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दुःखद, सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी ~ Lav Tiwari ( लव तिवारी )

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रविवार, 15 मार्च 2026

दुःखद, सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी

सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में अनिवार्य छुट्टी देने वाली याचिका खारिज कर दी और इसी के साथ नारीवादी दीदियों का गुबार फुट पड़ा....
ये कितना सही है इसपर विचार बिना हम बस इसे महिलाओं के खिलाफ मानकर विरोध पर उतर आए हैं।

हां पीरियड्स सामान्य दिनों से अलग होते हैं और विस्पर, स्टेय-फ़्री या सोफी के पैड्स लेने पर भी जैसे विज्ञापन में दिखाते हैं सैनेटरी पैड्स लेते ही लड़की ओलंपिक में पदक जीत लेती है, पिकनिक इंजॉय करती है, एग्जाम टॉप करती है या फिर मैराथन दौड़ जाती है ऐसा कुछ नहीं होता क्योंकि पैड्स महावारी के रक्त प्रवाह को सौखते हैं दर्द, क्रैम्प, थकान और जकड़न से राहत नहीं देते।
और सारी समस्याओं के साथ जांघों का छिल जाना माहवारी के बाद भी दो तीन दिन तक दर्द देता है।

पुराने समय मे महिलाओं को आराम मिल सके इसलिए चूल्हे चौके से छुट्टी दी जाती थी पर घर की बड़ी औरतों ने माहवारी की छुट्टी को एक्स्ट्रा काम का अवसर बना दिया और इन दिनों में घर की बहुये कपड़े धोना, आंगन लीपना, पत्थर फोड़ना, अनाज साफ करना, उपले बनाना मवेशियों का बाड़ा साफ करना और खेतीबाड़ी के वो भारी काम करती हैं जो आदमी अपने सामान्य दिनों में करते हैं।

उन्हें किसी ने एहसास ही नहीं दिलाया कि ये आराम का समय है तो कभी दिमाग मे आया भी नहीं कि माहवारी में आराम करना है...
धीरे धीरे महिलाओं ने खुद इसे परंपरा बना लिया कि घर के सारे अनुपयोगी काम महावारी के दिनों में करने हैं क्योंकि रसोई में नहीं खपना है।

सुप्रीम कोर्ट में बैठे जजों और आम समाज के लोगों ने अपनी दादी-नानियों को माहवारी में वही काम करते देखा है इसलिए इन्होंने आंकलन कर लिया कि माहवारी में छुट्टी देने से महिलाओं की प्रोग्रेस, कार्यक्षमता और संख्याबल कम हो जाएगा जो एक तरह से तार्किक भी है।

क्योंकि आप छुट्टी अनिवार्य कर सकते हो पर हर एक ऑफिस, विभाग और कम्पनी मालिक को महिलाओं को नोकरी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।

फिर जब किसी को पूरे तीस दिन बिना छुट्टी मांगे पूरी क्षमता से काम करने वाला आदमी मिल रहा है तो वो क्यों किसी महिला को काम पर रखेगा जिसे मासिक धर्म के नाम पर बिना वेतन काटे छुट्टी देना पड़े।

ये विषय संवेदना और नैतिकता का है,
कि जिन महिलाओं को पीरियड्स में ज्यादा समस्या हो उन्हें ऑफिस वाले संवेदना दिखाते हुए छुट्टी दें जबकि अनिवार्य करने से लोग महिलाओं को नोकरी देने से ही कतराने लगेंगे क्योंकि 90 प्रतिशत लोगों ने अपनी पुरानी पीढ़ी में महिलाओं को माहवारी में दुगना काम करते देखा है और उन्हें ये छुट्टी बस बहाना लगती है।
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