पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन
हम किस पार्टी के समर्थक हैं, से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब लोकतंत्र का हाथी अंगड़ाई लेना शुरू करता है तो यह कहना कठिन होता है कि वह कहां जाकर बैठेगा। और इसे स्वीकार करना लोकतन्त्र है। तमिलनाडु में एक फिल्मी अभिनेता पहली बार चुनाव लड़ता है और जनता उसे हाथो हाथ ले लेती है। आप कैसे कहेंगे कि जनता मूर्ख है? इस अहंकार से मुक्त होने के लिए लोकतंत्र की जमीन की तरफ देखना होगा।
(१)
आज बात पश्चिम बंगाल की, और उस जमीन की जिसे मैंने अपनी बंगाल यात्रा के दौरान छूकर महसूस किया था! कोलकाता में मैं होटल ग्रैंड हयात में रुका था। फाइव स्टार होटल, फाइव स्टार क्षेत्र, लेकिन सामने सड़क की दूसरी तरफ अनधिकृत चॉल, बिल्कुल फुटपाथ पर। और एक या दो नहीं, लंबी चौड़ी कई किलोमीटर तक फैली हुई। हर चाल में कुछ कैरम खेलते लोग, फुटबॉल का छोटा सा मैदान और तृणमूल कांग्रेस का कार्यालय।
एक सप्ताह के अंदर कम से कम ३ जुलूस देखा जो उन चालों से निकलकर तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सड़कों पर चलता था। चाय पीने के लिए जब हम बाहर दुकानों पर जाते थे तो पता चलता था कि आमजन इन लोगों से कितने त्रस्त हैं! यहां पर वर्ग संघर्ष की बात नहीं है, क्योंकि ये बातें चाय की छोटी छोटी दुकानों पर होती थीं, ये बंगला भाषी सामान्य गरीब लोग थे। उनका कहना था कि ये लोग बांग्लादेश से आकर यहां बसाए गए हैं और उनकी विवशता है तृणमूल कांग्रेस को अपना समर्थन दिखाना रोज रोज।
(२)
श्रील चैतन्य महाप्रभु के नवद्वीप और नदिया का दर्शन करते समय हम लोग चम्पाहाटी गए। यह एक जंगल जैसा ग्रामीण क्षेत्र था। यहां चैतन्य महाप्रभु अपने प्रिय पार्षद गदाधर के साथ श्रीकृष्ण-चिंतन करने आते थे। वहां एक बड़ा सा मंदिर है। उस मंदिर के चारों तरफ इस्लाम मतावलंबी लोगों का गांव बसता जा रहा है। वहां के पुजारी जी ने बताया था कि इन लोगों को सरकार यहां लाकर बसा रही है।
समस्या इस्लाम से नहीं। भारत के मुसलमान हैं तो कहीं भी जाकर बस सकते हैं। लेकिन पुजारी जी ने बताया कि बांग्लादेश के मुस्लिमों को यहां बसाया जा रहा है। वे आए दिन परेशान भी करते हैं। जब हम वहां से निकल रहे थे तो हमने वहां एक बड़ा सा बोर्ड देखा, एक कार्यालय के बाहर। उस पर लिखा था, रिफ्यूजी सेटलमेंट कमिश्नर। अर्थात शरणार्थियों को बसाने वाले विभाग के आयुक्त। फिर हमें समझ में आया कि पुजारी जी सही कह रहे हैं और तृणमूल कांग्रेस की सरकार बड़े सुनियोजित तरीके से यह काम कर रही है।
(३)
कोलकाता में रहने वाली एक गाजीपुर की बिटिया ने अपने बेटी का एडमिशन केवल एक साल के लिए द प्रेसीडियम में करवाया। उनके पिता जी मेरे बड़े भाई के सदृश हैं। मैंने केवल एक साल का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि, उनकी कॉलोनी के किसी लड़के का बाहर के किसी मुस्लिम से झगड़ा हो गया। सिक्योरिटी होने के बावजूद अवैध कॉलोनी में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थी झुंड बनाकर उनकी कॉलोनी में आए और हर घर पर पथराव किया।
पुलिस ने कुछ नहीं किया। उनके पति इतने डर गए थे कि उन्होंने एक साल के लिए अपने परिवार को गाजीपुर में भेज दिया। उनकी नौकरी थी इसलिए वे नौकरी छोड़ नहीं सकते थे। ये तीन मेरे व्यक्तिगत अनुभव हैं लेकिन समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, चैनल में हमने जो कुछ सुना देखा है, यदि उसे गोदी मीडिया कहकर खारिज भी कर दें, तो आखिर क्या वहां से आ रहे दृश्य, वीडियो, मुर्शिदाबाद के दंगे, विस्थापन, मृत्यु के आंकड़े, क्या ये सब गलत हैं?
बहुत अच्छा हुआ कि केंद्र सरकार ने चुनावी हिंसा के कारण प्रदेश सरकार को बर्खास्त नहीं किया जबकि इसकी मांगें उठती रहीं। केंद्र सरकार यदि ऐसा करती तो वह जनभावनाओं के विपरीत होता और केवल अपने वोटबैंक की भावनाओं अनुकूल होता। लगभग ८० प्रतिशत सीटें जीतने के लिए यह आवश्यक था कि बंगाल का सामान्य जन समुदाय उस सरकार के कार्यों और नीतियों को अपनी आंखों से देख सके, कानों से सुन सकें और आत्मा से महसूस कर सके। भाजपा और संघ जमीनी लड़ाई लड़ते रहे, लोकतांत्रिक तरीकों से जमीन तलाश करते रहे और जनजागरण करते रहे।
पंद्रह वर्षों तक ममता सरकार के साथ खड़े रहने के बाद जनता को परिवर्तन की आवश्यकता महसूस हुई। मुझे पिछले चुनाव के समय, वागर्थ के संपादक शंभूनाथ जी के साथ हुआ अपना फेसबुकिया संवाद भी याद आ रहा है। चुनावी हिंसा के समर्थन में लिखे उनके एक पोस्ट पर मैंने प्रश्न किया कि, क्या आप इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं। उनका उत्तर था कि, तृणमूल वाले बैठकर केवल ताली तो नहीं बजाएंगे। जब मैंने उनसे पूछा कि, क्या वामपंथी हिंसक चरित्र को तृणमूल में अपनी हिंसा का विकल्प दिखाई दे रहा है?
उन्होंने मुझे ब्लॉक कर दिया और यही अनुभव मेरठ विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर विद्या सागर सिंह के साथ भी हुआ। उन्हें भी वागर्थ के माध्यम से संवाद, विमर्श और ऊंची बातें करने वाले शंभूनाथ जी ने असहज प्रश्नों पर ब्लॉक कर दिया। बहरहाल, इसी बहाने मेरी विद्यासागर सर से बौद्धिक मित्रता हो गई। और वागर्थ के संपादकीय की निरर्थकता समझ में आ गई। एक प्रसंग से कितने प्रसंग जुड़े रहते हैं! सब याद आ जाता है।
और आज, लोकतंत्र के हाथी के नृत्य का पर्व है। कुछ भी अकारण नहीं होता, हमें अपनी आंखों को खुला रखना होगा और खुद देखना होगा।
माधव कृष्ण, द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी बड़ी बाग लंका गाजीपुर







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