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Lav Tiwari ( लव तिवारी )

Lav Tiwari On Mahuaa Chanel

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मंगलवार, 6 जून 2023

दुल्लहपुर का पशु मेला - नीरज सिंह अजेय

🐂🐃 दुल्लहपुर का पशु मेला 🐂🐃

मेला का नाम सुनते ही हमारे मन अपने स्थानीय बाजार और कस्बे में लगने वाले मेलों का दृश्य घूमने लगता है और अपना बचपना याद आने लगता है लेकिन आज हम लोग एक विशेष प्रकार के मेले की बात करेंगे जिसमें पशुओं की खरीद बिक्री होती थी।
आप में से तो बहुत लोग इस मेले के बारे में जानते भी नहीं होंगे पर आपको अपने क्षेत्र के ऐसे शानदार मेले के बारे में जानकारी होनी चाहिए।
ऐसा ही एक मेला अपने गाजीपुर जिले में दुल्लहपुर बाजार में लगता था, मेले को बंद हुए आज एक जमाना बीत गया पर अभी भी उस अविस्मरणीय मेले की यादें आती रहती है।
पहले हर गांवों में लोग बहुत ही प्रेम से पशुपालन करते थे, हर घर के सामने खुद की चरनी होती थी जिस पर कम से कम चार या पांच पशुओं को पाला जाता था, जिस घर में गाय भैंस और बैल नहीं होता था उसको लोग आश्चर्य से देखते थे।
जब हम लोग छोटे-छोटे थे उसके भी बहुत पहले से दुल्लहपुर का बैल मेला लगता आ रहा था।
इस मेले की यादें हमारे साथ जुड़ी हुई हैं, आज के बच्चे तो इसके बारे में कल्पना भी नहीं कर पाएंगे।
हमारे गांव से उत्तर दिशा की ओर दुल्लहपुर बाजार पड़ता है तो मैंने बचपन से देखा है कि बहुत सारे किसान अपने बछड़े और बैलों को हांकते हुए दुल्लापुर मेले में लेकर जाते थे, यह मेला प्रत्येक सप्ताह में सोमवार के दिन लगता था इस मेले के मालिक कोई कमला राय साहब थे। इसमें पशु के खरीदने बेचने पर एक रसीद कटानी पड़ती थी जिसका सामान्य शुल्क लगता था।बहुत दिनों तक यह मेला गाजीपुर जिले की शान हुआ करता था।
हम भी इस मेले में तीन या चार बार गये थे जिधर देखो एक से एक बछड़े और बैल। इनकी खूबसूरती देखते ही बनती थी।
हमारी खेती करने वाले पसराम चाचा कई बार बैलों की खरीद बिक्री करने के लिए मेले में जाते थे तो हम भी साथ गए थे।
यह पशु मेला दुल्लाहपुर रेलवे स्टेशन के ठीक सामने पूरब दिशा में और स्टेशन के दक्षिण दिशा में भी लगता था।
यह मेला आप को अपनी ओर बरबस ही आकर्षित कर लेता था। मेले में जहां तक निगाहें जाती चारों और बस बैल ही बैल दिखते थे।
मुझे याद आता है कि बचपन में मेरे घर में दो बैल थे जिसमें जो नया बैल था उसको हम लोग मरकहवा बैल बोलते थे। एक दिन एकाएक मरकहवा बैल बीमार हो गया है और उसकी मौत हो गई। मुझे याद आता है कि घर के सभी सदस्य रोने लगे थे और उस दिन घर में खाना भी नहीं बना था, संभवतः यह सना 1990 के आसपास की बात होगी।
धीरे-धीरे इस मेले में जानवरों को कसाईखानो में बेचने वाले व्यापारियों का आना जाना बढ़ गया, ज्यादा पैसे के लिए लोग पशुओं को इन व्यापारियों के हाथ बेच कर अच्छा खासा मुनाफा कमाने लगे।
हमें याद आता है कि जब ऐसे व्यापारी मेले में बेचने खरीदने के लिए हमारे गांव की ओर से बैलों को लेकर आते जाते थे तो हमारे गांव के कुछ बदमाश टाइप के लोग इन व्यवसायियों से पैसों की वसूली भी करते थे। अब जब दुल्लहपुर जाना होता है स्टेशन के सामने देखने पर पुराना मेला याद आने लगता है और उसकी यादें मन को भावुक कर देती है।
कभी ऐसे भी सुनहरे दिन थे कि जब हर घर में गाय भैंस बैल हुआ करते थे, जिस घर में जानवर नहीं होते थे उस परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा कम मानी जाती थी।
हमको लग रहा है कि लगभग बीस साल पहले से यह मेला बंद हो गया है। आज तो यह समय आ गया है कि लगभग हर गांव में पैसा होने पर भी दुध नही मिल रहा है, आधे लोग डिब्बे के दुध दही के भरोसे हो गये हैं।
अब गांव भी बनावटी शहर बनते जा रहे हैं क्योंकि अब गांव के अधिकांश परिवार ऐसे हैं जिनके पास कोई पशु नहीं है, लोग पशु पालने से कतरा रहे हैं और पशु पालने को निरर्थक और घाटे का सौदा समझ रहे हैं !
क्या वर्तमान में आपके घर में कोई पशु हैं ? यदि हैं तो आपकी महानता है। पता नहीं फिर कब दुल्लहपुर बाजार का पशु (बैल) मेला शुरू होगा ... ... ...

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यदि आपकी यादों में दुल्लहपुर मेले से जुड़ी कोई बात हो तो कमेन्ट में लीखिए मैं उसे इसमें जोड़ लुंगा।
पोस्ट पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजियेगा। यदि पोस्ट अच्छी लगे तो शेयर करें।
बाकी फिर कभी... ...
आप सभी को धन्यवाद 🙏
✍️ नीरज सिंह 'अजेय'
नीरज सिंह 'अजेय'  'हिन्दी साहित्यकार'



सोमवार, 5 जून 2023

कुछ भी हो नाम देखना जरूरी है। पंडित राजेंद्र प्रसाद शर्मा

अभी तक 300 से ज्यादा को मौत की नींद सुलाने वाला और 900 से ज्यादा को गंभीर घायल करने वाला उड़ीसा का ट्रेन एक्सीडेंट जिस स्टेशन पर हुआ उसका नाम है। बहानागा स्टेशन। इस स्टेशन के स्टेशन मास्टर का नाम है मोहम्मद शरीफ अहमद।

सुना है -
एक्सीडेंट की जाँच के आदेश के बाद से ही फ़रार है मोहम्मद शरीफ अहमद।

हम तो हमेशा से कहते आये हैं कि व्यापार हो, नौकरी हो, कारोबार हो, मजदूरी हो, सब्जी जो, फल हो, दूध हो..... कुछ भी हो -- नाम देखना जरूरी है।



परोपकार से बड़ा कोई धर्म नही है- नीरज सिंह अजेय हिन्दी साहित्यकार

रात तक़रीबन 9 बजे दफ़्तर से लौटने के क्रम में प्रफुल्ल बाबू की चमचमाती मर्सिडीज कार जैसे ही उनके घर के मुख्य फाटक में घुसी,ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मी तेज़ी से दौड़कर उनके पास पहुंचा औऱ उन्हें सैल्यूट करते हुए कहा...“साहब, एक महिला आपके लिए लिखी गई किसी व्यक्ति की एक चिट्ठी लेकर न जाने कब से यहाँ भटक रही हैं औऱ बार बार आपसे मिलने का अनुरोध कर रही है। मेरे मना करने के बाद भी यहाँ से भाग नहीं रही है , उसके साथ उसका एक बच्चा भी है ।”

प्रफुल्ल जी ने गार्ड की बातों को सुन बेहद अचरज से उस महिला को अपने नज़दीक बुलाया औऱ उससे जानना चाहा..."आप कहाँ से आई हैं और मुझसे क्यों मिलना चाहती हैं , किसने मुझें ये चिट्ठी लिखी है" ??

कपकपाती हाथों से महिला ने बिना कुछ ज़्यादा बोले प्रफुल्ल जी को एक चिट्ठी पकड़ाई औऱ फ़िर मद्धिम आवाज़ में सिसकते हुए बोली...." साहब, मैं अभागन बड़ी भयानक मुसीबत में हूँ , तत्काल आपकी मदद चाहिए , आपके पिताजी ने मुझें ये चिट्ठी देकर आपके पास भेजा है ।मेरा एकलौता बेटा बहुत बीमार है । इसे किसी भी तरह किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दीजिए ।आपका जीवनभर उपकार रहेगा ।गांव में इसके इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण मज़बूरी में मैं आपके पास आई हूँ "।

चिट्ठी देते हुए महिला प्रफुल्ल जी के सामने अपना दोनों हाथ जोड़कर खड़ी हो गई ।

प्रफुल्ल जी ने उस चिट्ठी को ध्यान से पढ़ा और कुछ पल के बाद बेहद गंभीर व शांत हो गए । उसके बाद वे मैली कुचैली साड़ी पहनी क़भी उस महिला की तरफ़ अपनी आँखें फेरते तो क़भी उस चिट्ठी की तरफ़ । कुछ देर तक बेहद गहरी चिंता में प्रफुल्ल बाबू गोताखोरी करते रहे ।

दरअसल उस चिट्ठी के साथ साथ वो महिला अपने गंभीर रूप से बीमार बच्चे को लेकर उनके पास इलाज़ हेतु मदद के लिए अपने गांव से शहर पहुँची थी ।

"आप कब से मेरा इंतज़ार कर रही हैं , क्या आपने कुछ खाया है"....?? प्रफुल्ल जी ने महिला से जानना चाहा ।

इसके उत्तर में महिला कुछ बोल न सकी , बस उनको लगातार एक टक देखती रही ।

प्रफुल्ल जी ने उसी क्षण अपने सुरक्षाकर्मी को बोल उस महिला औऱ उसके बीमार बच्चे के लिए अपने आउट गेस्ट रूम में रहने का इंतजाम करवाया औऱ फ़िर वहीं कुछ देर बाद दोनों के लिए भोजन का प्रबंध किया गया ।

उन दोनों के भोजन करते करते प्रफुल्ल जी फ़िर अपने मोबाइल फोन से किसी से कुछ बात करते हुए उनके सामने उपस्थित हो गए ।

महिला ने पुनः उनसे फरियाद करते हुए कहा..."साहब , भगवान के लिए मेरी मदद कीजिए और मेरे एकलौते बीमार बच्चे को किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दीजिए , नहीं तो इसका बचना मुश्किल है "।

महिला बोलते बोलते उनके पैरों पर गिर पड़ी ।

"अरे माताजी ऐसा मत कीजिए, आप मेरी मां समान हैं , आप चिंता मत कीजिए, सब ठीक हो जाएगा"....प्रफुल्ल बाबू ने उसकी हिम्मत बढ़ाई ।

इतने में रात के बेहद ख़ामोश सन्नाटे को चीरती हुई हॉर्न बजाती एक दूसरी गाड़ी तेज़ी से घर के अंदर घुसी औऱ कुछ पल बाद एक डॉक्टर वहाँ उपस्थित हुए ।

"आईए डॉक्टर साहब , ये बच्चा बीमार है , इसको ज़रा बेहद गंभीरता से पड़ताल कर इसका इलाज़ कीजिए"...प्रफुल्ल जी ने कहा ।

डॉक्टर बाबू ने बिना अपना वक़्त गवाएं तकरीबन बीस मिनट तक उस बच्चे का गहन निरीक्षण किया औऱ फ़िर कुछ जाँच करने के साथ साथ कुछ दवाईयों की पर्ची भी वहाँ खड़े प्रफुल्ल बाबू के हाथों में पकड़ा दी ।

"ये कुछ दवाइयां औऱ इंजेक्शन मेडिकल स्टोर से तत्काल मंगा लीजिए , अभी देने हैं और मैं अपने साथ जांच के लिए इस बच्चे का रक्त नमूना लेकर जा रहा हूँ ,इनके रिपोर्ट लेकर कल फ़िर आऊंगा" ......डॉक्टर ने प्रफुल्ल बाबू से कहा औऱ फिर वहां से निकल गए ।

प्रफुल्ल बाबू ने डॉक्टर की पर्ची औऱ कुछ पैसे अपने ड्राइवर को पकड़ाते हुए उसे तुरंत सारी दवाइयां लाने का निर्देश दिया औऱ फ़िर ख़ुद अपने घर के अंदर जाने के लिए वहाँ से बरामदे की ओर मुड़े ।

"साहब बस आप मेरे बच्चे को किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती करा देते , मैं ग़रीब कहाँ से दे पाऊंगी इलाज़ के इतने पैसे, मेरे पास तो रहने खाने के भी पैसे नहीं हैं"....महिला गिड़गिड़ाई ।

"माता जी , बस आप निश्चिंत रहें औऱ जाकर आराम करें , रात बहुत हो चुकी है ".....इतना कहकर प्रफुल्ल बाबू वहां से निकल अपने घर के अंदर प्रवेश कर गए ।

सुबह डॉक्टर बाबू बच्चे के तमाम रिपोर्ट के साथ फ़िर हाज़िर हुए और उसे एक दो इंजेक्शन तथा कुछ दवाइयां दीं ।

अपने दफ़्तर जाने से ठीक पहले प्रफुल्ल बाबू ने भी बीमार बच्चे के साथ साथ उस महिला का अच्छी तरह से ख़ैर मखदम लिया और सबको उन दोनों का बेहतर ख़याल रखने के लिए निर्देशित कर वहाँ से निकल गए । प्रफुल्ल बाबू एक निजी दूरसंचार कंपनी में बड़े ओहदे पर कार्यरत थे ।

डॉक्टर बाबू अब नियमित रूप से आकर उस बीमार बच्चे की जाँच करते औऱ साथ ही बेहतर ढंग से उसका इलाज़ भी ।

प्रफुल्ल बाबू भी सुबह शाम जब भी उनको समय मिलता उन दोनों की खोज ख़बर ले लेते ।

महिला जब भी उनको देखती रोते हुए उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती , हालांकि प्रफुल्ल बाबु उसको बार बार औऱ लगातार ये न करने के लिए कहते रहते ।

दिन बीतने के साथ साथ बच्चे का नियमित रूप से बेहतर इलाज़ होता रहा , साथ ही रहने खाने का भी भरपूर ख़याल रखा जाता ।

तक़रीबन एक महीने के बाद जब बच्चा पूरी तरह से तंदरुस्त हो गया तो महिला प्रफुल्ल बाबू के सामने जाकर बोली . ."साहब, मेरा बच्चा बिलकुल ठीक हो चुका है , हम अब वापस अपने गांव जाना चाहते हैं । आपने जो मेरे लिए किया उसके लिए मैं जीवन भर आपका औऱ आपके पिता कृष्णकांत जी का एहसानमंद रहूंगी" ।

जब वो महिला अपने बच्चे के साथ वहाँ से विदा होने लगी तो प्रफुल्ल बाबू ने कुछ रुपयों के साथ दोनों को नए कपड़े औऱ दो जोड़ी नए चप्पल उपहार स्वरूप दी औऱ साथ ही उसे एक चिट्ठी भी देते हुए कहा कि "इसे उन्हें ही दे दीजिएगा जिन्होंने आपको यहाँ भेजा था "।

महिला हाथ जोड़कर कृतज्ञता का भाव प्रकट करते हुए उन्हें लगातार अनगिनत दुआएं देती वहाँ से बढ़ चली ।

ठीक दूसरे ही दिन अपने गाँव पहुँच कृष्णकांत जी को वह चिट्ठी देते हुए महिला उनसे प्रफुल्ल जी की बहुत तारीफ़ करने लगी....“ बाबा , आपका बेटा तो देवता है देवता , कितना ख़याल रखा हमारा...ऐसा बेटा किस्मत वाले को नसीब होता है, ऊपरवाला उन्हें औऱ उनके समूचे परिवार को हमेशा सलामत रखे ।”

कृष्णकांत जी उस चिट्ठी को पढ़कर दंग रह गए...उसमें लिखा था, “ परम आदरणीय बाबू जी ,मैं आपको नहीं जानता औऱ न ही क़भी आपसे मिला हूँ लेकिन अब आपका बेटा इस पते पर नहीं रहता ... कुछ महीने पहले ही उसने ये मकान बेच दिया है । अब मैं यहाँ रहने लगा हूँ, पर मुझे भी आप अपना बेटा ही समझिए । बचपन से ही मैं अपने पिता से महरूम रहा हूँ , लेकिन मैंने जब आपका पत्र पढ़ा तो मुझें ऐसा लगा जैसे मेरे सगे बाप ने मुझें कुछ करने के लिए आदेश दिया है । आप कृपया इनसे कुछ मत कहिएगा। आपकी वजह से मुझे इस माता के द्वारा जितना आशीर्वाद और दुआएँ मिली हैं, उस उपकार के लिए मैं आपका ताउम्र ऋणी रहूँगा .. आपका अपना प्रफुल्ल शर्मा ।”

कुछ बेहद ख़ामोश लम्हों के बाद कृष्णकांत जी का सिर कुछ सोचकर ख़ुद ब ख़ुद उस अनजान पवित्र आत्मा के सम्मान में झुक गया......औऱ उनकी आंखें तो नम थीं ही !!
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परहित सरिस धर्म नहीं भाई...
परपीड़ा सम नहीं अधमाई...!!

गोस्वामी तुलसीदासजी.......

परोपकार से बड़ा कोई धर्म नही है......!!
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नीरज सिंह 'अजेय'
नीरज सिंह 'अजेय' 'हिन्दी साहित्यकार'


सोमवार, 29 मई 2023

आखिर कौन थे सम्राट पृथ्वीराज चौहान -श्री राम बहादुर राय भरौली बलिया उत्तर प्रदेश

आखिर कौन थे ?
सम्राट पृथ्वीराज चौहान

पूरा नाम :- पृथ्वीराज चौहान
अन्य नाम :- राय पिथौरा
माता/पिता :- राजा सोमेश्वर चौहान/कमलादेवी
पत्नी :- संयोगिता
जन्म :- 1149 ई.
राज्याभिषेक :- 1169 ई.
मृत्यु :- 1192 ई.
राजधानी :- दिल्ली, अजमेर
वंश :- चौहान (राजपूत)

आज की पीढ़ी इनकी वीर गाथाओं के बारे मे..
बहुत कम जानती है..!!
तो आइए जानते है.. #सम्राट #पृथ्वीराज #चौहान से जुडा इतिहास एवं रोचक तथ्य,,,

''(1) #पृथ्वीराज_चौहान ने 12 वर्ष कि उम्र मे बिना किसी हथियार के खूंखार जंगली शेर का जबड़ा फाड़
ड़ाला था ।

(2) #पृथ्वीराज_चौहान ने 16 वर्ष की आयु मे ही
महाबली नाहरराय को युद्ध मे हराकर माड़वकर पर विजय प्राप्त की थी।

(3) #पृथ्वीराज_चौहान ने तलवार के एक वार से जंगली हाथी का सिर धड़ से अलग कर दिया था ।

(4) महान सम्राट #पृथ्वीराज_चौहान कि तलवार का वजन 84 किलो था, और उसे एक हाथ से चलाते थे ..सुनने पर विश्वास नहीं हुआ होगा किंतु यह सत्य है..

(5) सम्राट #पृथ्वीराज_चौहान पशु-पक्षियों के साथ बाते करने की कला जानते थे।

(6) महान सम्राट #पृथ्वीराज_चौहान पुर्ण रूप से मर्द थे ।
अर्थात उनकी छाती पर #स्तन नहीं थे ।

(7) #पृथ्वीराज_चौहान 1166 ई. मे अजमेर की गद्दी पर बैठे और तीन वर्ष के बाद यानि 1169 मे दिल्ली के सिंहासन पर बैठकर पूरे हिन्दुस्तान पर राज किया।

(8) सम्राट #पृथ्वीराज_चौहान की तेरह पत्नियां थी।
इनमे संयोगिता सबसे प्रसिद्ध है..

(9) #पृथ्वीराज_चौहान ने मुहम्मद गौरी को 16 बार युद्ध मे हराकर जीवन दान दिया था..
और 16 बार कुरान की कसम का खिलवाई थी ।

(10) गौरी ने 17 वी बार मे चौहान को धौखे से बंदी बनाया और अपने देश ले जाकर चौहान की दोनो आँखें फोड दी थी ।
उसके बाद भी राजदरबार मे #पृथ्वीराज_चौहान ने अपना मस्तक नहीं झुकाया था।

(11) महमूद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर अनेकों प्रकार की पीड़ा दी थी और कई महीनों तक भूखा रखा था..
फिर भी सम्राट की मृत्यु न हुई थी ।

(12) सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सबसे बड़ी विशेषता यह थी की...
जन्मसे शब्द भेदी बाण की कला ज्ञात थी।
जो की अयोध्या नरेश "राजा दशरथ" के बाद..
केवल उन्हीं में थी।

(13) #पृथ्वीराज_चौहान ने महमुद गौरी को उसी के भरे दरबार मे शब्द भेदी बाण से मारा था ।
गौरी को मारने के बाद भी वह दुश्मन के हाथो नहीं मरे..
अर्थात अपने मित्र चन्द्रबरदाई के हाथों मरे, दोनो ने एक दूसरे को कटार घोंप कर मार लिया.. क्योंकि और कोई विकल्प नहीं था ।

दुख होता है ये सोचकर कि ऐसे महान योद्धा का इतिहास और भूगोल ढंग से नहीं लिखा गया है।

राम बहादुर राय
भरौली, बलिया,उत्तरप्रदेश


रविवार, 28 मई 2023

रिजल्ट तो हमारे जमाने में आते थे- लव तिवारी

ये जमाना गुजर गया ।अब बच्चो के no 95% से भी ऊपर आने पर भी कुछ नही आता ओर उस जमाने के 36 % वाला भी आज की फौज को पढ़ा रहा है

रिजल्ट तो हमारे जमाने में आते थे, जब पूरे बोर्ड का रिजल्ट 17 ℅ हो, और उसमें भी आप ने वैतरणी तर ली हो (डिवीजन मायने नहीं, परसेंटेज कौन पूँछे) तो पूरे कुनबे का सीना चौड़ा हो जाता था।

दसवीं का बोर्ड...बचपन से ही इसके नाम से ऐसा डराया जाता था कि आधे तो वहाँ पहुँचने तक ही पढ़ाई से सन्यास ले लेते थे। जो हिम्मत करके पहुँचते, उनकी हिम्मत गुरुजन और परिजन पूरे साल ये कहकर बढ़ाते,"अब पता चलेगा बेटा, कितने होशियार हो, नवीं तक तो गधे भी पास हो जाते हैं" !!

रही-सही कसर हाईस्कूल में पंचवर्षीय योजना बना चुके साथी पूरी कर देते..." भाई, खाली पढ़ने से कुछ नहीं होगा, इसे पास करना हर किसी के लक में नहीं होता, हमें ही देख लो... 

और फिर , जब रिजल्ट का दिन आता। ऑनलाइन का जमाना तो था नहीं,सो एक दिन पहले ही शहर के दो- तीन हीरो (ये अक्सर दो पंच वर्षीय योजना वाले होते थे) अपनी हीरो स्प्लेंडर या यामहा में शहर चले जाते। फिर आधी रात को आवाज सुनाई देती..."रिजल्ट-रिजल्ट"

पूरा का पूरा मुहल्ला उन पर टूट पड़ता। रिजल्ट वाले #अखबार को कमर में खोंसकर उनमें से एक किसी ऊँची जगह पर चढ़ जाता। फिर वहीं से नम्बर पूछा जाता और रिजल्ट सुनाया जाता...पाँच हजार एक सौ तिरासी ...फेल, चौरासी..फेल, पिचासी..फेल, छियासी..सप्लीमेंट्री !!
कोई मुरव्वत नहीं..पूरे मुहल्ले के सामने बेइज्जती।

रिजल्ट दिखाने की फीस भी डिवीजन से तय होती थी,लेकिन फेल होने वालों के लिए ये सेवा पूर्णतया निशुल्क होती।

जो पास हो जाता, उसे ऊपर जाकर अपना नम्बर देखने की अनुमति होती। टोर्च की लाइट में प्रवेश-पत्र से मिलाकर नम्बर पक्का किया जाता, और फिर 10, 20 या 50 रुपये का पेमेंट कर पिता-पुत्र एवरेस्ट शिखर आरोहण करने के गर्व के साथ नीचे उतरते।

जिनका नम्बर अखबार में नहीं होता उनके परिजन अपने बच्चे को कुछ ऐसे ढाँढस बँधाते... अरे, कुम्भ का मेला जो क्या है, जो बारह साल में आएगा, अगले साल फिर दे देना एग्जाम...

पूरे मोहल्ले में रतजगा होता।चाय के दौर के साथ चर्चाएं चलती, अरे ... फलाने के लड़के ने तो पहली बार में ही ...
     
आजकल बच्चों के मार्क्स भी तो #फारेनहाइट में आते हैं।
99.2, 98.6, 98.8.......

और हमारे जमाने में मार्क्स #सेंटीग्रेड में आते थे....37.1, 38.5, 39

हाँ यदि किसी के मार्क्स 50 या उसके ऊपर आ जाते तो लोगों की खुसर -फुसर .....
नकल की होगी ,मेहनत से कहाँ इत्ते मार्क्स आते हैं।
वैसे भी इत्ता पढ़ते तो कभी देखा नहीं । (भले ही बच्चे ने रात रात जगकर आँखें फोड़ी हों)

सच में, रिजल्ट तो हमारे जमाने में ही आता था।
😅😅😅


शनिवार, 27 मई 2023

उठता लहंगा बढ़ती इज्जत- गरीबी मर्द के कपड़े उतारती है अमीरी औरत के- लव तिवारी

उठता लहंगा बढ़ती इज्जत ?
सन 1980 तक लड़कियाँ कालेज में साड़ी पहनती थी या फिर सलवार सूट।
इसके बाद साड़ी पूरी तरह गायब हुई और सलवार सूट के साथ जीन्स आ गया।
2005 के बाद सलवार सूट लगभग गायब हो गया और इसकी जगह Skin Tight काले सफेद #स्लैक्स आ गए, फिर 2010 तंक लगभग #पारदर्शी_स्लैक्स आ गए जिसमे #आंतरिक_वस्त्र पूरी तरह स्प्ष्ट दिखते हैं।
फिर सूट, जोकि पहले घुटने या जांघो के पास से 2 भाग मे कटा होता था, वो 2012 के बाद कमर से 2 भागों में बंट गया और
फिर 2015 के बाद यह सूट लगभग ऊपर नाभि के पास से 2 भागो मे बंट गया, जिससे कि लड़की या महिला के नितंब पूरी तरह स्प्ष्ट दिखाई पड़ते हैं और 2 पहिया गाड़ी चलाती या पीछे बैठी महिला अत्यंत विचित्र सी दिखाई देती है, मोटी जाँघे, दिखता पेट।

आश्चर्य की बात यह है कि यह पहनावा कॉलेज से लेकर 40 वर्ष या ऊपर उम्र की महिलाओ में अब भी दिख रहा है। बड़ी उम्र की महिलायें छोटी लड़कियों को अच्छा सिखाने की बजाए उनसे बराबरी की होड़ लगाने लगी है। नकलची महिलाए,

अब कुछ नया हो रहा 2018 मे, स्लैक्स ही कुछ Printed या रंग बिरंगा सा हो गया और सूट अब कमर तक आकर समाप्त हो गया यानि उभरे हुए नितंब अब आपके दर्शन हेतु प्रस्तुत है।

साथ ही कॉलेजी लड़कियों या बड़ी महिलाओ मे एक नया ट्रेंड और आ गया, स्लैक्स अब पिंडलियों तंक पहुच गया, कट गया है नीचे से
(पुरुषों की वेशभूषा में पिछले 40 वर्ष मे कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नही हुआ)

पहले पुरुष साधारण या कम कपड़े पहनते थे, नारी सौम्यता पूर्वक अधिक कपड़े पहनती थी, पर अब टीवी सीरियलों, फिल्मों की चपेट में आकर हिन्दू नारी के आधे कपड़े स्वयं को Modern बनने में उतर चुके हैं।
यूरोप द्वारा प्रचारित #नंगेपन के षडयंत्र की सबसे आसान शिकार, भारत की मॉडर्न महिलाए है, जो फैशन के नाम पर खुद को नंगा करने के प्रति वेहद गंभीर है, पर उन्हें यह ज्ञात नहीं कि वो जिसकी नकल कर इस रास्ते पर चल पड़ी है, उनको इस नंगापन के लिए विज्ञापनों में करोड़ो डॉलर मिलते है। उन्हें कपडे न पहनने के पैसे मिलते हैं।
यहाँ कुछ महिलाए सोचेंगी की हमे क्या पहनना है ये हम तय करेंगे कोई और नहीं, तो आप अपनी जगह बिलकुल सही हैं, लेकिन ज़रा सोचिये यदि आप ऐसे कपडे पहनती हैं जिसके कारण आप खुद को असहज महसूस करती हो, ऐसे दिखावे के कपडे पहनने से क्या फायदा?

कल्याण - नारी अंक, गीताप्रेस अवश्य पढ़ें।
यह पोस्ट केवल हमारी बहु, बेटियों, माताओं, बहनों को यूरोप द्वारा प्रचारित नंगेपन के षडयंत्र का शिकार बननें से रोकने के लिए है, यदि इस पोस्ट को आप अपनें बहनों, बेटियों से शेयर करें तो हो सकता है, हमारा आनें वाला समाज प्रगति की ओर तत्पर होवे।

और हां सुनो लडकियों/महिलाओं जो आपके शुभचिंतक हैं वही चाहते हैं कि आप मर्यादा मे सुशोभित और सुसज्जित रहें आप की तरफ कोई नजर उठाकर ना देखे वरना दुनिया तो नंगा ही देखना चाहती है।

Note-अगर कम कपड़े पहनना ही मॉडर्न होना है
तो जानवर इसमें आप से बहुत आगे हैं-





बुधवार, 17 मई 2023

बिहार और बागेश्वर धाम श्री धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री साभार:-सर्वेश तिवारी श्रीमुख की कलम से


एक पच्चीस वर्ष का युवा कथावाचक बिहार जैसे राज्य में आता है और दूसरे ही दिन आठ से दस लाख की भीड़ उमड़ पड़ती है, तो यह सिद्ध होता कि अब भी इस देश की सबसे बड़ी शक्ति उसका धर्म है। मैं यह इसलिए भी कह रहा हूँ कि इसी बिहारभूमि पर किसी बड़े राजनेता की रैली में 50 हजार की भीड़ जुटाने के लिए द्वार द्वार पर गाड़ी भेजते और पैसे बांटते हम सब ने देखा है। वैसे समय में कहीं दूर से आये किसी युवक को देखने के लिए पूरा राज्य दौड़ पड़े, तो आश्चर्य होता है। मेरे लिए यही धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का सबसे बड़ा चमत्कार है।

वह दस लाख की भीड़ किसी एक जाति की भीड़ नहीं है, उसमें सभी हैं। बाभन-भुइंहार हैं, तो कोइरी कुर्मी भी... राजपूत हैं तो बनिया भी, यादव भी, हरिजन भी... यह वही बिहार है जहां हर वस्तु को जाति के चश्मे से देखने की ही परम्परा सी बन गयी है। उस टूटे हुए बिहार को एक युवक पहली बार में इतना बांध देता है, तो यह विश्वास दृढ़ होता है कि हमें बांधना असम्भव नहीं। राजनीति हमें कितना भी तोड़े, धर्म हमें जोड़ ही लेगा...
आयातित तर्कों के दम पर कितना भी बवंडर बतिया लें, पर यह सत्य है कि इस देश को केवल और केवल धर्म एक करता है। कश्मीर से कन्याकुमारी के मध्य हजार संस्कृतियां निवास करती हैं। भाषाएं अलग हैं, परंपराएं अलग हैं, विचार अलग हैं, दृष्टि अलग है, भौगोलिक स्थिति अलग है, परिस्थितियां अलग हैं, फिर भी हम एक राष्ट्र हैं तो केवल और केवल धर्म के कारण! धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री उसी धर्म की डोर से सबको बांध रहे हैं।

कुछ लोग उनके चमत्कारी होने को लेकर उनकी आलोचना करते हैं। मैं अपनी कहूँ तो चमत्कारों पर मेरा अविश्वास नहीं। एक महाविपन्न परिवार से निकला व्यक्ति यदि युवा अवस्था में ही देश के सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल हो जाता है, तो इस चमत्कार पर पूरी श्रद्धा है मेरी...

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने समय के मुद्दों पर स्पष्ट बोलते हैं, यह उनकी शक्ति है। नवजागृत हिन्दू चेतना को अपने संतों से जिस बात का असंतोष था कि वे हमारे विषयों पर बोलते क्यों नहीं, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री उस असन्तोष को शांत कर रहे हैं। यह कम सुखद नहीं...
कुछ लोग धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को रोकने के दावे कर रहे थे। मैं जानता हूँ, उन्हें ईश्वर रोके तो रोके, अब अन्य कोई नहीं रोक सकेगा... धीरेंद्र समय की मांग हैं। यह समय ही धीरेंद्र शास्त्री का है।
मैं स्पष्ट मानता हूँ कि यह भारत के पुनर्जागरण का कालखंड है, अब हर क्षेत्र से योद्धा नायक निकलेंगे। राजनीति, धर्म, अर्थ, विज्ञान, रक्षा... हर क्षेत्र नव-चन्द्रगुप्तों की आभा से जगमगायेगा। देखते जाइये...

साभार:-सर्वेश तिवारी श्रीमुख की कलम से

मंगलवार, 9 मई 2023

अविजित स्वाभिमान की पावन, वीर-कहानी अमर रहे। जय-जय राजस्थान तुम्हारी तेरा पानी अमर रहे। रचना श्री संजीव त्यागी ग़ाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

अविजित स्वाभिमान की पावन,
वीर-कहानी अमर रहे।
जय-जय राजस्थान तुम्हारी,
तेरा पानी अमर रहे।

जिसकी टापों से अरिदल के,
बढ़े हौसले चूर हुए।
शूर-शिरोमणि का वह चेतक,
हय तूफानी अमर रहे।

जब कर से करवालें छूटीं,
रजपूती शर्मिंदा थी।
तब गौरव हित लड़ने वाला,
हर बलिदानी अमर रहे।

स्वामी के प्राणों की रक्षा,
शीश कटा कर जिसने की।
राजभक्ति का अमिट चिह्न वो,
झाला मानी अमर रहे।

किया निछावर पाई-पाई,
राष्ट्र-धर्म की रक्षा में।
वणिक-विभूषण महामना वह,
भामा दानी अमर रहे।

पति-व्रत के पालन में जिसने,
वन के अगणित कष्ट सहे।
कुल सिसोदिया की मर्यादा,
वह पटरानी अमर रहे।।

जिसका अतुल शौर्य हर्षित हो,
सदियाँ सदियों गाएँगी।
गिरि अरावली का प्रताप वह,
कुलाभिमानी अमर रहे।।

महाप्रतापी,महापराक्रमी महाराणा प्रताप की जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।

शत शत नमन, सादर वन्दन🙏🌹

-संजीव कुमार त्यागी


मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

मैं गाजीपुर हूं- नीरज सिंह अजेय हिन्दी साहित्यकार


मैं_गाजीपुर_हूं

 गाजीपुर की भी कुछ सुनिए

"हटो व्योम के मेघ स्वर्ग लूटने हम आते हैं
गौरव बलिदानी गाजीपुर तेरी कीर्ति गाते हैं"

'सुनो तुम कब जानोगे कि मेरा हाल कैसा है
अभी मेरे कांधे से सारी दुनिया देखते हों |'

भागीरथी की धारा और गोमती की लहरों के साथ लिपटे हुए श्वेत व चमकते रेत भण्डारों की भांति मैं कभी जल की धार में बहता रहा और कभी पवन की प्रबल वेग में पूरे पूर्वांचल की मिट्टी में अपने और तुमको भी चमकाता रहा हूं।
तुम तो अभी भी बच्चे हो क्योंकि वैदिक युग से लेकर वर्तमान कलयुग तक न जाने कितनी पीढ़ियों का पालन और विसर्जन करना पड़ा है मुझे ... ...
राजा गधि व उनके पुत्र महर्षि जगदमिनी की वैभव गरिमा के कारण ही कालांतर में मैं गाजीपुर बना, जब तुम आत्मा के स्वरूप में किसी अन्य नश्वर शरीर में विराजमान थे उस वैदिक युग में भी मैं इस पावन भारत भूमि का प्रमुख घनघोर वन और इस ऋषियों मुनियों की तपस्थली रहा। तुम मेरे बारे में रामायण काल मैं भी उल्लेख देखोगे |
मेरी गोद में महर्षि यमदग्नी जो कि महाश्री परशुराम के पिता थे, पले और बढ़े थे। प्रसिद्ध ऋषियों गौतम और च्यवन ने मेरी ही पावन मिट्टी में प्राचीन काल में शिक्षण और धर्मोपदेश दिए ...
भगवान बुद्ध, जिन्होंने वाराणसी में सारनाथ में पहला धर्मोपदेश दिया था, के ज्ञान प्रसार केंद्र के रूप में मेरा अंश औहरहार (औड़िहार) शिक्षा का मुख्य केंद्र बनकर उभरा। मेरे कई स्तूपों और खंभे उस अवधि की गौरव गाथा को समेटे हुए है तुमने जाकर उसे देखा कभी पढ़ा, तुमने कभी उन पर अपनी उंगलियों को घुमाया और कुछ महसूस किया ... ...
मेरी पावन धरा पर ऋषि मुनि संग देवर्षि को भी आना पड़ा है, ऐसा लगता था कि इनके आगमन से मेरे रजो भूमि की दूर्वा से लेकर इमली वटवृक्ष तक हर्षित हो गये। देवर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण के साथ गाजीपुर के ददरीघाट पर ही ताड़का वध के समय जाते हुए पार किया था, ऐसी मान्यता वहां के लोगो की है । तुम्हारा ताड़ी घाट ताड़का राक्षसी का अपभ्रंश है जो ताड़का के अधिकार क्षेत्र में ही आता था । राक्षस संस्कृति का विस्तार के लिये गङ्गा नदी के दक्षिणी किनारे तक के भूभाग पर राक्षसों ने बलात अधिकार कर लिया था। देवर्षि विश्वामित्र का आगमन राक्षस संस्कृति के विस्तार को रोकने का हेतु बना। रघुनंदन श्रीराम और लक्ष्मण भी शिक्षा कौशल में पारंगत होने निमित्त विश्वामित्र संग हमारी वसुंधरा पर आये है।
चीनी यात्री ह्यूएन त्संग भी आया था मेरे गांव और शहर में और मुझे चंचू “युद्ध क्षेत्र की भूमि” के रूप में उल्लेख किया खैर अच्छा ही किया क्योंकि मैं शांति और युद्ध दोनों में शामिल रहता हूं ...
मैंने कभी धर्म के आधार पर भेदभाव करना नहीं सीखा, मुगल काल में भी मेरा शानदार इतिहास नासाज फरमाया गया |
कुछ नामचीन कलमकारों व इतिहास नविशों यह भी लिखा है कि मेरा नाम 'गाजीपुर' शैयद मसूद गाजी के नाम पर पड़ा,
मेरे लख्ते जिगर इस्तकेबल कहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम एकता के हमराह शैयद मस्सद गाजी ने 1330 ईस्वी में शहर बसाया तो कुछ ने कहा कि मैं उस्ताद गाजी मशूक द्वारा स्थापित हूं खैर जो भी हो मैं सदियों पहले भी था और आज भी हूं और कल भी रहूंगा ...
मुझे लहुरी काशी यानि काशी की बहन भी बोला जाता है शायद काशी की तरह हर ओ नाम जो मेरे घर में विद्यमान है लेकिन मुझे काशी की तरह सम्मान नहीं मिला। गंगा नदी मेरे आंगन से होकर बहती है गंगा सिधौना क्षेत्र से गोमती नदी का संगम करते हुए मेरे घर में प्रवेश करती है मेरे यहां भी काशी के घाटों की तरह ही कई गंगाघाट है जिनमें ददरी घाट, कलेक्टर घाट, स्ट्रीमर घाट, चितनाथ घाट, महावीर घाट सैदपुर, बाराह घाट औड़िहार तथा श्मशान घाट आदि है।
                मेरे घर में आस्था का द्वार है मौनी बाबा धाम चौचकपुर मेला और स्नान के लिए, पवहारी बाबा आश्रम जहां स्वामी विवेकानंद जी ने दीक्षा लिया, गंगा दास आश्रम जहां स्व. मुलायम सिंह यादव और योगी जी ने भी दर्शन प्राप्त किया।
                                           सिद्धपीठ हथियाराम मठ जहां लकवा के मरीजों का जादुई शीशे के द्वारा इलाज होता रहा है। निर्गुण पंथ (बावरी) की धरोहर सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ जहां लोग आज भी झूठी कसम खाने से डरते हैं। यहां गिरती हुई दीवार का गुरु के आदेश पर रुक जाना, चलती हुई ट्रेन का खड़ा हो जाना, हरवाहे बुलाकी दास (बुला साहेब) लिए भगवान द्वारा दही भेजना।
 चौमुख धाम आश्रम, कीनाराम आश्रम, नागा बाबा आश्रम, बिछुड़ननाथ, बुढ़े महादेव, सांई तकिया आश्रम, चंडी धाम, नवाजू बाबा धाम पशुओं के रोग मुक्ति के लिए मसान धाम आश्रम, मतंग ऋषि की तपोभूमि संगत घाट, सैदपुर भीतरी के स्थान को हूणों के युद्ध के लिए जाना जाता है।
           मेरे आंगन में कितने ही ऐसे सपूतों ने किलकारी भरी है कि मन गर्वित हो जाता है जिसके लिए मुझे पूरा देश याद करता है। मेरे सपूतों में स्वामी सहजानंद सरस्वती, मोहम्मद अयूब खान,शहीद वीर अब्दुल हमीद, शहीद राम उग्रह पाण्डेय, नजीर हुसैन  (भोजपुरी के प्रणेता), राही मासूम रजा, विवेकी राय, भोलानाथ गहमरी, विश्वनाथ सिंह गहमरी आदि ऐसे अनेक सपूत हुए।
दुश्मनों से देश की रक्षा के लिए 1962, 1965, 1971,  1999 के युद्ध में मेरे सपूतों ने अदम्य साहस का प्रदर्शन किया।
     एशिया का सबसे बड़ा गांव गहमर मेरे पास है। ऐतिहासिक अशोक स्तूप जमानियां,  स्कंद गुप्त के समय के सैदपुर भितरी में पुरातात्विक अवशेष जो मेरे लिए विशेष होने के अनकहे प्रमाण है 
18 वीं शताब्दी में में फिरंगियों ने आर्यावर्त की इस पावन भूमि को जंजीरों में जकड़ लिया और मुझे भी बक्सर के साथ जीत लिया जिस पर उनकी ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत थी,  कंपनी ने रिचर्डसन को एक न्यायाधीश के रूप में भेजा और  रॉबर्ट वॉर्लो को इस जिले के पहला कलेक्टर बनाया | लार्ड कार्नवालिस का मकबरा तो तुमने देखा ही होगा नहीं देखा तो पहले मेरे पूरे शहर और गांव के प्रमुख स्थलों को देख कर आओ फिर बताओ मैं कैसा हूं ... ...
मेरी उर्वरता जगजाहिर रही है; मेरी पोषक मिट्टी में नील, अफीम, केवड़ा, गेंदा गुलाब की खेती दशकों तक मेरे कृषकों की आजिविका का मुख्य साधन बना रहा फिर अंग्रेजों ने भी नील, अफीम, केवड़ा और गुलाब की खेती के लिए मुझे उपयोग किया मैंने भी उनके लिए ना सही पर अपने किसानों और अपनी मिट्टी के लिए इसको स्वीकार कर लिया। उन्होंने मुझ में अफ़ीम फैक्टरी स्थापित कर दिया यह वही अफीम फैक्ट्री है जिसे तुम आज भी मेरे शहर में देखते हो  अब तो मैं भारत सरकार को भी सरकारी राजस्व मुहैया करा रहा हूं |
पहले मेरा अफीम ब्रिटिश शासन के दौरान बंगाल की खाड़ी के माध्यम से नौकाओं पर चीन के लिए भेजा जाता था ...
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में मेरे राष्ट्र प्रेमी पुत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। फिरंगियों के शासन में 1942 में रोलेक्ट अधिनियम, ख़िलाफत आंदोलन, नमक सत्याग्रह, विदेश बैरिस्टर के बहिष्कार सत्याग्रह और आंदोलन में देश के अन्य हिस्सों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर और अपने गौरव से निडर होकर भाग लिया।  मेरे बेशकीमती लालों डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी, भागवत मिश्रा, गजानन मारवाड़ी, विश्वनाथ शर्मा, हरि प्रसाद सिंह, राममरात सिंह, रामराज सिंह, इंद्रदेव त्रिपाठी, देवकरण सिंह, सरजू पाण्डेय और अन्य पुत्रों जिनका नाम अभी भूल रहा हूं अरे ! आज भी मैं किशोरों सा साहसी और कर्मवीर बना रहा हूं इन्होंने अपने अदम्य साहस से कीर्तिमान स्थापित किया | मेरे लोगों ने क्विट इंडिया आंदोलन में अभूतपूर्व भूमिका निभाई ...
    मेरे कुलदीपक डॉ. शिवपुजन राय के नेतृत्व में स्वतंत्रता सेनानियों के जत्थे ने मेरे दिल के टुकड़े मुहम्मददाबाद तहसील में ध्वज पताका फहराया। डॉ. शिवपुजन राय, वननारायण राय, रामबदन राय आदि ने तो 18 अगस्त 1942 को देश के लिए अपना जीवन भी बलिदान कर दिया, मैं आज भी इनके लिए अभिमान का भान लिए हुए आंखों से गर्म लाल लाल आंसू गिराता हूं तुम उन बूंदों को अपनी आंखों में ढूंढना फिर तुम्हें मेरे ऊपर गर्व होने लगेगा ...
                       आजादी के बाद, मेरा विकास पिछड़ गया मेरे अपनों ने मेरी मिट्टी के कर्ज को चुकाने में कुछ लापरवाही कर दी इसलिए मैं विकसित नहीं हो सका। आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक और सामाजिक समृद्धि के बाद भी मैं पिछली कतार में क्यों हूं ...
 खैर जो भी हो तुम मेरे इस सपने को पूरा करोगे ना और मुझे पूरे भारत देश का सर्वोत्तम जिला बनाओगे ना ...
मेरी मिट्टी के बहादुर सैनिकों जैसे ब्रिगेडियर उस्मान, परमवीर चक्र पुरस्कार विजेता वीर अब्दुल हमीद, महावीर चक्र विजेता राम उग्रह पाण्डेय ने भी तो अखंड आर्यावर्त को सुरक्षित रखने के लिए अपनी कुर्बानी दे दी अभी तुमने देखा होगा कारगिल की विजयश्री में मेरे लालों ने उल्लेखनीय बहादुरी दिखायी और राष्ट्र के लिए स्वयं को शहीद कर दिया |
कभी बादशाह हिमायूं भी मेरे भिश्ती की मदद से व संत तपस्थली भुड़कुड़ा के परम संत गुरूजी के आशीर्वाद से खुद का जीवन बचाने में सफल रहा था |
मंदिरों, मस्जिदों, गुरूद्वारों व चर्चों के माध्यम से आज भी मेरे लोग धार्मिक सद्भाव के साथ मानवता का प्रसार कर रहे हैं ...
मेरी धरती ने देश को कई अच्छे नेता भी दिए हैं पर मुझे किसी पार्टी विशेष से मत जकड़ो पर मेरे कुल गौरव विकास पुरुष ने पिछले कुछ सालों में मेरे विकसित होने की सपने को पंख लगा दिया है ...
मैं आज भी राष्ट्रहित में प्रयत्नशील हूं पर यह मेरा खुद का प्रयास नहीं है मैं तो बस एक भारत भूमि का राष्ट्रप्रेमी टुकड़ा हूं ... ...
 मैं तो केवल एक प्रतिबिंब हूं , हां मैं केवल तुम्हारा दर्पण हूं तुम यदि अपने कर्तव्य और मानवता से अपने मुख्य मंडल को चमकाते रहोगे तो मैं सदा खिलखिलता रहूंगा ...
बस कुछ सपने अधूरे हैं की मेरे शहर में भी एक विश्वविद्यालय खुल जाए और मेरा अंधऊ हवाई पट्टी शुरू होकर हवाई अड्डा बने और उस पर से भी वायुदूत गुजरे, मेरे छोटे बाजारों और गांव की सड़कें जगह जगह खराब हो गई हैं तुम उस पर चलते हो तो मेरे बदन में भी दर्द होता है पर पता नहीं कब यह सपना पूरा होगा कभी-कभी सपना देखता हूं कि मेरे मिट्टी में भी कुछ कल कारखाने लगे हैं और मेरे लोग यहीं पर अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं। आध्यात्मिक ऐतिहासिक राजनीतिक और सामाजिक समृद्धि के बाद भी मैं पिछली कतार में क्यों हूं ... ... ...
बाकी फिर कभी

✍️ नीरज सिंह 'अजेय' 
नीरज सिंह 'अजेय'  'हिन्दी साहित्यकार' 
यदि लिखने में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करिएगा यह बस एक प्रयास है आप लोगों को अपने गाजीपुर जिले के गौरव गाथा से रूबरू कराने का |
यदि यह प्रयास अच्छा लगे तुम मेरे इस पेज को लाइक और फॉलो अवश्य करें नीरज सिंह 'अजेय'  'हिन्दी साहित्यकार' |




रविवार, 23 अप्रैल 2023

मैं जखनियां गाजीपुर हूं- नीरज सिंह अजेय हिन्दी साहित्यकार

मैं जखनियां हूँ

हजारों सालों से मैं निरंतर आबाद रहा यह और बात है कि पहले मैं एक छोटा सा गांव था समय की धार के साथ बढ़ते बढ़ते मैं एक छोटी बाजार बना फिर लोगों की जरूरत ने मुझे मशहुर कर दिया |
पहले तो केवल घनश्याम की मिठाई की दुकान, कन्हैया के कपड़े की दुकान थीं हा मुन्ना बरई की पान की दुकान पर भी भीड़ लगतीं थी |
मैंने सन 69 में ट्रेन का नदी में गिरना भी देखा है |
हां मैं वही जखनियाँ हूं जिसमें आज से 50 साल पहले एक बुढ़िया जलेबी बनाती थी पहले मेरे पास आने के लिए सड़क नहीं थी, चारों तरफ से रेह ही रेह थी भला हो बच्चा बाबू रामसिंहपुर का की उन्होंने मुझे अपने जमीन में फलने फूलने दिया |

मैं सालों से लोगों को देखता चला रहा हूं मैंने लोगों को मरते देखा है मैंने बच्चों को जन्म लेते देखा है हां मैंने देखा है कि कैसे कुछ अपराधी मेरी धरती को खुन से लाल कर दिए थे पर तभी मुझे अपने वीर शहीद बेटों अब्दुल हमीद और रामउग्रह पाण्डेय का शौर्य और वीरता अभिमानित कर देती है तभी मुझे याद आता है बुढ़िया माई हथियाराम और संत समाधि स्थल भुड़कुड़ा मेरे अभिमान हैं खटिया बाबा, मौनी बाबा, लकड़ियाँ बाबा का आशीर्वाद मुझे हमेशा मिला |

कभी मोती सेठ और जगरनाथ साव ने मेरे बाजार को मशहूर किया, तो कभी हाकिम प्रधान मंदरा ने |

मेरे स्टेशन ने छोटी लाइन से लेकर बड़ी लाइन तक का सफर देखा है |
बच्चों से तो मुझे हमेशा प्यार रहा है ना जाने कितने बच्चे मेरे स्टेशन और बाजार में खेलकूद के बड़े हुए हैं |

मेरी पहचान तहसील बनने से और बढ़ गई उस दिन मैं बहुत खुश हुआ था पर एक बात का दुख भी था कि मेरे विधायकों ने मेरे लिए कभी कुछ नहीं किया, इनके लिए तो मैं बस एक दुधारू गाय🐄 ही बनीं रहीं |

मेरे अस्पताल पर जब डाक्टर मिश्रा आये तब लोगों का आना जाना और बढ़ गया |
शुरू शुरू में तो मेरे बाजार में चालीस पचास ही दुकानें थीं पर समय के साथ आज हजारों दुकानदार मेरी गोद में पल रहे हैं |

मैं अपनी सड़कों को देखता हूँ तो निराश हो जाता हूँ कि क्या ऐसा कोई मेरा लाल नहीं है कि जो मेरी सड़कों को सही से बनवा सकें |
एक समय जयकिशुन सिंह प्रमुख जी से उम्मीदें जगी थी पर बाद में किसी ने सड़कों की सुध नहीं ली |

डा. इन्द्रदेव सिंह ने मेरे क्षेत्र में शिक्षा का अच्छा प्रसार किया | कपिलदेव गुरुजी मंदरा ने भी मेरे मान सम्मान को बढ़ाने का प्रयास किया | मैने मुहनोचवा से लेकर कोरोना तक देखा है |
मेरे बाजार में सब कुछ मिलता है और मिलता है लोगों का प्रेम... ...
फोटो बहुत पुरानी है।

📝 नीरज सिंह
स्वलिखित रचना, अपने जखनियां बाजार को समर्पित करता हूँ |


बुधवार, 12 अप्रैल 2023

कंद-मूल खाने वालों से मांसाहारी डरते थे- शाकाहार अपनाओ

कंद-मूल खाने वालों से
मांसाहारी डरते थे।।

पोरस जैसे शूर-वीर को
नमन 'सिकंदर' करते थे॥

चौदह वर्षों तक खूंखारी
वन में जिसका धाम था।।

मन-मन्दिर में बसने वाला
शाकाहारी राम था।।

चाहते तो खा सकते थे वो
मांस पशु के ढेरो में।।

लेकिन उनको प्यार मिला
शबरी' के जूठे बेरो में॥

चक्र सुदर्शन धारी थे
गोवर्धन पर भारी थे॥

मुरली से वश करने वाले
गिरधर' शाकाहारी थे॥

पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम
चोटी पर फहराया था।।

निर्धन की कुटिया में जाकर
जिसने मान बढाया था॥

सपने जिसने देखे थे
मानवता के विस्तार के।।

नानक जैसे महा-संत थे
वाचक शाकाहार के॥

उठो जरा तुम पढ़ कर देखो
गौरवमय इतिहास को।।

आदम से आदी तक फैले
इस नीले आकाश को॥

दया की आँखे खोल देख लो
पशु के करुण क्रंदन को।।

इंसानों का जिस्म बना है
शाकाहारी भोजन को॥

अंग लाश के खा जाए
क्या फ़िर भी वो इंसान है?

पेट तुम्हारा मुर्दाघर है
या कोई कब्रिस्तान है?

आँखे कितना रोती हैं जब
उंगली अपनी जलती है

सोचो उस तड़पन की हद
जब जिस्म पे आरी चलती है॥

बेबसता तुम पशु की देखो
बचने के आसार नही।।

जीते जी तन काटा जाए
उस पीडा का पार नही॥

खाने से पहले बिरयानी
चीख जीव की सुन लेते।।

करुणा के वश होकर तुम भी
गिरी गिरनार को चुन लेते॥

शाकाहार अपनाओ...!


मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

परमहंस श्री गंगा राम दास जी महाराज जी- लेखक श्री माधव कृष्ण।।

मेरे गुरुदेव की पुण्यतिथि पर

परमहंस श्री गंगा राम दास जी महाराज जी की आज २१वीं पुण्यतिथि हैl (वैशाख कृष्ण पंचमी दिनांक 11l04l23)l श्री महाराज जी श्री गंगा आश्रम बयेपुर देवकली, गाजीपुर के अधिष्ठाता और मानव धर्म प्रसार के प्रवर्तक युग पुरुष संत हैंl उनका जन्म उत्तर प्रदेश में ग़ाज़ीपुर जिला के ग्राम गुरैनी ( थाना शादियाबाद ) में 1 अगस्त 1920 ( श्रावण कृष्ण प्रतिपदा विक्रम संवत 1977 ) को एक संभ्रात कृषक परिवार में हुआ था। उनकी माता जी का नाम श्रीमती गुजरी देवी तथा पिता जी का नाम श्री ठकुरी यादव था।

बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा और शक्ति के धनी श्री महाराज जी बचपन से ही विरक्त थेl मात्र कक्षा 4 तक पढ़ने के बाद 12 वर्ष की अवस्था में उन्होंने सांसारिक बन्धनों से स्वयं को मुक्त करते हुए तपस्वियों की राह पकड़ीl संत श्री रामानन्द की गौरवशाली शिष्य परम्परा के संत परमहंस बाबा राममंगल दास जी ने उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार करते हुए दीक्षित कियाl श्री महाराज जी २५ वर्षों तक भारतीय आध्यात्मिक परम्परा के प्राचीन ऋषियों की भांति कानपुर के जंगलों में यमुनानदी के किनारे आत्म-साक्षात्कार के लिए तपस्यारत रहेl

जिन लोगों ने भारतीय समाज और अध्यात्म को सामंतवादी, जातिवादी, ब्राह्मणवादी इत्यादि सिद्ध कर नीचा दिखाने का प्रयास किया है, उनके लिए यह सोचना उनकी पाचनशक्ति की सामर्थ्य के बाहर है कि, "बाबा गंगाराम दास एक यादव कुल में उत्पन्न हुए थे, उनके गुरु एक ब्राह्मण कुल में उत्पन्न थे, लेकिन उनके गुरु ने केवल पात्रता देखी." और यही तो भारतीय आध्यात्मिक परम्परा चीख-चीख कर कह रही है - जात पात पूछे नहिं कोई/ हरि को भजे सो हरि का होई.

मेरे गुरुदेव ने न जाति देखी, और न धर्म. किसी का मनुष्य होना ही उनके लिए सब कुछ था. इसलिए आज भी आश्रम में सभी के लिए एक ही व्यवस्था है. उनके पास माननीय मुलायम सिंह यादव पहुंचे थे, उनसे भी गुरुदेव का यही प्रश्न था कि, घर घर में लगी आग कौन बुझाएगा? रक्षामंत्री ने उत्तर दिया, सपा बुझायेगी. लेकिन श्री महाराज जी संतुष्ट नहीं हुए. मुरारी बापू से गुरुदेव ने कहा, आप अंतर्राष्ट्रीय संत हैं, लोगों को मनुष्य बनाइए. बापू जी ने कहा, यह आप जैसे उछ कोटि के परमहंस की सामर्थ्य से ही हो सकता है.

आत्म साक्षात्कार और ईश्वर-प्राप्ति के बाद उन्होंने ईश्वर के आदेश से मानवता का प्रसार करने के लिए गाजीपुर के बयेपुर देवकली को अपना कर्म-क्षेत्र बनायाl उनके द्वारा स्थापित तप:स्थली श्री गंगा आश्रम आज गाजीपुर के दिव्यतम स्थान के रूप में प्रसिद्ध होती जा रही हैl वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत पूर्व रक्षा मंत्री स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव, प्रख्यात कथावाचक मुरारी बापू इत्यादि इस आश्रम ने आकर श्री महाराज जी का आशीर्वाद प्राप्त कर चुके हैंl यहाँ श्री राम-जानकी मंदिर, गुरु श्री राममंगल दास जी का मंदिर, यज्ञशाला और पूज्य महाराज जी गंगा राम दास बाबा का समाधि स्थल है, जो निःसंदेह दर्शनीय है। श्री महाराज जी से सम्बन्धित वस्तुओं दिव्य संग्रहालय भी है। यहाँ आश्रम की भावधारा से सम्बंधित पुस्तकें भी मिलती हैं जो अब आई आई टी कानपुर द्वारा भारतीय ग्रंथों के साथ शोध के लिए ऑनलाइन उपलब्ध हैं: https://wwwlrammangaldasjiliitklaclin/l श्री महाराज जी का नीति ग्रन्थ श्री रामचरितमानस हैl

श्री महाराज जी ने पुरातन ऋषियों की भांति धर्म और अध्यात्म को सामाजिक सरोकार से जोड़ाl श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार मनुष्य का कर्म ही परमात्मा की अर्चना हैl श्रीमहाराज जी ने अपने जीवन काल में ही मानव धर्म प्रसार के माध्यम से मनुष्य को मनुष्य बनने पर बल दिया जिससे जातिवाद, साम्प्रदायिक संकीर्णताओं को समाज से दूर किया जा सकेl उनके अनुसार मनुष्यता की तीन कसौटियां हैं – सत्य-न्याय-धर्मl स्थानीय पंचायत के माध्यम से न्याय व्यवस्था को लागू करने के लिए उन्होंने गाँव गाँव में शाखाएं स्थापित कींl आज भी गाजीपुर, फरीदाबाद, कोलकाता, वाराणसी, गोरखपुर, कानपुर लखनऊ, बांदा, मुम्बई, कच्छ इत्यादि शहरों में उनके शिष्य २०० से अधिक शाखाएं संचालित कर रहे हैंl इन शाखाओं की साप्ताहिक बैठक होती है, जिसमें एकत्र भक्त संगठित रहकर अन्याय का सामना करते हैंl गाजीपुर में अनेक शाखाओं के माध्यम से सालों तक चल रहे बैर को आपसी समझ और गाँव वालों की सहभागिता से समाप्त करने का प्रयास किया गया हैl श्री महाराज जी ने अपने जीवनकाल में एक गाँव को गोद लेकर उसे मुकदमाविहीन बनाकर सभी को ऐसा करने का सन्देश दियाl

आश्रम के साधु श्वेत भारतीय परिधान धारण करते हैंl उनके जीवन में सेवा और भजन मुख्य हैंl आज भी आश्रम जाने पर वे प्रत्येक व्यक्ति से समयानुकूल जलपान और भोजन का आग्रह करते हैंl आश्रम में प्रत्येक दिन सैकड़ों असहाय व्यक्ति भोजन पाते हैंl मानव धर्म प्रसार के उद्देश्य की पूर्ति का भार वर्तमान समाज के बीच छोड़कर श्री महाराज जी वैशाख कृष्ण पंचमी के दिन ०१l०५l२००२ को चौबीसवें मानवता अभ्युदय महायज्ञ की पूर्णाहुति के दिन भक्तों के बीच उन्मुनी मुद्रा में बैठकर देह छोड़ दिएl मानवता अभ्युदय यज्ञ का यह ४५ वां वर्ष हैl आज के दिन आश्रम में एक बड़ा भंडारा होता है, और लगभग ४५००० से ५०००० भक्त एक साथ एक पंक्ति में बैठकर आश्रम की महाप्रसाद ग्रहण करते हुए श्री महाराज जी के मार्ग पर चलने के संकल्प लेते हैंl

श्री महाराज जी ने धर्म पर चढ़ रही धूल को पोछते हुए वास्तविक अध्यात्म को प्रकट कियाl उन्होंने पारलौकिक वस्तु को भगवान् श्री राम और भगवान् श्री कृष्ण की भांति इहलौकिक बनाते हुए सत्य-न्याय-धर्म को आगे कियाl उनके सात महावाक्य हैं जो किसी भी धर्मावलम्बी के लिए सत्य हैं, और यही सभी धर्मों के शास्त्रों का निचोड़ है: १. कुछ भी बनने से पहले मानव बनेंl २. परमात्मा अहंकार ही खाता हैl ३. जो दूसरों को सुख देते हैं, परमात्मा उन्हें ही सुख देता हैl ४. परोपकारी धर्मात्मा बिना साधन-तप के भी ईश्वर को प्राप्त कर लेता हैl ५. सत्य न्याय धर्म की स्थापना में आपका सहयोग अपेक्षित हैl ६. परमात्मा अंधा-बहरा नहीं हैl ७. झूठ बोलने वाला कभी आगे नहीं बढ़ सकता हैl

गुरुदेव ने बचपन में मेरा हाथ पकड़ा, मेरी कविता सुनी, और कहा, तुम अच्छा लिखते हो बोलते हो, डी एम के पास जाओ, एस पी के पास जाओ, मानवता के लिए कार्य करो. मुझ जैसे अकिंचन जीव की सामर्थ्य नहीं थी कि उनकी विराट विश्विक चेतना को समझ सकूं. उस समय मुझे लगता था कि, मैं हाथ छुड़ाकर भाग जाऊं. उन्होंने हाथ छोड़ तो दिया और मुझे घूमने दिया, राउरकेला, बैंगलोर, मुम्बई, सिंगापोर, आर्ट ऑफ़ लिविंग, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, इस्कान इत्यादि. लेकिन वृथा न होय देव ऋषि वाणी.

मैं लौट आया और अपने गुरुदेव के मिशन से जुड़ गया. जब मैं परेशान होता हूँ तो उनकी समाधि पर जाता हूँ और मुझे पता है कि वह एक माँ की तरह मुझे सुन रहे हैं. मैं भयभीत होता हूँ तो आँख बंद कर उनका स्मरण कर लेता हूँ और मुझे पता है कि वह एक पिता की तरह मुझे अपनी सुरक्षा-कवच में लपेट लेते हैं. जब मैं सांसारिकता और तात्कालिकता में बह जाता हूँ, तब भी मुझे पता है कि वह माँ बिल्ली की तरह मुझे अपने मुंह में लिए घूम रहे हैं.

ऐसे कामधेनु को पाकर छेरी कौन दुहावे! मेरे गुरुदेव के विषय में अनेक चमत्कार प्रचलित हैं लेकिन उन्होंने कभी इनके प्रचार का आदेश नहीं दिया. उनके लिए केवल मानव धर्म का प्रसार ही एकमात्र कार्य है. आदि शंकर और उपनिषदों ने सभी को ब्रह्म बताकर ऐक्य स्थापित करने की घोषणा की लेकिन वह भाषा अब अन्य मतावलंबियों को मान्य नहीं है. मार्क्स ने सभी श्रमिकों मजदूरों को एक होने के लिए कहा लेकिन इसमें एक बड़ा वर्ग छूट जाता है जिससे संघर्ष की स्थिति लगातार बनी हुई है.

मेरे गुरुदेव ने सभी मनुष्यों के एक हो जाने का आह्वान किया. यही आज के युग की आवश्यकता है. यही सभी के लिए मान्य है. एक देवो देवकीपुत्र. एको गुरु मम गुरुदेव बाबा गंगारामदास, एको आश्रम: श्री गंगा आश्रम:. मेरे गुरुदेव धर्म के साक्षात विग्रह हैं. धर्म के दो मार्ग हैं: निवृत्ति जिसकी पद्धति हमारे गुरुदेव ने सुरति शब्द योग के रूप में डी. यह सर्व सुलभ और सहज मार्ग है. प्रवृत्ति मार्ग के रूप में उन्होंने मानव धर्म प्रसार का कार्य दिया जिससे शिव भाव से जीव सेवा हो सके.

गुरुदेव की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन!

लेखक - श्री माधव कृष्ण


मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

आसान नहीं सावरकर होना - श्री माधव कृष्ण ग़ाज़ीपुर उत्तर प्रदेश


तुम कहते हो
मैं सावरकर नहीं हूँ
यह सही है

तुम सावरकर हो भी नहीं सकते.
इसके लिए वीरता प्रथम चरण है और आत्मोत्सर्ग अंतिम.
नौ वर्ष की वय में हैजे से माँ की मृत्यु
सोलह वर्ष की वय में प्लेग से पिता की मृत्यु
कांटेदार बचपन में अपनी जड़ों को पकड़े रहना सावरकर है
मातृभूमि को माँ समझकर जकड़े रहना सावरकर है.

सोने की चम्मच लेकर
विदेशों में छुट्टियां मनाने वाले स्वातंत्र्यवीर नहीं होते
जिन्होंने अपने दल को ही सामन्तवाद से स्वतंत्र नहीं किया
जहाँ परिवार ही राष्ट्र है
और परिवार के प्रति श्रद्धा ही राष्ट्रभक्ति.
अंधे धृतराष्ट्र की गोद में उन्मादी कौरव पनपते हैं
वहाँ सावरकर जन्म नहीं लेते.
वहां जन्म लेती है सत्ता-लोलुप दुर्योधनी मानसिकता
जिसके लिए किसी और का सत्ता में होना राष्ट्रद्रोह है.

एक सावरकर 'द इण्डियन वॉर ऑफ़ इण्डिपेण्डेंस : 1857' लिखता है
और चीख चीखकर संसार को बता देता है
कि हम बेचैन हैं आज़ादी के लिए
हमारे पुरखों ने जान दी थी १८५७ में,
और वह ग़दर नहीं था
वह आज़ादी की पहली लड़ाई थी...

ऐसा सच बोलने के लिए साहस चाहिए
वह साहस तुम्हारे पास नहीं था
जब कश्मीर के पंडितों का नरसंहार होता रहा
तुम इसे सिद्ध करते रहे - एक छिटपुट घटना
और आज भी कर रहे.

यह साहस 'गाँधी' उपनाम की पूंजी नहीं
यह साहस गांधी महात्मा की पूंजी है, गांधी परिवार की नहीं...

"द हिस्ट्री ऑफ़ द वॉर ऑफ़ इण्डियन इण्डिपेण्डेन्स" लिखने के लिए
एक मनन चाहिए और अध्ययन
जो पुस्तकालयों में नहीं मिलता
अध्येता नहीं मिलते, पुस्तकें खुली हैं खुले आसमान में

एम॰एस॰ मोरिया जहाज के सीवर होल से आज़ादी की राह बना लेना सबके बूते की बात नहीं
असीम समुद्र की छाती को चीरना
सूर्यास्त-विहीन सशक्त राज्य को लांघकर
मनुष्य के असीम सामर्थ्य और सम्प्रभुता को सिद्ध करना हनुमत्ता है
लंका में रहकर लंका की जड़ें खोदना सावरकर है...
दो आजन्म कारावास मिल जाना ही प्रमाण है उस वीरता का
जिसे न देखने के लिए तुम्हारे चश्मों की प्रोग्रामिंग बदल दी गयी है
और तुम नहीं जानते
तुम बहुत छोटे हो उस सूर्य को उंगली दिखाने के लिए
जिसे मौलिक गांधी ने भी वीर कहा था.

सेलुलर जेल में कोल्हू का बैल बनकर नारियल से तेल निकालना
कैसे समझ सकता है एक आरामतलब युवराज
जिसके जीवन की कुल जमापूंजी एक उपनाम है
तुम्हें देखकर ही अब समझ पाता हूँ
कि नाम में क्या रखा है?

तिलक और पटेल की सलाह पर देशसेवा के लिए क्षमा मांगने में
और सरकारी अध्यादेश की कापी फाड़ने पर क्षमा मांगने,
चौकीदार चोर है कह देना और फिर क्षमा मांगने,
एक रक्षा सौदे को घोटाला कहने पर क्षमा मांगने, व
न्यायालय के प्रहार से बचने में अंतर है.

तुमने ठीक कहा
तुम सावरकर नहीं हो
क्योंकि सावरकर मनुष्यता की असीम समर्थ सम्भावनाओं के बीज का उपनाम है.

-माधव कृष्ण
२७.०३.२३
#PMOIndia #PMO #PMNarendraModi






रविवार, 2 अप्रैल 2023

ग़रीबी नहीं बिकती पर गरीब बिकते हैं. निष्ठा का आधार भूख है और भोजन बिकता है- श्री माधव कृष्ण जी

शुक्र है!
-माधव कृष्ण, ०२.०४.२३

(१)
शुक्र है धन है!
धन है तो विज्ञापन है
विज्ञापन है तो -
राजनीतिज्ञ हैं
साहित्यकार हैं
शिक्षक हैं.
शुक्र है! धन है
अन्यथा देश में
न राजनीतिज्ञ दिखते
न साहित्यकार
न विद्यालय.
बस दिखती शुद्ध प्रतिभा!

(२)
शुक्र है धन है!
धन है तो क्रयशक्ति है -
खरीद सकती है पुरस्कार
निकाल सकती है अपनी अज्ञात रचनाओं पर विशेषांक
आयोजित कर सकती है बड़ी गोष्ठियां
निर्मित हो सकते हैं अल्पकालीन साहित्यकार.
और इस क्षणिक प्रतिष्ठा के शृगाल आसन से
दिख सकती है मुड़ती हुई साहित्य की धारा.
पर एक दिन वर्षा होगी
और रंगरेज पकड़े जाएगा
रँगे सियार की भाषा उजागर होगी.
वर्षा के बाद आसमान साफ़ होगा और
रह जायेंगे
सूर सूर्य
तुलसी शशि.

(३)
धन है तो
खरीद सकते हैं मुर्गा
शराब और दंगाई,
ग़रीबी नहीं बिकती
पर गरीब बिकते हैं.
निष्ठा का आधार भूख है
और भोजन बिकता है.
वैचारिक संघर्ष में दो भक्त हैं -
एक भूख के और एक भजन के.
भूख जीत जाती है
और आका बनाते रहते हैं
लाखों करोड़ों और अरबों.
संसद भी जीवंत रहती है
सड़क भी.
शुक्र है भीड़ खरीदी जाती है
अन्यथा
सड़कों पर दीखते
केवल वे मुद्दे जो केवल और केवल जनता के हैं.

(४)
शुक्र है कि धन के साथ जाति है
इन के गोश्त में
कुछ प्रबंधक भेजते हैं दलाल
ताकि हलाल हो सके उनका प्रतिस्पर्धी.
चाहे राजनैतिक या व्यावसायिक या वैचारिक या साहित्यिक.
धन से जाति के नाम पर खरीदे गए उनके दलाल
काम खराब नहीं कर सकते हैं
तो नाम खराब करने का प्रयास करते हैं.
नाम खराब करने के लिए
उन्हें वराह अवतार लेना पड़ता है.
कीचड़ और गन्दगी में डूबकर
उन्हें भेजना पड़ता सन्देश
जिसके अंदर से झांकती है उनकी
धूमिल चेष्टा.
पर यह तो तय है कि बारिश होगी.
मौन की गूँज उठेगी.
पंकजनयन न्याय की लाठी से आवाज नहीं आती.
धुल जाएगा पंक
निखर उठेगा पंकज
कराह उठेंगे काज़ी
और रह जाएगा वही
जो सच है.
शुक्र है...बारिश होती है!

(५)
बिना आमन्त्रण जाना मत
बिना निमंत्रण खाना मत.
सीखे थे ये गुर चाची से.
इसलिए मैं फोन करके नहीं कहता
कि मुझे बुलाओ.
पैसे देकर नहीं कहता कि
मुझे छापो.
तलवे चाटकर नहीं कहता कि
मुझ पर लिखो.
झूठी निष्ठा प्रदर्शित नहीं करता कि
पुरस्कार मिले.
मैं जिस दिशा में हूँ
सहजता से हूँ
वह दिशा मेरी है
और
तुम्हारी दिशा में चलने से मुझे परहेज नहीं
पर उस दिशा में मेरी दिशा का असभ्य अतार्किक विखंडन दिखता है
मेरे पुरखों को अपशब्द मिलते हैं
और मैं विवश हो जाता हूँ
वह कहने और लिखने को
जो सत्य है
और सच की आदत है युगों पुरानी
अकेले खड़ा रहने की.
इसलिए जब तुम गोष्ठी करते हो
मुझे खुशी होती है
क्योंकि खुशी और जीवन्तता का एक गहरा सम्बन्ध है.
तुम किसे बुलाते, वह मेरा विषय नहीं
क्योंकि नानक चाहते थे
अनेक अच्छे लोग अनेक दिशाओं में बिखर जाएँ.
पर जब तुम पूछते हो कि बिना आमन्त्रण कोई क्यों नहीं आया
तो मुझे लगता है कि
तुम भी हलके हो
और मुझे भी हल्का बनाने की कोशिश कर रहे हो.
तुम्हें तुम्हारी हल्की मुस्कान मुबारक
जो तुम्हें क्षण भर का जीवन देती है
मुझे चलना है
अभी मीलों
मुझे जूते चाहिए
जिससे मैं निर्द्वन्द्व रौंदता रहूँ असत्य
और खोजता रहूँ अपना सच!
माधव कृष्ण
०२.०४.२३


शुक्रवार, 31 मार्च 2023

राम ही जगत गुरु, राम ही स्वीकार हैं। राम को हम सब भजे, राम ही संसार हैं।। रचना लव तिवारी

राम ही जगत गुरु, राम ही संसार हैं।
राम को हम सब भजे, राम ही स्वीकार हैं।।

राम ही है सूर्य चन्द्र, राम ही सत्य नाम हैं।
संत अंसन्त सब भजे, सब जन का कल्याण हैं।

राम सेवरी के भी प्रिय, राम भरत की शान हैं।
राम केवट के भी है, और राम भक्त हनुमान हैं।।

राम एक आधार सबके, सबमे प्रिय एक नाम हैं।
जो भजे नित दिन इन्हें, उनका बेड़ा पार हैं।

राम की महिमा तुलसी गाये, और गाये हनुमान हैं।
राम की महिमा लुवकुश गाये, जिसका सबकुछ राम हैं।।

मंगलवार, 7 मार्च 2023

भजमन सीता राम भज सीताराम के दूजा ना सहारा कौनो भज राधेश्याम के- अजय त्रिपाठी

तोहरे पे आस बाटे और विश्वास बा, तुही त लगयब बेड़ा पार हो-२

भजमन सीता राम भज सीताराम के
दूजा ना सहारा कौनो भज राधेश्याम के-४

दुनिया के रिश्ता नाता बस खाली नाम के
भजमन सीता राम भज सीताराम के
दूजा ना सहारा कौनो भज राधेश्याम के
सीता राम सीताराम भज सीता राम के
दूजा ना सहारा कौनो भज राधेश्याम के

********
यज्ञ हवन पूजा में ताड़का निस दिन विघ्न डारी
संत समाज राम के भजले बिपत परल जब भारी
विश्वमित्र के आज्ञा पाके राघव देहनी मारी
राम राम कही चली-२ गईली सुरधाम के।

भजमन सीता राम भज सीताराम के
दूजा ना सहारा कौनो भज राधेश्याम के
सीता राम सीताराम भज सीता राम के
दूजा ना सहारा कौनो भज राधेश्याम के


तोहरे पे आस बाटे और विश्वास बा, तुही त लगयब बेड़ा पार हो-२

*******
द्रुपद सुता के लाज बचवले, भरल बीच समाज
हो असहाय हरि के भजले, फसले जब गजराज
गाह के मारी प्रभु गज के उबरे लक्ष्मीपति महाराज
छन में सवेरे हरि-२ बिगड़ काम के

भजमन सीता राम भज सीताराम के
दूजा ना सहारा कौनो भज राधेश्याम के
सीता राम सीताराम भज सीता राम के
दूजा ना सहारा कौनो भज राधेश्याम के


रविवार, 26 फ़रवरी 2023

सागर पर सेतु निर्माण के समय- प्रभु राम और गिलहरियों की अद्भुत कहानी।

सागर पर सेतु निर्माण के समय
सभी गिलहरियां अपने मुंह में मिट्टियां भरकर लाती थीं और पत्थरों के बीच उनको भर देती थीं। इस दौरान उन्हें वानरों के पैरों के बीच से होकर गुजरना होता था। वानर भी इन गिलहरियों से तंग आ चुके थे। क्योंकि उन्हें भी गिलहरी को बचाने हुए निकलना होता था लेकिन वानरों को यह नहीं मालूम था कि ये गिलहरियां यहां वहां क्यों दौड़ रही है। तभी एक वानर ने उस पर चिल्लाते हुए कहा कि तुम इधर-उधर क्यों भाग रही हो। तुम हमें काम नहीं करने दे रही।
तभी उनमें से एक वानर ने गुस्से में आकर एक गिलहरी को उठाया और उसे हवा में उछाल कर फेंक दिया। हवा में उड़ती हुई गिलहरी भगवान का नाम लेती हुई सीधा श्रीराम के हाथों में ही जाकर गिरी। प्रभु राम ने स्वयं उसे गिरने से बचाया था। वह जैसे ही उनके हाथों में जाकर गिरी और उसने आंखें खोलकर देखा, तो प्रभु श्रीराम को देखते ही वह खुश हो गई। उसने श्रीराम से कहा कि मेरा जीवन सफल हो गया, जो मैं आपकी शरण में आई।
तब श्रीराम उठे और वानरों से कहा कि तुमने इस गिलहरी को इस तरह से क्यों लज्जित किया। श्रीराम ने कहा कि क्या तुम जानते हो गिलहरी द्वारा समुद्र में डाले गए छोटे पत्थर तुम्हारे द्वारा फेंके जा रहे बड़े पत्थरों के बीच के फासले को भर रहे हैं? इस वजह से यह पुल मजबूत बनेगा। यह सुन वानर सेना काफी शर्मिंदा हो गई। उन्होंने प्रभु राम और गिलहरी से क्षमा मांगी।
तब श्रीराम हाथ में पकड़ी हुई गिलहरी को अपने पास लाए और उससे इस घटना के लिए क्षमा मांगी। उसके कार्य को सराहना देते हुए उन्होंने उसकी पीठ पर अपनी अंगुलियों से स्पर्श किया। श्रीराम के इस स्पर्श के कारण गिलहरी की पीठ पर तीन रेखाएं बन गई, जो आज भी हर एक गिलहरी के ऊपर श्रीराम के निशानी के रूप में मौजूद हैं। यह तीन रेखाएं राम, लक्षमण और सीता की प्रतीक है।

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

जमुना तट श्याम खेलत होली,जमुना तट श्याम खेलत होली - पारंपरिक होली गीत

जमुना तट श्याम खेलत होली-२
केकर हाथे कनक पिचकारी केकरा हाथे अबीर झोली
जमुना तट श्याम खेलत होली-२

श्याम के हाथे कनक पिचकारी, राधा के हाथे अबीर झोली
जमुना तट श्याम खेलत होली-२

मार पिचकारी केहो भिझावत, भीजत होके कौन गोरी।
श्याम मार मार पिचकारी भिझावत, रंग में भीझे राधा गोरी।
जमुना तट श्याम खेलत होली-२

जमुना तट श्याम खेलत होली-२
केकर हाथे कनक पिचकारी केकरा हाथे अबीर झोली
जमुना तट श्याम खेलत होली-२



गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२ शिव शंकर खेलत फ़ाग- पारंपरिक होली गीत - मनोज तिवारी

गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२
शिव शंकर खेलत फ़ाग-२
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२

केकर भींगे लाल चुनरियां-२ केकर भिंगेला श्रीपाग-२
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२
केकर भिंगेला श्रीपाग-२
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग

गौरी के भिंगेला लाल चुनरिया, शिव के भिंगेला श्रीपाग-२
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२
शिव के भिंगेला श्रीपाग-२
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२

कहवा झुराबे लाल चुनरियां कहा झुरबो श्रीपाग
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२
कहवां झुराबे श्रीपाग-२
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२

काशी में झुराबे लाल चुनरियां, झारखंड श्रीपाग
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२
झारखंड श्रीपाग-२
गौरी संग लिए शिव शंकर खेलत फ़ाग-२


होली बरसाने में खेलत नन्दकिशोर- पारंपरिक होली गीत

राग/ थाट काफ़ी

होली बरसाने में खेलत नन्दकिशोर-३
खेलत नन्दकिशोर, खेलत नन्दकिशोर
होली बरसाने में खेलत नन्दकिशोर-२

उड़त गुलाल लाल भैये बदरा, होके भोर-बीभोर
खेलत नन्दकिशोर, खेलत नन्दकिशोर
होली बरसाने में, खेलत नन्दकिशोर-२

इत ते आयी कुँवर राधिका, उतते कुँवर कन्हाई।
खेलत फ़ाग परस्पर हिलमिल, शोभा बरन न जाई रे
कैसी धूम मचाई, बिरज में धूम मचाई।।

होली बरसाने में खेलत नन्दकिशोर-३
खेलत नन्दकिशोर, खेलत नन्दकिशोर
होली बरसाने में खेलत नन्दकिशोर-२