मंगलवार, 5 सितंबर 2023
वह सम्मान ले आना है रचना साधना शाही वाराणसी
सा,रे,गा,मा का राग छेड़ना;
यह संगीत न कहलाता।
तपते ह्रदय को स्निग्ध जो कर दे,
मधुर गीत वह कहलाता।
अनाचार की खेती होती,
वहाॅं सुनामी लाना है।
सदाचार , पुष्पित पल्लवित हो,
उर्वर भूमि बनाना है।
क्रांति आवाहन छेड़ के जग में,
सोया देश जगाना है।
मूल्य बदलता देश समाज है;
अपरिहार्यता को पहचानना है।
गुंडागर्दी और वसूली,
का बाज़ार विस्तार किया।
इस बाज़ार में मंदी लाकर,
देश का भाग्य जगाना है।
दहेज की आग में बेटी जलती,
उसको सिंचित करना है ।
बिन माॅंगे कहीं बेटा जलता,
उसको न्याय दिलाना है।
असत्य सवारी सत्य कर रहा,
सच्चा सारथी लाना है।
सत्य सदा करे सत्य सवारी,
असत्य को धूल चटाना है।
चिरनिद्रा में देश सो रहा,
उसको अब तो जगाना है
टूटे बिखरे जो मानव हैं,
उनमें जीवन लाना है।
स्वयं नैन नीर पोंछकर,
परिस्थितियाॅं सुखद बनाना है।
विश्व गुरु था देश हमारा,
वह सम्मान ले आना है।
~ साधना शाही
देखो देखो आई ईद रचना साधना शाही वाराणसी
देखो -देखो आई ईद
देखो -देखो आई ईद,
चहुं फैलाती है यह प्रीत।
मुस्लिम का यह है त्यौहार,
पर सबसे करता है प्यार।
तीस दिनों का कर रमजान,
इसके बाद ईद तू मान।
इस्लामिक यह व्रत है प्यारे,
जीवन सबका कर दे न्यारे।
सूर्योदय से अस्त तक रोज़ा,
रोजे़दार सदा है रहता ।
अंशु -रश्मि जैसे ही जाती,
रोजे़दार का रोजा खुलता।
अमीर- गरीब संग करें इफ्तारी,
ना कोई दंभ ना कोई अहंकारी ।
अंतिम दिन जब चांद दिखे तो,
ईद की तुम कर लो तैयारी।
ऊंच-नीच का भेद मिटाकर,
एक -सा हो सब का अंदाज़।
जाति की सीमाएं दूर हो,
प्रेम की हो बस एक आवाज़।
गिले-शिकवे सब रखो ताख पर ,
ईद मुबारक दिल से कह लो।
दीन- दुखी को भी मत भूलो,
सर्व-धर्म को शामिल कर लो।
ईद का मतलब खुशी है प्यारे,
जाति- धर्म में मत बांटो।
रहमत सदा बरसती एक सी,
जो बनी है खाई उसे पाटो।
साधना शाही, वाराणसी
मानव बनकर रहना सिखो कभी बने ना दानव- साधना शाही वाराणसी
ईश्वर की सर्वोपरि रचना
ईश की रचना में है ऊपर,
सुनो ए बच्चों !मानव।
मानव बन कर रहना सीखें,
कभी बनें ना दानव।
गुण इसमें हैं अनंत समाए,
संग में सूझ व बूझ।
इस गुण के कारण ही हम,
बन सकते हैं प्रत्यूष।
साहस, धैर्य ,कर्मशीलता,
ईश्वर गुण हैं प्रदत।
इनका सदा सदुपयोग करे नर,
ना होवे कभी ध्वस्त।
स्व-विवेक को ज्यों नर भूले,
घेरे कुंठा- निराशा।
आत्मविश्वास है नष्ट हो जाता,
मर जाए हर अभिलाषा।
निराशा सम अभिशाप न दूजा ,
आशा सम वरदान।
आशा का दामन कभी न छूटे,
जीवन भर रख लो ध्यान।
सद्भभावों से मन तुम भर लो,
दृढ़ संकल्प हो जाओ।
आत्मविश्वास को मीत बना लो,
हर लक्ष्य को तुम पा जाओ।
साधना शाही वाराणसी
सोमवार, 4 सितंबर 2023
नाले मेरे रूह के- बीना राय गाजीपुर उत्तर प्रदेश
नाले मेरे रूह के
नाले मेरे रूह के
जा के तेरे रुह तक
हो के अनसुने
वापस मुझतक
हो जाते हैं फिर
क़ैद-ए - मकां
कहने को तो हैं
यादें तिलस्मी
पर यही देते हैं
आंखों को नमी
सहरा जब बन जाता है
दिल का मेरे ज़मीं
यादें ही भिगो देती हैं
बन कर इक रवां
नाले मेरे रूह के........
दिल में रही हरदम
इक हलचल
चलते रहे फिर भी
हम मुसलसल
हुआ ना कुबूल कोई
तेरे बाद दिल को
वजह-ए- तस्कीं यहां
नाले मेरे रूह के........
(नाले- चीख पुकार
क़ैदे मकां- मकान में बंद
सहरा- रेगिस्तान
रवां- झरना
मुसलसल- लगातार
वजह-ए-तस्कीं- सुकून का जरिया)
स्वरचित रचना
दुनिया में छा जाएंगे स्वरचित गीत बीना राय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
दुनिया में छा जाएंगे*
जीता वो जिद्दी
दुश्मन तो क्या
हम भी कहां अभी हारे हैं
हार भले पर
हमने कहां स्वीकारे हैं
फिर उठना है
फिर लड़ना है
आंखों में दुश्मन के गड़ना है
लिख लो कहीं तुम
लगने हैं बाकी
हिम्मत के मेरे जयकारे हैं
जग ने हो मानी हार भले पर
हमने कहां स्वीकारे हैं।
बीता बहारों का
मौसम तो क्या
पतझड़ में हम गाएंगे
अंधियारों में किस्मत के
अनुभव के दीप जलाएंगे
अब क्या चहकना
अब क्या बहकना
जज़्बातों में अब
क्या लुढ़कना
सांस की सूरज
ढलने से पहले
दुनिया में में छा जाएंगे।
अंधियारों में किस्मत के
अनुभव के दीप जलाएंगे।
कुछ ना कहना सीखो स्वरचित नज़्म बीना राय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
कुछ ना कहना सीखो
ग़म के साथ रहना सीखो
किसी से कुछ ना कहना सीखो
दर्द आपना सहना सीखो
कीसी से कुछ ना कहना सीखो
गुनगुनाते रहो मुसकुराते रहो
हंसी ख्वाब से आंख मिलाते रहो
मौजों में बहना सीखो
किसी से कुछ ना कहना सीखो
घबराओ नहीं रब साथ है
तुम उसी से कहो जो भी बात है
रब के कदमों में ढहना सीखो।
किसी से कुछ ना कहना सीखो
अपने भारत को क्या हो गया बीना राय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
अपने भारत को क्या हो गया*
हर दिन हर पल ये हाहाकार
मानो घड़ी प्रलय की आई है
फिर भी क्षणभंगुर जीवन से
सबने कितनी आस लगाई है
कुछ मुक्त नहीं मिलावट से
अब असलियत को क्या हो गया।
हर बार चुनावी मौसम में
वादा करते हैं खोखला
सच्चाई का सहारा कोई ना ले
हर तरफ है सिर्फ ढकोसला
कर रहे घिनौनी राजनीति
उनके फितरत को क्या हो गया
जो निर्दोष नारी को नंगी कर
कुत्तों से जूझ पड़े थे
शायद था ना उसमें एक पुरुष
दानव से बद्तर हो गए थे
क्यों लगे विवेक में कीड़े
उस ख़लक़त को क्या हो गया।
जला कर बस्तियां निर्दोषों की,
कुछ तुच्छ अधिकार मांग रहे हैं
क्यों शर्म नहीं आती उन्हें,
हैवानियत की सीमा लांघ रहे हैं
लग गई नज़र ये किसकी
अपने भारत को क्या हो गया ।
स्वरचित कविता
सफल रहा ये अभियान बीना राय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
सफल रहा ये अभियान
इसकी सत्कार हम करें
आओ जयकार हम करें
चांद पर पहुंचा चंद्रयान
सफल रहा ये अभियान
अपना देश है महान।
जान गया है ये जहान
किये मेहनत इसपर जो
कितने कर्मठ हैं लोग वो।
दुनिया करती है बखान
अपना देश है महान
जान गया है ये जहान
दिल है और यही जान ।
हम उन्हें छोड़ आएंगे ऐसा सोचा ना था ऐसा सोचा ना था- बीना राय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
*ऐसा सोचा ना था*
मीत का दिल दुखाएंगे ऐसा सोचा ना था।
हम उन्हें छोड़ आएंगे ऐसा सोचा ना था।
राह में बिछड़ जाएंगे ऐसा सोचा ना था।
हम उन्हें छोड़ आएंगे ऐसा सोचा ना था।
अपना उनके सिवा दिल ना लगता कहीं
कुछ दुआ के सिवा दिल के बस में नहीं।
प्रीत बिन छटपटाएंगे ऐसा सोचा ना था।
हम उन्हें छोड़ आएंगे एंगे ऐसा सोचा ना था।
जीस्त जिनसे है ये वो जुदा हो गए।
हाल समझे नहीं और ख़फ़ा हो गये।
हिज़्र के पल सताएंगे ऐसा सोचा ना था ।
हम उन्हें छोड़ आएंगे ऐसा सोचा ना था।
उसे तन्हाई ना डसे स्वरचित बीना राय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
उसे तन्हाई ना डसे
वोमुझे भूले से भी याद करे ना करे
है दुआ मिरी की उसे तन्हाई ना डसे।
मन के आंखों में है बर्फ सा जम गया
है ख़ुदा का शुक्र हंस के मिलते हैं सबसे।
नाम उसका मैं जपूं मन बांवरा भी करूं
जग को मुझपर हंसना है तो हंसे ।
ऐ मेरी तनहाई ये जो अक्सर तू बीना राय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
ऐ मेरी तनहाई ये जो अक्सर तू
मेरे साथ साथ ही रहती है ना
अब तुझे गले लगाकर
मंजिल के तरफ़
चलना है मुझे ही
ये जो नाज़ुक सी मेरी हसरतें
तपते हुए सहरा से, तेरे मौजों के किनारे
दौड़ी चली आती थीं ना
और नहीं दौड़ सकतीं ये
अब इनसे मिलने के वास्ते मचलना है तुझे ही।
स्वरचित कविता से
हर्ष और संताप- बीना राय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
हर्ष और संताप
तभी तो हमपर कभी
बिन मांगे होती है।
खुशियों की बरसात
और कभी रो-रो के थक जाएं
पर भगवान भी हमारी
सुनता नहीं अलाप
जब लगे ये जीवन हमको
एक खुशियों भरी शौगात
बखानते हैं हम सब अपने
अच्छे कर्मों का प्रताप
फिर जब होती है हमारी,
दुखों से आंखेचार
बेहतर होता ये समझ जाते
शायद है ये हमारे किसी
बुरे कर्मों से मिला कोई अभिशाप
जैसा भी है ये जीवन
अपना ही तो है
गर दुख मिला है तो फिर
सुख भी मिलेगा
अगर बढ़ा लेंगे हम
अपने शुभ कर्मों का प्रताप
दाग के साथ भी चमकना बड़ा अच्छा लगता है- बीना राय गाजीपुर उत्तर प्रदेश
*दाग के साथ भी चमकना बड़ा अच्छा लगता है*
छुपकर चांद सा निकलना
बड़ा अच्छा लगता है
चांद सा घटना बढ़ना
दाग के साथ भी चमकना
बड़ा अच्छा लगता है
चाहे जितनी भी तमस हो
मेरे जीवन की गलियों में,
सबके मन में उजास भरना
बड़ा अच्छा लगता है
दाग के साथ भी चमकना
बड़ा अच्छा लगता है
हरदम एक सा रहने से
कुछ उबासी होती है
मुझको चांद सा बदलना
बड़ा अच्छा लगता है
दाग के साथ भी चमकना
बड़ा अच्छा लगता है
यूं तो दरमियां तेरे मेरे
एक फूल भी नहीं रूचे
फिर भी मिलन के बेला में
शब भर चांद का ठहरना
बड़ा अच्छा लगता है
दाग के साथ भी चमकना
बड़ा अच्छा लगता है
जब नहीं तुम मेरे साथ
बहक जाए मेरे जज्बात
हाल-ए-दिल चांद से कहना
बड़ा अच्छा लगता है
दाग के साथ भी चमकना
बड़ा अच्छा लगता है
बुलंदियों के बाम जाने पर
जब जले मुझसे जमाना
चांद सा खामोश रहना
बड़ा अच्छा लगता है
दाग के साथ भी चमकना
बड़ा अच्छा लगता है
तेरे ही निशां ढूंढते हैं स्वरचित नज़्म बीना राय गाज़ीपुर
चांद तारों से तेरा हाल पूछते हैं
हर घड़ी तेरे ही निशां ढूंढ़ते हैं
पर आती ही नहीं
नाम तेरा ले कर ही
मेरे दिन रैन गुजरते हैं
हर घड़ी तेरे ही निशां ढूंढ़ते हैं
शुक्रिया उम्मीद का दिल से
जो जाती ही नहीं
हम तो लेकर के ही जरिया
उम्मीदों का
इस रहे हयात में बढ़ते हैं
हर घड़ी तेरे ही निशां ढूंढ़ते हैं
ये घड़ी फुर्क़त की हमसे
ये कहती है
हम तो हर धड़कन में
तेरे बसते हैं
हर घड़ी तेरे ही निशां ढूंढ़ते हैं।
क्या पैमाने हैं नवगीत कुमार शैलेन्द्र कितनी तानें हैं। गोताखोरों की नज़रों के क्या पैमाने हैं ।
2:29 am
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#क्या_पैमाने_हैं
नवगीत----कुमार शैलेन्द्र
चलो नाप लें
दिल-दरिया में,.
कितनी तानें हैं।
गोताखोरों की नज़रों के,
क्या पैमाने हैं ।
जल के बाहर.
सोनमछरियाँ,
व्याकुल बिन पानी।
पानी -पानी
पानी वाले,
मछुए मनमानी।
बूढा बरगद
ना जाने खुद,
क्या क्या ठाने है।।
दायें बायें
आगे पीछे,
फिसल रहे मोती ।
गहरी आँतें
मोटी चमडी़,
जा़र जा़र रोतीं।
नयनों में
अंधता दोष,
पर भृकुटी ताने हैं।।
बचपन में
जो दाँत शेर के,
गिन पीते थे पानी।
सदा उन्हीं
पीठों पर बैठे,
लिख पढ़ रामकहानी।
शाकुन्तल
बुलबुल परिभाषा,
भाऱत माने है।।
घर- छत
फाँद चोरनी जैसी,
दाखिल कई हवाएँ,
मन वासन्ती
पतझर झाँके,
धूप गंध-विधवाएँ,
शिखर प्राण
उत्तुंग चढे़ ,
ज्योतित परवाने हैं ।।
कुमार शैलेन्द्र
गणेश चतुर्थी पर चंद्र देव और गणेश जी की स्तुति रचना -मधुलिका राय मल्लिका गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
1:00 am
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गणेश चतुर्थी पर चंद्र देव और गणेश जी की स्तुति
--------+++++++++--------
धवल मृदुल है रूप तुम्हारा
तुमसे है जग में उजियारा
चंद्र देव अब दर्शन दीजै
विनय कर रहा भक्त तुम्हारा।
भूख प्यास से आतप मन है,
क्षीणकाय अति निर्बल तन है
कलानिधि अब कृपा करो तुम
साष्टांग विनवत तन मन है।
शशि शशांक सारंग निशाकर
बिधु मयंक सुधांशु सुधाकर
रजनी पति अनेक हैं नामा
शिव के शिखर करत विश्रामा
भादो मास मा कृष्ण चतुर्थी
व्रत पूजन करिए गणपति की
विघ्नहरन विपदा हर लेते
सेवक जन को सब सुख देते
कृपा करो हे दीन दयाला
शंभू सुत गौरी के लाला
करत अनुग्रह मधु कर जोरे
कष्ट हरो सब गणपति मोरे
मधुलिका राय मल्लिका गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
रविवार, 3 सितंबर 2023
सुप्रसिद्ध तबला वादक पंडित श्री किशन महाराज पुण्य तिथि पर विशेष
11:26 am
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जन्म: 3 सितंबर, 1923
मृत्यु: 4 मई, 2008
भारत के सुप्रसिद्धतबला वादकथे। ये बनारस घराने के वादक थे। इन्हें कला क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा सन 1973 में पद्म श्रीऔर सन 2002 में पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया था। किशन महाराज तबले के उस्ताद होने के साथ साथ मूर्तिकार, चित्रकार, वीर रस के कवि और ज्योतिष के मर्मज्ञ भी थे।
जीवन परिचय
किशन महाराज का जन्म काशी के कबीरचौरा मुहल्ले में 3 सितंबर 1923 को एक संगीतज्ञ केपरिवार में हुआ। कृष्ण जन्माष्टमी पर आधी रात को जन्म होने के कारण उनका नाम किशन पड़ा। उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्षों में पिता पंडित हरि महाराज से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की।पिता के देहांत के बाद उनके चाचा एवं पंडित बलदेव सहाय के शिष्य पंडित कंठे महाराज ने उनकी शिक्षा का कार्यभार संभाला।
तबला वादन
किशन महाराज ने तबले की थाप की यात्रा शुरू करने के कुछ साल के अंदर ही उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ,पंडित ओंकार ठाकुर, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां,पंडित भीमसेन जोशी, वसंत राय, पंडित रवि शंकर,उस्ताद अली अकबर खान जैसे बड़े नामों के साथ संगत की। कई बार उन्होंने संगीत की महफिल में एकल तबला वादन भी किया। इतना ही नहीं नृत्यकी दुनिया के महान हस्ताक्षर शंभु महाराज, सितारा देवी, नटराज गोपी कृष्ण और बिरजू महाराज के कार्यक्रमों में भी उन्होंने तबले पर संगत की। उन्होंने एडिनबर्ग और वर्ष 1965 में ब्रिटेन में कॉमनवेल्थ कला समारोह के साथ ही कई अवसरों पर अपने कार्यक्रम प्रस्तुत कर प्रतिष्ठा अर्जित की। उनके शिष्यों में वर्तमान समय के जाने माने तबला वादक पंडित कुमार बोस, पंडित बालकृष्ण अय्यर, सुखविंदर सिंह नामधारी सहित अन्य नाम शामिल हैं।
प्रभावशाली व्यक्तित्व
आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे, माथे पर एक लाल रंग का टिक्का हमेशा लगा रहता था, वे जब संगीत सभाओं में जाते, संगीत सभायें लय ताल से परिपूर्ण हो गंधर्व सभाओं की तरह गीत, गति और संगीतमय हो जाती। तबला बजाने के लिए वैसे पद्मासन में बैठने की पद्धति प्रचलित हैं, किंतु स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी दोनों घुटनों के बल बैठ कर वादन किया करते थे, ख्याल गायन के साथ उनके तबले की संगीत श्रोताओं पर जादू करती थी, उनके ठेके में एक भराव था, और दांये और बांये तबले का संवाद श्रोताओं और दर्शकों पर विशिष्ट प्रभाव डालता था। अपनी युवा अवस्था में पंडित जी ने कई फ़िल्मों में तबला वादन किया, जिनमें नीचा नगर, आंधियां, बड़ी माँ आदि फ़िल्में प्रमुख हैं। कहते हैं न महान कलाकार एक महान इंसान भी होते हैं, ऐसे ही महान आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी भी थे, उन्होंने बनारस में दूरदर्शन केन्द्र स्थापित करने के लिए भूख हड़ताल भी की और संगत कलाकारों के प्रति सरकार की ढुलमुल नीति का भी पुरजोर विरोध किया।
बिंदास जीवन शैली
किशन महाराज का ज़िंदगी जीने का अन्दाज़ बहुत बिंदास रहा। उन्होंने ज़िंदगी को हमेशा 'आज' के आईने में देखा और अपनी मर्जी के मुताबिक बिंदास जिया। लुंगी कुर्ते में पूरे मुहल्ले की टहलान और पान की दुकान पर मित्रों के साथ जुटान ताज़िंदगी उनका शगल बना रहा। मर्जी हुई तो भैंरो सरदार को एक्के पर साथ बैठाया और घोड़ी को हांक दिया। तबीयत में आया तो काइनेटिक होंडा में किक मारी और पूरे शहर का चक्कर मार आए।
दिनचर्या
उनकी दिनचर्या पूजा पाठ, टहलना, रियाज, अपने शौक़ पूरे करना, मित्रों से गप्पे मारना था। यह सब ज़िंदगी की आखिरी घड़ी तक जारी रहा। वे बड़ी बेबाकी से कहते थे कि मैं कोई उलझन या दुविधा नहीं पालता बल्कि उसे जल्दी से जल्दी दूर कर देता हूं। ताकि न रहे बांस और न बजे बांसुरी। साठ साल पहले शेविंग के दौरान मूंछें सेट करने में एक तरफ छोटी तो दूसरी तरफ बड़ी हो जाने की दिक्कत महसूस की तो झट से उसे पूरी तरह साफ़ करा दिया। इसके बाद फिर कभी मूंछ रखने की जहमत नहीं उठाई। उनकी दिनचर्या बड़ी नियमित थी। प्रात: छह बजे तक उठ जाते थे। बगीचे की सफाई, चिड़ियों को दाना पानी और फिर टहलने निकल जाते थे।
पसंद-नापसंद
किशन महाराज का खानपान का भी अपना अलग स्टाइल था। दाल, रोटी, चावल के साथ छेना याकेला और लौकी चाप उन्हें काफ़ी पसंद था। गर्मीके सीजन में दोपहर में सप्ताह में दो तीन रोज सत्तूभी खाते थे। परंपरागत बनारसी नाश्ता पूड़ी-कचौड़ी उन्हें पसंद नहीं था। कभी-कभार किसी पार्टी में पंडित जी पैंट-शर्ट में भी जलवा बिखेरते दिख जाते थे। मगर अलीगढ़ी पायजामा और कुर्ता उनका पसंदीदा पहनावा था। गहरेबाजी, पतंगबाजी और शिकार के शौकीन रहे पंडित जी क्रिकेट और हॉकी में भी ख़ासी दिलचस्पी रखते थे।
सम्मान और पुरस्कार
लय भास्कर, संगीत सम्राट, काशी स्वर गंगा सम्मान,संगीत नाटक अकादमी सम्मान, ताल चिंतामणि, लय चक्रवती, उस्ताद हाफिज़ अली खान व अन्य कई सम्मानों के साथ पद्मश्री व पद्म विभूषणअलंकरण से इन्हें नवाजा गया।
निधन
किशन महाराज 3 सितम्बर 1923 की आधी रात को ही इस धरती पर आए थे और 4 मई, 2008 की आधी रात को ही वे इस धरती को छोड़, स्वर्ग की सभा में देवों के साथ संगत करने हमेशा के लिए चले गए। उनके जाने से भारत ने एक युगजयी संगीत के दिग्गज को खो दिया था।
ग़ाज़ीपुर के सुप्रसिद्ध शायर लेखक श्री इरशाद अहमद जी का संक्षिप्त परिचय एवं रचनाएं
11:05 am
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प्रारूप
नाम : इरशाद अहमद
(इरशाद जनाब ख़लीली)
जन्मतिथि : 01/05/1981
माता का नाम : सलामुन नेसा
पिता का नाम : मोहम्मद आशिक़
जन्म स्थान : जमालपुर (यूसुफपुर-मोहम्मदाबाद)
शैक्षिक योग्यता : एम. ए. एम. एड.
संप्रति (पेशा) : डायट प्रवक्ता
विधाएं : गीत, ग़ज़ल, नज़्म, निबंध, इतिहास लेखन, जीवन परिचय
साहित्यिक गतिविधियां : काव्य गोष्ठी, शेरी नशिस्त, कवि सम्मेलन, मुशायरोंं में प्रतिभाग करना
प्रकाशित कृतियां : कोई नहीं
पुरस्कार सम्मान : कोई नहीं
संपर्क सूत्र : 8182076748
विशेष परिचय : शायर, लेखक, शिक्षक, आयोजक, संयोजक, संचालक, गायक, प्रस्तोता
रचना
दुनिया को युद्ध के संकट से हमने हर बार बचाया है
हिंसा करने वालों को अहिंसावाद का पाठ पढ़ाया है
प्राचीन काल से कुटुंबकम् वसुधैव प्रेम की धारा है
गौतम चिश्ती बाबा कबीर नानक गांधी का नारा है
वीरों ने अपना लहू दिया जब जब भारत ने पुकारा है
जब देश पे संकट आया है हमने जौहर दिखलाया है
मन चंगा और कठौती में गंगा हाथों में तिरंगा है
नन्दा देवी सागरमाथा के टू और कंचनजंघा है
जो मठाधीश बनते फिरते हैं उनसे लेना पंगा है
हमने ऊंची दुर्गम पहाड़ियों पर झण्डा लहराया है
साम्राज्य वाद की नीति विश्व के लिए भयंकर ख़तरा है
दुश्मन को घुसकर मारेंगे इस बार हमारा जतरा है
हां मातृभूमि को पेश जिस्म के लहू का अंतिम क़तरा है
छेड़ो न हमें छोड़ेंगे नहीं हमने अक्सर समझाया है
यदि युद्ध चाहते हो तो फिर कायरता क्यों दिखलाते हो
अंधियारे में छुप कर धोखे से हमला क्यों करवाते हो
निः शस्त्र निहत्थों को मरवाकर बड़े वीर कहलाते हो
तुम जैसे कितने वीरों को हमने ही धूल चटाया है
ये सीधे सीधे भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है
दिल्ली में बैठे लोगों से मेरा प्रत्यक्ष निवेदन है
तत्काल कुचल दो सांपो को जो उठा तनिक उनका फन है
इच्छा शक्ति मज़बूत करो दुश्मन घर में घुस आया है
अब्दुल हमीद सा परमवीर उस्मां ब्रिगेडियर देखा है
कारगिल की चढ़ाई देखी है और सन इकहत्तर देखा है
टाइगर हिल पर दुनिया ने हिंदुस्तान का जौहर देखा है
जय हिन्द की सेना ने जनाब घुसपैठ को मार भगाया है
इरशाद जनाब खलीली
रचना-२
गंध है कैसा रंग स्वेद का?
काम यही है नस्लभेद का!
नाव किनारे क्यों कर डूबी?
प्रश्न यही है अनुच्छेद का!
धर्म कर्म खतरे में आ गया!
लोग पढ़ें सन्देश खेद का!
नेता है तो ज्ञाता होगा!
साम दाम का दण्ड भेद का!
एक है पालनहार सभी का!
कहना है क़ुरआन-वेद का!
उसके द्वारे सब समान हैं!
भेद नहीं काले सफ़ेद का!
रचना ३
झूठ के आगे लब खोलो
हिम्मत हो तो सच बोलो
पहले मन को साफ़ करो
फिर बातों में रस घोलो
कुछ भी कहने से पहले
अपने शब्दों को तौलो
सूरज सर पे चढ़ आया
बिस्तर छोड़ो मुँह धो लो
कौन यहाँ दुःख बाँटेगा
चुपके से मन में रो लो
जीवन झूला कहता है
देख संभल के तुम डोलो
अपनी ज़िम्मेदारी को
अपने कांधो पर ढो लो
इश्क़ आग का दरिया है
डूब सको तो फिर हो लो
अब तो फोन रखो इरशाद
आँखें भारी हैं सो लो
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