🌱 आखिर 108 पीपल ही क्यों? 🌱
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एक संकल्प… जिसके पीछे छिपी है बचपन से चली आ रही एक कहानी। 🙏
हमारा प्रकृति और पेड़-पौधों से रिश्ता आज का नहीं है।
बचपन में हम अपने पिताजी के सानिध्य में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के चहज गाँव में रहते थे। पिताजी गणित के प्रवक्ता थे। पहाड़ों की गोद में रहते हुए प्रकृति को बहुत करीब से देखने और महसूस करने का अवसर मिला।
शायद उसी समय प्रकृति हमारे जीवन में केवल दिखाई देने वाली चीज नहीं रही, बल्कि हमारे संस्कारों का हिस्सा बन गई। 🌿
बाद में जब हम गाजीपुर के राजकीय सिटी इंटर कॉलेज में कक्षा 7 में पढ़ते थे, तब वहाँ के प्रधानाचार्य श्री अब्दुल हफीज़ ख़ाँ साहब का वृक्षों और वनस्पतियों के प्रति विशेष लगाव देखकर भी हम बहुत प्रभावित हुए। पूरा विद्यालय परिसर तरह-तरह के फूलों, पौधों और वृक्षों से सजा रहता था।
इस प्रकार बचपन में ही पौधरोपण का संस्कार हमारे मन में गहराई से बैठ गया।
फिर वर्ष 2013 में जब केदारनाथ धाम की भयंकर प्राकृतिक आपदा की खबर टीवी पर देखी, हजारों लोगों के प्रभावित होने की खबर ने मन को भीतर तक झकझोर दिया। उसी समय से हमने पौधरोपण को एक अभियान के रूप में और अधिक गंभीरता से शुरू किया।
शुरुआत में हम हर प्रकार के पौधे लगाते थे।
लेकिन धीरे-धीरे कुछ ऐसे संयोग हमारे जीवन में आते गए कि पीपल के पौधे से हमारा रिश्ता विशेष होता चला गया। कभी कोई व्यक्ति पीपल का पौधा खोजते हुए हमारे पास आया और संयोग से हमारे पास पौधा उपलब्ध था… कभी किसी ने अपने घर में उगे पीपल को हमें सौंप दिया… और कभी रास्ते में किसी व्यक्ति को पीपल खोजते देखकर हम स्वयं उसके पास पहुँच गए।
ऐसा लगने लगा जैसे पीपल के पौधे बार-बार किसी न किसी बहाने हमारे जीवन में आ रहे हों। 🌱
एक दिन गायों का गोबर साफ करते समय हम एक छोटे से पीपल के पौधे में फँस गए। उस क्षण मन में एक बहुत भावुक विचार आया—मानो यह नन्हा पीपल हमसे कह रहा हो, “मुझे यहाँ से निकालकर बचा लीजिए…”
उसके बाद तो हमें चारों ओर पीपल के पौधे ही दिखाई देने लगे।
और फिर मन में विचार आया—
हम गायत्री मंत्र का जप माला से करते हैं और एक माला में 108 दाने होते हैं…
तो क्यों न गायत्री मंत्र जप की इसी भावना के साथ **108 पीपल लगाने का संकल्प** लिया जाए? 🙏🌱
यहीं से शुरू हुई हमारी 108 पीपल पौधरोपण यात्रा…
आज पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि यह केवल पेड़ लगाने की यात्रा नहीं है।
यह हमारे बचपन के संस्कारों की यात्रा है।
यह पिताजी से मिले प्रकृति-प्रेम की यात्रा है।
यह गायत्री साधना से जुड़ी भावना की यात्रा है।
और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ अच्छा छोड़ जाने की छोटी-सी कोशिश है। ❤️🌿
एक नन्हा-सा पौधा आज छोटा है,
लेकिन आने वाले वर्षों में वही किसी राहगीर को छाया देगा,
किसी पक्षी को आश्रय देगा,
और शायद किसी बच्चे को प्रकृति से प्रेम करना सिखाएगा।
🌱 यही हमारी कोशिश है…
🌱 यही हमारा संकल्प है…
**हम सुधरेंगे — युग सुधरेगा।**
🙏 जय गायत्री माता 🙏







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