मेरा ब्लॉग मेरी रचना- लव तिवारी संपर्क सूत्र- +91-9458668566

Lav Tiwari ( लव तिवारी )

Lav Tiwari On Mahuaa Chanel

we are performing in bhail bihan program in mahuaa chanel

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

Flag Counter

Flag Counter

सोमवार, 21 मार्च 2022

जब तुम भूले प्रिय तो कह दो, उल्लास कहाँ होली कैसी- संजीव कुमार त्यागी ग़ाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

कैसा अबीर  क्या है गुलाल
अब रंग और रोली कैसी?
जब तुम भूले प्रिय तो कह दो,
उल्लास कहाँ होली कैसी?

वे बोल खो गए कभी जिन्हें,
सुनने को समय ठहरता था।
तो भौंरे का गुंजन कैसा,
फिर कोयल की बोली कैसी?

वीणा पर बजते वसंत सा,
मनहर तेरा वह हास नहीं।
तब फ़ाग सुहाएगा किसको,
हुरियारों की टोली कैसी?

सब जलीं लालसाएँ मन की,
तेरे वियोग की होली में।
अब 'त्यागी' का मधुमास कहाँ,
सपनों की रंगोली कैसी??

-संजीव कुमार त्यागी
ग्राम पोस्ट- लठूडीह जिला ग़ाज़ीपुर
उत्तर प्रदेश





बढ़ी भोजपुरी तबे बढ़ी भोजपुरिया- संजीव कुमार त्यागी ग़ाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

* बढ़ी भोजपुरी तबे बढ़ी भोजपुरिया *
®®®®®®®®®®®®®®

मधुर सरल सब रस से भरल लागे,
बोलत सुनत जइसे लागेले मिसिरिया।
भाव से भरल दरियाव नाहीं थाह मिले,
लागे ब्रह्मलेख लेखा एकरो अछरिया।
एतना महान माई भाखा के बिसार काहें,
करेलीं गुलामी दोसरा के जयकरिया।
दुनिया के भाषा सब सीखीं पर याद रहे,
बोलीं भोजपुरी जब मिले भोजपुरिया।।

एही के बचावे बदे फत्ते शाही राज छोड़ी,
बनवा के सहलन लाखों दुखदरिया।
बहियाँ के अपने से कटले कुंवर सिंह,
करेली बयान गंगा माई के लहरिया।
गोरख कबीर लेखा केतने महान लोग,
गावेलें एकर गान बनि के पुजरिया।
काहें के डेरात बानी बोले से लजात बानी!
छतिया के तानि कहीं हईं भोजपुरिया।।

सुरुज के बढ़ला से दिनवा बढ़त जाला,
बढ़ेलें चनरमा त बढ़ेले अँजोरिया।
दान पुन जइसे बढ़ावेला धरम के जी,
चढ़ते आषाढ़ बढ़े जइसे बदरिया।
कुल खानदान जइसे पावेला सपूत के त,
बढ़ि जाला मान जइसे बढ़ेले पगरिया।
ओही तरे बान्ही गाँठ राख लेईं मोर बात,
बढ़ी भोजपुरी तब्बे बढ़ी भोजपुरिया।।

रचनाकार- श्री संजीव कुमार त्यागी
ग्राम पोस्ट- लठूडीह जिला- ग़ाज़ीपुर





रविवार, 20 मार्च 2022

चारो भैया लिहल जनमवा हो रामा चैत शुभ दिनवा (चैइता गीत)

चारो भैया लिहल, जनमवा, हो रामा

चैत शुभ दिनवा................................-2

केकर हउव राम,  केकर हउव लक्ष्मण -2
केकर हउव  भरत भुवलवा हो रामा
चैत शुभ दिनवा................................ -2
चारो भैया लिहल, जनमवा, हो रामा
चैत शुभ दिनवा................................-2


कौशल्या के राम, सुमित्रा  के लक्ष्मण -2
कैकेयी के भरत भुवलवा हो रामा
चैत शुभ दिनवा................................ -2
चारो भैया लिहल, जनमवा, हो रामा

चैत शुभ दिनवा................................-2

के हो लुटावेला अन धन सोनवा-2
के हो लुटावेला कर कँगनवा हो रामा 
चैत शुभ दिनवा.
चारो भैया लिहल, जनमवा, हो रामा

चैत शुभ दिनवा................................-2


राजा लुटावेलन अन धन सोनवा-2
रानी लुटावेली कर कँगनवा हो रामा 
चैत शुभ दिनवा.
चारो भैया लिहल, जनमवा, हो रामा

चैत शुभ दिनवा................................-2




गुरुवार, 10 मार्च 2022

गाज़ीपुर के कुल सात विधान सभा के 7 सीटो पर समाजवादी पार्टी व उनके सहयोगियो पार्टी की जीत- लव तिवारी


गाज़ीपुर के कुल सात विधान सभा के 7 सीटो पर समाजवादी पार्टी व उनके सहयोगियो पार्टी को ढेर सारी शुभकामनाए व बधाई


 1-सदर जीत- समाजवादी पार्टी के जैकिशन साहू ने बीजेपी की संगीता बलवंत को 1692 मतों से पराजित किया


2-जमानियां सपा के ओमप्रकाश सिंह ने बीजेपी की सुनीता सिंह को 22145 मतों से हराया


3-जहूराबाद से सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर ने बीजेपी के कालीचरण राजभर को 45231 मतों से हराया।


4-जखनियां से सुभासपा के बेदीराम ने बीजेपी के रामराज वनवासी को 36865 मतों से हराया


5-जंगीपुर से सपा के वीरेंद्र यादव ने बीजेपी के रामनरेश कुशवाहा को 35063 मतों से पराजित किया।


6- सैदपुर से सपा के अंकित भारती ने बीजेपी के सुभाष पासी को 35792 मतों से पराजित किया।


7-मुहम्मदाबाद से सपा के शोएब अंसारी ने बीजेपी की अलका राय को 18759 मतों से पराजित किया।














शुक्रवार, 4 मार्च 2022

कृष्णानंद उपाध्याय जी व चंदन राय (संचालक गरीब असहाय सहयोग संगठन) लगभग 700 लावारिस लाशों का दाह संस्कार

दिनांक ०१-मार्च -२०२२ बड़े भैया आदरणीय कृष्णानंद उपाध्याय जी Krishna Upadhyay व चंदन राय (संचालक गरीब असहाय सहयोग संगठन) जिनके द्वारा अबतक लगभग 700 लावारिस लाशों का विधिपूर्वक दाह संस्कार अपने सहयोगियों के साथ मिलकर किया है। इसी कार्यक्रम के उपलक्ष्य में कल बड़े भैया के पैतृक निवास शाहपुर उसरी ग़ाज़ीपुर में लगभग 500 गरीब, दिव्यांग जन को भोजन के साथ कंबल वितरण किया गया। इस विशेष आयोजन के मुख्य अतिथि महर्षि विश्वामित्र ऑटोनॉमस स्टेट मेडिकल कॉलेज गाजीपुर के प्राचार्य आदरणीय प्रो. आनंद कुमार मिश्रा जी एवं मुख्य चिकित्सा अधीक्षक जिला अस्पताल गाजीपुर डॉ. राजेश कुमार सिंह जी के साथ विशिष्ट सर्जन आदरणीय श्री एस सी तिवारी जी की गरिमामयी उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को और भी सुंदरता और भी बढ़ गई।

आदरणीय श्री एस सी तिवारी जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि देश या क्षेत्र में ऐसे बहुत कम लोग है जो इस तरह के उत्कृष्ट सामाजिक कार्यो के लिए अपने जीवन को पूर्ण रूप से समर्पित करके ऐसे महान कार्यो को अपने संगठन के साथ अंजाम दे रहे है। हम आप सभी को इस तरह के कार्यो में अपना शारीरिक रूप व आर्थिक रूप से योगदान देना चाहिए व इनकी कार्यो का प्रचार प्रसार भी करना चाहिए जिससे अन्य जिले प्रदेशो में इनके जैसे महान समाजसेवी संगठन का निर्माण हो सके।।
गरिमामयी उपस्थिति -Prem Mishra Deepak Kumar Pandey Adv Manoj Kumar Upadhyay Abhay Chaubey Ranu Mishra दिव्यांशु सिंह राजपूत

मीडिया रिपोर्टर- Sushil Tiwari Suneel Singh Yadav

#दाहसंस्कार #लावारिसकेवारिस #शमशान #मृत #शव
#गरीब #असहाय #संगठन #ग़ाज़ीपुर #उत्तरप्रदेश






रविवार, 20 फ़रवरी 2022

गुलाब लेकर खड़ा रहा पर, तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सजा न पाया।- आनंद अमित

तुम्हीं से हमने किया मुहब्बत, तुम्हीं से लेकिन बता न पाया।
चली गयी तुम कसम धराकर, कसम से मैं कसमसा न पाया।

लिखे थे तुमने लहू से अपने, चुभा-चुभाकर कलम नसों में।
जला चुका हूँ कई ख़तों को, तुम्हारे ख़त मैं जला न पाया।

हमारी हसरत रही अधूरी, हमारे सपने रहे अधूरे।
गुलाब लेकर खड़ा रहा पर, तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सजा न पाया।

नहीं है तुम सा कोई नगीना, हमारी किस्मत में ख़ाक ही है।
तमाम कोशिश के बाद भी तो, मैं अपनी किस्मत जगा न पाया।

तुम्हारी ख़िदमत में सर झुकाना, न थी इबादत तो और क्या थी।
जो तुम न आयी हमारे हिस्से, समझ लो मैंने ख़ुदा न पाया।

हमारी ज़ानिब यही हुआ बस, न टूटी कसमें न टूटे वादे।
मलाल है अब किसे बताऊँ, वफ़ा किया पर वफ़ा न पाया।

ग़ज़ल लिखी थी हर एक सफ़हे पे, हरेक मक्ते में नाम तेरा।
'अमित' लिखा हो किसी सफ़हे पे, कोई भी ऐसा सफ़हा न पाया।

Anand Amit Hindi Shree: https://youtu.be/GXgKgZt9Jik
: ये गाना इसी धुन पर है



सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

वैलेंटाइन डे विशेष- गुलाब नहीं चलो प्यार में कांटे बाँटें- डॉ एम डी सिंह ग़ाज़ीपुर

सियासत के शिकंजों से बचने की चाल सोच
अपने किस घड़ी ठोकना जंघे पे ताल सोच

उल्फत ने जान ली है नफरत से कहीं ज्यादा
वह उठा रही तेरे भी दिल में उबाल सोच

छिन तलवार जाय तोभी करेगा जुल्म जालिम
ली जाय कैसे उसके हाथों से ढाल सोच

निगल समंदर को ले दरिया तो कुछ बात बने
करने को सुन तू भी कुछ ऐसा कमाल सोच

मची आकाश में है शोर चुपचाप भीडं है
पड़ी हुई यहां जरूर काले में दाल सोच

डॉ एम डी सिंह

-फिर करता है मन :

आखिरी बार
एक बार और
बार-बार
करता है मन
देखा आऊं
अपना गांव

नगर से दूर
प्रकृति के पास
उड़ती हुई धूल
उगी हुई घास
टूटे खपरैल
जर्जर छप्पर
गंगा का अतिक्रमण
बैलों की घंटी
ट्रैक्टर की भड़-भड़
घुरिया काकी की चिल्ल-पों
इमिरती भौजी की झन-झन
छन्नू का अखाड़ा
नंग धड़ंग ताल ठोकते
गांव के नवरतन

फिर करता है मन
मंगरू काका की चुनौटी चुरा लूं
महंगू दादा की हुक्की गुड़गुड़ा लूं
मचान पर बैठ चिड़िया उड़ा लूं ।

(मुट्ठी भर भूख)

डॉ एम डी सिंह

ध्वज गणतंत्र का फहराएं

एक थे हम एक रहेंगे प्रतिज्ञा पुनः हम दोहराएं
एक मन एक पन से ध्वज गणतंत्र का फहराएं

सहज सरल सी एक युक्ति हो
कठोर जितनी एक भुक्ति हो
हो एक चेतना एक वेदना
एक हो बंधन एक मुक्ति हो

गंण अनेक पर एक गीत एक स्वर में हम गाएं
एक मन एक पन से ध्वज गणतंत्र का फहराएं

मंत्र एक हों मांत्रिक जितने
तंत्र एक हों तांत्रिक जितने
भिन्न भेष हो चाहे भाषा
जंत्र एक हों जांत्रिक जितने

जितना भी हो बोझ भारी गंण कंधा एक बन जाएं
एक मन एक पन से ध्वज गणतंत्र का फहराएं

डिगें नहीं सब लड़ें साथ में
जिएं सभी सब मरें साथ में
यहीं साधना यहीं सिद्धि हो
लगे रहें सब करें साथ में

यही क्षुधा यही दिखे तृष्णा जन गण मन मिल जाएं
एक मन एक पन से ध्वज गणतंत्र का फहराएं


तोहार मोर बबुनी

पिपिआति बा तुरुही बाजत बा तासा
तोहार मोर बबुनी सगरी बतासा

चहकोर भोर बा टहकोर दुपहरिआ
लग्गत बा महुआ अस मातल तिजहरिआ
संझइती क बेरा जस सिरफल क लासा
तोहार मोर बबुनी सगरी बतासा

बदरी अस बार मोरनी अस चाल बा
मोतिअन अस दंतुली चान जस गाल बा
नजरिया बा तिरछे चलावति गंड़ासा
तोहार मोर बबुनी सगरी बतासा

जवानी लगवले सिउराती क मेला
दिनवा भइल भांग धतूरा क रेला
बबुअन क जिउ उलटे गड़ले बा बांसा
तोहार मोर बबुनी सगरी बतासा


फिर से निचोड़ी भूख ने आंतें समय की

खड़ी की तर्क ने भाषा-भाष्य में अड़चनें
परिभाषा में उठ रहीं नित नई धड़कनें
चिंतन, चातुर्य और चरित्र में विभेद बढ़े
हुईं भाव में प्रकट भ्रम की अनेक उलझनें

स्वयं काव्य ने उतार अपनी फेंकी सहजता
गद्य आधुनिक भी अब नागफनी बोने लगे

सत्य ने भी कल्पना के अब सारे पंख काटे
अकर्मण्यों ने सबको गीता और शंख बांटे
सम्मान उसको भी सबके बराबर चाहिए
हठ ने हर जगह आलेख अनहद तल्ख़ साटे

घनघोर अंधेरी रात आई लौट फिर से
जुगनू आज फिर से प्रकाश के कोने लगे

संवादों ने कुटिलता के सारे बंध तोड़े
कल से किए धैर्य ने सारे अनुबंध छोड़े
फिरसे निचोड़ी भूख ने आंतें समय की
दुर्भिक्ष ने आपदा से कुटिल संबंध जोड़ें

कुत्ते भी करते आदमी को देख झौं-झौं
छिनी परंपरा को देख अपनी रोने लगे

चढ़ गईं आस्तीनें मुश्कें भी कसने लगीं
तरकस में तीरों की संख्याएं बढ़ने लगीं
खड़ी सेनाएं दिख रहीं आमने-सामने
फिर काल के भाल भृकुटियां तनने लगीं

पहुंच फिर गरदनों तक गए लो हाथ उठ कर
फिर कालरों से गिर बटन कहीं खोने लगे


फिर मत कहना :

सीधा कभी चलेगा क्या
जिसकी प्रवृत्ति में कैंड़ापन है
लड़ना भिड़न जिसका मन है
चाहे जैसी राह बना लो सीधी चिकनी
तोड़ेगा ही काटेगा ही
जहां चाहेगा मोड़ेगा हीं

मेरे भाई !
उसकी पगडंडी को सड़क बना दो 
बनी रहेगी मुद्दत तक साबुत

माना तुम्हारे ज्ञान विज्ञान से
रेत में धान की खेती होगी
पानी में बनेंगे मकान 
खाई में दौड़ेगी कार
पहाड़ की बर्फीली चोटी पर 
घास के उगेंगे मैदान 
आकाश में फूल खिलेंगे

भाई मेरे ! 
उसकी पगडंडी छीन तुम 
उसे ध्यानमुक्त अज्ञान दे रहे 
पाताल से आकाश तक सड़क बनाकर
तुम खालिस अभिमान दे रहे

एक दिन प्रकृति पूछेगी 
इंसान कहां है

सन्नाटे के शोर से 
दिमाग के परखच्चे उड़ जाएंगे 
फिर मत करना 
मैंने आगाह नहीं किया 

भाई !

लड़ाई शाश्वत है :

जीत और हार से 
ज्यादा जरूरी है लड़ना
आद्यांत लड़ते रहना ही जीवन है
जीवन संघर्ष में निरंतरता बनाए रखना
एक सहज सरल समर्पण है
समर्पण है जीवन उद्योग में
उद्यमी जीव का
जीवंतता बनाए रखने के लिए

याद रखें 
प्रतिद्वंदी कभी दुश्मन नहीं होता 
जीत कभी क्रूरता से नहीं मिलती
न जन्म ना मृत्यु मेरे भाई !
लड़ाई शाश्वत है



वादे में ना किसी, तेरी उम्मीदों में खामियां हैं
जिस तरह थे वे हैं ही, तेरी दीदों में खामियां हैं

मेरी बातों पे गौर फरमा बयां कर रहा हूं सच
मगरूरों में नहीं कुछ भी मुरीदों में खामियां हैं

कहीं चुपचाप बैठे रहना रह जाना मुद्दतों तक
बेफिकरों से कहीं ज्यादा संजीदों में खामियां है

देख वो जो उड़ रहा आकाश में एक दिन गिरेगा
तारीफ में कढ़ी जा रहीं कसीदों में खामियां हैं

मानता तू अपने ख्वाबों को कुसूरवार है गलत
ना पता तुझे गाफ़िल तेरी नींदों में खामियां हैं

डॉ एम डी सिंह

कद्दावर हो आगे मुकरने का मजा आए
हो सामने चट्टान ठुकरने का मजा आए

राहें ना बता आसान रहबर और हमको
दुश्वार डगर हो कि गुजरने का मजा आए

चढ़ने दे दोस्त इतना नीचे न दिखे कुछ भी
दूर हो घाटी कुछ उतरने का मजा आए

मिल जाए गर किसी के सपनों को पर हमसे
फिर ख्वाब कुछ अपने कुतरने का मजा आए

नसीहतें सभी तेरी हम मान लें नासेह 
बिगड़ने दे इतना सुधरने का मजा आए

वैलेंटाइन डे विशेष- 

गुलाब नहीं चलो प्यार में कांटे बाँटें
चुंबन नहीं आज गाल पर चांटे बाँटें 

चुभी जा रही जिन आंखों में आज रोशनी
मुट्ठी - मुट्ठी उन्हें अंधेरी रातें बाँटॆं

चलो दरकते विश्वासों में आग लगा दें
टूटते हुए कच्चे धागों को गांठें बाँटें

सुई धागा लिए ह्रदय में आ चुपके से
फटी हुई जेबों के खातिर टांके बाँटें 

नहीं लुभाता नगद न जाने क्यों दुनिया को
खोल जीवन बही उधार के खाते बाँटें

डॉ एम डी सिंह





गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

आपको पीड़ित मानवता ने पुकारा है ::-- आदरणीय गुरु जी प्रवीण तिवारी पेड़ बाबा

आपको पीड़ित मानवता ने पुकारा है ::--
******************************
हमारी पाँच ज्ञान इंद्रियाँ हमें ऐसा नाच नचाती हैं कि जीवनपर्यंत हम इनको ही संतुष्ट करने में लगे रहते हैं फिर भी इनकी भूख शांत नहीं होती । इसी का देन है कि धरती पर इंसानों की संख्या तो बढ़ती जा रही है परन्तु इंसानियत विरलों में, लाखों में किसी एक में ही है । जिसका परिणाम यह है चारों ओर प्रदूषण का अंबार लगा हुआ है । आज शायद ही कोई अपनी मौत मरता है । चारों ओर लूटपाट, दुर्घटना, हवशीपन बढ़ता ही जा रहा है । आज का इंसान कैसे भी करके मात्र खुद को बचाने में लगा है ।

चुँकि लोगों का प्यार संसाधनों से बढ़ता जा रहा है इसलिए लोग लोगों से दूर होते चले जा रहे हैं । अब इंसान मात्र फोन तक सिमटकर रह गया है ।

हम सबका जीवन दौड़ की प्रतियोगिता में शामिल लोगों जैसा हो गया हैं जहाँ सभी जीतने के लिए दौड़ते हैं । यहाँ गिरने वाले को कोई सहारा देने वाला नहीं होता बल्कि लोग उसको कुचलते हुए मंजिल की ओर बढ़ चलते हैं ।

बचपन से हमें संस्कार भी बड़ा आदमी बनने का ही दिया जाता है यहाँ बड़ा का मतलब धन से बड़ा है । इस तरह का संस्कार लोगों को अपनों से दूर करता चला जा रहा है । आज इसी का परिणाम है कि सभी उदासी का जीवन, अकेले का जीवन जी रहे हैं ।

आप धन खूब कमाइए पर उसका एक छोटा सा अंश पीड़ित मानवता के लिए अवश्य निकालिए ।
गीता के तीसरे अध्याय के बारहवें और तेरहवें श्लोक में तो स्पष्ट लिखा है कि " देवताओं के द्वारा दिए भोगों को जो पुरुष उनको दिए स्वयं भोगता है वह चोर है ।" तथा " जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिए अन्न पकाते हैं, वे तो पाप खाते हैं ।"

हम भगवान राम और कृष्ण के जीवन से देखते हैं कि इनका जीवन गरीबों के लिए समर्पित था ।
हम आप सभी का आह्वान करते हैं आइए हमलोग मिलजुल कर पीड़ितों के जीवन स्तर को बढ़िया बनाते हैं । आपको पीड़ित मानवता ने पुकारा है ।



रविवार, 16 जनवरी 2022

जय माता दी बोले ला जहनवा हो सजनवा माई के धमवा- अजय त्रिपाठी

जय माता दी बोले ला जहनवा हो
सजनवा माई के धमवा........२

ऊँचा पहाड़ पर माई दरबार बा
केहुं जाला पैदल केहु घोड़ा प सवार बा
होले भीड़ सझियां विहनवा हो -२
सजनवा माई के धमवा........२

बाले बनराज बइठल दुवरे समनवा २
तीन पिंडी रूप में माई देलि दरसनवा २
देखी सुख पावेला नयनवा हो-२
सजनवा माई के धमवा........२

करे के नहान बान गंगा के विधान बा
बीच राह अरध कुमारी माई स्थान बा-२
गुफवा में देनी दरसनवा है माई
सजनवा माई के धमवा........२

लउटी के वैशनों माई दरबार से
जाला जहान सारा भैरो दरबार के-२
देखी उलसे से पूनम के मनवा हो-२
सजनवा माई के धमवा........२

जय माता दी बोले ला जहनवा हो
सजनवा माई के धमवा........२

रचना- अजय त्रिपाठी
मशहूर गीतकार संगीतकार
वाराणसी उत्तर प्रदेश



बुधवार, 12 जनवरी 2022

भगवान परशुराम -एक समाज सुधारक ईश्वर -भगवान परशुराम

एक बार जरूर पढ़ें और ध्यान से पढ़े....

भगवान परशुराम ---एक समाज सुधारक ईश्वर
हमारे धर्म ग्रंथ और कथावाचक ब्राह्मण भारत के प्राचीन पराक्रमी नायकों की संहार से परिपूर्ण हिंसक घटनाओं के आख्यान तो खूब सुनाते हैं, लेकिन उनके समाज सुधार से जुड़े जो क्रांतिकारी सरोकार थे, उन्हें लगभग नजरअंदाज कर जाते हैं। विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक माने जाने वाले भगवान श्री परशुराम जी के साथ भी कमोबेश यही हुआ।

 उनके आक्रोश और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन करने की घटना को खूब प्रचारित करके वैमस्यता फैलाने का उपक्रम किया जाता है। पिता की आज्ञा पर मां रेणुका का सिर धड़ से अलग करने की घटना को भी एक आज्ञाकारी पुत्र के रुप में एक प्रेरक आख्यान बनाकर सुनाया जाता है। किंतु यहां यह सवाल खड़ा होता है कि क्या व्यकित केवल चरम हिंसा के बूते जन-नायक के रुप में स्थापित होकर लोकप्रिय हो सकता हैं ? क्या हैहय वंश के प्रतापी महिष्मति नरेश कार्तवीर्य अर्जुन के वंश का समूल नाश करने के बावजूद पृथ्वी क्षत्रियों से विहीन हो पाइ ? 

रामायण और महाभारत काल में संपूर्ण पृथ्वी पर सूर्यवंशी और चंद्रवंशी क्षत्रिय राजाओं के राज्य हैं। वे ही उनके अधिपति हैं। इक्ष्वाकु वंश के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को आशीर्वाद देने वाले और  कौरव नरेश धृतराष्ट को पाण्डवों से संधि करने की सलाह देने वाले और कौन्तेय पुत्र कर्ण को ब्रह्मशास्त्र की दीक्षा देने वाले श्री परशुराम ही थे। ये सब क्षत्रिय थे। अर्थात श्री परशुराम क्षत्रियों के शत्रु नहीं शुभचिंतक थे।श्री परशुराम केवल आतातायी क्षत्रियों के प्रबल विरोधी थे।
भगवान परशुराम ने जितना सम्मान महिलाओं को दिया इतना सम्मान  महिलाओं को भगवान विष्णु के किसी भी अवतार मैं  नही हुआ  भगवान परशुराम न्यायप्रिय देवता है जो दोनों पक्षो को सामने रखकर न्याय करते रहे है
 
समाज सुधार और जनता को रोजगार से जोड़ने में भी भगवान परशुराम की अहम् भूमिका अतंनिर्हित है। केरल, कच्छ और कोंकण क्षेत्रों में जहां भगवान  परशुराम ने समुद्र में डूबी खेती योग्य भूमि निकालने की तकनीक सुझाई , वहीं पशु का उपयोग जंगलों का सफाया कर भूमि को कृषि योग्य बनाने के काम में भी किया। यहीं श्री परशुराम ने शुद्र माने जाने वाले दरिद्र नारायणों को शिक्षित व दीक्षत किया ।श्री  परशुराम के अंत्योदय के प्रकल्प अनूठे व अनुकरणीय हैं। जिन्हें रेखांकित किए जाने की जरुरत है।
 
भगवान परशुराम का समय इतना प्राचीन है कि उस समय का एकाएक आकलन करना नामुमकिन है। जमदग्नि परशुराम का जन्म हरिशचन्द्रकालीन विश्वामित्र से एक-दो पीढ़ी बाद का माना जाता है। यह समय प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ‘अष्टादश परिवर्तन युग के नाम से जाना गया है। अर्थात यह ७५०० वि.पू. का समय ऐसे संक्रमण काल के रुप में दर्ज है, जिसे बदलाव का युग माना गया। इसी समय क्षत्रियों की शाखाएं दो कुलों में विभाजित हुइं। एक सूर्यवंश और दूसरा चंद्रवंश। चंद्रवंशी पूरे भारतवर्ष में छाए हुए थे और उनके प्रताप की तूती बोलती थी। हैहय अजरून वंश चंद्रवंशी था। इन्हें यादवों के नाम से भी जाना जाता था। महिष्मती नरेश कार्तवीर्य अर्जुन इसी यादवी कुल के वंशज थे। भृगु ऋषि इस चंद्रवंश के राजगूरु थे। जमदग्नि राजगुरु परंपरा का निर्वाह कार्तवीर्य अर्जुन के दरबार में कर रहे थे। किंतु अनीतियों का विरोध करने के कारण कार्तवीर्य अर्जुन और जमदग्नि में मतभेद उत्पन्न हो गए।

 परिणामस्वरप जमदग्नि  महिष्मति राज्य छोड़ कर चले गए।  उसी समय अनूपदेश का वीर कार्तवीर्य अर्जुन उधर आ निकला। आश्रम में आने पर ऋषि‍ पत्नी रेणुका ने उसका यथाचित आथित्य सत्कार किया। कार्तवीर्य अर्जुन युद्ध के मद से उत्मत्त हो रहा था। उसने उस सत्कार को आदरपूर्वक ग्रहण नहीं किया। उल्टे मुनि के आश्रम को तहस नहस करके वहाँ से डकारती हुई होमधेनु के बछड़े को बलपूर्वक हर लिया और आश्रम के बड़े बड़े वृक्षों को भी तोड़ डाला।अनेक ब्राहम्णों ने कान्यकुब्ज के राजा गाधि राज्य में शरण ली।

श्री  परशुराम जब यात्रा से लौटे तो रेणुका ने आपबीती सुनाई। इस घटना से कुपित व क्रोधित होकर श्री परशुराम ने हैहय वंश के विनाश का संकल्प लिया। इस हेतु एक पूरी सामरिक रणनीति को अंजाम दिया। दो वर्ष तक लगातार श्री परशुराम ने ऐसे सूर्यवंशी और यादववंशी राज्यों की यात्राएं की जो हैहय वंद्रवंशीयों के विरोधी थे। वाकचातुर्थ और नेतृत्व दक्षता व हरि के अवतार को जानकर   पर भगवान  परशुराम को ज्यादातर चंद्रवंशीयों ने समर्थन दिया। अपनी सेनाएं और हथियार परशुराम की अगुवाइ में छोड़ दिए। तब कहीं जाकर महायुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुइ।इस महायुद्ध धर्मयुद्ध में हर. व्यक्ति ने भाग लिया| महर्षि पराशर के साथ ऋषियों ने,आदिवासियों नें,राज्यों के हर वर्ग के कामगारों ने | 
 
इसमें श्री परशुराम को अवंतिका के यादव, विदर्भ के शर्यात यादव, पंचनद के द्रुह यादव, कान्यकुब्ज ;कन्नौज के गाधिचंद्रवंशी, आर्यवर्त सम्राट सुदास सूर्यवंशी, गांगेय प्रदेश के काशीराज, गांधार नरेश मान्धता, अविस्थान -अफगानिस्तान, मुजावत -हिन्दुकुश, मेरु -पामिर, श्री -सीरिया परशुपुर-पारस,वर्तमानफारस सुसतर् -पंजक्षीर उत्तर कुरु -चीनी सुतुर्किस्तान- वल्क, आर्याण -ईरान देवलोक-षप्तसिंधु और अंग-बंग -बिहार के संथाल परगना से बंगाल तथा असम तक के राजाओं ने परशुराम का नेतृत्व स्वीकारते हुए इस महायुद्ध में भागीदारी की। जबकि शेष रह गई क्षत्रिय जातियां चेदि -चंदेरी नरेश, कौशिक यादव, रेवत तुर्वसु, अनूप, रोचमान कार्तवीर्य अर्जुन की ओर से लड़ीं। इस भीषण युद्ध में अंतत: कार्तवीर्य अर्जुन और उसके कुल के लोग तो मारे ही गए। युद्ध में अर्जुन का साथ देने वाली जातियों के वंशजों का भी लगभग समूल नाश हुआ।

 भरतखण्ड में यह इतना बड़ा महायुद्ध था कि श्री  परशुराम ने अहंकारी व उन्मत्त क्षत्रिय राजाओं को, युद्ध में मार गिराते हुए अंत में लोहित क्षेत्र, अरुणाचल में पहुंचकर ब्रहम्पुत्र नदी में अपना फरसा धोया था। बाद में यहां पांच कुण्ड बनवाए गए जिन्हें समंतपंचका रुधिर कुण्ड कहा गया है। ये कुण्ड आज भी अस्तित्व में हैं। इन्हीं कुण्डों में भृगृकुलभूषण परशुराम ने युद्ध में हताहत हुए भृगु व सूर्यवंशीयों का तर्पण किया। इस धर्मयुद्ध का समय ७५०० विक्रमसंवत पूर्व माना जाता है। जिसे उन्नीसवां युग कहा गया है।
 
इस युद्ध के बाद श्री परशुराम ने समाज सुधार व कृषि के प्रकल्प हाथ में लिए। केरल,कोंकण मलबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी। इस समय कश्यप ऋषि और इन्द्र समुद्री पानी को बाहर निकालने की तकनीक में निपुण थे। अगस्त्य को समुद्र का पानी पी जाने वाले ऋषि और इन्द्र का जल-देवता इसीलिए माना जाता है। श्री परशुराम ने इसी क्षेत्र में परशु का उपयोग रचनात्मक काम के लिए किया। शूद्र माने जाने वाले लोगों को उन्होंने वन काटने में लगाया और उपजाउ भूमि तैयार करके धान की पैदावार शुरु करार्इं। इन्हीं शूद्रों को श्री परशुराम ने शिक्षित व दीक्षित करके ब्राहम्ण बनाया। इन्हें जनेउ धारण कराए। और अक्षय तृतीया के दिन एक साथ हजारों युवक-युवतियों को परिणय सूत्र में बांधा। श्री परशुराम द्वारा अक्षयतृतीया के दिन सामूहिक विवाह किए जाने के कारण ही इस दिन को परिणय बंधन का बिना किसी मुहूर्त के शुभ मुहूर्त माना जाता है। दक्षिण का यही वह क्षेत्र हैं जहां भगवान  परशुराम के सबसे ज्यादा मंदिर मिलते है
 
ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम: 
जय श्री परशुराम जी की
#भुदेव ✍️


मंगलवार, 11 जनवरी 2022

ब्राम्हण और काला नाग एक साथ दिखें, तो पहले ब्राम्हण को मार देना, वह अधिक खतरनाक है- अखिलेश यादव

सुना है कि समाजवादी पार्टी भगवान परशुराम की मूर्ति लगाने की बात कर रही है । मैं इसका हृदय से स्वागत करता हूँ , साथ ही मैं अखिलेश यादव जी से पूछना चाहता हूँ कि, यह उनका ब्राम्हणों से वोट लेने का हथकंडा मात्र है या पिता व पुत्र दोनों की सरकारों में ब्राम्हणों पर हुए अत्याचार का प्रायश्चित है ? जिस समाजवादी विचारधारा का जन्म ही ब्राम्हणों के विरोध में हुआ हो, वह आज ब्राम्हण वोट के लिए प्रपंच रच रहे हैं, मुलायम सिंह जी के द्वारा अराजक संघ चलाया जाता था जिसमें प्रचार हेतु जाने वाले लोग यह कहकर ब्राम्हणों के प्रति द्वेष उत्पन्न करवाते थे कि ब्राम्हण और काला नाग एक साथ दिखें, तो पहले ब्राम्हण को मार देना, वह अधिक खतरनाक है और पिता मुलायम सिंह यादव जी के इस कथन को मानते हुए, अखिलेश जी ने सन 2004 के कन्नौज लोकसभा चुनाव में नीरज मिश्रा की हत्या कराई थी ! उसका दोष सिर्फ इतना था कि जब अपने काफिले के साथ अखिलेश यादव जी छिबरामऊ के निकट कसाबा बूथ पर कैप्चरिंग करना चाहते थे , नीरज मिश्रा के मना करने पर उसको धमकी दी और वह जब नहीं माना तो वहां खड़े अपने लोगों से यह कहते हुए कि 24 घण्टे के अन्दर उसका सर चाहिए, फिर नीरज मिश्रा की सर कटी लाश कसाबा के पास के जंगलो में मिली थी और उसका सर बाक्स में रखकर अखिलेश जी को दिखाने के लिए लखनऊ भेजा गया था, पिता के मुख्यमंत्री होने के कारण सत्ता का दुरूपयोग कर अखिलेश जी तो बच गए,लेकिन कन्नौज का बच्चा बच्चा जानता है कि उक्त हत्या अखिलेश जी के इशारे पर हुई थी इसी प्रकार पिछले दिनों छिबरामऊ के सौ शय्या अस्पताल में जब बस हादसे में घायलों को देखने पहुंचे तो सब कुछ सामान्य था, किन्तु ड्यूटी पर तैनात बुजुर्ग डॉक्टर का नाम पूछते ही अखिलेश जी भड़क गए थे , कारण सिर्फ इतना था की डॉक्टर की जाति मिश्रा (ब्राहमण) थी,यह इनका ब्राम्हण प्रेम है अखिलेश जी की सरकार में ही इनके गृह जनपद में ब्राम्हणों, महिला सहित उसके परिवार को नंगा करके गांव में घुमाने की घटना किसी से छुपी हुयी नहीं है।

ब्राम्हणों का सामाजिक पतन और आर्थिक शोषण ही इनका लक्ष्य है, यही कारण है कि अखिलेश जी के मुख्यमंत्री रहते हुए यूपी के सुल्तानपुर जिले के इतौली के विधायक अबरार अहमद ने स्थानीय ब्राहमणों के शिष्ट मंडल से साफ कह दिया कि, समाजवादी पार्टी का ब्राहमणों से कोई लेना देना नहीं है और न ही आपसे हमारी कोई हमदर्दी है ! इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी ने अपने विधायकों को खास हिदायतें जारी की है कि ब्राहमणों की कोई मदद न की जाये ! इनके इस चरित्र से साफ होता है कि इनको ब्राहमणों से कितना प्रेम है ! ध्यान आता है कि मुलायम सिंह जी के मुख्यमंत्री बनने से पूर्व उत्तर प्रदेश में ब्राम्हण पढ़ने - लिखने में अग्रणी होने के कारण छोटी मोटी नौकरियों में लगकर अपना जीवन यापन करता था, किन्तु मुलायम सिंह जी के द्वारा नकल पद्धति को बढ़ावा देने से अपने स्वजातीय लोगों को नौकरियों में भर्ती दिलाई ! जिस कारण योग्य ब्राम्हणों को नौकरी से दूर किया जा सके ! बाद में इसी क्रम में अखिलेश की सरकार आने पर गांव - गांव में नकल सेंटर और अपने लोगों से विद्यालय के नाम पर डिग्री दिलाने का कारखाना खोला गया था ! यही नहीं अपने पिता से आगे बढ़कर यदि किसी नौकरी में कोई ब्राहमण अधिक नम्बर लेकर मैरिट में स्थान बना रहा होता था उसको नौकरी से वंचित करने के लिए सफेदा लगाकर नम्बर कम कर दिए जाते थे ! जिसका खुलासा करते हुए ब्राहमण दुबे परिवार में एक लड़की ने आत्महत्या कर ली थी ! चाहे पुलिस की भर्ती हो या अन्य राजस्व विभाग की भर्तियां अखिलेश जी के शासन में धांधली करते हुए अपने स्वजातीय लोगों को नौकरिया दिलाई ! जिस कारण से यूपी के बहुत से योग्य ब्राहमण नौकरी नहीं पा सकें ! इस प्रकार से इन्होने षड़यंत्र रचकर ब्राहमणों के अस्तित्व को ही चुनौती दी और सर्वाधिक अत्याचार भी ब्राहमणों पर इनकी सरकारों में हुए ! यही कारण था कि, इनके अत्याचारों से दुखी ब्राहमणों ने तिलक तराजू और तलवार का नारा देने वाली बहुजन समाज पार्टी की सरकार बना दी। क्योंकि उस समय भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी,

आज जय श्री राम का विरोध करने वाले अखिलेश यादव जय परशुराम कर ब्राहमणों का वोट पाकर सत्ता हासिल कर फिर से उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने का स्वप्न देख रहे है ! अच्छा हो अखिलेश जी हमारे भगवान और महापुरुषों को जातियों में न बाँटें। राम को क्षत्रिय कृष्ण को यादव और परशुराम को ब्राम्हण बताकर संगठित हुए हिन्दू समाज की एकता तोड़ने का प्रपंच रच रहे हैं! अखिलेश जी निर्दोष रामभक्तों के हत्यारे अपने पिता से यदि पूछेंगे तो उनके पिता उन्हें बता देंगे की इस देश का ब्राहमण जातिवादी नहीं बल्कि राष्ट्रवादी है और भारत माता की पूजा करता है और अखंड भारत का स्वप्न देखता है और दुनिया में भारत माता को शीर्ष स्थान पर ले जाने हेतु प्रयत्नशील रहता है ।



शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

किन किन हालातों से गुजर कर मिलती है कामयाबी और लोग एक पल में कह देते हैं किस्मत अच्छी थी

ऐसे ही हालातों से गुजर कर मिलती है कामयाबी और लोग एक पल में कह देते हैं किस्मत अच्छी थी मिडिल क्लास के सबसे निचले पायदान पर मौजूद सरकारी नौकरी की आस लगाए बैठे लाखों आकांक्षीयो की कहानी जो एम बी इंजीनियरिंग,मेडिकल एवं अन्य प्रतिष्ठित परीक्षाओं की तैयारी करने में असमर्थ हैं।।

उन्हें उनके घरवालों से सिर्फ महीने का मकान किराया,घर के खेत में उपजी धान का चावल एवं गेहूं का आटा, गैस भराने के लिए एवं लुसेंट किताब खरीदने के रुपए ही मिल सकता है।।

उनके सामने इन सीमित संसाधनों से महीने निकालने की चुनौती पहले बनी रहती है।।इस दौरान खाना बनाने में कितना कम समय खर्च हो इसका भी ध्यान रखना होता है।। दाल भात एवं आलु का चोखा एक ही समय में कैसे बनता है ये सिर्फ इनको पता है।।

खाना जल गया हो या सब्जी में नमक कम हो या फिर चावल पका ही न हो, खाते समय सभी का स्वागत ऐसे किया जाता है मानो किसानों के मेहनत को कद्र करने का ठेका इन्हें ही मिला हो।।

मां बाप के दर्द को अपने सपनों में सहेजना कोई इनसे सीखे।।जिस समय जमाने को बाइक,आइफोन,फिल्म इत्यादि का आने का इंतजार रहता है उस समय इन्हें प्रतियोगिता दर्पण,वैकेंसी,रिजल्ट आदि का इंतजार रहता है।।जहां आज भी समाज में जात-पात, धर्म, संप्रदायिकता का जहर विद्यमान है वहीं इनके कमरे में एक ही थाली में विभिन्न जाति एवं धर्मों का हाथ निवाले को उठाने के लिए एक साथ मिलता है।। इससे बढ़िया समाजिक सौहार्द का उदाहरण कहीं और मिल ही नहीं सकता।

कुल मिलाकर इनका एक ही लक्ष्य है परीक्षा को पास कर मां बाप को वो सबकुछ देना जिसके लिए वो एक दिन तरसे थे।।मुझे गर्व है कि मैं ऐसे लड़कों पर जो अपने सपनो को मंज़िल तक ले जाने में सफल होते है।।



गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

जिंदगी बहुत अनमोल है (फिर हम तुम और नफ़रत क्यों)- राजेश कुमार सिंह श्रेयस कवि, लेखक,

*
ज़िन्दगी अनमोल है, बड़े भाग्य से मनुष्य का शरीर मिलता है यह बात अक्सर कही -सुनी जाती है
प्रेम के दो मीठे बोल बोलने चाहिए। मीठी जुवां के दो मीठे बोल सुन कर,उसका पत्थर दिल पिघल गया। दिल बड़ा जल रहा था ,अब जाकर ठंडा हुआ इस दिल में तो आग लगी।आखिर ये चंद छोटी छोटी लाइने, ज़िन्दगी की ऐसी इबारते लिखती है, जो कभी भयानक आग सी लगा देतीं हैं और ये ही प्यार की मीठी बरसात करा देतीं है।

शब्दों की ये जादूगिरी दो दिलों को मिला देती हैं,तो कभी कभी ऐसा कहर बरपा देती है जो कभी हर पल साथ- साथ रहते थे, वे एक दूसरे के जान दुश्मन बन जाते हैं।

ना जाने हम उन बातों के बतकुच्चन को बतिया कर क्यों अपनी भड़ास निकालने में अपनी जीत समझते है, जो घर - घर में द्वेष के किस्से क्यों कहे जाते हैं l पारिवारिक विखरन का आधार बनते है।

सच में यह मन बड़ा अधम है अंहकारी बन कर खुद को बड़ा मान बैठता है।
ईर्ष्या की आग में जलता हुआ व्यक्ति स्वयं के तन मन को जलाता है।।

जबकि एक बात तो बड़ी ही स्पष्ट है, और सबको पता भी होती है कि व्यक्ति की अगली सांस उसकी है भी या नही, इसकी गारंटी बिल्कुल नही है l फिर भी न जाने क्या- क्या, और कैसे- कैसे दूषित विचार यह मन पाले रहता है कल मैंने सुन्दर काण्ड से जुडी एक पोस्ट डाली चर्चा थी कि रावण का अभिमान उसे ले डूबा वह अभिमानी बल्कि महाअभिमानी था
उसके अभिमान ने अपना ही क्या, उसके पूरे कुल का नाश करा कर ही दम लिया गुरु जी का फोन आया, शायद उन्होंने मेरी पोस्ट पढ ली थी गुरूजी के शब्दों के रूप में सोचे तो रावण हनुमान जी के विषय में कहता है ....

बोला विहासि महाअभिमानी।
मिला हमहि कपि बड़ गुर ग्यानी।।

इसी अहंकार की बात मैंने ऊपर कहा है शब्दों का माया जाल,भौकाल, और माल आदि ऐसे ऐसे फरेब हैं, जो रिश्तों की जमीन को नोच-चोथ देते हैं

राजस्थान के मेरे फेसबुक मित्र धनराज माली , जो ना सिर्फ अच्छे लेखक, कहानीकार, ब्लॉगर हैं, बल्कि एक अच्छे,सरल, और यथार्थवादी इंसान भी हैं l उनका कल का लेख पढ कर मुझे ऐसा लगा कि शायद वे मेरी ही बात को अपने ढंग से कह रहे हो l
सच में मेरी खुशियाँ मुझे मुबारक,वैसे ही दूसरों की खुशियाँ भी उन्हें भी मुबारक़ हो, यही खुश रहने का राज है।

विगत दिनों अपने साथ घटी एक घटना को सोच कर मै बार बार द्रवित और दुखित होता हूँ, और पश्चाताप भी करता हूँ,जहां खुशियों की दरखत को मैंने,खुद की आँखों की आगे चंद मिनटो में कटते देखा l जहां मुझे यह पता चला कि गम और ख़ुशी के बीच कितनी पतली झिल्ली है, जो थोड़ी सी बात से फट जाती है l मै इसमे भी अपनी बड़ी ग़लती मानता हूँ, और पाश्चाताप करता हूँ कि अपने ही कुछ शब्दों को जल्दी से समेट लेता , या बाँध लेता तो, शायद यह पीड़ा हमें या शायद और को नही होती l जहां हमारी खुशियाँ पुराने अंदाज में खिलखिलाती रहती, क्योंकि मै, तो उम्र में बड़ा था l मुझे तो थोड़ी अकल होनी चाहिए l खैर ये खुशियाँ अभी भी खोई नही हैं,उन्हें सवारूंगा l अपनी खुशियों को बाँटने और परोसबे के अनेकों युगत है।

अब मेरे मित्र श्री नन्दकिशोर वर्मा जी को ही ले ले,...पानी -पर्यावरण के लिये दिन रात दौड़ते है, अपनी छोटी क्षमता में बड़ा बड़ा काम करते है, एक पौधा गोमती के तीर पर रोपते है, तो ढेर सारी खुशियाँ अपनी झोली में भर लेते है। सच कहूँ तो उन्हें ख़ुशी देना और लेना खूब आता है। करोना का भयावह संक्रमण काल था, उस वक्त,मेरे वर्मा जी, मेरी बेटी की सगाई से जुडी मेरी हर उन मुश्किलों को हल कराने में जुटे थे, जो मेरे लिये कोई बड़ी समस्या हो l चाहें वह पुलिस परमिशन की बात हो, या विषम परिस्थितियों में तैयारी आदि की बात हो l कही कोई स्वार्थ नही, बस शायद वह उसमे अपनी खुशियाँ बटोर रहे हों l
ऐसे एक दो नही अनेकों, लोग हैं, जिनका जिक्र कर के मै इस लेख को अमर कर सकता हूँ।

मेरे गांव में मेरा एक भाई है, मेरे पिता जी के चचेरे भाई का बेटा " प्रमोद " बिल्कुल सामान्य सा बच्चा लेकिन आज अपने लेख में उसका जिक्र कर इस लेख को और महान करूँगा, क्योंकि वह खुशियाँ बटोरने वाला, इंसान है l गांव में जब कोई, कार्यक्रम, गमी -ख़ुशी हो मेरा प्रमोद वहाँ बड़ी लगन से, बड़ी सिद्दत से, लगा रहता l जी हाँ वह, उन खुशियों को बटोर रहा होता है, जिसे पाना किसी और के बस की बात नही है l पिछले दिनों उसकी बेटी की शादी थी l देर से जानकारी मिली, नही तो मै वहाँ पहुंच कर अपनी खुशियाँ भी बटोरता l फेसबुक पर मेरे अन्य ऐसे अनेक मित्र है, जैसे पशुपतिनाथ सिंह, लव -कुश तिवारी, डा ओमप्रकाश सिंह, धनंजय सिंह आदि जो निस्वार्थ भाव से कुछ ऐसा करते है, जहां खुशियाँ उनकी झोली भरती रहती हैं।

कहने सुनने को बहुत है, मद को फेक, एक नेक, सरल और सहज़ इंसान की भांति यदि ऐसी खुशियाँ बटोरता चला जाये तो खुशियों से झोली लबा लब भर जायेगी l
अंत में बस कुछ चंद शब्दों के साथ इस लेख को विराम देना चाहुँगा कि मेरे मित्र, खुशियों को पाने के ढेरों रास्ते हैं, ज़रा मुस्कुरा कर, प्यार के दो मीठे बोल बोलना आना चाहिए l थोड़ा हँसना और हँसाना सीखिए। प्यार के दो मीठे बोल के साथ गुदगुदाना और गुनगुना सीखिये l स्वयं की छोड़,दूसरों की खुशियों को सुन कर खुश होना सीखिये।

जिंदगी खुशगवार रहेगी हर तरफ प्यार की बहार बहेगी

हाँ एक शब्द इस जो इस लेख के शीर्षक में है , जो सबसे बुरा है, जिससे दूर रहने की जरुरत है,...
मै आज बहुत खुश हुआ कि इस लेख को पूरा लिखा, फिर भी एक भी स्थान पर उसका प्रयोग नही किया l इस कारण मेरा लेखन सार्थक रहा, यह भी मेरी ख़ुशी है l
बीता वर्ष जाने को है, नव वर्ष में नई खुशियाँ आने को है..खुश रहिये, मस्त रहिये, स्वस्थ रहिये है,
नववर्ष मंगलमय हो l
😍😍😍😍😍😍😍
जय हिन्द.....
©® राजेश कुमार सिंह "श्रेयस"
कवि, लेखक, समीक्षक
लखनऊ, उप्र


बुधवार, 29 दिसंबर 2021

सुती उठी बर्तन धोई लेके आई पनिया आ गईली घर मे जबसे हमरो दुल्हनिया- गीतकार अजय त्रिपाठी

पढ़ल लिखल मैडम से सोचली की बियाह करब
गऊवा में हमहु ऐडवांस कहलाइब
चश्मा लगाइब शूट बूट पेनब फेशन में
मैडम के संग में शहर घूमें जाईब

बाकी जबसे बियाह भईल जिनिगी मोर बेहाल भईल
घरवा में जहिया से आ गइली रानी
आ मेहरी के नोकर बनी घर मे रहत बानी
सगरो सोचलका पे फिर गईल पानी

सुती उठी बर्तन धोई लेके आई पनिया
आ गईली घर मे जबसे हमरो दुल्हनिया- २
सूती उठी बर्तन......

अपने सुतेली पहिले हमकें जगावली २
जगते रसोइया में तुरते पठावली २
मागेली चाय हमसे- २ बैठी के पलनिया
आ गईली घर.......२

रोजे रोजे हप्ता हप्ता भेषवा बनावली २
किसम किसम के होठलाली लगावली २
बाल कटवावेली-२जइसन गॉव के नचनिया
आ गईली घर.......२

एमए बीए पास हई रोबवा जमावेली २
प्यार से ना बोले डाटी डाट के बोलावेली २
तीर अस लागे इनकर-२ सगरो बचनिया
आ गईली घर.......२

केतना बताई पूनम होत बा ससतिया २
आफत में जिनगी पड़ल होता दूरगतिया २
ना जाने कइसन चलनी २ नैकी रे चलनिया
आ गइली घर......२

सुती उठी बर्तन धोई लेके आई पनिया

गीतकार अजय त्रिपाठी
सुप्रसिद्ध संगीतकार व गीतकार वाराणसी उत्तर प्रदेश


ये कौन आ गई दिलरुबा महकी महकी फ़िजा महकी महकी हवा महकी महकी - जनाब गुलाम अली

ये कौन आ गई, दिलरुबा, महकी महकी - 2
फ़िज़ा महकी महकी, हवा, महकी महकी
ये कौन आ गई...

वो आँखों, में काजल, वो बालों में गजरा - 2
हथेली पे उसके, हिना महकी महकी
ये कौन आ गई...

ख़ुदा जाने किस किस की, ये जान लेगी - 2
वो क़ातिल अदा, वो क़ज़ा महकी महकी
ये कौन आ गई...

सवेरे सवेरे, मेरे, घर पे आई
ऐ हसरत, वो बाद-ए-सबा, महकी महकी
ये कौन आ गई...

फ़िज़ा महकी महकी, हवा, महकी महकी
ये कौन आ गई, दिलरुबा, महकी महकी
ये कौन आ गई...ये कौन आ गई...




सोमवार, 27 दिसंबर 2021

अगिया दहेज के अईसन तेज हो गईल बेटी जनमावल परहेज हो गईल दहेज गीत - मनोज तिवारी मृदुल

अगिया दहेज के अईसन तेज हो गईल
बेटी जनमावल परहेज हो गईल

बाप भईल कंस से भी बढ़ के कसाई
अपना जमलका देला बध कराई
कइसन माई बाप के करेज हो गईल
बेटी जनमावल परहेज...........

बेटियां के दुख का बा ई त के ना जाने
तबो निदर्दी लोगवा बने अनजाने
बेटहा त जुल्मी अंग्रेज हो गईल
बेटी जनमावल परहेज............

दिन नइखे ढेर अब त उहो युग आई
शादी बदे बबुआ कम्पटीशन देवे जाई
सुनी होखे शुरू अब त सेज हो गईल
बेटी जनमावल परहेज............

रोके अत्याचार जे कुकर्म बढ़ जाईहं
एकरे ई बोझ से धरती फ़ट जाईहं
पपवा के बहुते मोटा पेज हो गईल
बेटी जनमावल परहेज............





हुजूर आपका भी एहतराम करता चलूँ। इधर से गुज़रा था, सोचा सलाम करता चलूँ- जगजीत सिंह

हुजूर आपका भी एहतराम करता चलूँ।
इधर से गुज़रा था, सोचा सलाम करता चलूँ।।
हुजूर आपका भी एहतराम .......

निगाह-ओ-दिल की यही आखरी तमन्ना है।
तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये में शाम करता चलूँ।।
हुजूर आपका भी एहतराम .......

उन्हें ये जिद के मुझे देख कर किसी को न देख।
मेरा ये शौक के सबसे कलाम करता चलूँ।।
हुजूर आपका भी एहतराम ......

ये मेरे ख़्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिन।
अब आ गया हूँ तो दो दिन कयाम करता चलूँ।।
हुजूर आपका भी एहतराम .......

हुजूर आपका भी एहतराम करता चलूँ।
इधर से गुज़रा था, सोचा सलाम करता चलूँ।।



हर साल आयी मईया तोहरी दुअरिया कबो अईतु हमरो बखरिया माई जग तरनी-२ भोजपुरी पचरा मनोज तिवारी मृदुल

हर साल आयी मईया तोहरी दुअरिया
कबो अईतु हमरो बखरिया माई जग तरनी-२

नाही बाटे विद्या बुद्धि नाही बा ज्ञानवा
नही जानी हम मईया पुजवा के धनवा
हम त हई मईया पाँव के पूजरिया -२
कबो अईतु हमरो बखरिया.........

निर्धन के धन देलु कोढ़ीयन के तनवा
सेवक बझिनियन के देवेलु लालनवा
जब होला कृपा के जग पे नजरिया हो-२
कबो अईतु हमरो बखरिया............

है महारानी जगत भवानी
हमरा के तार देतू तब तोहखे जानी
हम त हई महारानी निपट अनाड़िया हो
कब लेबू हमरो खबरिया माई जग तरनी
कबो अईतु हमरो बखरिया.........

हर साल आयी मईया तोहरी दुअरिया
कबो अईतु हमरो बखरिया माई जग तरनी-२





मां शारदे कहा तू बीणा बजा रही है। किस मंजुगान से तू जग को लुभा रही है।।

मां शारदे कहा तू बीणा बजा रही है।
किस मंजुगान से तू जग को लुभा रही है।।
मां शारदे कहा तू बीणा........

किस भाव मे भवानी तू मग्न हो रही हो
विनती नही हमारी क्यो मातु सुन रही हो।।
मां शारदे कहा तू बीणा........

हम दीन बालक कब से विनती सुना रहे है।
चरणों मे तेरे माता हम सिर झुका रहे है।।
मां शारदे कहा तू बीणा........

अज्ञान तम हमारी! माँ शीघ्र दूर कर दे।
शुभ ज्ञान हममें माता माँ शारदे तू भर दे।।
मां शारदे कहा तू बीणा........

हमको दयामयी तू ले गोंद में पढ़ाओ।
अमृत जगत में हमको माँ ज्ञान का पिलाओ।।
मां शारदे कहा तू बीणा........

बालक सभी जगत के सुत मातु है तुम्हारे।
प्राणों से प्रिय तुम्हें हम पुत्र सब दुलारे।।
मां शारदे कहा तू बीणा........

मातेश्वरी तू सुन ले सुंदर विनय हमारी।
करके दया तू भरले बाधा जगत की सारी।।
मां शारदे कहा तू बीणा........

मेरी बेटी मेरा शान 
मेरे बड़े भाई की बेटी
भूमि तिवारी


कभी जाने नही दी है वतन की आबरू हमने किया है जान देकर आज खुद को सुखरू हमने।।

कभी जाने नही दी है वतन की आबरू हमने
किया है जान देकर आज खुद को सुखरू हमने।।
कभी जाने नही दी है वतन.....

हकीकत है ये कुर्बानी कभी तो गुल खिलायेगी
चमन को सींच कर अब तक बहाया जो लहू हमने।।
कभी जाने नही दी है वतन........

हमे है फख अपने ही वतन के काम आयी है।
दिलो में सरफरोशी की जो की थी आरजू हमने।।
कभी जाने नही दी है वतन.......

हमारी कामयाबी से जमाने भर में महकेंगे।
वफ़ादारी के फूलों को दिए है रंगबू हमने।।
कभी जाने नही दी है वतन.......

फ़िजा में यू ही लहराता रहेगा देश का परचम।
नही अब तक किया है दुश्मन के आगे सरनम हमने।।
कभी जाने नही दी है वतन.....…...

ख़बर क्या थी निभायेंगे वही यो दुश्मनी जिसने।
गले मिलकर हजारों बार की है गफ़्तम हमनें।।
कभी जाने नही दी है वतन........

किया मजबूर हमको जंग लड़ने के लिए वर्ना।
न छोड़ी है कभी अपनी शराफ़त अपनी खू हमने।।
कभी जाने नही दी है वतन...........








गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

हम वो आखिरी लोग है जिसने सायकिल की सवारी को तीन चरणों मे सीखा है- लव तिवारी

बचपन में हमने गांव में साइकिल तीन चरणों में सीखी थी ,
पहला चरण - कैंची
दूसरा चरण - डंडा
तीसरा चरण - गद्दी ...

तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।
कैंची वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे।

और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना #सीना_तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और क्लींङ क्लींङ करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है।

आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से महरूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था।
हमने ना जाने कितने दफे अपने घुटने और मुंह तुड़वाए है और गज़ब की बात ये है कि तब #दर्द भी नही होता था, गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए।

अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो दो फिट की साइकिल आ गयी है, और अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में।

मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी! जिम्मेदारियों" की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं।
इधर से चक्की तक साइकिल ढुगराते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए। और यकीन मानिए इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी।और ये भी सच है की हमारे बाद "कैंची" प्रथा विलुप्त हो गयी ।

हम लोग की दुनिया की आखिरी_ पीढ़ी हैं जिसने साइकिल चलाना तीन चरणों में सीखा !
पहला चरण कैंची
दूसरा चरण डंडा
तीसरा चरण गद्दी।

● हम वो आखरी पीढ़ी हैं, जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।

● हम वो आखरी लोग हैं, जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं !!

😊😊