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Lav Tiwari ( लव तिवारी ): फरिश्ता लघुकथा लेखक आदरणीय राजेश श्रेयस

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शुक्रवार, 26 जून 2026

फरिश्ता लघुकथा लेखक आदरणीय राजेश श्रेयस

फरिश्ता ( लघुकथा ) ✍️

बेशर्म गर्मी को इतनी भी शर्म नहीं कि किसी के रोजी-रोटी और पेट पर लात मार न दे। रोड के किनारे पड़ी मौरंग की बोरियों को तीसरे माले तक ले जा रहे अचल का पसीना सिर से एड़ी की तरफ उतर रहा था। इतनी गर्मी में बेचारे अचल को लगातार चलना ही पड़ रहा था । और चले भी क्यों नहीं। घर के लिए तेल- नमक का जुगाड़ करने के साथ साथ,छोटे बेटे सोमेश के दवाई के लिए पैसे का इंतजाम करना उसकी मजबूरी थी।

आज अचल जब घर से चला, तो सोमेश ने धीरे से कहा था बाबूजी ! आज जल्दी घर आना। मुझे आज किसी डॉक्टर के पास जरूर ले चलो। सोमेश की ये बातें अचल के मजबूर कानों में बार-बार गूंज रही थी
डॉ. प्रवीण अपने निर्माणाधीन कोठी को देखने के लिए आए हुए थे । सारे मिस्त्री मजदूर उनके पास जमा हो गए थे । शायद आज डॉ. प्रवीण में मजदूरों के लिए कोका कोला वाला कोल्ड ड्रिंक का इंतजाम करके लाए थे ।इस प्रकार चिलचिलाती गर्मी में इस कोठी के मालिक ने अपने मजदूरों के लिए कुछ राहत का इंतजाम किया था ।

सारे मजदूर ठंडी कोल्ड ड्रिंक का मजा ले रहे थे । ठीक उसी वक्त अचल धूप में किनारे खड़ा चंदन के फोन से अपने बेटे सोमेश से बातें कर रहा था। बात करते-करते वह रो पड़ा । बेटा मैं अभी आता हूँ, मेरे लाल ! अब मत रोवो, मैं आ ही रहा हूँ ।
ऐसा कहते हुए उसने छोटे वाले की पैड फोन को अचल को चंदन को पकड़ाते हुए कहा। भाई चंदन! मैं घर जा रहा हूँ । मेरे बेटे की तबीयत बहुत खराब है । अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है । तुम्हारे जेब में क्या दो - तीन सौ रूपये पड़े हैं । यदि पड़े हो तो भईया मुझे दे दो । मैं मेहनत मजदूरी करके मय ब्याज तुमको चुकता कर दूंगा । मुझे अपने भैया को डॉक्टर से दिखाना जरूरी है ।
चंदन ने जब अपना जेब टटोला तो मुश्किल से उसकी जेब में डेढ -पौने दो सौ रुपए पड़े थे। उसने उन रूपयो को अचल को पकड़ाते हुए, कहां भाई यह पकड़ो, आज भईया को हर हाल में डॉक्टर के पास ले जाओ । अचल के चेहरे की रंगत बदल गयी, थोड़ी सी खुशी तो चेहरे पर झलक पड़ी थी ।
उसने सुपरवाइजर राकेश से घर जाने के लिए छुट्टी मांगी । एकाएक एक कड़कती आवाज में सबका ध्यान उसकी तरफ खींच लिया।
कहाँ बे कहाँ जाएगा ?
तुम्हें कहीं नहीं जाना है,शाम को जाना है ?
मुझे इससे लेना देना नहीं कि तुम्हारा बेटा बीमार है या मर..%%
अचल को जैसे लकवा मार गया हो, वह भरभरा कर जमीन पर गिर पड़ा। सारे मजदूर उसकी तरफ दौड़े ।
डॉ. प्रवीण दूर से इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे । उन्होंने अचल और चंदन की बात को भी सुन लिया था । उन्हें इस बात का पता भी लग गया था कि सुपरवाइजर तेज आवाज में सिर्फ इसलिए बोल रहा है की मालिक डॉक्टर प्रवीण यह जान जाए कि वह अपने दायित्वों के प्रति कितना जागरुक है ।
डॉ. प्रवीण अचल की ओर बढ़े । बड़े ही प्रेम से बिना इस बात की फिक्र किया कि उनके कपड़े गंदे हो जाएंगे, उन्होंने अचल को अपनी बाहों में उठा लिया और बोला चाचा ! आप बिल्कुल परेशान न हो । आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको आपके घर ले चलता हूँ । मैं आपके बच्चे को ले आऊंगा और आपके बच्चे का इलाज कोई दूसरा नहीं करेगा, मैं स्वयं करूंगा। रूपए पैसे की चिंता बिल्कुल छोड़िए और आपने ये जो थोड़े से पैसे उस लड़के से उधार लिए है उसे वापस कर दीजिए ।
ऐसा कहते हुए डॉ.प्रवीण ने अचल को अपनी कार में बैठाया, और अचल के घर की तरफ चल दिए।
कुछ ही घंटे बाद अचल का बेटा सोमेश डॉ प्रवीण की क्लीनिक पहुंच चुका था। उसने दवा खा ली थी । उसका बुखार उतर गया था। एसी की ठंडी ठंडी हवाएं, उसके बदन को राहत पहुंचा रही थी। अचल स्तब्ध होकर डॉ प्रवीण को निहार रहा था। वह उन्हें ऐसे देख रहा था कि मानो कोई फरिश्ता उसके सामने बैठा हो ।
डॉ. प्रवीण भी सामने बैठे अचल को एकटक निहार रहे थे । वे अतीत के उन दिनों की यादों खो गए थे, जब बचपन में वे एक बार बहुत बीमार थे। उनका भी शरीर तेज ज्वर से जल रहा था। उस समय उनके पिताजी जो नोएडा के एक छोटे से कारखाने में बतौर मजदूर काम करते थे, वे भी अपने सुपरवाइजर के डांट की परवाह किए बगैर अपने प्रवीण के लिए दोपहर में काम छोड़कर वापस घर आ गए थे ।

©® राजेश श्रेयस
दिनांक : 26-06-2026