गाजीपुर की एक सड़क...
बारिश... अंधेरा... और एक लावारिस लाश
लोग बहुत थे। पर तमाशा देख रहे थे।
फोन एक का बजा।
"वीरेंद्र भैया... आ जाइए"
25 मिनट में भीगते हुआ पहुंचा।
भीड़ बोली - *"पुलिस आएगी, पंचनामा होगा"*
वो बोला - *"3 घंटे हो गए। सड़ रही है। पहले मर्चेंरी मे रखा जाएगा, फिर कागज बनेगा"*
पुलिस के सहयोग से उठाया... और चल दिया।
वो कौन था?
नाम - कुंवर वीरेंद्र सिंह
पहचान - "लावारिसों का वारिस"
कहानी क्या है?
2015... Tata Memorial।
माँ कैंसर का इलाज शुरू हुआ और इलाज के दौरान 8 अक्टूबर 2018को मृत्यु हो गईं। माँ के आखिरी शब्द थे - *"बेटा... अकेला मत छोड़ना किसी को"*
उसी दिन वीरेंद्र ने दुनिया की हर लाश को "माँ" कह दिया।
*14 साल से हिसाब लगाइए...*
*रातें* = जागते हुए बीतीं
*त्योहार* = शमशान में बीते
*रिश्ते* = लावारिसों के साथ बने
*पैसे* = मिट्टी, लकड़ी, कफन में उड़े
*हिन्दू है* - तो _कृष्ण कुमार, जमुना, भोले नाथ, रविन्द्र, रामू_ के साथ मुखाग्नि
*मुस्लिम है* - तो _अतीक, गुड्डू, शेर अली, नौसाद_ के साथ जनाजा
72 घंटे इंतजार।
पहचान न हो तो भी... नाम "इंसान" लिखकर संस्कार।
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एक पत्रकार ने पूछा - "डर नहीं लगता?"*
वीरेंद्र हंसे और बोले- *"68 बार रक्तदान कर चुका हूँ।"
बोले - "डर उस दिन लगा था जब माँ तड़प रही थी और मैं कुछ नहीं कर पाया।
आज डरने की उम्र नहीं रही... निभाने की उम्र है"
गाजीपुर के कई नेताओ ने कहा - "राजनीति कर रहे हो?"
वीरेन्द्र बोले - *"राजनीति लाशों से नहीं होती सर।
राजनीति वोट से होती है। मैं तो बस दुआ कमा रहा हूं"*
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सबसे बड़ी बात क्या है पता है?
वीरेंद्र जी शादी नहीं किए।
बोले - "बीवी-बच्चे होंगे तो रात 2 बजे लाश के पास कैसे जाऊंगा?
मेरी शादी तो इंसानियत से हो चुकी हैं।"
उनका बस एक सपना है...
"जब मैं मरूं ना...
तो मेरी अर्थी पर कोई रोए नहीं।
बल्कि हजारों कहें - 'ये वही है जिसने मेरे बाप का कोई कहे मेरे माँ अन्तिम दाह संस्कार किया था'"
"मरूं तो लोगों के दिलों में बसूं"
_जय माशान बाबा_
_कुंवर वीरेंद्र सिंह - गाजीपुर_







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