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रविवार, 30 अगस्त 2026

क्या जातिविहीन समाज संभव है: एक विमर्श- लेखक डॉ. श्रीकान्त पाण्डेय

"क्या जातिविहीन समाज संभव है: एक विमर्श"

भारत की स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति की घटना नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न भी थी जिसमें मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, उसकी नागरिकता, प्रतिभा, श्रम और मानवीय गरिमा से तय हो। स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक मंच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनी और उसकी विशेषता यह थी कि उसमें अनेक विचारधाराओं, सामाजिक समूहों और राजनीतिक प्रवृत्तियों का संगम था। गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाषचंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, आंबेडकर सहित अनेक धाराओं के लोगों ने अलग-अलग दृष्टियों से आधुनिक भारत की कल्पना को आकार दिया। इसलिए स्वतंत्र भारत का संविधान किसी एक व्यक्ति या एक विचारधारा की कृति नहीं, बल्कि संविधान सभा की दीर्घ बहसों, समितियों, उपसमितियों और विभिन्न राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टियों के बीच बनी सामूहिक सहमति का परिणाम था। डॉ. भीमराव आंबेडकर इस विराट प्रक्रिया के प्रमुख शिल्पकारों में अवश्य थे, लेकिन संविधान को केवल उनका बनाया हुआ कहना उसके सामूहिक चरित्र को सीमित करना होगा।

आंबेडकर का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है कि उन्होंने भारतीय समाज की उस सबसे गहरी बीमारी को स्वयं भोगा था जिसे हम जाति और अस्पृश्यता के नाम से जानते हैं। उन्होंने जाति को केवल सामाजिक विभाजन नहीं माना, बल्कि इसे मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के रास्ते में मूल बाधा के रूप में देखा। उनकी प्रसिद्ध अवधारणा थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिकाऊ नहीं हो सकता जब तक सामाजिक लोकतंत्र उसके साथ न हो। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व उनके लिए अलग-अलग मूल्य नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए लोकतांत्रिक जीवन के आधार थे। इसी कारण उनका लक्ष्य केवल दलितों को कुछ सुविधाएं दिलाना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक संरचना को बदलना था जिसमें जन्म मनुष्य की सामाजिक हैसियत निर्धारित करता है।

यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अंतर समझना आवश्यक है। आंबेडकर ने वंचित वर्गों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और रोजगार में अवसर तथा राज्य की सक्रिय भूमिका का समर्थन किया, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य जातियों को स्थायी राजनीतिक पहचान में बदलना नहीं था। उनकी 1945 की पुस्तक "States and Minorities" में राज्य समाजवाद और आर्थिक लोकतंत्र की एक विस्तृत रूपरेखा दिखाई देती है, लेकिन उसे भारतीय संविधान का प्रत्यक्ष और पूर्णतः अंगीकृत स्वरूप मानना ठीक नहीं होगा। इसी प्रकार संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रतिनिधित्व तथा सेवाओं में विशेष प्रावधान ऐतिहासिक वंचना को दूर करने के उपाय थे, जाति व्यवस्था को स्थायी बनाने की घोषणा नहीं।

आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी इसी जटिलता को समझने में सहायता करती है। ब्रिटिश काल में पृथक निर्वाचक मंडलों और प्रतिनिधित्व की बहस से लेकर कम्युनल अवॉर्ड और फिर पूना पैक्ट तक वंचित समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न विकसित हुआ। स्वतंत्र भारत में संविधान ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सेवाओं में विशेष अवसरों की व्यवस्था की। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए भी संवैधानिक आधार निर्मित किया गया। अनुच्छेद 15 और 16 में विशेष प्रावधानों की गुंजाइश तथा नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 46 राज्य को कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की विशेष देखभाल का दायित्व देता है। बाद में मंडल आयोग और उसके क्रियान्वयन ने पिछड़े वर्गों के आरक्षण को भारतीय राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बना दिया।

विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक असमानता को कम करके अंततः समान अवसर का समाज बनाना था, वही धीरे-धीरे स्वयं राजनीतिक लामबंदी का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम बन गई। जाति समाप्त होने के बजाय जातीय पहचान अधिक संगठित होती गई। प्रत्येक समुदाय अपने महापुरुष, अपना इतिहास, अपनी संख्या और अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी खोजने लगा। लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व स्वाभाविक रूप से आवश्यक है, लेकिन जब प्रतिनिधित्व का प्राथमिक आधार नागरिकता के बजाय जातीय गणित बन जाए, तब लोकतंत्र सामाजिक न्याय का साधन होने के साथ-साथ पहचान की प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन सकता है।

आज भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा इसी विरोधाभास के भीतर काम कर रहा है। एक ओर संविधान जाति-विहीन समान नागरिकता की दिशा दिखाता है, दूसरी ओर चुनावी राजनीति जातीय पहचान को संगठित करके सत्ता में हिस्सेदारी का रास्ता बनाती है। हर राजनीतिक दल जातीय सामाजिक समीकरणों की गणना करता है और लगभग हर बड़ा सामाजिक समूह अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संख्या के अनुपात में देखने लगा है। इसे सामाजिक सहभागिता और प्रतिनिधित्व का नाम देना कुछ हद तक उचित है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम अंततः ऐसी राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें जाति कमजोर होगी या और अधिक राजनीतिक रूप से संस्थाबद्ध होगी?

आरक्षण के प्रश्न को भी इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। आरक्षण को केवल सुविधा या विशेषाधिकार समझना ऐतिहासिक अन्याय की उपेक्षा होगी। सदियों की सामाजिक वंचना को केवल वर्तमान आय से नहीं मापा जा सकता। दूसरी ओर यह प्रश्न भी वैध है कि क्या आरक्षण अनंतकाल तक उसी रूप में चलता रहना चाहिए और क्या आर्थिक तथा शैक्षणिक रूप से अपेक्षाकृत सशक्त परिवारों तथा अत्यंत वंचित परिवारों के बीच पर्याप्त अंतर किया जाना चाहिए। यहां सामाजिक पिछड़ेपन, ऐतिहासिक भेदभाव, आर्थिक स्थिति, शिक्षा और अवसरों के वास्तविक अभाव को साथ रखकर अधिक सूक्ष्म नीति की आवश्यकता है। आरक्षण और व्यापक सामाजिक संरक्षण को एक ही चीज मानना भी उचित नहीं होगा। आरक्षण प्रतिनिधित्व का एक औजार है, जबकि सामाजिक संरक्षण का दायरा शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, कौशल, रोजगार और आर्थिक सुरक्षा तक फैला हुआ है।

इस पूरे प्रश्न का एक दूसरा पक्ष भारत की बदलती अर्थव्यवस्था है। स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशकों में राज्य एक बड़े नियोक्ता, नियोजक और कल्याणकारी संस्था के रूप में उपस्थित था। सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी नौकरियां सामाजिक गतिशीलता का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं। लेकिन उदारीकरण के बाद अर्थव्यवस्था में बाजार की भूमिका तेजी से बढ़ी और आज सरकारी रोजगार की तुलना में निजी क्षेत्र का महत्व बहुत अधिक है। सरकारी नौकरियों का आकार सीमित होता जा रहा है, जबकि आरक्षण की राजनीति मुख्यतः उन्हीं अवसरों के इर्द-गिर्द घूमती है। परिणाम यह है कि जिस रोजगार क्षेत्र में अवसर सीमित हैं, उसी के लिए जातीय प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इससे स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति को केवल सरकारी नौकरियों के प्रतिशत तक सीमित रखने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, उद्यमिता, निजी क्षेत्र में निष्पक्ष अवसर और सामाजिक सुरक्षा तक क्यों नहीं विस्तारित किया जाए?

भारत का दूसरा बड़ा अंतर्विरोध धर्म और आधुनिकता के बीच दिखाई देता है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और आस्था को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन राज्य की दृष्टि से सभी नागरिक समान हैं। धार्मिक स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण में अनिवार्य विरोध नहीं है। व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक आस्था रखने की स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक नीति, शिक्षा, चिकित्सा, कानून और शासन का आधार प्रमाण, तर्क और वैज्ञानिक विवेक होना चाहिए। आस्था निजी जीवन में सम्मानित हो सकती है, लेकिन उसे वैज्ञानिक सत्य का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

यहीं आधुनिक भारत का एक अद्भुत अंतर्विरोध सामने आता है। हम अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, जैव प्रौद्योगिकी और आधुनिक चिकित्सा की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन सामाजिक चेतना के अनेक हिस्सों में मध्ययुगीन पहचानें अब भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। मनुष्य के पास स्मार्टफोन है, लेकिन सामाजिक संबंधों में जाति पूछी जाती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा होती है, लेकिन विवाह में गोत्र, जाति और समुदाय की सीमाएं खड़ी की जाती हैं। हम वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक जीवन में जन्म आधारित पहचान को अभी भी निर्णायक मानते हैं। यह आधुनिकता और मध्ययुगीन चेतना का असाधारण संगम है।

धर्म और जाति के प्रश्न को केवल हिंदू समाज तक सीमित करना भी ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं होगा। जाति जैसी सामाजिक संरचनाएं भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक समुदायों में विभिन्न रूपों में दिखाई देती रही हैं। बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं ने सामाजिक असमानताओं और कर्मकांडीय वर्चस्व के विरुद्ध महत्वपूर्ण वैकल्पिक दृष्टियां प्रस्तुत कीं, लेकिन सामाजिक जीवन से जातीय पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों में भी स्थानीय सामाजिक संरचनाओं का प्रभाव दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि जाति केवल किसी एक धर्म का धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि भारतीय समाज की एक गहरी सामाजिक संस्था है, जिसने धर्म की सीमाओं को भी अनेक बार पार किया है।

इसलिए जाति उन्मूलन का अर्थ किसी धर्म का विरोध करना नहीं हो सकता। इसका वास्तविक अर्थ जन्म आधारित सामाजिक श्रेणीकरण का अंत होना है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आस्था में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध रहना चाहता है तो उसे इसकी पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, नागरिक अधिकार, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक अवसर उसके जन्म से निर्धारित नहीं होने चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता और जाति उन्मूलन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि दोनों आधुनिक नागरिकता के अलग-अलग आयाम हैं।

अब प्रश्न यह है कि क्या कानून बनाकर जाति को समाप्त किया जा सकता है? यहां सावधानी जरूरी है। केवल सरनेम हटाने का कानून बना देने से जाति समाप्त नहीं होगी। नाम बदलने से सामाजिक संरचना नहीं बदलती। भारत में अनेक लोग बिना जातिसूचक उपनाम के रहते हैं और फिर भी उनकी जाति सामाजिक संबंधों, विवाह, स्थानीय नेटवर्क और कभी-कभी प्रशासनिक अभिलेखों से पहचानी जाती है। दूसरी ओर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे संवैधानिक संरक्षणों के लिए जातीय पहचान को प्रशासनिक रूप से दर्ज करना आवश्यक भी है। इसलिए एक तरफ जाति पहचान समाप्त करने की इच्छा और दूसरी तरफ ऐतिहासिक वंचना के उपचार के लिए जाति की पहचान की आवश्यकता, दोनों के बीच वास्तविक संवैधानिक तनाव मौजूद है।

अंतरजातीय विवाह इस समस्या का एक महत्वपूर्ण रास्ता अवश्य हो सकता है, लेकिन उससे भी जाति अपने आप समाप्त नहीं होती। भारतीय कानून में बच्चे की जाति का निर्धारण केवल इस सरल सिद्धांत से नहीं होता कि माता या पिता में से जो पालन-पोषण करे, बच्चे को उसी की जाति मिल जाएगी। विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय तथा प्रशासनिक नियमों ने परिस्थितियों, सामाजिक परिवेश और वास्तविक सामाजिक स्थिति को महत्व दिया है। इसलिए अंतरजातीय विवाह जाति की दीवार को कमजोर करने वाला महत्वपूर्ण सामाजिक माध्यम है, लेकिन उसके साथ कानूनी और सामाजिक परिस्थितियां भी जुड़ी हैं।

असल चुनौती यह है कि क्या हम जाति को केवल प्रशासनिक श्रेणी के रूप में सीमित कर सकते हैं और सामाजिक जीवन से धीरे-धीरे उसका प्रभाव समाप्त कर सकते हैं। शायद यही अधिक व्यावहारिक रास्ता होगा। जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानताएं बनी हुई हैं, तब तक ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों की पहचान मिटा देना न्यायपूर्ण नहीं होगा। लेकिन उस पहचान को स्थायी राजनीतिक अस्मिता बना देना भी जाति उन्मूलन के लक्ष्य के विपरीत जा सकता है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि संरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे कम हो और समान अवसरों की वास्तविकता धीरे-धीरे बढ़े।

इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं होगा। विद्यालयों में जाति आधारित अलगाव और भेदभाव पर कठोर निगरानी, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा, उच्च शिक्षा तक समान पहुंच, ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आर्थिक अवसर, अंतरजातीय विवाह को वास्तविक सामाजिक सुरक्षा, भेदभाव विरोधी प्रभावी संस्थाएं और श्रम की प्रतिष्ठा जैसे अनेक मोर्चों पर काम करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सरकारी व्यवस्था को जाति की पहचान का राजनीतिक उपयोग कम करने और नागरिक अधिकारों को अधिक सार्वभौमिक बनाने की दिशा में बढ़ना होगा।

हमें यह भी समझना होगा कि जाति केवल ऊपर से थोपी हुई व्यवस्था नहीं है। वह परिवार, विवाह, भोजन, सामाजिक संबंध, स्थानीय सत्ता और सांस्कृतिक स्मृति में भी पुनरुत्पादित होती है। इसलिए राज्य कानून बनाकर जाति की घोषणा तो प्रतिबंधित कर सकता है, लेकिन परिवार को यह नहीं सिखा सकता कि वह अपने बेटे या बेटी के विवाह के लिए जाति न पूछे। जाति का वास्तविक अंत तब होगा जब जाति सामाजिक लाभ और सम्मान की मुद्रा रहना बंद करेगी।

यही बात राजनीति पर भी लागू होती है। राजनीति किसी समूह को संगठित करती है और अक्सर उसके लिए एक साझा हित या साझा विरोधी का निर्माण करती है। यह लोकतंत्र का सामान्य तत्व है। समस्या तब शुरू होती है जब लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा नागरिक हितों के बजाय स्थायी जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण पर निर्भर हो जाए। तब बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, पर्यावरण, कृषि संकट, श्रमिक अधिकार और आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं और पहचान स्वयं राजनीतिक मुद्दा बन जाती है।

धर्म आधारित ध्रुवीकरण इस समस्या को और जटिल करता है। किसी भी धार्मिक समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन लोकतांत्रिक राज्य किसी एक धर्म की सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर आधारित नहीं हो सकता। भारतीय संविधान का मूल आग्रह नागरिक समानता है। बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का सम्मान और अल्पसंख्यक नागरिक की समान गरिमा, दोनों एक साथ संभव हैं। वास्तव में यही भारतीय धर्मनिरपेक्षता की कसौटी है।

भारत के सामने इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन सत्ता में है। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार का समाज बनना चाहते हैं। क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें मनुष्य पहले हिंदू, मुस्लिम, ब्राह्मण, दलित, यादव, राजपूत, कुर्मी, जाटव, कायस्थ या किसी अन्य पहचान का प्रतिनिधि हो और बाद में नागरिक? या ऐसी व्यवस्था जिसमें उसकी सामाजिक पहचान निजी और सांस्कृतिक स्तर पर रह सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उसकी प्राथमिक पहचान एक समान अधिकारों वाले भारतीय नागरिक की हो?

जाति उन्मूलन का अर्थ इतिहास को मिटाना नहीं है। इतिहास को याद रखना इसलिए आवश्यक है कि जिन अन्यायों ने समाज को बनाया, वे फिर न दोहराए जाएं। लेकिन इतिहास की स्मृति को स्थायी वैमनस्य में बदल देना भी उचित नहीं। सामाजिक न्याय का सर्वोच्च लक्ष्य यह होना चाहिए कि एक दिन आरक्षण की आवश्यकता स्वयं कम हो जाए, क्योंकि समाज में अवसर इतने समान हो चुके हों कि जन्म किसी की नियति तय न करता हो। उस दिन आरक्षण की समाप्ति किसी अधिकार की हार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की सफलता होगी।

इसी तरह वैज्ञानिक चेतना का अर्थ आस्था का दमन नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि सार्वजनिक जीवन में सत्य का निर्धारण तर्क, प्रमाण और अनुभव से हो। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या किसी अन्य धार्मिक स्थल में व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार जाए, लेकिन अस्पताल में इलाज विज्ञान से हो, विद्यालय में ज्ञान प्रमाण पर आधारित हो, न्यायालय में निर्णय संविधान और कानून से हो और सरकार की नीतियां आंकड़ों तथा तर्क पर आधारित हों। यही आधुनिकता का वास्तविक अर्थ है।

शायद स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी ऐतिहासिक चुनौती यही थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक स्वतंत्रता में बदला जाए। हमने विदेशी शासन समाप्त कर दिया, लेकिन जन्म आधारित असमानताओं को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सके। हमने लोकतंत्र स्थापित किया, लेकिन लोकतांत्रिक चेतना अभी भी पहचान की राजनीति से मुक्त नहीं हुई। हमने आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाया, लेकिन सामाजिक चेतना में अंधविश्वास और मध्ययुगीन पूर्वाग्रह अभी भी जीवित हैं। हमने संविधान में समानता लिख दी, लेकिन सामाजिक व्यवहार में समानता अभी अधूरी है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी जाति के विरुद्ध अभियान की नहीं, बल्कि जाति की सामाजिक उपयोगिता समाप्त करने की है। आवश्यकता किसी धर्म को कमजोर करने की नहीं, बल्कि धर्म को निजी आस्था और नागरिकता को सार्वजनिक समानता के क्षेत्र में रखने की है। आवश्यकता आरक्षण को अचानक समाप्त करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यापक सामाजिक और आर्थिक नीतियां बनाने की है जिनसे एक दिन आरक्षण की आवश्यकता ही न्यूनतम रह जाए। आवश्यकता पहचान को मिटाने की नहीं, बल्कि पहचान को अधिकार और अवसर का स्थायी आधार बनने से रोकने की है।

भारत यदि वास्तव में 21वीं सदी की वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और विकसित सभ्यता बनना चाहता है तो उसे केवल सड़कों, पुलों, डिजिटल तकनीक और सकल घरेलू उत्पाद में आधुनिक नहीं होना होगा। उसे अपनी सामाजिक चेतना में भी आधुनिक होना पड़ेगा। आधुनिक राष्ट्र वह नहीं जिसमें केवल मशीनें आधुनिक हों, बल्कि वह है जिसमें मनुष्य का मूल्य जन्म से ऊपर हो, श्रम को सम्मान मिले, स्त्री और पुरुष समान नागरिक हों, शिक्षा और स्वास्थ्य अधिकार की तरह उपलब्ध हों, धर्म व्यक्ति की स्वतंत्रता हो और राज्य किसी धर्म, जाति या समुदाय की श्रेष्ठता का उपकरण न बने।

भारत की वास्तविक राष्ट्रीय चेतना शायद वहीं से जन्म लेगी जहां जातीय अस्मिता और धार्मिक पहचान के ऊपर नागरिकता की समान पहचान खड़ी होगी। तब राजनीति जातीय जोड़-घटाव और धार्मिक ध्रुवीकरण से निकलकर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, उत्पादकता, श्रम की प्रतिष्ठा, वैज्ञानिक सोच और विवेकपूर्ण आर्थिक समानता जैसे वास्तविक प्रश्नों पर केंद्रित हो सकेगी। तब विकास केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा का विस्तार होगा।

स्वतंत्रता आंदोलन ने हमें राजनीतिक आजादी दी, संविधान ने हमें समान नागरिक बनने का रास्ता दिया। अब अगली ऐतिहासिक यात्रा सामाजिक मुक्ति की है। जाति से मुक्ति, भेदभाव से मुक्ति, अंधविश्वास से मुक्ति और उस राजनीति से मुक्ति जो नागरिक को पहले किसी समूह का सदस्य और बाद में मनुष्य मानती है। यही वह अधूरा काम है जिसे पूरा किए बिना आधुनिक भारत की परियोजना पूरी नहीं होगी। और शायद आंबेडकर की सबसे बड़ी प्रासंगिकता भी आज यही है कि संविधान को केवल पढ़ा न जाए,
बल्कि उसके मूल आदर्शों, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय को सामाजिक जीवन का वास्तविक आधार बनाया जाए।

डॉ. श्रीकान्त पाण्डेय
अव.प्राप्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र
पी. जी. कॉलेज
गाजीपुर ( उत्तर प्रदेश )


सोमवार, 24 अगस्त 2026

Muscular Dystrophy में LGMD क्या है

Muscular Dystrophy में LGMD क्या है?

LGMD (Limb-Girdle Muscular Dystrophy) मांसपेशियों की एक आनुवंशिक (Genetic/वंशानुगत) बीमारी है। इसमें मुख्य रूप से शरीर के केंद्र के पास की मांसपेशियाँ—विशेषकर कंधे, ऊपरी भुजाएँ, कूल्हे और जांघें—धीरे-धीरे कमजोर होती हैं और उनका आकार कम हो सकता है। यह पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित कर सकती है।

1. LGMD के मुख्य लक्षण

  • चलने और दौड़ने में कठिनाई
  • सीढ़ियाँ चढ़ने में परेशानी
  • जमीन या कुर्सी से उठने में हाथों का सहारा लेना
  • कूल्हे और जांघों की कमजोरी
  • कंधों और बाजुओं की कमजोरी
  • बार-बार गिरना या संतुलन में परेशानी
  • चलने का ढंग बदलना, जैसे डगमगाकर चलना
  • मांसपेशियों का धीरे-धीरे कमजोर या पतला होना
  • कुछ प्रकारों में पिंडलियों की मांसपेशियाँ बड़ी दिखाई दे सकती हैं
  • कुछ LGMD प्रकारों में हृदय और श्वसन मांसपेशियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं।

2. LGMD क्यों होता है?

LGMD किसी एक बीमारी का नाम नहीं, बल्कि कई आनुवंशिक मांसपेशी रोगों का समूह है। अलग-अलग जीन में परिवर्तन (mutation) के कारण मांसपेशियों के लिए आवश्यक प्रोटीन ठीक से काम नहीं कर पाते। इससे समय के साथ मांसपेशियों की कमजोरी बढ़ सकती है। 30 से अधिक आनुवंशिक प्रकार पहचाने जा चुके हैं।

3. LGMD के प्रकार

वर्तमान नामकरण में इन्हें मुख्यतः दो समूहों में समझा जाता है:

  • LGMD-D (Dominant): दोषपूर्ण जीन की एक प्रति से बीमारी हो सकती है।
  • LGMD-R (Recessive): आमतौर पर संबंधित जीन की दोनों प्रतियों में परिवर्तन होने पर बीमारी होती है।

पुराने नाम जैसे LGMD1 और LGMD2 भी कई पुरानी रिपोर्टों में मिलते हैं। उदाहरण के लिए, पुराने LGMD2A को नए नामकरण में LGMD R1 calpain3-related कहा जाता है।

4. LGMD की शुरुआत किस उम्र में होती है?

यह बीमारी बचपन, किशोरावस्था या वयस्क अवस्था में शुरू हो सकती है। शुरुआत की उम्र और बीमारी की गति उसके विशिष्ट आनुवंशिक प्रकार पर निर्भर करती है। कुछ प्रकार बहुत धीरे बढ़ते हैं, जबकि कुछ में कमजोरी अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ सकती है।

5. LGMD की जाँच कैसे होती है?

सही निदान के लिए आमतौर पर निम्न जाँचों का उपयोग किया जा सकता है:

  1. न्यूरोलॉजिस्ट/न्यूरोमस्कुलर विशेषज्ञ द्वारा शारीरिक परीक्षण
  2. CK या CPK (Creatine Kinase) रक्त जाँच — मांसपेशियों के नुकसान का संकेत दे सकती है, लेकिन केवल CK से LGMD का प्रकार निश्चित नहीं होता।
  3. Genetic Testing / NGS Gene Panel — आज LGMD के प्रकार की पुष्टि में बहुत महत्वपूर्ण है।
  4. आवश्यकता होने पर EMG/NCS
  5. Muscle MRI
  6. कुछ मामलों में Muscle Biopsy
  7. विशेष प्रकार के अनुसार ECG, Echocardiography तथा Pulmonary Function Test (PFT) भी किए जा सकते हैं।

महत्वपूर्ण बात

LGMD का सही subtype जानने के लिए Genetic Test सबसे महत्वपूर्ण जाँचों में से एक है। इससे रोग की प्रकृति, संभावित हृदय/फेफड़े की जटिलताओं और परिवार के अन्य सदस्यों के आनुवंशिक जोखिम को समझने में मदद मिलती है।

6. क्या LGMD का इलाज है?

अभी अधिकांश LGMD प्रकारों के लिए ऐसा एक सार्वभौमिक उपचार उपलब्ध नहीं है जो हर व्यक्ति में बीमारी को पूरी तरह समाप्त कर दे। उपचार मुख्यतः लक्षणों, कार्यक्षमता और जटिलताओं के प्रबंधन पर आधारित होता है।

उपचार और देखभाल में शामिल हो सकते हैं:

  • विशेषज्ञ की सलाह से फिजियोथेरेपी और सुरक्षित व्यायाम
  • मांसपेशियों और जोड़ों की गति बनाए रखना
  • जरूरत पड़ने पर walking aid, brace, wheelchair या अन्य सहायक उपकरण
  • गिरने से बचाव
  • नियमित हृदय जाँच, यदि subtype में हृदय जोखिम हो
  • श्वसन क्षमता की जाँच, यदि subtype में जोखिम हो
  • पोषण, वजन और दैनिक गतिविधियों का उचित प्रबंधन
  • न्यूरोलॉजिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट आदि की multidisciplinary care।

7. क्या सभी LGMD रोगियों की स्थिति एक जैसी होती है?

नहीं। LGMD में व्यक्ति-विशेष और subtype के अनुसार बहुत अंतर हो सकता है। किसी व्यक्ति में बीमारी धीरे बढ़ सकती है, जबकि दूसरे में कमजोरी अधिक तेजी से बढ़ सकती है। इसलिए केवल नाम “LGMD” के आधार पर भविष्य की स्थिति बताना उचित नहीं है; exact genetic subtype जानना आवश्यक होता है।

संक्षेप में

LGMD = कंधे और कूल्हे के आसपास की मांसपेशियों को प्रमुख रूप से प्रभावित करने वाली आनुवंशिक Muscular Dystrophy का समूह।

सबसे महत्वपूर्ण कदम:
CK/CPK रिपोर्ट + Genetic Test की रिपोर्ट + वर्तमान लक्षण को किसी अनुभवी Neurologist या Neuromuscular specialist को दिखाकर exact LGMD subtype की पुष्टि कराना।

CK/CPK, Genetic Test, Muscle Biopsy या किसी अन्य जाँच की रिपोर्ट है,  उसे LGMD की पूर्ण रूप से पुष्टि की जा सकती है



जातिगत आरक्षण को हटाने के लिए सामान्य वर्ग का कोई भी सांसद विधायक और नेता सामने नहीं आया- लव तिवारी गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

देश में हिन्दुत्व के होल सोल ब्रैंड अंबेसडर, सामान्य वर्ग को सरकार ने लात मार मारकर ये समझाया कि देशभक्ति नहीं जाति भक्ति करने में ही फायदा है । जब मोदी जी का दिल आया गधी पर... तो परी क्या चीज है ?

मित्रों हिन्दू धर्म बड़े खतरे में है । ये समय था कि हम सभी लोग गजवा-ए-हिंद के खिलाफ तैयारी करते लेकिन अफसोस कि हिन्दुओं ने एकजुट होकर जिसको अपना नेता बनाया, उस नेता ने ही हिन्दू एकता की पीठ में छुरा घोंप दिया । कई सदियों के बाद हिंदुओं को प्रचंड सत्ता मिली, लेकिन जिनको सत्ता दी गई वो चढ़ावा चोरी जैसे घृणित कामों में लिप्त पाए गए । ये राम मंदिर की मर्यादा 5 साल तक भी अक्षुण्ण नहीं रख सके, हिंदुत्व तो बहुत बड़ा विषय है और बहुत गंभीर जटिल मुद्दे हैं ।

जब से देश की राजनीति हिंदुत्व के दौर में प्रवेश करती है।
तो सिर्फ सामान्य वर्ग की जातियां ही ऐसी थी जिन्होंने जाति भक्ति छोड़कर राष्ट्रभक्ति और हिंदुत्व भक्ति के नाम पर बीजेपी को वोट दिया। बाकी हर जाति ने अपनी अपनी पार्टी बनाई और अपने ही वर्ग की अन्य जातियों से गठजोड़ करके मुख्यमंत्री के पद तक भी पहुंच गए ।

जैसे यादवों ने अपनी पार्टी बनाई सपा और आरजेडी

जाटवों ने अपनी पार्टी बनाई बसपा

यूपी, राजस्थान और हरियाणा में जाट लोगों ने भी अपनी अलग अलग पार्टियां बनाई, RLD इत्यादि

उत्तर प्रदेश में कुर्मियों ने बनाया अपना दल

राजभरों ने बनाई सुहलदेव समाज पार्टी

बिहार के पासवानों ने बनाई LJP

बिहार के कुर्मियों ने जनता दल

यूपी में निषादों की भी अलग पार्टी है ।

सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण... सोचने लायक बात यह है की लाख कोशिशों के बाद भी बीजेपी इन जाति के लोगों को हिंदुत्व के नाम पर अपनी पार्टी के अंदर विलय कराने में कामयाब नहीं हो सकी । इन जातियों में जाति भक्ति इतनी ज्यादा है कि ये अगर बीजेपी में आए भी तो अपनी पार्टी के गठबंधन के साथ ही आए। इन जातियों के नेता भी सत्ता की मलाई काटने के लिए बीजेपी के साथ हो लिए, लेकिन आज भी हिंदुत्व पर इनकी जुबान नहीं खुलती है ।

अब हिंदुत्व के लिए इतने लंबे समय से बैटिंग करने का काम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कर रहे थे और सही मायने में गजवा ए हिंद से मुकाबला करने के लिए देश को तैयार करने में जी जान से लगे हुए थे तब इन सभी सामान्य वर्ग की जातियों की पीठ में मोदी जी ने यूजीसी लाकर छुरा घोंप दिया । जब सामान्य वर्ग की नींद टूटी तो उसको समझ में आया कि हिंदुत्व की घुट्टी पिलाकर उसके साथ बड़ा अन्याय किया जा रहा है। अब ये सब जातीय बवाल और जन भावनाओं के उफान को रोकना हमारे हाथ में नहीं है, सरकार ने हिमालयन ब्लंडर किया है । दुख इसी बात का है, ये सब जो हो रहा है इसकी टाइमिंग बहुत खराब है ये समय हिंदुओं को तैयार करने का था लेकिन मोदी ने आपस में हिंदुओं को ही लड़वाकर देश के इस्लामीकरण का रास्ता खोल दिया ।

अगर मोदी और संघ चाहते तो यादव, कुर्मी, पासवान अन्य सभी जातियों में मौजूद ऐसे महानायकों को आदर्श बना सकते थे जिन्होंने मुगलों के खिलाफ महान युद्ध लड़े और हिन्दुत्व के आदर्श स्थापित किए लेकिन बीजेपी और मोदी ने ऐसे अंग्रेजों के पिट्ठुओं को अपना आदर्श बना लिया है जो अपनी किताबों में ये लिखते हैं कि ब्रह्मा जी रंडीबाज थे ।

यानी जब मोदी जी का दिल आया गधी पर तो परी क्या चीज है?
और यही आज इस वक्त देश का दुर्भाग्य है और देश की बड़ी विडंबना भी है ।

विदुर नीति में विदुर लिखते हैं कि जहर एक व्यक्ति को मार सकता है, लेकिन राजा की एक गलत नीति पूरे राष्ट्र का संहार कर सकती है ।

तो अगर इस राष्ट्र को बचाना चाहते हो तो इसका एक ही उपाय है इस त्रिपुंडधारी फर्जी चक्रवर्ती सम्राट को उखाड़ फेंकने के लिए भीषण संकल्प लो और किसी योग्य हिन्दू नेता को आगे कर समाज में फिर से समरसता का माहौल स्थापित करो और सब जातियों में बराबरी स्थापित करो। किसी के साथ कोई अन्याय ना हो । किसी का तुष्टीकरण न हो । क्योंकि हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, कहीं जाति की लड़ाई में हम वो अमूल्य समय ना खो दें जो इस राष्ट्र को बचाने के लिए आवश्यक है ।
साभार

- लव तिवारी





शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

लावारिस लाशो के वारिस- आदरणीय श्री कुंवर वीरेंद्र सिंह जी गाजीपुर उत्तर प्रदेश

गाजीपुर की एक सड़क...
बारिश... अंधेरा... और एक लावारिस लाश

लोग बहुत थे। पर तमाशा देख रहे थे।
फोन एक का बजा।
"वीरेंद्र भैया... आ जाइए"

25 मिनट में भीगते हुआ पहुंचा।

भीड़ बोली - *"पुलिस आएगी, पंचनामा होगा"*
वो बोला - *"3 घंटे हो गए। सड़ रही है। पहले मर्चेंरी मे रखा जाएगा, फिर कागज बनेगा"*

पुलिस के सहयोग से उठाया... और चल दिया।


वो कौन था?
नाम - कुंवर वीरेंद्र सिंह
पहचान - "लावारिसों का वारिस"

कहानी क्या है?

2015... Tata Memorial।
माँ कैंसर का इलाज शुरू हुआ और इलाज के दौरान 8 अक्टूबर 2018को मृत्यु हो गईं। माँ के आखिरी शब्द थे - *"बेटा... अकेला मत छोड़ना किसी को"*

उसी दिन वीरेंद्र ने दुनिया की हर लाश को "माँ" कह दिया।

*14 साल से हिसाब लगाइए...*

*रातें* = जागते हुए बीतीं
*त्योहार* = शमशान में बीते
*रिश्ते* = लावारिसों के साथ बने
*पैसे* = मिट्टी, लकड़ी, कफन में उड़े

*हिन्दू है* - तो _कृष्ण कुमार, जमुना, भोले नाथ, रविन्द्र, रामू_ के साथ मुखाग्नि
*मुस्लिम है* - तो _अतीक, गुड्डू, शेर अली, नौसाद_ के साथ जनाजा

72 घंटे इंतजार।
पहचान न हो तो भी... नाम "इंसान" लिखकर संस्कार।

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एक पत्रकार ने पूछा - "डर नहीं लगता?"*
वीरेंद्र हंसे और बोले- *"68 बार रक्तदान कर चुका हूँ।"
बोले - "डर उस दिन लगा था जब माँ तड़प रही थी और मैं कुछ नहीं कर पाया।
आज डरने की उम्र नहीं रही... निभाने की उम्र है"

गाजीपुर के कई नेताओ ने कहा - "राजनीति कर रहे हो?"
वीरेन्द्र बोले - *"राजनीति लाशों से नहीं होती सर।
राजनीति वोट से होती है। मैं तो बस दुआ कमा रहा हूं"*

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सबसे बड़ी बात क्या है पता है?

वीरेंद्र जी शादी नहीं किए।
बोले - "बीवी-बच्चे होंगे तो रात 2 बजे लाश के पास कैसे जाऊंगा?
मेरी शादी तो इंसानियत से हो चुकी हैं।"
उनका बस एक सपना है...

"जब मैं मरूं ना...
तो मेरी अर्थी पर कोई रोए नहीं।
बल्कि हजारों कहें - 'ये वही है जिसने मेरे बाप का कोई कहे मेरे माँ अन्तिम दाह संस्कार किया था'"

"मरूं तो लोगों के दिलों में बसूं"

_जय माशान बाबा_
_कुंवर वीरेंद्र सिंह - गाजीपुर_



मंगलवार, 11 अगस्त 2026

चालीस के बाद- 11 अगस्त जन्मदिवस विशेष लेखक लव तिवारी

चालीस के बाद

एक उम्र के बाद
आदमी को कुछ नहीं चाहिए होता
न कोई जीत,
न कोई प्रमाण,
न कोई ताली।

बस एक ऐसी जगह चाहिए होती है
जहाँ उससे कोई सवाल न किया जाए।

जहाँ उसे हर बात के लिए
अपने होने का कारण न बताना पड़े।

शायद चालीस के आसपास
आदमी पहली बार समझता है
कि थकान शरीर में नहीं होती,
थकान उन तमाम जवाबों में होती है
जो उसने पूरी ज़िंदगी देते-देते जमा कर लिए हैं।

बचपन में
माँ ने पूछा
“इतनी देर से क्यों आए?”

पिता ने पूछा
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”

स्कूल ने पूछा
“कितने नंबर आए?”

रिश्तेदारों ने पूछा
“बड़े होकर क्या बनोगे?”

और वह हर बार
एक नया जवाब लेकर खड़ा हो गया।

फिर जवानी आई।

तब सवाल बदल गए

“कमा कितना लेते हो?”

“कहाँ काम करते हो?”

“अपना घर कब होगा?”

“शादी कब करोगे?”

“बच्चे कब होंगे?”

और उसने फिर
अपनी ज़िंदगी को
उन सवालों के हिसाब से काट-छाँटकर
एक ऐसा आदमी बनाने की कोशिश की
जिसे दुनिया स्वीकार कर सके।

फिर प्रेम आया।

वहाँ सवाल और कठिन थे

“तुम मुझसे कितना प्यार करते हो?”

“तुम्हें मेरी परवाह क्यों नहीं दिखती?”

“तुमने ऐसा क्यों कहा?”

“तुमने वैसा क्यों नहीं किया?”

और उसने सीखा
कि कभी-कभी प्यार करने से ज्यादा मुश्किल होता है
अपने प्यार को समझाना।

उसने समझाया।

बहुत समझाया।

कभी शब्दों से,
कभी चुप रहकर,
कभी अपनी गलतियाँ मानकर,
कभी अपनी सही बात छोड़कर।

फिर घर आया।

फिर बच्चे आए।

फिर जिम्मेदारियाँ आईं।

फिर उसने जाना
कि पुरुष होना शायद
हर बार मजबूत होने का नाम नहीं है

बल्कि
हर बार टूटकर भी
सुबह उठ जाने का नाम है।

वह गिरा भी होगा,
डरा भी होगा,
कई रातें ऐसी भी रही होंगी
जब उसने छत को देखते हुए सोचा होगा

“क्या मैं सही कर रहा हूँ?”

लेकिन सुबह
उसने वही चेहरा पहना
जिस पर सबको भरोसा था।

क्योंकि घर में
पिता का डर
बच्चों के लिए कोई विकल्प नहीं होता।

उसने कमाया।

हार गया।

फिर कमाया।

कुछ लोगों को खोया।

कुछ रिश्ते बचाए।

कुछ रिश्तों को
बहुत कोशिश करके भी नहीं बचा पाया।

कुछ दोस्त
सिर्फ़ पुराने फोटो में रह गए।

कुछ सपने
बैंक बैलेंस, EMI, स्कूल फीस
और जिम्मेदारियों के नीचे दब गए।

और कुछ सपने
आज भी उसके भीतर
चुपचाप साँस लेते हैं।

फिर चालीस आई।

और अचानक
उसे एहसास हुआ

अब वह हर बात का जवाब नहीं देना चाहता।

किसी ने गलत समझ लिया
तो समझ लिया।

किसी ने उसकी नीयत पर शक किया
तो किया।

किसी को उसका मौन अहंकार लगा
तो लगे।

किसी को उसका व्यस्त रहना बेरुखी लगा
तो लगे।

अब उसमें
हर गलतफहमी को ठीक करने की ऊर्जा नहीं बची।

क्योंकि उसने पूरी ज़िंदगी
लोगों को समझाते हुए बिताई है
कि वह बुरा नहीं है।

अब वह बस इतना जानता है

जिसे मेरे साथ रहना है,
वह मेरे मौन को भी पढ़ लेगा।

और जिसे हर बार
मेरे शब्दों की गवाही चाहिए,
शायद उसे मैं कभी समझा ही नहीं पाऊँगा।

चालीस के बाद
पुरुष प्रेम करना नहीं छोड़ता।

बस प्रेम का शोर छोड़ देता है।

वह अब
किसी के पीछे भागकर
अपनी जगह नहीं माँगता।

वह अब
हर बहस जीतना नहीं चाहता।

वह अब
हर रिश्ता बचाना नहीं चाहता।

वह अब
हर चोट का हिसाब नहीं रखता।

वह बस चाहता है

सुबह की एक चाय।

अपने लोगों की सलामती।

बच्चों की हँसी।

अपने कमरे में कुछ घंटे की ख़ामोशी।

शरीर में थोड़ी ताकत।

मन में थोड़ा सुकून।

और कोई ऐसा इंसान
जिसके सामने उसे
अपने मन की सफाई देने की जरूरत न पड़े।

क्योंकि चालीस का पुरुष
बहुत कुछ देख चुका होता है।

उसे मालूम होता है
कि हर बहस का अंत समझ नहीं होता।

हर माफ़ी के बाद रिश्ता नहीं बचता।

हर सच पर विश्वास नहीं किया जाता।

और हर अच्छा आदमी
हर किसी के लिए अच्छा साबित नहीं हो सकता।

इसलिए अब
वह चुप रहता है।

यह चुप्पी हार नहीं है।

यह उस आदमी की
आखिरी बची हुई ताकत है
जिसने जिंदगी भर
सब कुछ ठीक करने की कोशिश की है।

बचपन में
उसे कहा गया था
“मर्द बनो।”

उसने बनकर दिखाया।

जिम्मेदारियाँ उठाईं।

घर संभाला।

लोगों को संभाला।

अपने आँसू संभाले।

अपने डर संभाले।

अपने सपने तक संभालकर रखे।

अब चालीस पर
वह पहली बार
अपने लिए कुछ माँगता है

मुझे मत समझाओ।

मुझसे मत पूछो कि मैं ऐसा क्यों हूँ।

मुझे हर बात साबित मत करने दो।

मैं थक चुका हूँ
अपने होने का प्रमाण देते-देते।

अब अगर तुम मेरे पास हो,
तो बस मेरे पास रहो।

मेरी हर चुप्पी का अर्थ मत खोजो।

हर दूरी को नाराज़गी मत समझो।

हर थकान को बेरुखी मत कहो।

कभी-कभी
एक आदमी बस थका हुआ होता है।

और कभी-कभी
उसकी चुप्पी में
पूरी ज़िंदगी बोल रही होती है।

चालीस के बाद
उसे दुनिया जीतनी नहीं होती।

उसे बस
अपने भीतर बचा हुआ आदमी
बचाना होता है।

और शायद यही
उम्र का सबसे कठिन सत्य है

एक उम्र के बाद पुरुष शांति नहीं माँगता…
वह सिर्फ़ उन चीज़ों से दूर हो जाता है
जो उसकी शांति छीनती हैं।

क्योंकि अब उसके पास
समय कम नहीं हुआ है

बस
वह पहली बार समझ गया है
कि उसका समय
उसका अपना भी है।