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अक्टूबर 2026 ~ Lav Tiwari ( लव तिवारी )

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बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

स्मृतिशेष कवि अनन्तदेव पाण्डेय 'अनन्त' की कविता गँउवों गाँव बुझाते नइखे का सांस्कृतिक पाठ डॉ. अक्षय पाण्डेय

स्मृतिशेष कवि अनन्तदेव पाण्डेय 'अनन्त' की कविता 'गँउवों गाँव बुझाते नइखे' का सांस्कृतिक पाठ
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भोजपुरी साहित्य में अनन्तदेव पाण्डेय 'अनन्त' का महत्त्व उस कवि के रूप में है, जिसने गाँव को बाहर से देखकर उसका चित्र नहीं बनाया, बल्कि उसके भीतर रहकर बदलते हुए लोकजीवन की धड़कनों को सुना। 03 अक्टूबर, 2026 को उनके निधन के साथ भोजपुरी साहित्य ने एक ऐसे रचनाकार को खो दिया, जिसकी कविता में लोकभाषा की सहजता, जीवनानुभव की प्रामाणिकता और सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षण की गहरी आकुलता एक साथ उपस्थित थीं। 92 वर्षों के उनके जीवन में ग्रामीण समाज के अनेक रूपों को देखने-समझने का अवसर था। वर्ष 1997 से उनके साथ बने मेरे साहित्यिक सम्बन्ध ने उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक सरोकारों को निकट से समझने का अवसर दिया। उन्हें स्मरण करते हुए उनकी कविता 'गँउवों गाँव बुझाते नइखे' विशेष रूप से ध्यान खींचती है। यह कविता किसी बीते हुए गाँव का भावुक चित्र नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विघटन का साक्ष्य है, जिसमें गाँव का भौतिक अस्तित्व बचा रहने पर भी उसकी विशिष्ट जीवन-पद्धति धीरे-धीरे मिटती जाती है। अनन्त जी की रचनात्मक उपलब्धि यह है कि उन्होंने इस क्षरण को पहचानने के साथ उसे लोकभाषा में ऐसा रूप दिया, जिसमें एक क्षेत्र का अनुभव व्यापक सामाजिक प्रश्न बन जाता है।
  अनन्तदेव पाण्डेय 'अनन्त' का जन्म 29 नवम्बर, 1934 को गाजीपुर जनपद के जमनियाँ तहसील के पचोखर क्षेत्र के आलमगंज गाँव में हुआ था। ग्रामीण जीवन से उनका सम्बन्ध केवल जन्म और निवास का सम्बन्ध नहीं था; खेती-बारी, घरेलू व्यवहार, लोकाचार और गाँव की सामाजिक संरचना उनके अनुभव का हिस्सा थे। यही अनुभव उनकी कविता की विश्वसनीयता का आधार बना। जून, 1986 में वाराणसी जनपद से आजमगढ़ जनपद में स्थानान्तरण होने से पहले वे खेती-बारी का काम भी देखते थे। स्थानान्तरण के कारण खेती से उनका प्रत्यक्ष सम्बन्ध छूटा और जमीन भी बेचनी पड़ी। इस व्यक्तिगत परिवर्तन ने उन्हें अपने आसपास के गाँवों में हो रहे व्यापक बदलावों को नई दृष्टि से देखने का अवसर दिया। खेतों में बैलों की जगह ट्रैक्टर आने लगे; घरों की बनावट, खान-पान, पहनावा, बोलचाल, रीति-रिवाज और सामाजिक व्यवहार बदलने लगे। उनके सामने प्रश्न केवल इतना नहीं था कि पुरानी वस्तुओं की जगह नई वस्तुएँ क्यों आ रही हैं; मूल प्रश्न यह था कि इन परिवर्तनों के साथ ग्रामीण समाज की सांस्कृतिक पहचान का क्या हो रहा है। इसी अनुभव से कविता का मूल स्वर निकला-

"गँउवों गाँव बुझाते नइखे
अब कतहीं ऊ बाते नइखे।"

यहाँ 'गाँव बुझाते नइखे' का अर्थ गाँव के भौतिक रूप से समाप्त हो जाने तक सीमित नहीं है। गाँव मौजूद है, लेकिन उसके भीतर का वह संसार- उसकी बोली, सामुदायिकता, श्रम-संस्कृति, लोकविश्वास और आत्मीय सम्बन्ध पहचान में नहीं आ रहा। शीर्षक में प्रयुक्त 'बुझाते' शब्द भी अर्थपूर्ण है। वह किसी निश्चित निष्कर्ष की घोषणा नहीं करता, बल्कि पहचान के धुँधलाने, परिचित के अपरिचित हो जाने और सांस्कृतिक निरन्तरता के टूटने की अनुभूति व्यक्त करता है। कविता का बार-बार लौटता हुआ यह भाव उसके सभी प्रसंगों को एक सूत्र में बाँधता है। सन् 2000 तक विस्तृत रूप में पूरी हुई इस कविता का पहला सार्वजनिक पाठ 25 जनवरी, 2002 को जमनियाँ तहसील में गणतन्त्र दिवस के पूर्व आयोजित कवि-सम्मेलन में हुआ। बाद में 'गाजीपुर समाचार' साप्ताहिक में इसका दो बार प्रकाशन हुआ और 'समकालीन सोच' एवं बी.एच. यू. से प्रकाशित होने वाली भोजपुरी की पत्रिका 'भोजपुरी जनपद' पत्रिका में भी इसे स्थान मिला। वर्ष 2004 से आगे गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज, गोपालगंज, सीवान, बलिया, वाराणसी, बक्सर, सासाराम, भभुआ, जौनपुर, मऊ और आजमगढ़ सहित अनेक भोजपुरीभाषी क्षेत्रों में इसके पाठ ने इसे व्यापक लोकस्वीकृति दिलाई। इसकी लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि पाठक इसमें केवल कवि की चिन्ता नहीं, अपनी बदलती हुई दुनिया का अनुभव सुनते हैं।
इस पुस्तक में अपने आलेख 'लोक-संरक्षण की विराट चेष्टा : ‘गँउवों गाँव बुझाते नइखे’’ में मैंने इस कविता को लोक-संस्कृति के संरक्षण के एक व्यापक रचनात्मक प्रयास के रूप में देखा है। इसकी विशिष्टता यह है कि कवि संस्कृति की चर्चा किसी अमूर्त अवधारणा के रूप में नहीं करता। वह उसे वस्तुओं, शब्दों, श्रम-पद्धतियों, खान-पान, खेलों, पहनावे और सामाजिक व्यवहारों में पहचानता है। कविता की संरचना चौपाई छन्द और परिगणन शैली पर आधारित है। कवि एक के बाद एक उन वस्तुओं और व्यवहारों को सामने लाता है, जो कभी गाँव के दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थे। मेरे मूल आलेख में ऐसे लगभग 267 लोकप्रचलित संज्ञा-शब्दों के लुप्त होने की पीड़ा का उल्लेख है। यह परिगणन मात्र सूची तैयार करने की युक्ति नहीं है; यही कविता की केंद्रीय रचनात्मक रणनीति है। प्रत्येक शब्द एक लुप्तप्राय अनुभव का संकेत बनता है और शब्दों का संचय धीरे-धीरे एक पूरे सांस्कृतिक संसार की पुनर्रचना कर देता है। इसीलिए इसे 'लोक-संस्कृति कोश' कहना सार्थक है। सामान्य कोश शब्द का अर्थ बताता है, जबकि अनन्त जी की कविता शब्द के साथ उसका जीवन-परिवेश भी बचाती है।
कविता के आरम्भिक अंश में घरों की बनावट और निर्माण-सामग्री का उल्लेख इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है-

"बखरी बऽने निमन सस्ता
चउकठ खम्हा अउर निगस्ता
धऽरन बल्ला कोरो खपड़ा
से अब घर छवाते नइखे।"

इन पंक्तियों में ग्रामीण वास्तु की स्मृति है, लेकिन कविता का आशय किसी पुरानी निर्माण-शैली का गुणगान भर नहीं है। स्थानीय सामग्री से बने घर अपने परिवेश, जलवायु, उपलब्ध संसाधनों और सामूहिक श्रम से जुड़े होते थे। उनके निर्माण में स्थानीय कारीगरी और पीढ़ियों से अर्जित व्यावहारिक ज्ञान काम आता था। जब निर्माण-सामग्री और तकनीक बदलती है, तब केवल घर का दृश्य नहीं बदलता; उसके साथ जुड़ा ज्ञान, शब्दावली और श्रम-विभाजन भी अप्रासंगिक होने लगता है। इस प्रकार कवि का ध्यान वस्तु से उसके सांस्कृतिक तंत्र की ओर जाता है। घर यहाँ स्थापत्य की इकाई से आगे बढ़कर लोकजीवन की निरन्तरता का प्रतीक बन जाता है। इसी सांस्कृतिक तंत्र की ध्वनियों को कवि इन पंक्तियों में पुनर्जीवित करता है-

"ढेंका-जाँत कहाँ चल गइलें
ओखर-मूसर कहाँ परइलें
होत भोरहरी में घम घम घम
चूरा कहीं कुटाते नइखे।"

ठेंका, जाँत, ओखर और मूसर जैसे उपकरणों का उल्लेख उस श्रम-संस्कृति को सामने लाता है, जिसमें घरेलू उत्पादन और कृषि-आधारित जीवन का गहरा सम्बन्ध था। 'घम घम घम' की ध्वन्यात्मक पुनरावृत्ति इस स्मृति को केवल दृश्य नहीं रहने देती; पाठक उस सुबह को सुनने लगता है, जिसमें घरेलू श्रम के साथ गाँव जागता था। आधुनिक उपकरणों ने श्रम के अनेक रूप बदले हैं, पर पुराने श्रम से जुड़े सामूहिक अनुभव और दैनिक लय भी उनके साथ पीछे छूटे हैं। कविता की शक्ति इसी बिन्दु पर है; वह किसी वस्तु के अनुपयोगी हो जाने को केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं मानती, बल्कि उससे जुड़े अनुभवों के लोप को भी दर्ज करती है। फिर भी इसका अर्थ यह नहीं कि कवि पुराने श्रम की कठिनाइयों को आदर्श बनाता है। उसकी चिन्ता उन सांस्कृतिक अर्थों को पहचानने की है, जो उपयोगिता बदल जाने पर भी स्मरण और अध्ययन के योग्य रहते हैं। घरेलू जीवन की छोटी-छोटी वस्तुओं का उल्लेख कविता के इस लोक-संग्रह को और व्यापक बनाता है-

"घर-घर में सउरी कहवाँ बा
दउरा आ दउरी कहवाँ बा
कजरउटा कजरउटी में अब
काजर कहीं पराते नइखे।"

यहाँ वस्तुओं की अनुपस्थिति के पीछे घरेलू उत्पादन, उपयोग और परम्परा का बदलता हुआ संसार है। दउरा-दउरी और कजरउटा-कजरउटी जैसे शब्द उस जीवन की याद दिलाते हैं, जिसमें बहुत-सी आवश्यकताएँ स्थानीय साधनों और घरेलू कौशल से पूरी होती थीं। इन वस्तुओं का महत्त्व उनकी भौतिक उपयोगिता तक सीमित नहीं था; वे घर के दैनिक व्यवहार और पारिवारिक जीवन की निरन्तरता में शामिल थीं। कविता उन्हें संग्रहालय की निर्जीव वस्तुओं की तरह प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि उस जीवन के भीतर रखती है, जिसमें उनका अर्थ था। इसीलिए उसकी सूची वस्तुओं का मृत अभिलेख नहीं, जीवित संस्कृति का पुनर्स्मरण बनती है।
          इस रचना में कृषि-संस्कृति का पक्ष भी विशेष महत्त्व रखता है। कवि लिखता है-

"पँवदर कहवाँ अनुवाँ बाटे
धुरई कहाॅं इनारे झाँके
मोट कहाॅं खेतवहिया बोदर
दउरी दोन देखाते नइखे।"

इन पंक्तियों में खेती से जुड़े उपकरणों और प्रक्रियाओं का संसार उपस्थित है। ग्रामीण शब्दावली का यह हिस्सा उस व्यावहारिक ज्ञान से निर्मित हुआ था, जिसे किसान अपने अनुभव से सीखते और अगली पीढ़ी तक पहुँचाते थे। कृषि के साधन बदलने के साथ उनकी शब्दावली भी पीछे छूटती जाती है। इस बदलाव का एक परिणाम यह है कि नई पीढ़ी के लिए पुरानी कृषि-व्यवस्था केवल अपरिचित वस्तुओं का समूह बनकर रह जाती है; उन शब्दों के पीछे मौजूद श्रम, कौशल और पर्यावरणीय ज्ञान तक उसकी पहुँच कम हो जाती है। अनन्त जी की कविता इस टूटते सम्बन्ध को रेखांकित करती है। वह यह आग्रह नहीं करती कि पुरानी कृषि-पद्धति ही अपनाई जाए, बल्कि यह संकेत देती है कि तकनीकी बदलाव के बावजूद पुराने लोकज्ञान का दस्तावेजीकरण और सांस्कृतिक मूल्यांकन आवश्यक है।
          खान-पान और फसल-विविधता का प्रसंग भी इसी विमर्श को आगे बढ़ाता है-

"बर्रे बनल बुझउवल बाटे
कोदो बाटे कहाँ बोवाते
उरदी मोथी टाॅंगुन सावाँ
खरिहाने में जाते नइखे।"

कोदो, उड़द, मोथी और साँवा जैसे अनाजों का उल्लेख केवल भोजन की स्मृति नहीं है। इनके पीछे स्थानीय जलवायु, भूमि, कृषि-ज्ञान और आहार-पद्धति का अनुभव जुड़ा हुआ है। जब खेती में कुछ फसलों का स्थान सीमित होता है, तब भोजन की विविधता के साथ उनसे सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान और लोकव्यवहार भी प्रभावित होते हैं। इस दृष्टि से कविता का सांस्कृतिक दस्तावेजीकरण कृषि और खाद्य-संस्कृति के इतिहास के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। वह हमें बताती है कि ग्रामीण संस्कृति को समझने के लिए खेत और रसोई को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता; दोनों एक ही जीवन-व्यवस्था के परस्पर सम्बद्ध अंग हैं।
          अनन्त जी का लोक-संग्रह वस्तुओं तक सीमित नहीं रहता। वह बचपन और सामुदायिक जीवन के उन रूपों को भी दर्ज करता है, जिनमें सामाजिक सम्बन्ध सहजता से विकसित होते थे। कविता में वे लिखते हैं-

"छोड़ कबड्डी आ बरगत्ता
फेंटल जाता तास क पत्ता
फानी कूदत के बा कहवाँ
ऊढ़ा कहीं कुदाते नइखे।"

और आगे-

"गुल्ली-डंडा आँब मुदउवल
ओल्हा-पाती ढूक ढुकउवल
कउड़ी गोटी सतघरवो अब
कवनों जगह खेलाते नइखे।"

इन पंक्तियों में पारम्परिक खेलों की स्मृति है, लेकिन इनका अर्थ केवल मनोरंजन के साधनों के बदल जाने तक सीमित नहीं है। ऐसे खेल खुले स्थानों, साथियों की उपलब्धता, सामूहिक सहभागिता और प्रत्यक्ष संवाद पर निर्भर थे। उनके माध्यम से बच्चे नियम बनाना, प्रतिस्पर्धा करना, हार-जीत स्वीकारना और समूह में रहना सीखते थे। आज बच्चों के मनोरंजन के साधन और उनकी दिनचर्या बदल गई है। इस परिवर्तन को केवल पतन कह देना उचित नहीं होगा, लेकिन यह अवश्य विचारणीय है कि सामूहिक खेलों और खुले परिवेश की जगह कौन-से अनुभव ले रहे हैं। अनन्त जी की कविता इस प्रश्न को सीधे सिद्धान्त के रूप में नहीं उठाती; वह खेलों के नाम और उनके लुप्त होने की अनुभूति से पाठक को उस बदलाव पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
          लोक-संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण आयाम गीतों, उत्सवों और सामूहिक अनुष्ठानों में भी सुरक्षित रहता है। कविता की पंक्तियाँ हैं-

"गारी भा जँतसार भोरइता
पिंड़िया सोहर फगुआ चइता
सावन में झुलुआ पटेंग पर
कजरी गीत गवाते नइखे।"

सोहर, फगुआ, चइता और कजरी जीवन के अलग-अलग अवसरों और ऋतु-चक्रों से जुड़ी लोक-अभिव्यक्तियाँ हैं। इनके माध्यम से समुदाय अपने सुख-दुःख, उत्सव, स्मृति और भावनाओं को साझा करता था। लोकगीतों की परम्परा में व्यक्तिगत अनुभव सामूहिक स्वर प्राप्त करता है। जब गीत गाने के अवसर, अवसरों से जुड़े अनुष्ठान और सामूहिक भागीदारी कम होने लगती है, तब संस्कृति की अभिव्यक्ति का एक जीवित माध्यम भी कमजोर पड़ता है। कविता का यह पक्ष विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि यहाँ संरक्षण का प्रश्न वस्तुओं के संग्रह से आगे बढ़कर जीवित परम्पराओं के बने रहने का प्रश्न बन जाता है।
          अनन्त जी की सांस्कृतिक चिन्ता भाषा और पारिवारिक सम्बोधनों में हो रहे परिवर्तन के माध्यम से भी व्यक्त होती है-

"बाबू के पापा हजमवलँ
पापा के डैडी पसघवलँ
अम्मी-मम्मी कऽ बयार में
माई कहल सुनाते नइखे।"

इन पंक्तियों को किसी एक भाषा या सम्बोधन के पक्ष में दूसरे को खारिज करने के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। उनका मूल आशय उस सांस्कृतिक बदलाव को रेखांकित करना है, जिसमें पारिवारिक सम्बन्धों की अभिव्यक्ति बदलती है और कुछ स्थानीय शब्द दैनिक व्यवहार से बाहर होने लगते हैं। 'माई' जैसे शब्द में सम्बोधन के साथ एक विशिष्ट भाव-संसार भी जुड़ा है। भाषा केवल वस्तुओं के नाम बताने का माध्यम नहीं; वह सम्बन्धों की निकटता, अनुभव की बारीकियों और सामूहिक पहचान को भी अभिव्यक्त करती है। किसी शब्द का पीछे छूटना अपने आप में सांस्कृतिक विनाश का प्रमाण नहीं, लेकिन जब अनेक स्थानीय शब्द और उनके व्यवहार-क्षेत्र एक साथ लुप्त होने लगें, तब भाषा के साथ जुड़े अनुभवों का क्षरण भी विचारणीय हो जाता है। कविता इस परिवर्तन को दर्ज करती है और पाठक को भाषा की सांस्कृतिक भूमिका पर पुनर्विचार करने का अवसर देती है।
         कवि की दृष्टि में गाँव का संकट केवल पुरानी वस्तुओं और शब्दों के लुप्त होने का संकट नहीं, सामाजिक व्यवहार और नैतिक सम्बन्धों में आ रहे बदलाव का संकट भी है। वे लिखते हैं-

"मिल्लत कऽ उ नेम कहाँ बा
रेंड पर चढ़ल सेम कहाँ बा
मतलब में आन्हर बा सभही
बाउर-नीक सुझाते नइखे।"

इन पंक्तियों में पारस्परिकता और सामाजिक विवेक के कमजोर पड़ने की चिन्ता व्यक्त होती है। पुराने ग्रामीण समाज को किसी दोषरहित आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा; वहाँ भी विषमताएँ और सीमाएँ थीं। फिर भी परिचय, परस्पर सहयोग और सामुदायिक व्यवहार के अनेक रूप जीवन को एक विशिष्ट सामाजिक आधार देते थे। कवि का प्रश्न यह है कि जब व्यक्तिगत लाभ सम्बन्धों पर हावी होने लगता है, तब समाज के साझा नैतिक मानदण्डों का क्या होता है। इस अर्थ में कविता की सांस्कृतिक आलोचना केवल अतीत की वस्तुओं को बचाने तक सीमित नहीं रहती; वह वर्तमान के सामाजिक चरित्र की भी पड़ताल करती है।
          इसी विमर्श को कवि आधुनिक जीवन-शैली और उपभोक्तावादी आकांक्षाओं के सन्दर्भ में आगे बढ़ाता है-

"तपत रहल गाँव कऽ अदमी
सुख-सुविधा में बहल इ अदमी
पछिमा ठाट-बाट कऽ आगे
आपन कवनो ठाटे नइखे।"

यहाँ सुख-सुविधाओं की प्राप्ति और अपनी सांस्कृतिक पहचान के बीच तनाव सामने आता है। कवि आधुनिकता का निषेध नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर प्रश्न उठाता है, जो बाहरी जीवन-शैली को अपनाने में अपनी ही परम्पराओं और अनुभवों को तुच्छ समझने लगती है। सांस्कृतिक संकट तब पैदा होता है, जब परिवर्तन विवेकपूर्ण चयन के बजाय अन्धानुकरण बन जाता है। कविता की दृष्टि में विकास और सांस्कृतिक स्मृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। आधुनिक साधनों को अपनाते हुए भी स्थानीय ज्ञान, भाषा और सामाजिक सम्बन्धों को सुरक्षित रखा जा सकता है। इसीलिए कविता को आधुनिकता-विरोधी रचना कह देना उसके आशय को सीमित कर देना होगा। उसका वास्तविक आग्रह आधुनिकता के भीतर विवेक और सांस्कृतिक आत्मबोध की उपस्थिति है। इसी सन्दर्भ में टेलीविजन के प्रभाव पर कवि का व्यंग्य उल्लेखनीय है-

"जगह-जगह टी.वी. नाचत बा
नाच-नाच जहर बाँटत बा
अइसन लूझल गाँव लपटि के
मरि-मरि पियत अघाते नइखे।"

यहाँ 'जहर' का प्रयोग आधुनिक माध्यमों से प्रसारित सामग्री के अन्धाधुन्ध प्रभाव के प्रति कवि की आशंका को व्यक्त करता है। इसे किसी तकनीक के पूर्ण निषेध के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विवेक के क्षरण पर की गई टिप्पणी के रूप में पढ़ना अधिक उचित है। कोई भी माध्यम अपने आप में संस्कृति का शत्रु नहीं होता; उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि समाज उससे किस प्रकार संवाद करता है। अनन्त जी की कविता का प्रश्न यह है कि क्या बाहरी प्रभावों को ग्रहण करते समय गाँव अपनी सांस्कृतिक चेतना को भी सक्रिय रखता है, या आकर्षण में बहकर अपनी पहचान से दूर होता जाता है। यह प्रश्न आज के डिजिटल परिवेश में भी उतना ही प्रासंगिक है, जहाँ सूचना और मनोरंजन की उपलब्धता के साथ विवेकपूर्ण चयन की आवश्यकता भी बढ़ गई है।
इस प्रकार 'गँउवों गाँव बुझाते नइखे' को केवल पुरानी वस्तुओं की सूची, ग्रामीण जीवन का चित्र या अतीत का शोकगीत मानना इसकी रचनात्मक व्यापकता को सीमित करना होगा। कविता का वास्तविक संगठन तीन स्तरों पर काम करता है। पहले स्तर पर वह लुप्त होती वस्तुओं, शब्दों और परम्पराओं को दर्ज करती है; दूसरे स्तर पर उनके पीछे मौजूद श्रम, सामाजिक सम्बन्ध और जीवन-पद्धति को स्मृति में पुनर्स्थापित करती है; और तीसरे स्तर पर वर्तमान विकास-दृष्टि से यह प्रश्न पूछती है कि परिवर्तन की प्रक्रिया में मनुष्य क्या बचा रहा है और क्या खो रहा है। यही त्रिस्तरीय संरचना इसे लोक-संस्कृति का दस्तावेज होने के साथ आलोचनात्मक कविता भी बनाती है। परिगणन शैली का विस्तार केवल शब्दों की बहुतायत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक क्षरण के बहुस्तरीय स्वरूप को उजागर करने की युक्ति है। हर नई वस्तु या परम्परा के उल्लेख से लोप का दायरा विस्तृत होता है और अन्ततः पाठक के सामने एक समग्र जीवन-संसार की अनुपस्थिति आकार ग्रहण करती है।
          इस कविता की एक अन्य उपलब्धि यह है कि वह दो पीढ़ियों के बीच संवाद की सम्भावना बनाती है। पुरानी पीढ़ी के पाठक इसमें अपने जीवन के अनुभवों और परिचित वस्तुओं को पहचान सकते हैं; नई पीढ़ी के लिए यह उस सांस्कृतिक संसार का परिचय है, जिसे उसने शायद प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा। इस तरह कविता स्मृति को केवल निजी अनुभव नहीं रहने देती, बल्कि उसे पीढ़ियों के बीच हस्तान्तरित होने योग्य सांस्कृतिक सामग्री में बदल देती है। भोजपुरी भाषा के शब्द-वैभव, ग्रामीण समाज के परिवर्तन, पारम्परिक कृषि-ज्ञान और लोकाचार के अध्ययन की दृष्टि से भी यह रचना उपयोगी है। 'गँउवों गाँव बुझाते नइखे' को वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर के भोजपुरी पाठ्यक्रम में स्थान मिलना इसकी साहित्यिक और शैक्षिक प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। पाठ्यक्रम में इसका अध्ययन विद्यार्थियों को केवल कविता की भाषा और छन्द से परिचित नहीं कराता, बल्कि उन्हें लोक-संस्कृति के दस्तावेजीकरण और आधुनिक समाज के सांस्कृतिक प्रश्नों पर विचार करने का अवसर भी देता है।
         अनन्तदेव पाण्डेय 'अनन्त' के निधन के बाद उनकी कविता को पढ़ना उनकी स्मृति के साथ-साथ अपने समय को समझने का भी अवसर है। उन्होंने जिस सांस्कृतिक क्षरण को दर्ज किया, वह किसी एक गाँव या एक पीढ़ी तक सीमित नहीं है। आज भी ग्रामीण समाज में तकनीक, बाजार, शिक्षा, रोजगार और जीवन-शैली के कारण परिवर्तन हो रहे हैं। इनमें से अनेक परिवर्तन आवश्यक और सकारात्मक हैं; प्रश्न यह है कि उनके साथ स्थानीय भाषाओं, पारम्परिक ज्ञान और सामुदायिक स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए हम क्या कर रहे हैं। अनन्त जी की कविता हमें अतीत में लौटने का निर्देश नहीं देती; वह अतीत से प्राप्त अनुभवों के सहारे वर्तमान को अधिक विवेकपूर्ण ढंग से समझने की प्रेरणा देती है। यही उसका स्थायी साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्त्व है।
          अपने मूल आलेख में मैंने 'गँउवों गाँव बुझाते नइखे' को लोक-संरक्षण की विराट चेष्टा कहा था। आज उनके न रहने पर इस कथन का आशय और स्पष्ट होता है। अनन्त जी ने उन शब्दों, वस्तुओं और व्यवहारों को कविता में सुरक्षित किया, जिनके लुप्त होने पर उनके साथ जुड़ी स्मृतियाँ भी विस्मृत हो सकती थीं। उनका अवदान केवल इतना नहीं कि उन्होंने एक बदलते गाँव का चित्र खींचा; उन्होंने उस परिवर्तन के सांस्कृतिक अर्थ को पहचानने की दृष्टि दी। उनकी कविता हमें सिखाती है कि लोक-संस्कृति को बचाना अतीत की हर वस्तु को ज्यों-का-त्यों बनाए रखना नहीं, बल्कि अपने समाज के अनुभव, ज्ञान, भाषा और आत्मीयता को समझते हुए भविष्य तक पहुँचाना है। मैं अनन्त जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। उनकी कविता भोजपुरी साहित्य में लोक-स्मृति के संरक्षण का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों को अपने गाँव, अपनी भाषा और अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति सजग करती रहे,यही उनके प्रति सच्ची साहित्यिक श्रद्धांजलि होगी।
                           ०००
                             - डॉ. अक्षय पाण्डेय 
                                 शिवपुरी काॅलोनी 
                                गाजीपुर- 233001
                              मो.नं.- 8887899462