नेहरू बनाम मोदी
निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी नेहरू जी के कार्यकाल से आगे निकल गए। यह बड़ी बात है। इसके लिए उनके राजनैतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता को दाद दी जानी चाहिए।
जनसंघ या भाजपा को वर्षों बाद एक राजनैतिक व्यक्तित्व मिला है जिसे राजनीति की समझ है, जिसने जमीन पर वर्षों कार्य किया है और प्रधानमंत्री पद पर आने से पहले मुख्यमंत्री के रूप में जिसने प्रशासनिक कौशल का परिचय भी दिया है।
देश की सीमाओं की रक्षा, आतंकवादियों को देश की भूमि से दूर रखने, देश को एक कुशल नेतृत्व देने के लिए मैं मोदी जी का प्रशंसक हूं और रहूंगा। देश के डिजिटाइजेशन, आत्मनिर्भरता, धारा ३७० जैसी अनेक निर्णायक नीतियों के कारण वह इतिहास में सम्मिलित हो चुके हैं।
मोदी जी द्वारा अपनी विचारधारा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति खुला प्रेम भी उनकी महानता का द्योतक है अन्यथा शीर्ष पर पहुँचने के बाद अनेक लोग स्टेट्समैन बनने के लोभ में वैचारिक दूरी बनाने लगते हैं। लेकिन आज का विषय कुछ और है।
यह बात तो हुई समय सीमा की, मोदी जी की और उनकी राजनैतिक कुशलता की। लेकिन इस आधार पर प्रधानमंत्री नेहरू जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को कम करके आंकना किसी की भी भूल होगी। वह महामानव थे, इसमें कोई संदेह नहीं।
संघ के विद्यालय में पढ़ने के कारण और पारिवारिक परिवेश के कारण मुझे अपने देश के महापुरुषों पर गर्व है, उनमें अटूट श्रद्धा है। जब कोई नेहरू के के व्यक्तित्व और कृतित्व पर कीचड़ उछालता है तो मुझे पीड़ा होती है।
क्या हम नेहरू जी को छोटा करने लायक पर्याप्त बड़े बन चुके हैं? क्या हम नेहरू जी का अध्ययन कर चुके हैं? क्या उनका इस देश के स्वाधीनता संग्राम में कोई योगदान नहीं है? क्या उन्होंने स्वतंत्रता के बाद इस देश को कुछ नहीं दिया?
नेहरू जी का मूल्यांकन करते समय इन प्रश्नों पर अवश्य विचार होना चाहिए, और अच्छे से विचार होना चाहिए। जब देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा था, और जब यह विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली देश का उपनिवेश था, उस समय नेहरू जी एक समृद्ध परिवार के उत्तराधिकारी थे।
उनका आनंद भवन आज भी उनकी समृद्धि की गाथा गाता है। वह आनंद भवन उनके पिता और पुत्री ने देश को दे देने में जरा भी संकोच नहीं किया। नेहरू जी ने अपने पिता द्वारा इतनी बड़ी संपत्ति कांग्रेस को देने पर कभी विरोध नहीं किया। (परिशिष्ट)
उन्होंने विदेश से पढ़ाई की, सीधे उच्च न्यायालय से प्रैक्टिस शुरू की लेकिन उसी वर्ष १९१२ में उन्होंने अपना जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया। २३ वर्ष की उम्र! और राष्ट्र के लिए यह समर्पण! क्या उनकी देशभक्ति पर प्रश्न उठाना देशभक्ति है?
और हमें यह भी याद रखना होगा कि उस समय की राजनीति आज की तरह सत्ता और धन के लिए नहीं थी। उस समय कांग्रेस में सम्मिलित होने का अर्थ था, जेल आंदोलन अंग्रेजों का विरोध और घर की बर्बादी। और उद्देश्य: एकमात्र देश की स्वाधीनता।
पंडित नेहरू नेता सुभाष चंद्र बोस को अत्यंत प्रिय थे। 1939 के पुनर्निर्वाचन में नेहरू ने बोस का सक्रिय समर्थन नहीं किया, पर वे उनके कट्टर विरोधी भी नहीं थे। उन्होंने चुनाव के बाद कांग्रेस की एकता बनाए रखने और बोस-गांधी समझौते का प्रयास किया। नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने नेहरू ब्रिगेड नाम क्यों रखा था? केवल सतही स्तर पर इतना समझ लेना भी नेहरू और बोस के प्रेम को समझने के लिए पर्याप्त होगा। (परिशिष्ट)
वह पंडित नेहरू ही थे जिन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को सत्ता के केंद्र में रखा। उन्होंने अपनी पुत्री के स्थान पर शास्त्री जी को दीर्घकाल के लिए राजनैतिक संरक्षण और विश्वास दिया, उन्हें प्रांतीय नेता से राष्ट्रीय नेता बनाया। आज हम सबके चहेते प्रधानमंत्री शास्त्री जी नेहरू के कारण उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन गए। (परिशिष्ट)
पंडित नेहरू के प्रति मेरी अटूट श्रद्धा वैसी ही है जैसी किसी और राष्ट्रभक्त महापुरुष के प्रति। यह तो केवल कुछ छोटे उदाहरण हैं जो उनके विषय में फैलायी जा रही सोशल मीडिया भ्रांतियों के विरुद्ध टिककर सोचने के लिए एक आधार देती हैं।
उनकी नीतियों की आलोचना हो सकती है, विशेषकर उनके चीन युद्ध की तैयारियों को लेकर, लेकिन इतिहास का यह मूल्यांकन इतिहास के उस बिंदु पर खड़े रहकर करना होगा। औए मूल्यांकन से कोई अछूता नहीं रहता। लेकिन एक बिंदु किसी के सर्वस्व को नष्ट नहीं कर सकता।
परिशिष्ट:
१. नेहरू परिवार का पुराना घर स्वराज भवन (जो पहले आनंद भवन कहलाता था)। पंडित मोतीलाल नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लगभग 1930 में समर्पित कर दिया था। इसके बाद नए बने घर का नाम आनंद भवन रखा गया। वर्तमान आनंद भवन को बाद में इंदिरा गांधी ने नवंबर 1970 में राष्ट्र को समर्पित किया और इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया।
२. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इंग्लैंड के इनर टेम्पल (Inner Temple) में कानून की पढ़ाई की। वे 1912 में बार-एट-लॉ (Barrister-at-Law) बने और उसी वर्ष भारत लौटकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। सार्वजनिक जीवन (राजनीति) में उनका प्रवेश भी लगभग इसी समय शुरू हो गया। भारत लौटने के बाद वे 1912 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बांकीपुर अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। बाद के वर्षों में उनका राजनीतिक जुड़ाव बढ़ता गया और 1919 के होम रूल आंदोलन तथा 1920 के असहयोग आंदोलन के दौरान वे पूर्णकालिक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे।
३. 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष नेता जी ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया और उसके अध्यक्ष के रूप में नेहरू जी को नियुक्त किया।
1939 में बोस और कांग्रेस नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद हुए, जिसके परिणामस्वरूप बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। इसके बावजूद नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने रहे और समिति का कार्य आगे बढ़ाते रहे। 1939 में नेहरू द्वारा बोस को लिखे पत्रों में भी वे समिति के कार्य का उल्लेख करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे उससे अलग नहीं हुए थे।
४. लाल बहादुर शास्त्री को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र में लाने की प्रक्रिया धीरे-धीरे हुई, लेकिन निर्णायक मोड़ 1951–52 में आया।
1951 में जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) का महासचिव बनाया। शास्त्री ने 1951-52 के पहले आम चुनावों के संगठन और प्रत्याशी चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1952 में, जबकि वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रभावशाली मंत्री थे, नेहरू ने उन्हें राज्य में न रखकर दिल्ली बुलाया और अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल में रेल एवं परिवहन मंत्री बनाया। इसे शास्त्री को राष्ट्रीय नेतृत्व की पंक्ति में लाने का सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
इसके बाद नेहरू ने उन्हें लगातार महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए—रेलवे, परिवहन एवं संचार, वाणिज्य एवं उद्योग, और अंततः गृह मंत्रालय। इससे उनका कद कांग्रेस और सरकार दोनों में बढ़ता गया।
1964 में नेहरू की तबीयत खराब होने पर उन्होंने शास्त्री को बिना विभाग के मंत्री के रूप में फिर मंत्रिमंडल में लाकर अपने निकटतम सहयोगियों में रखा।
५. 1939 के कांग्रेस अध्यक्षीय चुनाव (त्रिपुरी संकट) में नेहरू जी की भूमिका जटिल थी। वे न तो पूरी तरह नेता जी के साथ खड़े हुए, न ही गांधीवादी खेमे के सक्रिय चुनाव-प्रबंधक बने।
५.1. नेहरू ने बोस की उम्मीदवारी का खुला समर्थन नहीं किया। गांधीजी और उनके निकट सहयोगी पट्टाभि सीतारमैया को उम्मीदवार बनाना चाहते थे। नेहरू बोस की कई नीतियों से सहानुभूति रखते थे, लेकिन वे गांधीजी से टकराव के पक्ष में नहीं थे।
५.2. नेहरू गांधी खेमे के साथ रहे, लेकिन बोस-विरोधी अभियान के प्रमुख नेता नहीं बने। कांग्रेस कार्यसमिति के कई सदस्य बोस के पुनर्निर्वाचन के विरुद्ध सक्रिय थे, जबकि नेहरू अपेक्षाकृत मध्यस्थ भूमिका में रहे।
५.3. बोस की जीत के बाद नेहरू ने समझौता कराने का प्रयास किया। जब बोस चुनाव जीत गए और कांग्रेस में संकट गहरा गया, तब नेहरू ने दोनों पक्षों के बीच मेल-मिलाप की कोशिश की। बाद में उन्होंने बोस से इस्तीफा वापस लेने की अपील भी की थी।
५.4. नेहरू बोस की कुछ बातों से सहमत थे, पर उनकी रणनीति से नहीं। दोनों समाजवादी झुकाव रखते थे, लेकिन यूरोप की परिस्थितियों, कांग्रेस संगठन और स्वतंत्रता संघर्ष की रणनीति पर उनके मतभेद थे।
संक्षेप में, 1939 के पुनर्निर्वाचन में नेहरू ने बोस का सक्रिय समर्थन नहीं किया, पर वे उनके कट्टर विरोधी भी नहीं थे। उन्होंने चुनाव के बाद कांग्रेस की एकता बनाए रखने और बोस-गांधी समझौते का प्रयास किया।
६. 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष Subhas Chandra Bose ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया और उसके अध्यक्ष के रूप में नेहरू जी को नियुक्त किया।
1939 में बोस और कांग्रेस नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद हुए, जिसके परिणामस्वरूप बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
इसके बावजूद नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने रहे और समिति का कार्य आगे बढ़ाते रहे। 1939 में नेहरू द्वारा बोस को लिखे पत्रों में भी वे समिति के कार्य का उल्लेख करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे उससे अलग नहीं हुए थे।
माधव कृष्ण, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल


























