तो दुकान थी.. छोटू के इतना कहते ही मनोहरलाल ने उसे एक तगड़ा सा थप्पड़ नन्हें छोटू के गाल पर जड़ दिया ।
नन्हा छोटू तिलमिला कर बेंच से नीचे गिर गया। उसके कपड़े कीचड़ में सन उठे। उसकी रुई वाली मिठाई कीचड में गिर कर पिचक गयी और ख़राब हो गयी । उस छोटे बच्चे की छोटी सी पूँजी बर्बाद हो गयी ।
जमीन पर लुढ़का छोटू कभी खुद को देखता,तो कभी अपनी बर्बाद हो चुकी, रुई वाली मिठाई को देखता। उसने आरत दृष्टि से मनोहरलाल की ओर देखा। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा फूट पड़ी । वह बिल्कुल बेचारा और विवश था। वह कर ही क्या सकता था ।
आइये बाबूजी,आपलोग लोग बैठिए, ऐसा बोलते हुए मनोहरलाल ने कार से उतरे चारों लोगों को बेंच पर बैठने का अनुरोध किया। जगह की दिक्कत जैसी की तैसी थी। ग्राहकों से सारे बेंच भरे हुए थे।

मनोहरलाल की इस गंदी सी हरकत को देखकर कार से उतरे भद्र से दिखते सज्जन का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा .. अरे मनोहरलाल ! तुमसे इस लड़के को मारा क्यों ? यह लड़का किसका है?... शायद उस सज्जन ने बच्चे की यह बात सुन ली थी कि "चाचा यह मेरी भी दुकान तो थी ।"
मनोहरलाल अब क्या ही जवाब देता, वह उस व्यक्ति का मुँह देखने लगा । थोड़ा हिचकते हुए बोला, साहब ! ये महेश का लड़का है । सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगे।
अरे मनोहरलाल..महेश कहाँ है? क्या वह दुकान पर बिल्कुल नहीं आता ? उसको देखे तो मुझे महीना हो गए । तूँ उसकी दुकान पर काम करता था, मैं यह समझ रहा था कि महेश तुम पर बहुत विश्वास करता है, इसलिए सारी दुकान तुम्हारी जिम्मेदारी पर छोड़ रखा है ।
उस सज्जन ने जब दुबारा डांटते हुए मनोहरलाल से पूछा तो मनोहरलाल ने सारी बातें उस नेक इंसान को बता दी ..
बाबूजी,महेश अब इस दुनिया में नहीं है । उसके गुजरे लगभग छः महीने से ऊपर हो गए। यह लड़का महेश का ही लड़का है।
महेश का लड़का है !..अरे महेश की पत्नी भी तो बरसों पहले गुजर गई थी। और उसका यह लड़का इस हाल में । अब तो यह बिल्कुल अकेला और अनाथ हो गया होगा ।

अबे नालायक तुम अपने मालिक से इस तरह की वफादारी निभा रहे हो। उसके बेटे की जिम्मेदारी निभाने की जगह, तुम इस छोटे लड़के से ऐसा व्यवहार कर रहे हो, उसको इस तरह से पीट रहे हो ।
अभी के अभी खाली कर दे इस गुमटी को, नहीं तो तुम्हारी हड्डी पसली तोड़ दूँगा। बिल्कुल अभी के दफा हो जा यहाँ से,नहीं तो पुलिस बुलाकर तुम्हें बंद करता हूँ । मैंने यह दुकान ( बड़ी सी गुमटी ) तुम्हें नहीं दी थी, मैंने यह दुकान उस महेश को दी थी जो की एक नेक और सज्जन इंसान था। मेरे बचपन का दोस्त था।

उस सज्जन ने छोटे छोटू के दोनों हाथों को पड़कर उठाया और उसे अपने बाहों में समेट लिया। उनके कपड़े गंदे हो गए लेकिन उनको इससे कुछ लेना देना नहीं था। इस वक्त तो उसके बचपन के दोस्त महेश का बेटा, छोटू उसकी बाहों में था। छोटू और वह सज्जन दोनों ही रो रहे थे। धूर्त मनोहरलाल दुकान छोड़कर फरार हो चुका था। दुकान में बैठे अन्य ग्राहक इस नेकइंसान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे ।

©® राजेश 'श्रेयस'
( राजेश कुमार सिंह 'श्रेयस')
कवि लेखक एवं समीक्षक
लखनऊ, उ.प्र. (भारत )
दिनांक 23 जुलाई 2026