मेरी कुलदेवी माँ भवानी चंडी ( ऊँचेड़ा )
( नवरात्र पर्व विशेष )
बलिया जनपद अंतर्गत चौदह के क्षेत्र में बसें कलचुरीवंशीय क्षत्रिय (राजपूत ) तथा मेरी भी अधिष्ठात्री कुलदेवी, मेरे गांव संवरा के सन्निकट गांव गोपालपुर के कुलीन ब्राह्मण कुल की आराध्या माँ भगवती विंध्यवासिनी की प्रतिरूप उचेड़ा
नामक ग्राम में अवस्थित माँ चंडी भगवती को इस समस्त क्षेत्र वासियों की पूजनीय देवी के रूप में जाना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि संवरा - गोपालपुर एवं चिंतामणि पुर से लेकर औन्दी तक, इधर मटिहीं से लेकर रतसर के बीच बसे कलचुरीवंशीय क्षत्रियों के परिवार में बेटे- बेटियों के यहाँ यदि कोई भी शुभ- मांगलिक कार्य होता है तो प्रथम पूजा माँ चंडी की ही होती है। इन दोनों वंशों के क्षत्रिय परिवार ऊंचेड़ा या खड़ीचा स्थित माँ भगवती के मंदिरों में पूजा आराधना करते हैं । कलचुरीवंशीय क्षत्रियों का गोत्र कृष्णात्र ( अत्रि ऋषि से संबंधित गोत्र ) एवं कुलदेवी विंध्यवासिनी वर्णित है । जैसा कि मैंने पूर्व में बताया, माँ भगवती चंडी, मां विंध्यवासिनी की ही रूप है। यदि हम कुछ और गहराई में जाएं तो कलचुरीवंशीय क्षत्रिय छत्तीसगढ़ के रतनपुर से आए थे । यह स्थान छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जनपद के सन्निकट है। रतनपुर में मां भगवती चंडी की बहुत ही पौराणिक ऐतिहासिक और प्राचीन प्रतिमा है। उस क्षेत्र के कलचुरी वंशियों की वही आराध्या है । मुझे रतनपुर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और माँ भगवती के दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त हो चुका है ।
बात करते हैं ऊँचेड़ा वाली चंडी माई की। इनके के विषय में मान्यता है कि इनको इस स्थान तक ले आने का श्रेय गोपालपुर के एक ब्राह्मण परिवार का है, जो मां विंध्यवासिनी के बहुत बड़े उपासक थे। कहते हैं कि वह अपने योग से प्रतिदिन माँ के दर्शन करने जाया करते थे। वृद्धावस्था आने पर उन्होंने मन से प्रार्थना की कि माँ मेरे पास ही चले आइये, क्योंकि अब मैं आने-जाने में असमर्थ हूँ । माँ भगवती ने स्वप्न में उन्हें बताया कि मैं अमुक जगह पहुंच चुकी हूँ, वहां मेरी स्वयं भू प्रतिमा है। आप यहां से हमारा दर्शन कर सकते हैं ।बताते हैं कि यही स्थान उचेडा है जहां माँ का आगमन हुआ ।
साथ ही साथ एक मान्यता यह भी मानता है कि देवी दिन में तीन रूप धारण करती है। प्रातः ब्रह्मबेला में बालिका के रूप में, दोपहर मध्यान में यौवन अवस्था में, एवं संध्या रात्रि कालीन बेला में वृद्धावस्था में इनके दर्शन होते हैं। वर्ष के दोनों नवरात्रों में मां चंडी के दर्शन करने वालों की एक अच्छी खासी संख्या मां भगवती के दर्शन करने के लिए लगातार आती है । जनपद बलिया के सेंगर वंशीय क्षत्रियों की आराध्य नाथ बाबा का मंदिर रसड़ा सहित अन्य तीन स्थानों पर अवस्थित है । जैसा कि मैं बचपन से देखा आया। सेंगर और कलचुरी वंश के परिवार अगल-बगल गांव में बसे हुए हैं तो उनके बीच के पारिवारिक- सांस्कृतिक संबंध भी आपस में खूब है। इसका एक उदाहरण रसड़ा जी का नाथ जी मंदिर और उचेडा का चंडी माँ मंदिर भी है । दोनों वंशों क्षत्रिय परिवार और उस क्षेत्र में रहने वाले सारे लोग इन दोनों मंदिरों पर बराबर जाते हैं और पूजा अर्चन करते हैं ।
नवरात्र का पावन महीना चल रहा है, उपरोक्त क्षेत्र में जन्म लेने वाले और सामाजिक एवं पौराणिक विषयों पर कलम चलाने वाले साहित्यकार के रूप में मैंने भी अपनी कृति काव्य कथा वीथिका में इन दोनों ही मंदिरों से जुड़े कथानकों कलम चलाई है। #कथा_वीथिका के पृष्ठ ८७ पर मैंने 'विंध्यवासिनी स्वरूप चंडी माँ उचेडा' शीर्षक से माँ चंडी के विषय में कविता लिखी है, वही श्रीनाथजी के विषय में मेरी रचना ' लाठी की पूजा होती है ' शीर्षक से #कथा_वीथिका के पृष्ठ ७६ पर है ।
बलिया के प्रख्यात इतिहासविद डॉ. शिवकुमार कौशिकेय ने भी अपनी पुस्तक #बलिया_विरासत के पृष्ठ ९१ पर ' भवानी मंदिर उचेड़ा ' शीर्षक से मां चंडी के विषय में लिखा है।
नवरात्रि इस पावन पर्व पर मैं अपनी कुलदेवी मां भगवती चंडी को प्रणाम करता हूं एवं आप सभी को नवरात्र पर्व की शुभकामनाएं व्यापित करता हूँ।
©®राजेश श्रेयस
( राजेश कुमार सिंह 'श्रेयस')
कवि,लेखक एवं समीक्षक
लखनऊ / बलिया







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