चाँदनी रात भरपूर मुस्कुराहट भी बिखेर नहीं पाई थी कि घनघोर काले बादलों की काली साया ने उसे ढक लिया l
खिलखिलाती हुई रोशनी के होठों की खुशियां अचानक स्तब्ध हो गयीं l पतली पतली बांस की फंठीयों पर चढ़ी हुई प्लास्टिक की पन्नीयाँ फड़फडाती हुई मानो कह रही थी, रोशनी, ...अब मैं इससे ज्यादा तुम्हारी हिफाजत नहीं कर सकती l अपनी पूरी बात करने के पहले ही रोशनी के सिर ऊपर पड़ी काली चादर कहां चली गई पता नहीं चला l
फटे दुप्पटे में स्वयं को छुपाए , रोशनी यह नहीं समझ पा रही थी, कि आखिर वह जाए तो जाए कहाँ l
पानी की तेज बौछारें रोशनी को बेइंतहा दर्द दे रही थी l
अचानक आकाश में बिजली तड़की और तड़कती बिजली की रोशनी मैं एक काली छतरी ओढ़े सुंदर सी काया उसके पास आयी l
अरे, यहां क्या कर रही है रोशनी ? चल,घर चल l
अरे भाभी आप.. आप यहाँ कैसे चली आयीं ? ऐसी हालत में तो आपको आना ही नहीं चाहिए था.. भाभी l
भाभी... आप भीगती हुई क्यों चली आयीं l आपकी तबीयत खराब हो जाएगी l आपको तो इस वक्त अपनी सेहत का बहुत ही ध्यान रखना चाहिए,
ऐसा कहते हुए रोशनी डल्लू भाभी से चिपट कर रो पड़ी l
तेज हवा और हल्की हल्की बूंदा बांदी के बीच रोशनी को अपनी छतरी में ले डल्लू धीरे धीरे अपने कदम बढ़ा रही थी l डॉक्टर ने उसे इस अवस्था में ऐसे ही चलने की सलाह दी थी l
ऊपरी मंजिल से रोशनी के आशियाने को हर रोज निहारने वाली वाली डल्लू , बड़ी मुश्किल से छत की सीढ़ियों से नीचे उतर पायी थी l
डल्लू भाभी के घर की लाबी में बिछे बिस्तर पर दुबकी रोशनी खुद को लिहाफ से लपेटकर गर्म करने की कोशिश कर रही थी l
डल्लू ने चाय का गर्म गर्म प्याला रोशनी हाथों में पकड़ाया तो वह बोल पड़ी....
अरे भाभी!!..आप मेरे लिए इतना मेहनत कर रही हो ?
नहीं भाभी नहीं.. रोशनी के आँखों से आंसू की धारा निकल पड़ी l
अरे मेहनत,..!! यह क्या बोल रही हो रोशनी,..मुझे तो तुम एक सींक भी सरकाने नहीं देती मेरी बिटिया रानी l वैसे भी बर्तन पोछा करने के बाद, तेरा काम समाप्त हो जाता है लेकिन रोशनी,... इसके बाद मेरे लिए कोई काम बाकी ही कहाँ छोड़ती हो l
रोशनी!.. तुम अंधेरी रात में जलती हुई एक खूबसूरत दीया हो,जिसकी रोशनी बहुत दूर तक जाने वाली है l
ऐसा कहते हुए डल्लू ने दोबारा रोशनी को गले लगा लिया l इस बार डल्लू और रोशनी दोनों रो रहे थे l
.........©® राजेश " श्रेयस"
।राजेश श्रेयस
( राजेश कुमार सिंह 'श्रेयस')
कवि,लेखक एवं समीक्षक







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