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Lav Tiwari ( लव तिवारी )

Lav Tiwari On Mahuaa Chanel

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शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

तुम से ही जीवन अपनी कैसे इसे बर्बाद करेगे - लव तिवारी

अब नही याद करेंगे न कोई फ़रियाद करेगे
तुम से ही जीवन अपना कैसे इसे बर्बाद करेगे

तुमको शायद मालूम न हो बिछड़ते हो जब ख्वाबों में तुम
दिल सहम जाता हो जैसे,  सोचते किसको प्यार करेगें

मुझको पता तुम मेरी न हो, हो अमानत गैरो की
जान कर इन सच्ची बातो को, फिर कैसे इनकार करेगे

रखे सलामत ख़ुदा तुम को, और सारी खुशियां मिले 
मरते दम तक यही तमन्ना और दुआ हर बार करेगें

रचना- लव तिवारी
दिनांक -02- अगस्त-2019






गुरुवार, 1 अगस्त 2019

धुंधली पड़ रही अपनी तस्वीर बदल लें- डॉ एम डी सिंह

धुंधली पड़ रही अपनी तस्वीर बदल लें
चलिए खुद ही अपनी तकदीर बदल लें

कह दो काजिओं से हालात बदल गए
अब तो वे भी अपनी तहरीर बदल लें

सुनते-सुनते दुनिया अब ऊब रही है
कुछ तो जनाब अपनी तकरीर बदल लें

मुटा रहीं गर्दनों पर कुछ तो असर करे
पुरानी पड़ी अपनी शमशीर बदल लें

अपनी ही नहीं दिमाग की भी सुने दिल
असर करे जो अपनी तदवीर बदल लें

काजी- न्यायाधीश
तहरीर- लिखावट
तकरीर- भाषण
शमशीर -दो धारी तलवार
तदवीर -उपाय,प्रयत्न
डॉ एम डी सिंह




रविवार, 14 जुलाई 2019

वृक्ष ही जीवन है - लव तिवारी

शिक्षा और संस्कार दोनों अलग अलग विषय वस्तु है, एक तरफ शिक्षा जहा मानव के शरीर में ज्ञान के प्रकाश को प्रदर्शित करता है वही संस्कार शिक्षा का मानवीय एवम नैतिक प्रयोग को दर्शाता है, आज के ज़माने में किसे ज्ञान नहीं कि पेड़ के आभाव से पर्यावरण पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है, और प्रकृति संसन्धान ही उच्च कोटि के मानवीय संसाधन है, शिक्षा और ज्ञान का एक विशाल समूह भारत की राजधानी दिल्ली में रहता है लेकिन संस्कार कही कही देखने को मिलता है ,हाँ यहाँ हर एक व्यक्ति 10 रूपये को 1 लाख करने के फ़िराक में है,

      एक छोटी सी घटना अपने जीवन में घटित हुई है एक बार हम सब अपने दादा जी के साथ बैठे हुए थे ,दादा जी का मतलब बाबा से है बाबा ने बुआ के लडके से फिरकी लेते हुए कहा मेरे जैसा कोई काम करने वाला है तुम्हारे गांव में, मैं दिन भर घर द्वार साफ सुथरा करता हूँ ,जिस तरह बाबा फिरकी ले रहे थे बुआ का लड़का भी फिरकी के अंदाज में बाबा को वास्तविकता से रूबरू कराया बोला की नाना जी आप के दरवाजे पर कितने पेड़ है और घर द्वार को झाड़ू से चमकाना कौन सी बड़ी बात होती है आप हमारे यहाँ चलिये मेरे बाबा के कार्यो का मूल्यांकन कीजिये आप 10% भी नहीं है, आप सभी मित्रों को बता दे जो सुख हमें अपने बुआ के यहाँ पेड़ो को देख के मिलता है वो अपने गांव में नहीं 50 से 100 मीटर की दुरी में सारे पेड़ो का समूह कटहल, सिरफल, बड़हल जामुन, आम के पेड़ो की कई विशेषताये , कार्य वास्तविक में वो होता है जो सामाजिक और नैतिक सोच से किया गया हो, हम अपने गुरु जी Praveen Tree जी में समाज के प्रति नैतिक ज़िमेदारी का अदभुत कार्य देखा है वाकई सराहनीय है, सराहनीय शब्द का मतलब इस पोस्ट में कई तस्वीरों के माध्यम से देखी गयी है कि  कैसे गुरु जी ने धन के आभाव में पौधों के सुरक्षा संबंधी कार्यो को बख़ूबी निभाया हुआ है और समाज के लोगों को एक सन्देश भी भेजा है जन समुदाय के कार्यो को करने के लिए धन से ज्यादा निष्ठा और लगन की जरुरत होती है
लिंक- https://m.facebook.com/SabkaaSahyog/

धन्यबाद  लव तिवारी










शुक्रवार, 14 जून 2019

पर्यावरण का स्थायी समाधान वन संरक्षण एवम वृक्षारोपण- लव तिवारी

पिछले कुछ दिनों से गर्मी के आतंक ने भारत देश को हिला कर रख दिया है, एक दिन तो यह आंकड़ा था विश्व के 15 सबसे गर्म शहरो में भारत के 10 शहर शामिल थे जिसमें राजस्थान के चूरू जिले का तापमान सबसे अधिक 50℃ से भी ऊपर था,  दोस्तों पानी का स्थायी समाधान नदी नालों को जोड़ना नहीं हो सकता, इसका स्थाई समाधान हमें हमारी जड़ों में और हमारी परंपरा में तलाशना होगा। हमारे पुरखों ने जंगलों से उतना ही लिया, जितना आवश्यक था। हमारे पुरखे सूखी लकड़ियों का प्रयोग करते थे। हरी टहनियों को तोड़ना पाप मानते थे।


हाल में ही भारत के प्रधानमंत्री से एक विशेष समुदाय के व्यक्ति के द्वारा मुलाकात हुई उसने भारत मे संस्कृत अध्ययन पर विशेष जोर देने को कहा संस्कृत भाषा मे पेड़ संरक्षण पर विशेष बल दिया है पिछली तीन सदियों से प्रकृति के साथ भरपूर छेड़छाड़ की गई। यह प्रक्रिया औपनिवेशिक भारत के पहले वन अधिनियम कानून से शुरू हुई। आज़ादी के बाद 1970 के बाद हमने सबसे अधिक प्रकृति और उसके उपादानों के साथ छेड़खान की है। इसका परिणाम हमें अत्यधिक तापमान, जल की कमी और सूखे के रूप में हमारे सामने आया है।
दोस्तों जल का स्थायी समाधान  पर्यावरण में बढ़ते तापमान का स्थायी उपाय अधिकाधिक वृक्षारोपण है। वृक्षारोपण की बात हर साल होती है, इसलिए हमें यह बात सामान्य लगती है, लेकिन इस बार इसे एक उत्सव के रूप में मनाया जाए तो और अधिक बेहतर होगा।
आने वाले मानसून के मध्य में हम 30 दिनों तक अपने अपने क्षेत्रों में वृक्षारोपण का कार्य करें। इसकी शुरुआत अपने-अपने घरों से कीजिये, इसके बाद सार्वजनिक स्थलों- विद्यालय, लोक धार्मिक स्थलों, ग्राम पंचायत भवन, डिस्पेंसरी, सड़क के किनारे, अथाई पर वृक्षारोपण का कार्य करेंगे। इससे एक ओर जल और जंगल सुरक्षित होगा वहीं दूसरी तरफ हमारे पुरखों के लिए यह एक आदर्श श्रद्धांजलि होगी। हमारी विचारधारा आदिवासियत की दिशा में यह एक सशक्त कदम भी होगा।



मुस्कुलर डिस्ट्रॉफी - कई निराशाओं में व्यथित मन ढूढ़े एक आशा- लव तिवारी

हिंदी हिन्दू और हिंदुस्तान का जिक्र करते हुए अपनी कहानी लिख रहा हूँ , हिन्दू और हिंदुस्तान की बात इस लिए है कई बाबाओ ने हिन्दू रीति रिवाज को इस हिंदुस्तान में बर्बाद कर रखा है, यही कारण भी हिन्दू धर्म में लोगो की आस्था दिन पर दिन खत्म होती जा रही है , सेक्टर 15 स्थित अपने आवास के पास एक नाई की दुकान है उस दुकान का मालिक ने जल्द में ही ईसाई धर्म को धारण कर लिया , मैंने पूछा कि ऐसा क्यों किया तो बोला मेरी धर्म पत्नी हमेशा बीमार रहती थी और जैसे मैने ईसाई धर्म को धारण किया मेरे पत्नी को पहले से बेहतर है।

अपनी कहानी पर आते है हम दो भाइयों लव और कुश तिवारी का जन्म 11 अगस्त 1987 को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर के युवराजपुर के ग्राम में हुआ था बचपन की पढ़ाई लिखाई गांव में हुई और बाद की पढ़ाई हाइस्कूल और इंटरमिडियड की पढ़ाई शहर के सरकारी स्कूल राजकीय सिटी इंटर कॉलेज में हुई। पढ़ाई के साथ साथ इस स्कूल में अपना एक अलग बर्चस्व था, इसका मुख्य कारण हम दोनों भाइयों को संगीत के प्रति रुचि और कॉलेज के हर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़ चढ़ के भागीदारी, राजकीय सिटी कॉलेज में पढ़ाई के बाद आगे की स्नातक तक कि पढ़ाई स्नाकोत्तर महाविद्यालय ग़ाज़ीपुर में पूरी हुई , स्नाकोत्तर की पढ़ाई के हम दोनों भाइयों को अलग अलग शहर जाना पड़ा मुझे प्रबंधन में पोस्ट ग्रेजुएट के लिए ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर उत्तर प्रदेश आना पड़ा और वही मेरे भाई को कंप्यूटर में पोस्ट ग्रेजुएट के लिए काशी बनारस आना पढ़ा, पढ़ाई पूरा होने के एक साल तक सब कुछ ठीक चल रहा था फिर एक दिन भाई को लगा कि मेरा शरीर दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा है फिर उसने इस बात की जिक्र पिता जी से की , यही कोई दिसंबर 2012 में पिता जी ने उसे नोएडा से वाराणसी में बुला लिया, वही सारे परीक्षण के बाद पता चला कि हम दोनों भाइयो को मुस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की भयानक बीमारी है इसकी बात की पुष्टि के वाराणसी के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय हॉस्पिटल ने हम दोनों भाइयों को अखिल भारतीय आयुवेर्दिक संस्थान जिसे एम्स दिल्ली कहा जाता है वहाँ के लिए भेजा, और वहाँ इस बात की पूर्ण पुष्टि हुई ।

यही से इस पूरे लेखन का शीर्षक कई निराशाओं में  व्यथित मन ढूढे  एक आशा, कई विशेष जानकारों का यह मानना है कि इस रोग का कोई इलाज संभव नही और किसी के द्वारा यह भी सुनने को मिलता है कि भारत के आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में ही एक इलाज संभव है, अब इस बात की पुष्टि और रोग के सही उचार के लिए देश के विभिन्न प्रदेशों के आयुर्वेद के चिकित्सक के पास आना जाना हुआ लेकिन कोई कारीगर इलाज नही मिला , इस बीच कई लोगो द्वारा ये सुझाव दिए गए दवा के साथ दुआ की भी जरूरत होती है फिर यहीं से शुरू हुई लूट खसोट की कहानी और फिर हिंदू धर्म के प्रपंच का अनोखा किस्सा , मरता क्या न करता हिंदुस्तान के इन पापी ब्राम्हणों ने बहुत रुपये तक चुना लगाया और फिर भी बात नही बनी, यही पर उस नाई की बात में सच्चाई नजर आई, उसको भी हिन्दू धर्म के इन  ढोंगी बाबाओं भी लूटा होगा और बाद में बेचारा थक हार कर ईसाई धर्म को मानने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा।

धन्यबाद - लव तिवारी
नोएडा उत्तर प्रदेश
+91-9458668566




बुधवार, 5 जून 2019

विश्व पर्यावरण दिवस पर आधुनिक मानव की मानसिकता - लव तिवारी

कुल्लू में तापमान 33℃ है ऋषिकेश में तापमान 38℃ है नैनीताल में 26℃ है डलहौजी में भी 25 से 30 के बीच मे है कुफरी में 23℃ है शिमला में 25℃ है और मसूरी में भी 26 है |इन सभी हिल स्टेशन्स के तापमान लगातार बढ़ रहें , दिल्ली से शिमला के लिए रोज हजारों लोग निकलते हैं और गर्मी के मौसम का आनंद लेकर चले आते है आते जाते हजारों रुपये खर्च के साथ जो लंबा जाम लगता है वहाँ जिसकी कोई हद नही शिमला को दिल्ली बनाने का प्रोसेस लगातार जारी है |जब इन प्राकृतिक जगहों पर ये हाल है तो भैया UP बिहार दिल्ली राजस्थान में 50℃ + तापमान पहुँचना नार्मल है ।


AC घर घर लग रही स्कूल, हॉस्पिटल,सरकारी आवास, सरकारी कार्यालय प्राइवेट संस्थान हर जगह AC का ही बोल बाला है , बिना AC आप रह भी नही सकते,हम अपनी मौत अपने हाँथो लिख रहे ,गंगा सूख गई है , ग्लेशियर में बर्फ ही नही है पिघलेगा कहाँ से ।

गर्मी पड़ती है हम झुंझलाते हैं , जिनका फील्ड वर्क है उनकी हालत खराब है , जो ऑफिसियल वर्क करते है उन्हें तो कम दिक्कत का सामना करना पड़ता है, आदमी की जितनी आमदनी नही उससे ज्यादा पैसा शिकंजी , ठंडे पानी और गन्ने के जूस पर खर्च कर देता है ! सरकार भी सस्ती AC बाँटने निकली है , दुबई जो की रेगिस्तान में बसा है वहाँ तापमान 42℃ है ,और हमारे यहाँ 50 पहुँच रहा , हमारे यहाँ केवल पर्यावरण दिवस पर पौधरोपण का कार्य किया जाता है और आज कल कार्यक्रम को सोशल मीडिया पर पोस्ट करके वाहवाही लूटी जाती है

सरकारों को इस ओर ध्यान देना चहिये , एक सीमा के बाद तो AC भी काम नही करती 60 ℃ के बाद खून उबल जाएगा और सब मर जाएँगे,
इस बार ठंडी में कुहरा का दर्शन नही हुआ , वरना पूरे दिन कुहरा पड़ता था ,
सावन की झड़ी तो लोग भूल ही चुके हैं जब हफ़्तों महीनों लगातार बारिश होती थी रिमझिम रिमझिम ।
एक AC और लाइये चलाइये अपने सुकून की केवल ढुढिये और सो जाइये !! विज्ञान और प्रकृति की लड़ाई में विजेता सदैव प्रकृति होगी लिख के ले लीजिए ।

प्रस्तुति - लव तिवारी
पर्यावरण दिवस पर विशेष
5 जून 2019





मंगलवार, 4 जून 2019

केजरीवाल के दिल्ली मेट्रो और डीटीसी बस में महिलाओं के मुफ्त यात्रा के संदर्भ में -लव तिवारी


मजबूर मजदूर और लड़की - ये वाक्य अब दिए गए केजरीवाल के दिल्ली मेट्रो और डीटीसी बस में महिलाओं के मुफ्त यात्रा के संदर्भ में है, वाकई केजरिवाल पर ये कहावत भी सटीक बैठती है, अँधेर नगरी चौपट राजा टका सेर भाजी टका सेर खाजा, बात सोचनीय है कि क्या मेट्रो या डीटीसी में फ्री सेवा उन गरीब मजदूरों के बजाय दिल्ली के उन महिला वर्ग को मिलनी चाहिए जिनकी वेतन हजारो एवम लाखो में है, फिर इस एलान से मेट्रो के विस्तार पर पूरा असर पड़ेगा और जिस मेट्रो की वजह से दिल्ली प्रदूषण रहित है पेड़ लगाने के बजाय दिल्ली के इवेन और ओड का फार्मूला भी फैल रहा, जहा लोगो के द्वारा अपनी वाहन छोड़ कर मेट्रो यात्रा या पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर जोर देना चाहिए वहाँ लोगो ने निजी वाहनों की संख्या बढ़ा दी जिसके पास इवेन नंबर का वाहन था उसने ओड नंबर का वाहन खरीदा, वैसे बहुत हद तक ये फार्मूला पसंद आया लेकिन एक साल तक ही इसे प्रयोग में लाया गया,केजरीवाल ने महिलाओं को मेट्रो मुफ्त करके दिल्ली चुनाव के बाद मेट्रो बंद करने की पूरी व्यवस्था कर दी, घाटे में कैसे चलेगी मेट्रो? वैसे मेरे हिसाब से वोटर जब 72 हजार ठुकरा सकता है तो मुफ्त यात्रा क्या मायने रखती है |

शुक्रवार, 3 मई 2019

आरक्षण पर एक हरिजन की जुबानी मध्यप्रदेश - लव तिवारी

मध्यप्रदेश भारत देश का एक अनोखा राज्य जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अनोखा पहचान इसके पीछे भारत देश में इसकी भगोलिक स्थिति का मध्य होना है, आज कल तो विशेष रूप को सुशोभित करता यह प्रदेश क्यों की महाकुंभ की आस्था को संजोता महाकाल की नागरी उज्जैन पुरे भारत के विभिन्न नगरो के लोगो जमावड़ा , आस्था भक्ति विश्वास को संजोता यह धार्मिक पर्व - महाकुम्भ

मध्यप्रदेश से निकलते समय इस बात की जानकारी हुयी क़ि वहाँ की शिवराज सरकार ने आरछण के आधार पर होने वाले प्रमोशन को बंद कर दिया है, इस बात की ख़ुशी मिली , दोपहर के समय जब हम घर से रेलवे स्टेशन की तरफ निकले रस्ते में ऑटो की सवारी कर स्टेशन को जाना था ,ऑटो वाले भाई से जब हम आरक्षण का जिक्र किये तो भाई भी बोला की दोस्त हम भी आरछण विरोधी है , फिर झट से मैंने दोस्त की जात का पता किया उसने बोला की श्रीमान हम जाती से हरिजन है , मैंने कहा की तब तो आप को इसका विरोध करना चाहिए तब उस व्यक्ति ने एक ऐसी बात बोली की मैं दंग रह गया , बोला आरछण हम को अपंग बना रही है और योग्य #व्यक्ति को उस जगह पर बैठने का अधिकार है, अगर योग्य व्यक्ति को आज के समय नौकरी नहीं दिया जाय तो सारे काम सही ढंग से न होकर ख़राब और सुस्त रूप को धारण करेगे ,जब मैं छोटा था तो मेरे पिता जी का स्वर्गवास हो गया माता जी भी 4 ,5 साल की उम्र में परलोक सिधार गयी, पालन पोषण दादा दादी ने किया ,आज कल सरकार के द्वारा जो हम सबको 4 से 10 किलो अनाज मिलता है उसके आधार पर रिक्शे वाले कहते जब घर बैठे खाने को मिल रहा है तो कमाने की क्या जरुरत,  आरक्षण विरोधी समाज का वो पड़ा लिखा वर्ग भी है जो किसी जाति धर्म को न देख कर देश का वास्तविक विकास  चाहता है, लेकिन राजनीती में बैठे देश के वो गद्दार जो आरक्षण और जाति धर्म को मोहरा बनाकर देश के साथ दुर्व्यवहार करते है और वोट बैंक की राजनीति

सोमवार, 11 मार्च 2019

गांव वाले कितने अच्छे होते है - लव तिवारी

कच्चे घर और पक्के रिश्ते होते थे
गाँव वाले कितने अच्छे होते थे

सुना है हर दरवाजे में अब ताला है
पहले तो हर घर मे बच्चे होते थे

अब तो कार में दुल्हन आती जाती है
पहले सिर्फ डोली और सिक्के होते थे

ये तो खुश्क़ पडी़ है नदिया झरने भी
याद है बादल कितने गहरे होते थे

क्या अब भी कोई खैलता है उस पीपल पर
जिस से हम दिन भर ही चिपके होते थे


शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

भगवान राम के कुल की विस्तृत जानकारी - वा‍ल्मीकि रामायण- ॥1-59 से 72।।

राम के कुल को रघुवंश या रघुकुल क्यूँ कहा जाता है?
भगवान् राम की वंश परंपरा
वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध।भगवान् राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था।
मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुँची।
इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी।
रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है:- ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ।
मरीचि के पुत्र कश्यप हुए।कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुए।वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था।वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।
इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए।
कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था।
विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए।
अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ।
त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए।
धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था।
युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए और मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ।
सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित।
ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए।
भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए।
सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे।सगर के पुत्र का नाम असमंज था।असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए।दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए।
भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतार था।भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए।रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।
रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए।
प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए।
सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था।
अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए।
मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए।
अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था।नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए।
नाभाग के पुत्र का नाम अज था।अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, तथा शत्रुघ्न हैं।
वा‍ल्मीकि रामायण- ॥1-59 से 72।।


आधुनिक समाज मे गाय को छोड़कर घर मे कुत्ते की अधिक महत्ता- लव तिवारी

समाज मे आधुनिकता और पश्चिमी सभ्यताओं के नाम पर हम में बहुत ख़राब परिवर्तन आये है जहा घर में गाय न रख के कुत्ता रखना | कुत्ते के बारे में शास्त्रों में कहा गया है के इसको कभी भी बांध के नही रखना चाहिए इसको खुला छोड़ना चाहिए और गाय के बारे में कहा गया है के इसको साज समाल कर के रखना चाहिए देखभाल के साथ | पर हमने ऐसी अंग्रेजी शिक्षा शिखी के गाय को छोर दी, कशाई ले जाये काटने को या कोई और... कुत्ता पकड़ के घर में बांध के पट्टे से रखा..और बड़े शान से बताते है 'देखो मेरा कुत्ता' | रोज सबरे कुत्ते को टहलाने लेके जायेंगे, फिर सुसु और टट्टी करवाएंगे और गाय की बार करो तोह नाक चड़ाएंगे | एक कुत्ते को पालने के लिए आज कल लाखों रुपये खर्च किये जा रहे है कुत्ते की महत्ता आदमी से बढ़ कर हो गयी है क्यो की कुत्ते की देखभाल करने के लिए विशेष रूप से नौकर और नौकरी दी जाती है

कुत्ते और गाय की कोई तुलना नही हो सकती पर अंग्रेजी शिक्षा ने सब सत्यानास कर दिया | जिस गाय के गोबर से स्नान किये बिना आप कोई यज्ञ नही कर सकते, जिस गोबर की लेपन किये बिना यज्ञ की बेदी नही बन सकती उसी गोबर को देखते ही अंग्रेजी स्कूल में पड़ने वाले बच्चे छि छि करते है और बदबू की बात करते है पर दुनिया भर का कचरा अंग्रेजी सेन्ट और परफिउम में खुसबू आति है जो त्वचा और शारीर दोनों का नुक़सान करते है |


बुधवार, 23 जनवरी 2019

जिंदगी का सफर- लव तिवारी

।।  जीवन का सफर  ।।
.
एक बार एक नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी।
एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा।
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यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली।
.
वह सोचने लगा, अहा ! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं ?
.
कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा.. भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता।
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अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।
.
नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ।
.
सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई।
.
चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।
.
कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया।
.
आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।
शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।
जीत किसके लिए, हार किसके लिए
      ज़िंदगी भर ये तकरार किसके लिए..
जो भी आया है वो जायेगा एक दिन
      फिर ये इतना अहंकार किसके लिए -
विचार कीजिये..



गुरुवार, 10 जनवरी 2019

भारत में रहकर भारत को गाली देने वाले कुत्तों के लिए समर्पित।

एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था। उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था। कुत्ते ने कभी नौका में सफर नहीं किया था, इसलिए वह अपने को सहज महसूस नहीं कर पा रहा था। वह उछल-कूद कर रहा था और किसी को चैन से नहीं बैठने दे रहा था।मल्लाह उसकी उछल-कूद से परेशान था कि ऐसी स्थिति में यात्रियों की हड़बड़ाहट से नाव डूब जाएगी। वह भी डूबेगा और दूसरों को भी ले डूबेगा।

परन्तु कुत्ता अपने स्वभाव के कारण उछल-कूद में लगा था। ऐसी स्थिति देखकर बादशाह भी गुस्से में था, पर कुत्ते को सुधारने का कोई उपाय उन्हें समझ में नहीं आ रहा था। नाव में बैठे दार्शनिक से रहा नहीं गया। वह बादशाह के पास गया और बोला : "सरकार। अगर आप इजाजत दें तो मैं इस कुत्ते को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ।बादशाह ने तत्काल अनुमति दे दी।

दार्शनिक ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस कुत्ते को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया।
कुत्ता तैरता हुआ नाव के खूंटे को पकड़ने लगा।उसको अब अपनी जान के लाले पड़ रहे थे।
कुछ देर बाद दार्शनिक ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया।वह कुत्ता चुपके से जाकर एक कोने में बैठ गया।

नाव के यात्रियों के साथ बादशाह को भी उस कुत्ते के बदले व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ।
बादशाह ने दार्शनिक से पूछा : "यह पहले तो उछल-कूद और हरकतें कर रहा था। अब देखो, कैसे यह पालतू बकरी की तरह बैठा है ?

दार्शनिक बोला : "खुद तकलीफ का स्वाद चखे बिना किसी को दूसरे की विपत्ति का अहसास नहीं होता है। इस कुत्ते को जब*मैंने पानी में फेंक दिया तो इसे पानी की ताकत और नाव की उपयोगिता समझ में आ गयी।

जिन कुत्तों को भारत में डर लगता है उन्हें 6 महीने के लिए सीरिया, इराक़ या पाकिस्तान में फेंक देना चाहिए फिर भारत आने पर अपने आप भीगी बिल्ली बनकर एक कोने में पड़े रहेंगे।*
'भारत' में रहकर 'भारत' को गाली देने वाले कुत्तों के लिए समर्पित।
 _जयहिंद_  




बुधवार, 5 दिसंबर 2018

मैं जनम जनम से उसी का हूँ उसे आज तक ये पता नही- चंदन दास

सारे राह कुछ भी कहा नही, कभी उसके घर मैं गया नही
मैं जनम जनम से उसी का हूँ उसे आज तक  ये पता नही
सारे राह.….

ये खुदा की देन अजीब है, है इसी का नाम नसीब है
जिसे तूने चाहा मिल गया जिसे मैंने चाहा मिला नही
सारे राह..…

उसे पाक नजरो से चूमना भी इबादतों में शुमार है
कोई लाख फूल करीब हो कभी मैंने उनको छुआ नही
सारे राह..…

इस शहर में कई साल से मेरे कुछ करीबो अजीज है
उन्हें मेरी कोई खबर नही मुझे उनके का कोई पता नही
सारे.....

मैं जनम...

गायक- चन्दन दास




सोमवार, 26 नवंबर 2018

जान भी देते अगर उनका इशारा होता- चंदन दास

उनसे इंकार तो हरगिज़ न गवारा होता
जान भी देते अगर उनका इशारा होता
कौन कहता है कि दिन रात मेरे नाम करो
एक लम्हा तो मेरे साथ  गुजारा होता
जान भी ......
उनसे.........

तू मसीहा है मसीहा मसीहा लेकिन
बात तो जब भी थी दर्द का चारा होता
जान भी ....
उनसे......

एक हसरत है जो पलती है मेरे सीने में
काश इस शहर में तो कोई तो हमारा होता
जान भी.......…

गैर के हाथ से सागर भी न लगा न मुराद
तू अगर ज़हर भी देता तो गवारा होता
जान भी......

Visit- https://youtu.be/Lco4Xy6FoLg
गायक- जनाब चंदन दास


रविवार, 25 नवंबर 2018

महफ़िल में रंग लाएगी बोतल शराब की- चंदन दास

जब से उल्फत तेरी नसीब हुई सारी दुनिया मेरी रक़ीब हुई
ऐसी जन्नत को क्या करूँ लेकर बाद मरने के जो नसीब हुई

महफ़िल में रंग लाएगी बोतल शराब की
नाचेगी और नाचायेगी बोतल शराब की

रुखसत हुए जो घर को तो साकी ने ये कहा
ले जा वो याद आएगी बोतल शराब की
नाचेगी और......

दिल है मरीज़ इश्क का दिल की दवा शराब
हर दर्द को मिटाएगी बोतल शराब की
नाचेगी और नाचायेगी.......

घर मे अकेले बैठके पीने का क्या मजा
महफ़िल में रंग लाएगी बोतल शराब की
नाचेगी और .........

दुनिया को छोड़ छाड़ कर मयखाना आइये
दुनिया नयी बनाएगी बोतल शराब की
महफिल में रंग.....

असलम जमाने वालो ने ठुकरा दिया तो क्या
तुझको गले लगाएगी बोतल शराब की
नाचेगी और.....

गायक- चंदन दास
ग़ज़ल- असलम


शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

देख मालिक एक सावन की कैसा कैसा रूप निराला- लव तिवारी

बचपन का शोर जवानी की उलझन और बुढ़ापे का शांत जमाना
देख मालिक एक सावन की कैसा कैसा रूप निराला

बचपन की एक नाव पुरानी उसपर हम सब खेले थे
और झूलों की रुत सुहानी जिस पर हम सब झूले थे
बाग बगीचे में अदभुत फल का क्या ठिकाना था
 हर बरस सावन की चाह का एक ग़जब जमाना था


यौवन में सावन की कजरी और प्रीतम का प्यार
साजन की राह निहारत सजनी करे सृंगार
सब बगिया बीच झूलो का यह ये अद्भुत त्यौहार
हर बरस सावन की खुशियां मिले हमे हर बार

 बूढ़ा सावन बचपन को ढूढे कैसे अपनी अखियों में
 कैसे बीते दिन सुहाने कुछ पत्ते कुछ कलियों में
बिन साजन सावन है सुना इस कजरी के मातम में
 कैसे कैसे दिन दिखे अब की बरस मोहे सावन में

 रचना - लव तिवारी


सोमवार, 14 मई 2018

ब्राम्हण और जनेऊ- लव तिवारी

#ब्राह्मण_और_जनेऊ
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पिछले दिनों मैं हनुमान जी के मंदिर में गया था जहाँ पर मैंने एक ब्राह्मण को देखा, जो एक जनेऊ हनुमान जी के लिए ले आये थे | संयोग से मैं उनके ठीक पीछे लाइन में खड़ा था, मेंने सुना वो पुजारी से कह रहे थे कि वह स्वयं का काता (बनाया) हुआ जनेऊ हनुमान जी को पहनाना चाहते हैं, पुजारी ने जनेऊ तो ले लिया पर पहनाया नहीं | जब ब्राह्मण ने पुन: आग्रह किया तो पुजारी बोले यह तो हनुमान जी का श्रृंगार है इसके लिए बड़े पुजारी (महन्थ) जी से अनुमति लेनी होगी, आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें वो आते ही होगें | मैं उन लोगों की बातें गौर से सुन रहा था, जिज्ञासा वश मैं भी महन्थ जी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा।

थोड़ी देर बाद जब महन्थ जी आए तो पुजारी ने उस ब्राह्मण के आग्रह के बारे में बताया तो महन्थ जी ने ब्राह्मण की ओर देख कर कहा कि देखिए हनुमान जी ने जनेऊ तो पहले से ही पहना हुआ है और यह फूलमाला तो है नहीं कि एक साथ कई पहना दी जाए | आप चाहें तो यह जनेऊ हनुमान जी को चढ़ाकर प्रसाद रूप में ले लीजिए |
इस पर उस ब्राह्मण ने बड़ी ही विनम्रता से कहा कि मैं देख रहा हूँ कि भगवान ने पहले से ही जनेऊ धारण कर रखा है परन्तु कल रात्रि में चन्द्रग्रहण लगा था और वैदिक नियमानुसार प्रत्येक जनेऊ धारण करने वाले को ग्रहणकाल के उपरांत पुराना बदलकर नया जनेऊ धारण कर लेना चाहिए बस यही सोच कर सुबह सुबह मैं हनुमान जी की सेवा में यह ले आया था प्रभु को यह प्रिय भी बहुत है | हनुमान चालीसा में भी लिखा है कि - "हाथ बज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूज जनेऊ साजे"।

अब महन्थ जी थोड़ी सोचनीय मुद्रा में बोले कि हम लोग बाजार का जनेऊ नहीं लेते हनुमान जी के लिए शुद्ध जनेऊ बनवाते हैं, आपके जनेऊ की क्या शुद्धता है | इस पर वह ब्राह्मण बोले कि प्रथम तो यह कि ये कच्चे सूत से बना है, इसकी लम्बाई 96 चउवा (अंगुल) है, पहले तीन धागे को तकली पर चढ़ाने के बाद तकली की सहायता से नौ धागे तेहरे गये हैं, इस प्रकार 27 धागे का एक त्रिसुत है जो कि पूरा एक ही धागा है कहीं से भी खंडित नहीं है, इसमें प्रवर तथा गोत्रानुसार प्रवर बन्धन है तथा अन्त में ब्रह्मगांठ लगा कर इसे पूर्ण रूप से शुद्ध बनाकर हल्दी से रंगा गया है और यह सब मेंने स्वयं अपने हाथ से गायत्री मंत्र जपते हुए किया है |

ब्राह्मण देव की जनेऊ निर्माण की इस व्याख्या से मैं तो स्तब्ध रह गया मन ही मन उन्हें प्रणाम किया, मेंने देखा कि अब महन्त जी ने उनसे संस्कृत भाषा में कुछ पूछने लगे, उन लोगों का सवाल - जबाब तो मेरे समझ में नहीं आया पर महन्त जी को देख कर लग रहा था कि वे ब्राह्मण के जबाब से पूर्णतया सन्तुष्ट हैं अब वे उन्हें अपने साथ लेकर हनुमान जी के पास पहुँचे जहाँ मन्त्रोच्चारण कर महन्त व अन्य 3 पुजारियों के सहयोग से हनुमान जी को ब्राह्मण देव ने जनेऊ पहनाया तत्पश्चात पुराना जनेऊ उतार कर उन्होंने बहते जल में विसर्जन करने के लिए अपने पास रख लिया |

मंदिर तो मैं अक्सर आता हूँ पर आज की इस घटना ने मन पर गहरी छाप छोड़ दी, मेंने सोचा कि मैं भी तो ब्राह्मण हूं और नियमानुसार मुझे भी जनेऊ बदलना चाहिए, उस ब्राह्मण के पीछे-पीछे मैं भी मंदिर से बाहर आया उन्हें रोककर प्रणाम करने के बाद अपना परिचय दिया और कहा कि मुझे भी एक जोड़ी शुद्ध जनेऊ की आवश्यकता है, तो उन्होंने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि इस तो वह बस हनुमान जी के लिए ही ले आये थे हां यदि आप चाहें तो मेरे घर कभी भी आ जाइएगा घर पर जनेऊ बनाकर मैं रखता हूँ जो लोग जानते हैं वो आकर ले जाते हैं | मेंने उनसे उनके घर का पता लिया और प्रणाम कर वहां से चला आया।

शाम को उनके घर पहुंचा तो देखा कि वह अपने दरवाजे पर तखत पर बैठे एक व्यक्ति से बात कर रहे हैं , गाड़ी से उतरकर मैं उनके पास पहुंचा मुझे देखते ही वो खड़े हो गए, और मुझसे बैठने का आग्रह किया अभिवादन के बाद मैं बैठ गया, बातों बातों में पता चला कि वह अन्य व्यक्ति भी पास का रहने वाला ब्राह्मण है तथा उनसे जनेऊ लेने आया है | ब्राह्मण अपने घर के अन्दर गए इसी बीच उनकी दो बेटियाँ जो क्रमश: 12 वर्ष व 8 वर्ष की रही होंगी एक के हाथ में एक लोटा पानी तथा दूसरी के हाथ में एक कटोरी में गुड़ तथा दो गिलास था, हम लोगों के सामने गुड़ व पानी रखा गया, मेरे पास बैठे व्यक्ति ने दोनों गिलास में पानी डाला फिर गुड़ का एक टुकड़ा उठा कर खाया और पानी पी लिया तथा गुड़ की कटोरी मेरी ओर खिसका दी, पर मेंने पानी नहीं पिया

इतनी देर में ब्राह्मण अपने घर से बाहर आए और एक जोड़ी जनेऊ उस व्यक्ति को दिए, जो पहले से बैठा था उसने जनेऊ लिया और 21 रुपए ब्राह्मण को देकर चला गया | मैं अभी वहीं रुका रहा इस ब्राह्मण के बारे में और अधिक जानने का कौतुहल मेरे मन में था, उनसे बात-चीत में पता चला कि वह संस्कृत से स्नातक हैं नौकरी मिली नहीं और पूँजी ना होने के कारण कोई व्यवसाय भी नहीं कर पाए, घर में बृद्ध मां पत्नी दो बेटियाँ तथा एक छोटा बेटा है, एक गाय भी है | वे बृद्ध मां और गौ-सेवा करते हैं दूध से थोड़ी सी आय हो जाती है और जनेऊ बनाना उन्होंने अपने पिता व दादा जी से सीखा है यह भी उनके गुजर-बसर में सहायक है |

इसी बीच उनकी बड़ी बेटी पानी का लोटा वापस ले जाने के लिए आई किन्तु अभी भी मेरी गिलास में पानी भरा था उसने मेरी ओर देखा लगा कि उसकी आँखें मुझसे पूछ रही हों कि मेंने पानी क्यों नहीं पिया, मेंने अपनी नजरें उधर से हटा लीं, वह पानी का लोटा गिलास वहीं छोड़ कर चली गयी शायद उसे उम्मीद थी की मैं बाद में पानी पी लूंगा |

अब तक मैं इस परिवार के बारे में काफी है तक जान चुका था और मेरे मन में दया के भाव भी आ रहे थे | खैर ब्राह्मण ने मुझे एक जोड़ी जनेऊ दिया, तथा कागज पर एक मंत्र लिख कर दिया और कहा कि जनेऊ पहनते समय इस मंत्र का उच्चारण अवश्य करूं -- |

मैंने सोच समझ कर 500 रुपए का नोट ब्राह्मण की ओर बढ़ाया तथा जेब और पर्स में एक का सिक्का तलाशने लगा, मैं जानता था कि 500 रुपए एक जोड़ी जनेऊ के लिए बहुत अधिक है पर मैंने सोचा कि इसी बहाने इनकी थोड़ी मदद हो जाएगी | ब्राह्मण हाथ जोड़ कर मुझसे बोले कि सर 500 सौ का फुटकर तो मेरे पास नहीं है, मेंने कहा अरे फुटकर की आवश्यकता नहीं है आप पूरा ही रख लीजिए तो उन्हें कहा नहीं बस मुझे मेरी मेहनत भर का 21 रूपए दे दीजिए, मुझे उनकी यह बात अच्छी लगी कि गरीब होने के बावजूद वो लालची नहीं हैं, पर मेंने भी पांच सौ ही देने के लिए सोच लिया था इसलिए मैंने कहा कि फुटकर तो मेरे पास भी नहीं है, आप संकोच मत करिए पूरा रख लीजिए आपके काम आएगा | उन्होंने कहा अरे नहीं मैं संकोच नहीं कर रहा आप इसे वापस रखिए जब कभी आपसे दुबारा मुलाकात होगी तब 21रू. दे दीजिएगा |

इस ब्राह्मण ने तो मेरी आँखें नम कर दीं उन्होंने कहा कि शुद्ध जनेऊ की एक जोड़ी पर 13-14 रुपए की लागत आती है 7-8 रुपए अपनी मेहनत का जोड़कर वह 21 रू. लेते हैं कोई-कोई एक का सिक्का न होने की बात कह कर बीस रुपए ही देता है | मेरे साथ भी यही समस्या थी मेरे पास 21रू. फुटकर नहीं थे, मेंने पांच सौ का नोट वापस रखा और सौ रुपए का एक नोट उन्हें पकड़ाते हुए बड़ी ही विनम्रता से उनसे रख लेने को कहा तो इस बार वह मेरा आग्रह नहीं टाल पाए और 100 रूपए रख लिए और मुझसे एक मिनट रुकने को कहकर घर के अन्दर गए, बाहर आकर और चार जोड़ी जनेऊ मुझे देते हुए बोले मेंने आपकी बात मानकर सौ रू. रख लिए अब मेरी बात मान कर यह चार जोड़ी जनेऊ और रख लीजिए ताकी मेरे मन पर भी कोई भार ना रहे |

मेंने मन ही मन उनके स्वाभिमान को प्रणाम किया साथ ही उनसे पूछा कि इतना जनेऊ लेकर मैं क्या करूंगा तो वो बोले कि मकर संक्रांति, पितृ विसर्जन, चन्द्र और सूर्य ग्रहण, घर पर किसी हवन पूजन संकल्प परिवार में शिशु जन्म के सूतक आदि अवसरों पर जनेऊ बदलने का विधान है, इसके अलावा आप अपने सगे सम्बन्धियों रिस्तेदारों व अपने ब्राह्मण मित्रों को उपहार भी दे सकते हैं जिससे हमारी ब्राह्मण संस्कृति व परम्परा मजबूत हो साथ ही साथ जब आप मंदिर जांए तो विशेष रूप से गणेश जी, शंकर जी व हनूमान जी को जनेऊ जरूर चढ़ाएं...

उनकी बातें सुनकर वह पांच जोड़ी जनेऊ मेंने अपने पास रख लिया और खड़ा हुआ तथा वापसी के लिए बिदा मांगी, तो उन्होंने कहा कि आप हमारे अतिथि हैं पहली बार घर आए हैं हम आपको खाली हाथ कैसे जाने दो सकते हैं इतना कह कर उनहोंने अपनी बिटिया को आवाज लगाई वह बाहर निकाली तो ब्राह्मण देव ने उससे इशारे में कुछ कहा तो वह उनका इशारा समझकर जल्दी से अन्दर गयी और एक बड़ा सा डंडा लेकर बाहर निकली, डंडा देखकर मेरे समझ में नहीं आया कि मेरी कैसी बिदायी होने वाली है |

अब डंडा उसके हाथ से ब्राह्मण देव ने अपने हाथों में ले लिया और मेरी ओर देख कर मुस्कराए जबाब में मेंने भी मुस्कराने का प्रयास किया | वह डंडा लेकर आगे बढ़े तो मैं थोड़ा पीछे हट गया उनकी बिटिया उनके पीछे पीछे चल रह थी मेंने देखा कि दरवाजे की दूसरी तरफ दो पपीते के पेड़ लगे थे डंडे की सहायता से उन्होंने एक पका हुआ पपीता तोड़ा उनकी बिटिया वह पपीता उठा कर अन्दर ले गयी और पानी से धोकर एक कागज में लपेट कर मेरे पास ले आयी और अपने नन्हें नन्हा हाथों से मेरी ओर बढ़ा दिया उसका निश्छल अपनापन देख मेरी आँखें भर आईं।

मैं अपनी भीग चुकी आंखों को उससे छिपाता हुआ दूसरी ओर देखने लगा तभी मेरी नजर पानी के उस लोटे और गिलास पर पड़ी जो अब भी वहीं रखा था इस छोटी सी बच्ची का अपनापन देख मुझे अपने पानी न पीने पर ग्लानि होने लगी, मैंने झट से एक टुकड़ा गुड़ उठाकर मुँह में रखा और पूरी गिलास का पानी एक ही साँस में पी गया, बिटिया से पूछा कि क्या एक गिलास पानी और मिलेगा वह नन्ही परी फुदकता हुई लोटा उठाकर ले गयी और पानी भर लाई, फिर उस पानी को मेरी गिलास में डालने लगी और उसके होंठों पर तैर रही मुस्कराहट जैसे मेरा धन्यवाद कर रही हो , मैं अपनी नजरें उससे छुपा रहा था पानी का गिलास उठाया और गर्दन ऊंची कर के वह अमृत पीने लगा पर अपराधबोध से दबा जा रहा था।

अब बिना किसी से कुछ बोले पपीता गाड़ी की दूसरी सीट पर रखा, और घर के लिए चल पड़ा, घर पहुंचने पर हाथ में पपीता देख कर मेरी पत्नी ने पूछा कि यह कहां से ले आए तो बस मैं उससे इतना ही कह पाया कि एक ब्राह्मण के घर गया था तो उन्होंने खाली हाथ आने ही नहीं दिया...!!






शनिवार, 21 अप्रैल 2018

बेईमानों की फौज बन गयी सत्ता के गलियारे में- नृपजीत सिंह पप्पू

राजनीति भी भीग रही है झूठ के फव्वारे में,
बेइमानों की फ़ौज बन गयी सत्ता के गलियारे में,

कहाँ दिख रहा कोई युधिष्ठिर, दुर्योधन ही सारे हैं,
शकुनि सर पर नाच रहा है,विदुर तो दूर किनारे है,

भीष्म की थी जो भीष्म प्रतिज्ञा उसमे नेक इरादे थे,
अब तो मंजिल सिंहासन और खोखले सब वादे हैं,

क्या फिर से होगा महाभारत लोकतंत्र के चौबारे में,
बेईमानों की फ़ौज बन गयी सत्ता के गलियारे में,,,,,,,

जनमानस के सुख ख़ातिर वो कितना परित्याग किये,
साधारण जन की शंका पर माँ सीता को वनवास दिए,

जनता संग विश्वासघात ख़्वाहिश जन सेवक बनने की,
रामराज्य की कोरि कल्पना सहनशक्ति नही सुनने की,

क्यों देखें छवि राम की जनतंत्र के हत्यारे में,,,,,,,
बेईमानों की फ़ौज बन गयी सत्ता के गलियारे में,,,,,,

गुज़रा नही है वक्त अभी भी आओ सभी सम्हल जायें,
बांध कफ़न संघर्ष करें गद्दारों का दिल दहल जाये,

हिंसा नही अहिंसा से ही इनको दूर भगा डालें,
नापाक हुए दामन को मिलकर फिर से पाक बना डालें

बहुत हो चुका रहा ना बाक़ी सुनना इनके बारे में,,,,,
बेईमानों की फ़ौज बन गयी सत्ता के गलियारे में,,,,,,

राजनीति भी भीग रही है झूठ के फव्वारे में,
बेईमानों की फ़ौज बन गयी सत्ता के गलियारे में,,,,,,,

लेख़क- नृपजीत सिंह"निप्पी' पप्पू सिंह
         महुआ टीवी


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आओ एक मानव श्रृंखला बनायें आओ - नृपजीत सिंह "निप्पी"

एक मानव श्रृंखला बनायें आओ....
प्रेम के धागे में पिरोकर,एक मानव श्रृंखला बनायें,
मानवता का पंख लगाकर,इसको जन जन तक पहुँचायें
एक मानव श्रृंखला बनायें;  आओ...

न जाति-पाति हो,ना राग द्वेष हो,
हों रंग-बिरंगे,पर एक भेष हो,
हो सबका साथ सबका विकास,
ना रह जाये भूखा, कोई आस-पास,
राह अलग हो सकती मंज़िल एक है यही बताएं,,,,,
एक मानव श्रृंखला बनायें,,,,आओ,,,

नफरत की एक चिंगारी,ना बन जाए ज्वाला,
 विषयुक्त जुबाँ मत खोलो,घोलो अमृत का प्याला,
 तकरार ना बस प्यार हो,व्यभिचार ना सदाचार हो,
 तन मन में ये सँस्कार हो, परहित ही त्योहार हो,
गंगा यमुना और सरस्वती जैसा संगम बन जाये,,,आओ,
एक मानव श्रृंखला बनायें,,,,, आओ,,,

आओ सबजन मिलकर गायें,एक नया इतिहास बनायें,
उखड़ ना जायें कहीं धरा से,अंगद जैसा पाँव जमायें,
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई,एक हो सबका नारा,
सौहार्द रहेगा क़ायम हरदम,यह संकल्प हमारा,
चारों दिशा से घिरा हुआ हम एक आँगन बन जायें,,आओ,...
एक मानव श्रृंखला बनायें,,,,, आओ,,,,,आओ
प्रेम के धागे,,,,,,,,,
  नृपजीत सिंह"निप्पी"पप्पू सिंह
    महुआ टीवी


मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

फिर से कोई हिंदू और मुसलमान न हो - लव तिवारी

मुल्क में अब से न कोई घमासान हो
फिर से कोई हिन्दू और मुसलमान न हो
आदते जो बिगड़ी है, वरसो की हमारी
अब कोई मॉ बहन की सुनी मांग न हो
अब भी वक़्त हैं सुधर कर कुछ करो अच्छा सा,
धरती पर खौफ़ हैवानियत का अंजाम न हो
मज़हबी बन कर कुछ न होगा हमें हासिल
देश को चैन मिले , इंसानियत हैवान न हो
एक जगह जहा मुकम्मल हो सबकी इबादत
हो एक मसीहा, अल्ला औऱ भगवान न हो
स्वरचित- लव तिवारी
11-04-2018


सोमवार, 19 मार्च 2018

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम
थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे

गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे


मंगलवार, 13 मार्च 2018

भारतीय किसान की दुर्दशा - लव तिवारी

कौन दर्द सुनेगा तेरा, अब नही घाव दिखाने को
देश की इस धरती पर, बचा न कुछ और गवानें को 

भारत की मर्यादा को संभाले देश का एक किसान ही है,
 देश की धरती सोना उगले उसका एक अरमान भी है,

 बिलख रहा है आज किसान, फूल बना अंगारे जो 
अन्न ,जीवन नही होगा धरती पर, लोग मरेगे दाने को

राजनीति में पिसता रहता ,देश का नेक किसान भला 
देश का नेता दुखड़ा रोये, इससे फर्जी इंसान कहाँ 

झेले सीने पर कहर प्रकृति का, फिर झेले राजनीति को
 देश का सच्चा किसान यहाँ, फिर खेले मौत की कहानी को


प्रस्तुति - लव तिवारी
संपर्क सूत्र- +91-9458668566
 Visit- www.lavtiwari.blogspot.in


मंगलवार, 6 मार्च 2018

वायु मुद्रा सूर्य मुद्रा ज्ञान मुद्रा ध्यान मुद्रा- युश महाराज







सूर्य का अर्थ होता है अग्नि,  सूर्य मुद्रा को करने से हमारे भीतर के अग्नि तत्व संचालित होते हैं। सूर्य की अँगुली अनामिका को रिंग फिंगर भी कहते हैं। इस अँगुली का सीधा संबंध सूर्य और यूरेनस ग्रह से होता है । सूर्य ऊर्जा स्वास्थ्य का प्रतिनिधित्व करती है और यूरेनस कामुकता, अंतर्ज्ञान और बदलाव का प्रतीक है। सूर्य को सेहत और उर्जा का प्रतीक माना जाता है। सूर्य मुद्रा को लोग अग्नि मुद्रा के नाम से भी जानते हैं।



यह मुद्रा पृथ्वी मुद्रा के विपरीत है । यह मुद्रा सूर्य के गुणों का हमारे शरीर में विस्तार करती है तथा पृथ्वी तत्व की अधिकता को कम करती है ।



वायु मुद्रा का अभ्यास करने से शरीर में वायु का संतुलन बना रहता है । आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर के अंदर चौरासी तरह की वायु होती है और वायु चंचलता की निशानी है वायु की विकृति मन की चंचलता को बढ़ाती है इसलिए मन को एक ही जगह स्थिर रखने के लिए वायु-मुद्रा का अभ्यास किया जाता है माना जाता है की जब तक शुद्ध वायु शरीर को प्राप्त नहीं हो जाती तब तक हमारा शरीर रोगी रहता है । शरीर को रोगों से बचाने के लिए वायु मुद्रा का अभ्यास किया जाता है ।  सामान्य तौर पर इस मुद्रा को कुछ देर तक बार-बार करने से वायु विकार संबंधी समस्या की गंभीरता 12 से 24 घंटे में दूर हो जाती है। चलिए जानते



अपने हाथ की तर्जनी उंगली को अपने अंगूठे से मिला लें लेकिन उंगली और अंगूठा सिर्फ एक-दूसरे को हल्के से छूते हुए ही हों उन पर दबाव नहीं पड़ना चाहिए। इसमें हाथों की आकृति ज्ञान मुद्रा जैसी बनती है इसीलिए इसे ध्यान ज्ञान मुद्रा  कहा जा सकता है। ध्यान मुद्रा  से लाभ-. इस मुद्रा को करने से दिमाग तेज होता है। मन को एक जगह लगाने वाली याददाश्त तेज होती है तथा नींद न आना और तनाव जैसे रोग समाप्त हो जाते हैं।


ब्रह्मचर्य और योग-साधना मूलबंध आसन युश महाराज







आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर में सात धातु होते हैं- जिनमें अन्तिम धातु वीर्य (शुक्र) है। वीर्य ही मानव शरीर का सारतत्व है।

40 बूंद रक्त से 1 बूंद वीर्य होता है।

एक बार के वीर्य स्खलन से लगभग 15 ग्राम वीर्य का नाश होता है । जिस प्रकार पूरे गन्ने में शर्करा व्याप्त रहता है उसी प्रकार वीर्य पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से व्याप्त रहता है।



सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते है ।।



ब्रह्मचर्य और योग-साधना मूलबंध आसन  यह आसन यौन विकारों से संबंधित कई प्रकार की समस्याओं में लाभकारी होता है, इसीलिए इसे गुप्तासन कहते हैं। यह सेक्सुअल प्रोब्लेम्स के लिए बहुत ही मुफीद आसन है। इस आसन के अभ्यास से विभिन्य प्रकार के सेक्स समस्याएँ का समाधान किया जा सकता है। यह विभिन्य प्रकार के बीमारी जैसे स्वप्नदोष, वीर्यदोष, वीर्य चंचलता, मूत्र-संबंधी बीमारी, गुदा की बीमारियाँ इसके अभ्यास से ठीक हो जाती है|


मंगलवार, 30 जनवरी 2018

बाल संस्कार श्लोको को नित्य प्रयोग कर जीवन सफल बनायें

।। बाल संस्कार ।।
अपने बच्चो को निम्नलिखित श्लोकों को नित्य दैनन्दिनी में शामिल करने हेतु संस्कार दे एवं खुद भी पढ़े।
*प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र। संग्रह

*प्रात: कर-दर्शनम्*

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥

*पृथ्वी क्षमा प्रार्थना*

समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥

*त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण*

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥

*स्नान मन्त्र*
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥

*सूर्यनमस्कार*

ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च
आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम्
सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥
ॐ मित्राय नम:
ॐ रवये नम:
ॐ सूर्याय नम:
ॐ भानवे नम:
ॐ खगाय नम:
ॐ पूष्णे नम:
ॐ हिरण्यगर्भाय नम:
ॐ मरीचये नम:
ॐ आदित्याय नम:
ॐ सवित्रे नम:
ॐ अर्काय नम:
ॐ भास्कराय नम:
ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥

*संध्या दीप दर्शन*

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते॥
दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥

*गणपति स्तोत्र*

गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
विनायक: चारूकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वादश एतानि नामानि प्रात: उत्थाय य: पठेत्॥
विश्वम तस्य भवेद् वश्यम् न च विघ्नम् भवेत् क्वचित्।
विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।
लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्नवदनं ध्यायेतसर्वविघ्नोपशान्तये॥

*आदिशक्ति वंदना*

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

*शिव स्तुति*
कर्पूर गौरम करुणावतारं,
संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।
सदा वसंतं हृदयार विन्दे,
भवं भवानी सहितं नमामि॥

*विष्णु स्तुति*

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

*श्री कृष्ण स्तुति*

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम॥
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥

श्रीराम वंदना

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

श्रीरामाष्टक

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा॥
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्॥

एक श्लोकी रामायण

आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥

सरस्वती वंदना

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम पातु सरस्वती भगवती
निःशेषजाड्याऽपहा॥

हनुमान वंदना

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्।
दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥
*
स्वस्ति-वाचन

ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

शांति पाठ

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

बहुत ही सुंदर संग्रह
इसे हर हिन्दू को अपने पास सुरक्षित रखें  । ऐसा संग्रह सरलता से नही मिलता ।
एक प्रति परिवार के बच्चों को भी दे ।


मंगलवार, 16 जनवरी 2018

काल तक था मेरा जो अपना आज बेगाना क्यो है - लव तिवारी

कल तक था जो मेरा अपना आज बेगाना क्यो है
मेरी हालत देखकर ये जमाना पागल क्यो हैं

उनकी चाहत में अक्सर हालत कुछ ऐसी होती
जाने सब बातों को दिल फिर भी दीवाना क्यो है

वो रूठे तो उनके तस्वीरों से बात करे मेरी नजरें
रात गुजर जाये चाहत में वो अफ़साना क्यो है

एक दीवाना मैं जो अक्सर तड़पु न सोऊ रातो में
मेरी मोहब्बत का मसीहा आज अंजाना क्यो है

रचना- लव तिवारी
१५- जनवरी- २०१८




गुरुवार, 11 जनवरी 2018

देव पुरुष पूज्य श्री देवरहा बाबा देवरिया उत्तर प्रदेश

मित्रों के अनुरोध पर पुनः प्रस्तुति। एक ऐसे संत जिसके पैरो के नीचे अपना सिर रखने नेता व अंग्रेज तक आते थे!!

देवरहा बाबा का जन्म अज्ञात है। यहाँ तक कि उनकी सही उम्र का आकलन भी नहीं है। वह यूपी के देवरिया जिले के रहने वाले थे। मंगलवार, 19 जून सन् 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपना प्राण त्यागने वाले इस बाबा के जन्म के बारे में संशय है। कहा जाता है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा थे। (बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है, कुछ लोग उनका जीवन 250 साल तो कुछ लोग 500 साल मानते हैं.

भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष थे देवरहा बाबा. डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन, जैसी विभूतियों ने पूज्य देवरहा बाबा के समय-समय पर दर्शन कर अपने को कृतार्थ अनुभव किया था. पूज्य महर्षि पातंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग में पारंगत थे।

श्रद्धालुओं के कथनानुसार बाबा अपने पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से बड़े प्रेम से मिलते थे और सबको कुछ न कुछ प्रसाद अवश्य देते थे. प्रसाद देने के लिए बाबा अपना हाथ ऐसे ही मचान के खाली भाग में रखते थे और उनके हाथ में फल, मेवे या कुछ अन्य खाद्य पदार्थ आ जाते थे जबकि मचान पर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं रहती थी।

श्रद्धालुओं को कौतुहल होता था कि आखिर यह प्रसाद बाबा के हाथ में कहाँ से और कैसे आता है. जनश्रूति के मुताबिक, वह खेचरी मुद्रा की वजह से आवागमन से कहीं भी कभी भी चले जाते थे. उनके आस-पास उगने वाले बबूल के पेड़ों में कांटे नहीं होते थे. चारों तरफ सुंगध ही सुंगध होता था।
लोगों में विश्वास है कि बाबा जल पर चलते भी थे और अपने किसी भी गंतव्य स्थान पर जाने के लिए उन्होंने कभी भी सवारी नहीं की और ना ही उन्हें कभी किसी सवारी से कहीं जाते हुए देखा गया. बाबा हर साल कुंभ के समय प्रयाग आते थे।

मार्कण्डेय सिंह के मुताबिक, वह किसी महिला के गर्भ से नहीं बल्कि पानी से अवतरित हुए थे. यमुना के किनारे वृन्दावन में वह 30 मिनट तक पानी में बिना सांस लिए रह सकते थे. उनको जानवरों की भाषा समझ में आती थी। खतरनाक जंगली जानवारों को वह पल भर में काबू कर लेते थे।

लोगों का मानना है कि बाबा को सब पता रहता था कि कब, कौन, कहाँ उनके बारे में चर्चा हुई. वह अवतारी व्यक्ति थे. उनका जीवन बहुत सरल और सौम्य था।वह फोटो कैमरे और टीवी जैसी चीजों को देख अचंभित रह जाते थे। वह उनसे अपनी फोटो लेने के लिए कहते थे, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उनका फोटो नहीं बनता था। वह नहीं चाहते तो रिवाल्वर से गोली नहीं चलती थी. उनका निर्जीव वस्तुओं पर नियंत्रण था।

अपनी उम्र, कठिन तप और सिद्धियों के बारे में देवरहा बाबा ने कभी भी कोई चमत्कारिक दावा नहीं किया, लेकिन उनके इर्द-गिर्द हर तरह के लोगों की भीड़ ऐसी भी रही जो हमेशा उनमें चमत्कार खोजते देखी गई।अत्यंत सहज, सरल और सुलभ बाबा के सानिध्य में जैसे वृक्ष, वनस्पति भी अपने को आश्वस्त अनुभव करते रहे. भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें अपने बचपन में देखा था।

देश-दुनिया के महान लोग उनसे मिलने आते थे और विख्यात साधू-संतों का भी उनके आश्रम में समागम होता रहता था. उनसे जुड़ीं कई घटनाएं इस सिद्ध संत को मानवता, ज्ञान, तप और योग के लिए विख्यात बनाती हैं।

मुझे अच्छी तरह याद है और मैं वहाँ मौजूद भी था. कोई 1987 की बात होगी, जून का ही महीना था. वृंदावन में यमुना पार देवरहा बाबा का डेरा जमा हुआ था. अधिकारियों में अफरातफरी मची थी। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बाबा के दर्शन करने आना था।प्रधानमंत्री के आगमन और यात्रा के लिए इलाके की मार्किंग कर ली गई।

आला अफसरों ने हैलीपैड बनाने के लिए वहां लगे एक बबूल के पेड़ की डाल काटने के निर्देश दिए. भनक लगते ही बाबा ने एक बड़े पुलिस अफसर को बुलाया और पूछा कि पेड़ को क्यों काटना चाहते हो? अफसर ने कहा, प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए जरूरी है. बाबा बोले, तुम यहां अपने पीएम को लाओगे, उनकी प्रशंसा पाओगे, पीएम का नाम भी होगा कि वह साधु-संतों के पास जाता है, लेकिन इसका दंड तो बेचारे पेड़ को भुगतना पड़ेगा!

वह मुझसे इस बारे में पूछेगा तो मैं उसे क्या जवाब दूंगा? नही! यह पेड़ नहीं काटा जाएगा. अफसरों ने अपनी मजबूरी बताई कि यह दिल्ली से आए अफसरों का है, इसलिए इसे काटा ही जाएगा और फिर पूरा पेड़ तो नहीं कटना है, इसकी एक टहनी ही काटी जानी है, मगर बाबा जरा भी राजी नहीं हुए. उन्होंने कहा कि यह पेड़ होगा तुम्हारी निगाह में, मेरा तो यह सबसे पुराना साथी है, दिन रात मुझसे बतियाता है, यह पेड़ नहीं कट सकता।

इस घटनाक्रम से बाकी अफसरों की दुविधा बढ़ती जा रही थी, आखिर बाबा ने ही उन्हें तसल्ली दी और कहा कि घबड़ा मत, अब पीएम का कार्यक्रम टल जाएगा, तुम्हारे पीएम का कार्यक्रम मैं कैंसिल करा देता हूं. आश्चर्य कि दो घंटे बाद ही पीएम आफिस से रेडियोग्राम आ गया कि प्रोग्राम स्थगित हो गया है, कुछ हफ्तों बाद राजीव गांधी वहां आए, लेकिन पेड़ नहीं कटा. इसे क्या कहेंगे चमत्कार या संयोग.
बाबा की शरण में आने वाले कई विशिष्ट लोग थे. उनके भक्तों में जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री , इंदिरा गांधी जैसे चर्चित नेताओं के नाम हैं. उनके पास लोग हठयोग सीखने भी जाते थे. सुपात्र देखकर वह हठयोग की दसों मुद्राएं सिखाते थे. योग विद्या पर उनका गहन ज्ञान था. ध्यान, योग, प्राणायाम, त्राटक समाधि आदि पर वह गूढ़ विवेचन करते थे. कई बड़े सिद्ध सम्मेलनों में उन्हें बुलाया जाता, तो वह संबंधित विषयों पर अपनी प्रतिभा से सबको चकित कर देते।

लोग यही सोचते कि इस बाबा ने इतना सब कब और कैसे जान लिया. ध्यान, प्रणायाम, समाधि की पद्धतियों के वह सिद्ध थे ही. धर्माचार्य, पंडित, तत्वज्ञानी, वेदांती उनसे कई तरह के संवाद करते थे. उन्होंने जीवन में लंबी लंबी साधनाएं कीं. जन कल्याण के लिए वृक्षों-वनस्पतियों के संरक्षण, पर्यावरण एवं वन्य जीवन के प्रति उनका अनुराग जग जाहिर था.
देश में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जब इंदिरा गांधी हार गईं तो वह भी देवरहा बाबा से आशीर्वाद लेने गईं. उन्होंने अपने हाथ के पंजे से उन्हें आशीर्वाद दिया. वहां से वापस आने के बाद इंदिरा ने कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ का पंजा निर्धारित कर दिया. इसके बाद 1980 में इंदिरा के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया और वह देश की प्रधानमंत्री बनीं।
वहीं, यह भी मान्यता है कि इन्दिरा गांधी आपातकाल के समय कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती से आर्शीवाद लेने गयीं थी. वहां उन्होंने अपना दाहिना हाथ उठाकर आर्शीवाद दिया और हाथ का पंजा पार्टी का चुनाव निशान बनाने को कहा।
बाबा महान योगी और सिद्ध संत थे. उनके चमत्कार हज़ारों लोगों को झंकृत करते रहे. आशीर्वाद देने का उनका ढंग निराला था. मचान पर बैठे-बैठे ही अपना पैर जिसके सिर पर रख दिया, वो धन्य हो गया. पेड़-पौधे भी उनसे बात करते थे. उनके आश्रम में बबूल तो थे, मगर कांटेविहीन. यही नहीं यह खुशबू भी बिखेरते थे।
उनके दर्शनों को प्रतिदिन विशाल जनसमूह उमड़ता था. बाबा भक्तों के मन की बात भी बिना बताए जान लेते थे. उन्होंने पूरा जीवन अन्न नहीं खाया. दूध व शहद पीकर जीवन गुजार दिया. श्रीफल का रस उन्हें बहुत पसंद था।
देवरहा बाबा को खेचरी मुद्रा पर सिद्धि थी जिस कारण वे अपनी भूख और आयु पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते थे।
ख्याति इतनी कि जार्ज पंचम जब भारत आया तो अपने पूरे लाव लश्कर के साथ उनके दर्शन करने देवरिया जिले के दियारा इलाके में मइल गांव तक उनके आश्रम तक पहुंच गया. दरअसल, इंग्लैंड से रवाना होते समय उसने अपने भाई से पूछा था कि क्या वास्तव में इंडिया के साधु संत महान होते हैं।
प्रिंस फिलिप ने जवाब दिया- हां, कम से कम देवरहा बाबा से जरूर मिलना. यह सन 1911 की बात है. जार्ज पंचम की यह यात्रा तब विश्वयुद्ध के मंडरा रहे माहौल के चलते भारत के लोगों को बरतानिया हुकूमत के पक्ष में करने की थी. उससे हुई बातचीत बाबा ने अपने कुछ शिष्यों को बतायी भी थी, लेकिन कोई भी उस बारे में बातचीत करने को आज भी तैयार नहीं।
डाक्टर राजेंद्र प्रसाद तब रहे होंगे कोई दो-तीन साल के, जब अपने माता-पिता के साथ वे बाबा के यहां गये थे. बाबा देखते ही बोल पड़े-यह बच्चा तो राजा बनेगा. बाद में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने बाबा को एक पत्र लिखकर कृतज्ञता प्रकट की और सन 54 के प्रयाग कुंभ में बाकायदा बाबा का सार्वजनिक पूजन भी किया।
बाबा देवरहा 30 मिनट तक पानी में बिना सांस लिए रह सकते थे. उनको जानवरों की भाषा समझ में आती थी. खतरनाक जंगली जानवरों को वह पल भर में काबू कर लेते थे.
उनके भक्त उन्हें दया का महासमुंदर बताते हैं. और अपनी यह सम्पत्ति बाबा ने मुक्त हस्तज लुटाई. जो भी आया, बाबा की भरपूर दया लेकर गया. वितरण में कोई विभेद नहीं. वर्षाजल की भांति बाबा का आशीर्वाद सब पर बरसा और खूब बरसा. मान्यता थी कि बाबा का आशीर्वाद हर मर्ज की दवाई है।
कहा जाता है कि बाबा देखते ही समझ जाते थे कि सामने वाले का सवाल क्या है. दिव्यदृष्ठि के साथ तेज नजर, कड़क आवाज, दिल खोल कर हंसना, खूब बतियाना बाबा की आदत थी. याददाश्त इतनी कि दशकों बाद भी मिले व्यक्ति को पहचान लेते और उसके दादा-परदादा तक का नाम व इतिहास तक बता देते, किसी तेज कम्प्युटर की तरह।
हां, बलिष्ठ कदकाठी भी थी. लेकिन देह त्याहगने के समय तक वे कमर से आधा झुक कर चलने लगे थे. उनका पूरा जीवन मचान में ही बीता. लकडी के चार खंभों पर टिकी मचान ही उनका महल था, जहां नीचे से ही लोग उनके दर्शन करते थे. मइल में वे साल में आठ महीना बिताते थे. कुछ दिन बनारस के रामनगर में गंगा के बीच, माघ में प्रयाग, फागुन में मथुरा के मठ के अलावा वे कुछ समय हिमालय में एकांतवास भी करते थे।
खुद कभी कुछ नहीं खाया, लेकिन भक्तनगण जो कुछ भी लेकर पहुंचे, उसे भक्तों पर ही बरसा दिया. उनका बताशा-मखाना हासिल करने के लिए सैकडों लोगों की भीड हर जगह जुटती थी. और फिर अचानक ११ जून १९९० को उन्होंने दर्शन देना बंद कर दिया।
लगा जैसे कुछ अनहोनी होने वाली है. मौसम तक का मिजाज बदल गया. यमुना की लहरें तक बेचैन होने लगीं. मचान पर बाबा त्रिबंध सिद्धासन पर बैठे ही रहे. डॉक्टरों की टीम ने थर्मामीटर पर देखा कि पारा अंतिम सीमा को तोड निकलने पर आमादा है.१९ तारीख को मंगलवार के दिन योगिनी एकादशी थी।
आकाश में काले बादल छा गये, तेज आंधियां तूफान ले आयीं. यमुना जैसे समुंदर को मात करने पर उतावली थी. लहरों का उछाल बाबा की मचान तक पहुंचने लगा. और इन्हीं सबके बीच शाम चार बजे बाबा का शरीर स्पंदनरहित हो गया. भक्तों की अपार भीड भी प्रकृति के साथ हाहाकार करने लगी।
यह हमारे मित्र की प्रस्तुति है