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माँ के होने का मतलब - लेखक डॉ अक्षय पाण्डेय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश ~ Lav Tiwari ( लव तिवारी )

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शनिवार, 9 मई 2026

माँ के होने का मतलब - लेखक डॉ अक्षय पाण्डेय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

माँ के होने का मतलब
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दिनभर की भाग-दौड़ के बाद जब मन अपने भीतर के किसी शांत कोने की तलाश में भटकता है, तभी अचानक स्क्रीन पर एक तस्वीर उभर आती है- सोशल मीडिया की असंख्य सूचनाओं के बीच ठहरी हुई, पर भीतर गहरे तक उतर जाने वाली। पानी के अथाह विस्तार में एक माँ अपने बच्चे को बाँहों में भींचे हुए है। दोनों के शरीर पर लाइफ जैकेट है, मानो जीवन को बचाए रखने का अंतिम भरोसा। लेकिन उस दृश्य में सबसे अधिक प्रभावशाली जो है, वह यह कृत्रिम सुरक्षा नहीं, बल्कि वह आलिंगन है, माँ का वह अंतिम, अटूट, निरुपाय और फिर भी अदम्य आलिंगन।
पहली दृष्टि में यह एक दुर्घटना का दृश्य है, एक खबर, एक त्रासदी, जिसे लोग साझा कर रहे हैं, उस पर अपने शब्दों की श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे उस तस्वीर पर दृष्टि गहराती है, वह केवल एक घटना नहीं रह जाती; वह एक भाव-दर्शन में बदल जाती है। वहाँ कोई शोर नहीं है, कोई संवाद नहीं, कोई नाटकीयता नहीं, केवल एक माँ है, जो अपने बच्चे को ऐसे थामे हुए है, जैसे वह उसे जीवन के अंतिम किनारे तक पहुँचाना चाहती हो, भले ही स्वयं उस पार न जा सके। कितनी विचित्र विडंबना है- लाइफ जैकेट, जो जीवन बचाने का प्रतीक है, वही उस दृश्य में एक मौन प्रश्न बनकर खड़ी है। वह कहती है कि मनुष्य ने अपने लिए कितनी व्यवस्थाएँ कर ली हैं, कितने साधन जुटा लिए हैं, पर जीवन के सबसे निर्णायक क्षणों में जो सबसे बड़ा सहारा होता है, वह किसी उपकरण का नहीं, बल्कि एक भावना का होता है।और वह है माँ का प्रेम। वह प्रेम, जो किसी तकनीक से नहीं उपजता, किसी प्रशिक्षण से नहीं आता, बल्कि अस्तित्व की जड़ों में रचा-बसा होता है।
कल्पना कीजिए उस क्षण की, चारों ओर पानी का अनंत फैलाव, साँसों का टूटता हुआ क्रम, देह की सीमाएँ धीरे-धीरे जवाब देती हुईं। ऐसे में मनुष्य का स्वभाव है कि वह स्वयं को बचाने की चेष्टा करे। पर यहाँ एक माँ है, जो अपने अस्तित्व के अंतिम क्षण में भी स्वयं को नहीं, अपने बच्चे को प्राथमिकता देती है। उसकी बाँहें उस बच्चे के चारों ओर इस तरह कस जाती हैं, जैसे वह अपने भीतर की सारी शक्ति, सारी ऊष्मा, सारी चेतना उसी में स्थानांतरित कर देना चाहती हो। यह दृश्य केवल करुणा का नहीं, बल्कि विस्मय का भी है। क्योंकि यह हमें उस मूल सत्य के सामने खड़ा कर देता है, जिसे हम जानते तो हैं, पर अक्सर उसकी गहराई को समझ नहीं पाते; माँ का प्रेम स्वाभाविक नहीं, अलौकिक है। वह प्रकृति का एक ऐसा रहस्य है, जिसमें त्याग सहज हो जाता है, समर्पण स्वभाव बन जाता है, और 'मैं' का अस्तित्व 'तुम' में विलीन हो जाता है।
लोग उस तस्वीर को साझा कर रहे हैं- कोई लिखता है 'सलाम इस माँ को', कोई कहता है 'माँ महान है', कोई भावुक होकर आँसू की इमोजी लगा देता है। लेकिन क्या सचमुच इतने भर से उस दृश्य को समझा जा सकता है? क्या कुछ शब्द, कुछ वाक्य उस क्षण की गहराई को व्यक्त कर सकते हैं? शायद नहीं। क्योंकि वह क्षण भाषा की सीमा से बाहर है। वह अनुभव का वह प्रदेश है, जहाँ शब्द पहुँचते-पहुँचते थक जाते हैं। उस आलिंगन में एक इतिहास छिपा है,जन्म से लेकर उस अंतिम क्षण तक का इतिहास। वह वही माँ है, जिसने पहली बार उसे अपनी गोद में लिया होगा, उसकी पहली रोने की आवाज़ सुनी होगी, उसके पहले कदमों पर मुस्कुराई होगी, उसके हर दर्द को अपने भीतर महसूस किया होगा। और अब, उसी माँ की बाँहें उस बच्चे को वैसे ही थामे हुए हैं, बस अंतर इतना है कि अब यह आलिंगन विदा का है, एक अंतिम प्रयास का है।
यहाँ मातृत्व केवल एक भाव नहीं, एक तप है; एक निरंतर साधना, जो जीवन के हर मोड़ पर अपने को सिद्ध करती है। माँ अपने बच्चे के लिए जो करती है, वह किसी नियम, किसी कर्तव्य-बोध या किसी सामाजिक अपेक्षा से संचालित नहीं होता। वह एक सहज प्रवाह है, जैसे नदी का जल, जो बिना किसी आग्रह के बहता है, बिना किसी शर्त के देता है। और शायद यही कारण है कि जब ऐसी कोई घटना सामने आती है, तो वह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं रह जाती; वह समूची मानवता के भीतर एक कंपन पैदा कर देती है। हम सब अपने-अपने भीतर उस 'माँ' को याद करने लगते हैं, वह जो हमारे जीवन में है, या थी, या जिसकी स्मृति अब भी हमारे भीतर किसी दीप की तरह जल रही है।
यह तस्वीर हमें एक बार फिर उस मूल सत्य की ओर लौटाती है, जिसे हम अपने व्यस्त जीवन में कहीं पीछे छोड़ आए हैं कि मनुष्य होने का अर्थ केवल जीना नहीं, बल्कि किसी के लिए जीना है। और इस 'किसी' का सबसे शुद्ध, सबसे निस्वार्थ रूप 'माँ' है।
वह माँ, जो अपने बच्चे के लिए हर परिस्थिति में खड़ी रहती है, चाहे वह सुख का समय हो या दुःख का, चाहे वह उपलब्धि का क्षण हो या विफलता का। दुनिया के सारे संबंध समय के साथ बदल सकते हैं, परिस्थितियों के साथ ढल सकते हैं, पर माँ का संबंध एक स्थिर ध्रुव की तरह होता है, अपरिवर्तनीय, अडिग। इसलिए उस तस्वीर को देखकर केवल दुःख ही नहीं होता, एक गहरा सम्मान भी जागता है। वह सम्मान उस शक्ति के लिए है, जो इतनी सहजता से अपने को विसर्जित कर देती है। वह श्रद्धा उस प्रेम के लिए है, जो किसी भी सीमा को स्वीकार नहीं करता- न समय की, न परिस्थिति की, न जीवन और मृत्यु की। और तब, अनायास ही भीतर से पं.हरिराम द्विवेदी विरचित गीत का लोक-स्वर प्रस्फुटित होता-

माई अस केहू नाहीं माई, माई होले,
माई अँखियन में सुख कै ओहाईं होले।

ओकरा ममता मतिन कउनो ममता न बा,
जग में ओकर कतौं कउनो समता न बा,
उ सनेहिया के सीतल जोन्हाई होले।

यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि उस दृश्य का सार है, उस घटना का निष्कर्ष है। यह हमें बताता है कि माँ की तुलना किसी से नहीं की जा सकती, क्योंकि वह तुलना के दायरे से बाहर है। शायद इसीलिए, जब हम ऐसी घटनाओं के बारे में सोचते हैं, तो हमारे भीतर एक अजीब-सी शांति भी उतरती है- एक विश्वास कि इस संसार में अभी भी कुछ ऐसा है, जो शुद्ध है, जो सच्चा है, जो अविनाशी है। और वह है, माँ का प्रेम। वह प्रेम, जो जीवन के हर अंधकार में एक दीपक की तरह जलता है। वह प्रेम, जो हर संकट में एक सहारा बनता है। वह प्रेम, जो अंततः हमें यह सिखाता है कि मनुष्य होने का सबसे बड़ा अर्थ क्या है।
इस तस्वीर में एक माँ हारती हुई नहीं दिखती; वह अपने सबसे बड़े विजय-क्षण में दिखाई देती है, जहाँ उसने अपने अस्तित्व को अपने बच्चे के लिए समर्पित कर दिया। यह हार नहीं, यह प्रेम की पराकाष्ठा है। यह अंत नहीं, यह उस अमरता की शुरुआत है, जो केवल त्याग और ममता से जन्म लेती है। और शायद यही कारण है कि यह तस्वीर केवल एक घटना की स्मृति नहीं बनती, बल्कि एक शाश्वत प्रतीक बन जाती है, उस सत्य का, जिसे हम बार-बार देखते हैं, बार-बार महसूस करते हैं, और हर बार नए सिरे से स्वीकार करते हैं कि सचमुच,
इस दुनिया में माँ से बड़ा कोई नहीं।
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माँ के होने का मतलब
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दियाधरी, दरवाज़ा, खिड़की
छप्पर होता है,
माँ के होने का मतलब
पूरा घर होता है ।

चूल्हे से चौकठ तक माँ है
साँस-साँस बिखरी,
उसकी यादें जेठ-तपन में
नीर-भरी गगरी,
सबसे मीठा धरती पर
माँ का स्वर होता है ।

आँचल की छाया को छू ले
ऐसा ताप नहीं,
माँ के मन को माप सके
ऐसा परिमाप नहीं,
माँ की ममता से छोटा
भू-अम्बर होता है ।

ख़ुद रोती पर हमें
हसीं संसार सदा देती,
निराकार सपनों को माँ
आकार सदा देती,
माँ से बड़ा न पीर,औलिया
ईश्वर होता है ।
०००
- डॉ.अक्षय पाण्डेय
8887899462