मैं वह सूरज हूं न डूबेगी जिसकी किरन
रात होगी तो सितारों मे बिखर जाऊंगा
शायर खामोश गाज़ीपुरी ..... 🔮
उबैदुर्रहमान सिद्दीकी
शहर के मुहल्ला सट्टी मस्जिद में खामोश ग़ाज़ीपुरी के घर का सामने मैं खड़ा हूँ. बचपन से उन्हें कमरे में बैठे देखता, कभी कुछ लिखते, कभी गुनगुनाते हुए सुनता या किसी गजल को सजाने संवारने में उनपर नजर पड़ती. यह हमारे जनपद के एक शलाखा शायर खामोश गाज़ीपुरी थे. असल नाम मुज़फ्फर हुसैन था और पिताश्री मुनव्वर अली थे.
खामोश गाजीपुरी का जन्म 25 अप्रैल 1932 में मोहल्ला सट्टी मस्जिद के एक सामान परिवार मे हुआ. उनके उस्ताद कलीम गाजीपुरी ने "नया दौर " नामक पत्रिका मे लिखा कि "खामोश कोई बड़े बाप के बेटे नहीं थे, बल्कि एक मेहनतकश मां बाप के बेटे थे. मैने उन्हें उंगली पकड़ कर 1939/40 में चश्मय रहमत ओरिएंटल कालेज मे प्रवेश कराया, लिखाया पढ़ाया. सरोश मछलीशाहरी के शागिर्द थे और उन्ही के सानिध्य मे रहकर शेर शायरी के उतार चढाव के फन को सीखा. फिर वह 1945 से 1980 तक कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों की धड़कन बनकर उभरे. उनकी गजल रचना की विशेषता थीं कि वह ऐसे शब्दों को चुनते जिसे एक आम आदमी या रिक्शा चालाने वाला भी समझ सके. यही विशेषता उनकी लोकप्रियता का कारण बना. फिर ऐसी लोकप्रियता थीं कि गाजीपुर के किसी अन्य शायरों के नसीब में नहीं आई. राही मासूम रज़ा के बाद आप इकलौते शायर थे जिन्होंने गाजीपुर के नाम को कवि सम्मेलन और मुशायरे की दुनिया में स्थापित किया.
खामोश ग़ाज़ीपुरी का यह शेर जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ :
कभी उनका छुप के हंसना कभी खुल कर मुस्कराना
मेरी आंख डबडबायी, उन्हें मिल गया बहाना
जब मुझको न पाएगा पैमाना पुकारेगी
साकी न सही लेकिन मयखाना पुकारेगा
अफसोस नहीं मुझको कुछ शमा के बुझने का
ग़म यह है कि अब किसको परवाना पुकारेगा
खामोश साहब हमेशा जिंदगी की उलझनों से झूझते रहे और आगे बढ़ते रहे. उनके जीवन में एक ऐसा लम्हा भी आया जब उन्हें बेरोजगार होना पड़ा. धन अर्जन के लिए एकमात्र सहारा कवि सम्मेलन तथा मुशायरे था. कम समय में उन्हें हिन्दुस्तान के बड़े कवि सम्मेलनों और मुशायरों के मंचों पर अग्रिम पंक्तियों के शायरों में जैसे कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, मजरूह सुल्तानपुरी जिनकी तूती बोलती थी, साथ लाखड़ा किया. शकील बदायूनी और साहिर लुधियानवी के चाहितें बने. जहाँ मुशयरा या कवि सम्मेलन होता, खामोश को बुलाते थे.
खामोश की विशेषता थीं कि जैसी ग़ज़ल होती, अपनी लय को उसी स्केल मे ढाल देते थे और वही लय ग़ज़ल की अंतिम पंक्ति तक बनी रहती. और यही कंठ से फूटी उनकी लय मन के अन्तःस्थल को छू जाया करती.गज़ले पढ़ने की उनकी अपनी एक शैली थीं.
उनके समय दरी पर बैठकर कवि सम्मलेन और मुशायरा सुनने का रवाज था. ज़ब वह मंच पर आते, लोकप्रियता का आलम यह था किपंडाल मे बैठे लोग खडे होकर उन्हें सम्मान देते थे. मैने उन्हें 1978/79 तथा 1980 में आयोजित मुशायरों में सुना है. रिक्शा चलाने वाले उनकी कविताओं को कई दिनों तक चलाते समय गाते रहते थे. वह लिखते है :
यह महकता हुआ संदल की तरह उनका बदन
जैसे खुशबू भी इक इंसान बना दी जाए.
रात अँधेरी अगर है तो गलती रात की है
किया सितम है कि चिरागो को सजा दी जाए
आगे लिखते हैँ :
इक हूक उठ रही है दिले बेक़रार मे
कौन आ रहा है छुप के लिबास- बहार मे
अच्छा हुआ कि दर्द ने चौका दिया मुझे
कुछ नींद आ चली थीं शबे इंतिज़ार मे
खामोश क्यूँ चमन कि फ़िज़ा है धुआँ धुआँ
जलता ना हो किसी का नशेमन बहार मे
कहा जाता है कि खामोश साहब किसी युवति को दिल दे बैठे थे. कुछ दिनों के बाद उन्हें पता चला कि उसने शहर के एक धनाढ्य व्यपारी से शादी रचा ली, इस खबर से उनका दिल टूट गया, फिर कई गज़ले लिखी. उसी मे यह भी एक थीं:
डूब जाने दो मेरे दिल को पयमाने मे
ज़िन्दगी क्या है यह सोचूंगा तो मर जाऊंगा
खामोश साहब की यह भी एक ग़ज़ल थीं :
हमें काश तुम से मुहब्बत न होती
कहानी हमारी हक़ीकत न होती
न दिल तुम को देते न मजबूर होते
न दुनिया न दुनिया के दस्तूर होते
क़यामत से पहले क़यामत न होती
हमीं बढ़ गये इश्क़ में हद से आगे
ज़माने ने ठोकर लगायी तो जागे
अगर मर भी जाते तो हैरत न होती
तुम्हीं फूँक देते नशेमन हमारा
मुहब्बत पे अहसान होता तुम्हारा
ज़माने से कोइ शिकायत न होती
यह ग़ज़ल तत्कालीन प्रसिद्ध पत्रिका " शमा ", दिल्ली, अंक अक्टूबर 1952 मे प्रकाशित हुई. ज़ब फ़िल्म मुग़ल आज़म सिनेमाहाल मे लगी तो उसके सभी गाने हिट हुए थे. बगैर बताये शकील बदायूनी ने खामोश साहब की प्रकाशित ग़ज़ल को अपने लिखें गानों के तौर पर लिया. ज़ब उपरोक्त खामोश की ग़ज़ल फ़िल्म के गाना के तौर पर रिलीज हुआ तो खामोश साहब को और उनके मित्रो को मालूम हुआ.
उनके परम मित्रों में उआ समय वकील भैरोनाथ वर्मा, वकील कमलाकांत चौबे, मुफलिस गाज़ीपुरी, डाक्टर उमाशंकर तिवारी, वकील इशरत जाफरी, खलिश ग़ाज़ीपुरी आदि लोगो ने मिलकर रेजिस्टर्ड डाक से शकील बदायूनी मुंबई को एक नोटिस भेजा," क्यूँ ना आपके खिलाफ कोर्ट केस किया जाए." नोटिस पाते ही तुरंत शकील बदायूंनी ने अपने आदमियों को मुंबई से गाजीपुर भेजा जो आकर खामोश से मिले. 3500 रुपिया का एक लिफाफा उन्हें दिया, जिसमे अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए लिखा कि "मेरी इज़्ज़त तुम चाहे उछाल दो या बदनामी से मुझे बचा लो, अब तुम्हारे हाथ मे है. निःसंदेह यह गजल तुम्हारी है लेकिन फिल्म "मुगल आजम" के सीन के अनुसार गाने की डिमांड थी, इसलिए लें लिया ".
खामोश चुंकि मन के बड़े उदार और सज्जन शायर थे. जवाब लिखा कि, " मैंने लाख अपने मित्रों को मना किया, मुझे बगैर बताय न जाने कब नोटिस भेज दिया, आप परेशान न हों, मै उनसे बात करता हूं.".
1962 में हिंद चीन युद्ध के समय लाल किला दिल्ली में मुशायरा का एक आयोजन हुआ जिसमें लता मंगेशकर के साथ नामचीन कवियों और शायरो का जमावड़ा था. खामोश गाजीपुरी ने ज़ब यह कविता पढ़ी तो लोग जोश मे आकर उठ खड़े हो गए तथा एक एक बंद को कई बार सुना :
ताज - अजंता के निगहबान हैं हम
न हिले जो किसी ताकत से वह चट्टान है हम
न उलझ हमसे की ठहरा हुआ तूफान हैं हम
जो भी तूफान से उलझता है कुचल जाता है
जो भी चट्टान से लड़ता है मसल जाता है
तू भी टकराएगा हमसे मसल जाएगा
जंग की आग से खेलेगा तो जल जाएगा
सारा कस बल तेरी फौजों का निकल जाएगा
तुझको गुलशन की कोई शाख नहीं दे सकते
जान दे सकते हैं लद्दाख नहीं दे सकते हैं.
हास्यस्पद बात यह रही कि शहर के लोगो ने उनका मज़ाक भी खूब उड़ाया जैसे डाक्टर राही मासूम रज़ा का (1952 तक ) टांग मे टीबी होजाने से भचक के चला करते थे, उनका भी उपहास उड़ाते रहे. उआ समय अधिकतर शायर - कवि माईक पर जाने से पहले थोड़ा सा जाम लें लिया करते थे, इसपर खामोश साहब का भी राह चलते मज़ाक उड़ाते, यह पंक्तिया लिखी :
लोगो की फितरत क्या कहिए अब मुझको शराबी कहते हैं
हालांकि मुझे मयखाने की खुद राह दिखाई लोगों ने
खामोश साहब की कई ऐसी गजलें है जो देश विदेश मे लोकप्रिय हुई थी. बेहतरीन गजल गायकों ने उनकी गज़लो को सुरों मे ढाला है जैसे मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने उनकी कई गज़ले गई, उनमे एक यह है :
उम्र जलवों में बसर हो यह जरूरी तो नहीं
हर शबे ग़म की सहर हो यह जरूरी तो नहीं
सबकी नजरों में हो साकी यह जरूरी है मगर
सब पे साकी की नज़र हो यह जरूरी तो नहीं
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है
उनकी आगोश में सर हो यह जरूरी तो नहीं
जगजीत सिंह ने खामोश साहब की इस गजल को गाकर अमर कर दिया:
देर व हरम में बसने वालों
मायखवारों में फूट न डालो
आरिज लब सादा रहने दो
ताजमहल पे रंग न डालो
उबैदुर्रहमान
गाजीपुर







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