शनिवार, 13 जून 2026

पंडित जवाहर लाल नेहरू बनाम श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी - लेखक श्री माधव कृष्ण गाज़ीपुर उत्तरप्रदेश

नेहरू बनाम मोदी

निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी नेहरू जी के कार्यकाल से आगे निकल गए। यह बड़ी बात है। इसके लिए उनके राजनैतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता को दाद दी जानी चाहिए।

जनसंघ या भाजपा को वर्षों बाद एक राजनैतिक व्यक्तित्व मिला है जिसे राजनीति की समझ है, जिसने जमीन पर वर्षों कार्य किया है और प्रधानमंत्री पद पर आने से पहले मुख्यमंत्री के रूप में जिसने प्रशासनिक कौशल का परिचय भी दिया है।

देश की सीमाओं की रक्षा, आतंकवादियों को देश की भूमि से दूर रखने, देश को एक कुशल नेतृत्व देने के लिए मैं मोदी जी का प्रशंसक हूं और रहूंगा। देश के डिजिटाइजेशन, आत्मनिर्भरता, धारा ३७० जैसी अनेक निर्णायक नीतियों के कारण वह इतिहास में सम्मिलित हो चुके हैं।

मोदी जी द्वारा अपनी विचारधारा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति खुला प्रेम भी उनकी महानता का द्योतक है अन्यथा शीर्ष पर पहुँचने के बाद अनेक लोग स्टेट्समैन बनने के लोभ में वैचारिक दूरी बनाने लगते हैं। लेकिन आज का विषय कुछ और है।

यह बात तो हुई समय सीमा की, मोदी जी की और उनकी राजनैतिक कुशलता की। लेकिन इस आधार पर प्रधानमंत्री नेहरू जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को कम करके आंकना किसी की भी भूल होगी। वह महामानव थे, इसमें कोई संदेह नहीं।

संघ के विद्यालय में पढ़ने के कारण और पारिवारिक परिवेश के कारण मुझे अपने देश के महापुरुषों पर गर्व है, उनमें अटूट श्रद्धा है। जब कोई नेहरू के के व्यक्तित्व और कृतित्व पर कीचड़ उछालता है तो मुझे पीड़ा होती है।

क्या हम नेहरू जी को छोटा करने लायक पर्याप्त बड़े बन चुके हैं? क्या हम नेहरू जी का अध्ययन कर चुके हैं? क्या उनका इस देश के स्वाधीनता संग्राम में कोई योगदान नहीं है? क्या उन्होंने स्वतंत्रता के बाद इस देश को कुछ नहीं दिया?

नेहरू जी का मूल्यांकन करते समय इन प्रश्नों पर अवश्य विचार होना चाहिए, और अच्छे से विचार होना चाहिए। जब देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा था, और जब यह विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली देश का उपनिवेश था, उस समय नेहरू जी एक समृद्ध परिवार के उत्तराधिकारी थे।

उनका आनंद भवन आज भी उनकी समृद्धि की गाथा गाता है। वह आनंद भवन उनके पिता और पुत्री ने देश को दे देने में जरा भी संकोच नहीं किया। नेहरू जी ने अपने पिता द्वारा इतनी बड़ी संपत्ति कांग्रेस को देने पर कभी विरोध नहीं किया। (परिशिष्ट)

उन्होंने विदेश से पढ़ाई की, सीधे उच्च न्यायालय से प्रैक्टिस शुरू की लेकिन उसी वर्ष १९१२ में उन्होंने अपना जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया। २३ वर्ष की उम्र! और राष्ट्र के लिए यह समर्पण! क्या उनकी देशभक्ति पर प्रश्न उठाना देशभक्ति है?

और हमें यह भी याद रखना होगा कि उस समय की राजनीति आज की तरह सत्ता और धन के लिए नहीं थी। उस समय कांग्रेस में सम्मिलित होने का अर्थ था, जेल आंदोलन अंग्रेजों का विरोध और घर की बर्बादी। और उद्देश्य: एकमात्र देश की स्वाधीनता।

पंडित नेहरू नेता सुभाष चंद्र बोस को अत्यंत प्रिय थे। 1939 के पुनर्निर्वाचन में नेहरू ने बोस का सक्रिय समर्थन नहीं किया, पर वे उनके कट्टर विरोधी भी नहीं थे। उन्होंने चुनाव के बाद कांग्रेस की एकता बनाए रखने और बोस-गांधी समझौते का प्रयास किया। नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने नेहरू ब्रिगेड नाम क्यों रखा था? केवल सतही स्तर पर इतना समझ लेना भी नेहरू और बोस के प्रेम को समझने के लिए पर्याप्त होगा। (परिशिष्ट)

वह पंडित नेहरू ही थे जिन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को सत्ता के केंद्र में रखा। उन्होंने अपनी पुत्री के स्थान पर शास्त्री जी को दीर्घकाल के लिए राजनैतिक संरक्षण और विश्वास दिया, उन्हें प्रांतीय नेता से राष्ट्रीय नेता बनाया। आज हम सबके चहेते प्रधानमंत्री शास्त्री जी नेहरू के कारण उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन गए। (परिशिष्ट)

पंडित नेहरू के प्रति मेरी अटूट श्रद्धा वैसी ही है जैसी किसी और राष्ट्रभक्त महापुरुष के प्रति। यह तो केवल कुछ छोटे उदाहरण हैं जो उनके विषय में फैलायी जा रही सोशल मीडिया भ्रांतियों के विरुद्ध टिककर सोचने के लिए एक आधार देती हैं।

उनकी नीतियों की आलोचना हो सकती है, विशेषकर उनके चीन युद्ध की तैयारियों को लेकर, लेकिन इतिहास का यह मूल्यांकन इतिहास के उस बिंदु पर खड़े रहकर करना होगा। औए मूल्यांकन से कोई अछूता नहीं रहता। लेकिन एक बिंदु किसी के सर्वस्व को नष्ट नहीं कर सकता।

परिशिष्ट:
१. नेहरू परिवार का पुराना घर स्वराज भवन (जो पहले आनंद भवन कहलाता था)। पंडित मोतीलाल नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लगभग 1930 में समर्पित कर दिया था। इसके बाद नए बने घर का नाम आनंद भवन रखा गया। वर्तमान आनंद भवन को बाद में इंदिरा गांधी ने नवंबर 1970 में राष्ट्र को समर्पित किया और इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया।

२. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इंग्लैंड के इनर टेम्पल (Inner Temple) में कानून की पढ़ाई की। वे 1912 में बार-एट-लॉ (Barrister-at-Law) बने और उसी वर्ष भारत लौटकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। सार्वजनिक जीवन (राजनीति) में उनका प्रवेश भी लगभग इसी समय शुरू हो गया। भारत लौटने के बाद वे 1912 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बांकीपुर अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। बाद के वर्षों में उनका राजनीतिक जुड़ाव बढ़ता गया और 1919 के होम रूल आंदोलन तथा 1920 के असहयोग आंदोलन के दौरान वे पूर्णकालिक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे।

३. 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष नेता जी ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया और उसके अध्यक्ष के रूप में नेहरू जी को नियुक्त किया।
1939 में बोस और कांग्रेस नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद हुए, जिसके परिणामस्वरूप बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। इसके बावजूद नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने रहे और समिति का कार्य आगे बढ़ाते रहे। 1939 में नेहरू द्वारा बोस को लिखे पत्रों में भी वे समिति के कार्य का उल्लेख करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे उससे अलग नहीं हुए थे।

४. लाल बहादुर शास्त्री को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र में लाने की प्रक्रिया धीरे-धीरे हुई, लेकिन निर्णायक मोड़ 1951–52 में आया।
1951 में जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) का महासचिव बनाया। शास्त्री ने 1951-52 के पहले आम चुनावों के संगठन और प्रत्याशी चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1952 में, जबकि वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रभावशाली मंत्री थे, नेहरू ने उन्हें राज्य में न रखकर दिल्ली बुलाया और अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल में रेल एवं परिवहन मंत्री बनाया। इसे शास्त्री को राष्ट्रीय नेतृत्व की पंक्ति में लाने का सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
इसके बाद नेहरू ने उन्हें लगातार महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए—रेलवे, परिवहन एवं संचार, वाणिज्य एवं उद्योग, और अंततः गृह मंत्रालय। इससे उनका कद कांग्रेस और सरकार दोनों में बढ़ता गया।
1964 में नेहरू की तबीयत खराब होने पर उन्होंने शास्त्री को बिना विभाग के मंत्री के रूप में फिर मंत्रिमंडल में लाकर अपने निकटतम सहयोगियों में रखा।

५. 1939 के कांग्रेस अध्यक्षीय चुनाव (त्रिपुरी संकट) में नेहरू जी की भूमिका जटिल थी। वे न तो पूरी तरह नेता जी के साथ खड़े हुए, न ही गांधीवादी खेमे के सक्रिय चुनाव-प्रबंधक बने।
५.1. नेहरू ने बोस की उम्मीदवारी का खुला समर्थन नहीं किया। गांधीजी और उनके निकट सहयोगी पट्टाभि सीतारमैया को उम्मीदवार बनाना चाहते थे। नेहरू बोस की कई नीतियों से सहानुभूति रखते थे, लेकिन वे गांधीजी से टकराव के पक्ष में नहीं थे।
५.2. नेहरू गांधी खेमे के साथ रहे, लेकिन बोस-विरोधी अभियान के प्रमुख नेता नहीं बने। कांग्रेस कार्यसमिति के कई सदस्य बोस के पुनर्निर्वाचन के विरुद्ध सक्रिय थे, जबकि नेहरू अपेक्षाकृत मध्यस्थ भूमिका में रहे।
५.3. बोस की जीत के बाद नेहरू ने समझौता कराने का प्रयास किया। जब बोस चुनाव जीत गए और कांग्रेस में संकट गहरा गया, तब नेहरू ने दोनों पक्षों के बीच मेल-मिलाप की कोशिश की। बाद में उन्होंने बोस से इस्तीफा वापस लेने की अपील भी की थी।
५.4. नेहरू बोस की कुछ बातों से सहमत थे, पर उनकी रणनीति से नहीं। दोनों समाजवादी झुकाव रखते थे, लेकिन यूरोप की परिस्थितियों, कांग्रेस संगठन और स्वतंत्रता संघर्ष की रणनीति पर उनके मतभेद थे।
संक्षेप में, 1939 के पुनर्निर्वाचन में नेहरू ने बोस का सक्रिय समर्थन नहीं किया, पर वे उनके कट्टर विरोधी भी नहीं थे। उन्होंने चुनाव के बाद कांग्रेस की एकता बनाए रखने और बोस-गांधी समझौते का प्रयास किया।

६. 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष Subhas Chandra Bose ने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया और उसके अध्यक्ष के रूप में नेहरू जी को नियुक्त किया।
1939 में बोस और कांग्रेस नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद हुए, जिसके परिणामस्वरूप बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
इसके बावजूद नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने रहे और समिति का कार्य आगे बढ़ाते रहे। 1939 में नेहरू द्वारा बोस को लिखे पत्रों में भी वे समिति के कार्य का उल्लेख करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे उससे अलग नहीं हुए थे।

माधव कृष्ण, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल


सक्षमता पास शिक्षकों को भी CTET/ TET पास करना जरूरी सुप्रीम कोर्ट

सक्षमता पास शिक्षकों को भी CTET/ TET पास करना जरूरी ।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश ।

अब शिक्षकों को नौकरी बचाने के लिए सीटीईटी या टीईटी पास करना जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर उनकी नौकरी खत्म हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी शिक्षकों सीटीईटी या टीईटी पास करने का निर्देश दिया है। बिहार के लगभग 2.60 लाख शिक्षक इस वक्त 'रडार' पर हैं, जिन्होंने अब तक ये दोनों परीक्षाएं पास नहीं की हैं।

जिन शिक्षकों की उम्र 55 वर्ष से अधिक है, उन्हें नौकरी से तो नहीं निकाला जाएगा, लेकिन उनकी तरक्की के रास्ते बंद हो जाएंगे। बिहार के ऐसे 60 हजार शिक्षकों को न तो प्रधानाध्यापक बनने का मौका मिलेगा और न ही अनुभव का लाभ। उन्हें नौकरी बचाने के लिए मिली छूट उनके करियर की ग्रोथ को फ्रीज कर देगी। 15 वर्ष पहले ही शिक्षकों के लिए टीईटी और सीटीईटी परीक्षा की वैधता अनिवार्य कर दिया गया था। 29 जुलाई 2011 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने स्पष्ट किया था कि सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को टीईटी पास करना अनिवार्य है। यह शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता है। इसके बाद विभिन्न राज्यों में टीईटी के साथ ही सीटीईटी की परीक्षा शुरु की गई थी। टीईटी परीक्षा पास होने के बाद अभ्यर्थी केवल अपने स्कूल में ही नियुक्त युक्त हो सकते है। जबकि, सीटीईटी परीक्षा पास होने के बाद वे देश के सभी सरकारी स्कूलों में नियुक्त हो सकते है। सीटीईटी परीक्षा पास होने के बाद अभ्यर्थी अपने राज्यों में स्थित सरकारी स्कूलों के साथ ही केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, दिल्ली स्कूल सहित अन्य स्कूलों में नियुक्ति हो सकती है। शिक्षा मंत्री ने साफ किया है कि नियुक्तियां नियमों के मुताबिक ही होंगी। दूसरी तरफ, बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के सचिव आनंद मिश्रा ने इसे गलत ठहराया है। उनका कहना है कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर नए नियम थोपना अन्याय है।

सिर्फ 3 मौके, 2028 आखिरी डेडलाइन

शिक्षकों के पास खुद को साबित करने के लिए अब बहुत कम समय बचा है। सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त 2028 तक का अल्टीमेटम दिया है। बिहार में अपनी टीईटी परीक्षा नहीं होने के कारण शिक्षकों के पास अब केवल सीटीईटी का ही विकल्प है। साल 2025 की परीक्षा का मौका हाथ से निकल चुका है, अब 2027 और 2028 के रूप में तीन मौके ही शेष हैं।

कुल शिक्षकः 5.80 लाख संकट मेंः 2.60 लाख बुजुर्गः 60 हजार प्रमोशन पर रोक
स्तोत्र समाचार पत्र




शुक्रवार, 12 जून 2026

मासूम भांजे का गला रेतने वाले जल्लाद मामा को फांसी- जज शक्ति सिंह जी

गाजीपुर कोर्ट में जज शक्ति सिंह जी की चर्चा हर तरह लोग यही बोल रहे है जज हो तो शक्ति सिंह जी जैसा👇
गाजीपुर कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मासूम भांजे का गला रेतने वाले जल्लाद मामा को फांसी, जज ने तोड़ी पेन की निब!

अदालत में पूछा गया- "छोड़ दिया तो क्या करोगे?"... हत्यारे ने कहा- "जो उलझेगा, उसे भी मार दूंगा", फिर सुनाई गई मौत की सजा

गाजीपुर। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की अदालत ने चार वर्षीय मासूम दानियाल उर्फ अदनान की निर्मम हत्या के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दोषी मामा *अमजद खान* को फांसी की सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश शक्ति सिंह की अदालत ने इस जघन्य अपराध को "दुर्लभतम से दुर्लभ" श्रेणी का मानते हुए दोषी को मौत की सजा दी। फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश ने परंपरा के अनुसार अपने पेन की निब भी तोड़ दी।

कोर्ट में दिखी हैवानियत, नहीं था कोई पछतावा

सजा सुनाए जाने से पहले अदालत ने दोषी अमजद खान से पूछा कि यदि उसे छोड़ दिया जाए तो वह क्या करेगा। इस पर उसने निर्भीकता से जवाब दिया, "अगर कोई मुझसे उलझेगा तो मैं उसकी भी हत्या कर दूंगा।"

जब अदालत ने पूछा कि क्या उसे अपने किए पर पछतावा है, तो उसने साफ शब्दों में कहा, *"बिल्कुल नहीं।"* दोषी के इस रवैये को देखते हुए अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई और आदेश दिया कि उसे तब तक फांसी पर लटकाया जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।

मामूली विवाद में मासूम की ले ली थी जान

यह हृदयविदारक घटना 21 अक्टूबर 2021 को दिलदारनगर क्षेत्र के बारा गांव में हुई थी। चार वर्षीय दानियाल अपनी मां शबाना नाज के साथ ननिहाल आया हुआ था। इसी दौरान किसी बात को लेकर शबाना और उसके भाई अमजद खान के बीच विवाद हो गया।

गुस्से में आगबबूला अमजद ने अपने ही सगे भांजे पर धारदार चाकू से हमला कर उसका गला रेत दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मासूम का सिर गर्दन से मात्र कुछ इंच ही जुड़ा रह गया था। मां ने अपनी आंखों के सामने बेटे को तड़पते हुए दम तोड़ते देखा।

सगे भाई-बहनों की गवाही बनी सबसे बड़ा सबूत

घटना के बाद मृतक के चाचा अरबाज खान ने हत्या का मुकदमा दर्ज कराया। सुनवाई के दौरान कुल 9 गवाहों ने अदालत में बयान दिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि आरोपी की तीन सगी बहनों और एक सगे भाई ने भी न्याय के पक्ष में खड़े होकर उसके खिलाफ गवाही दी।

इन्हीं मजबूत साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर अदालत ने अमजद खान को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई।

जज बोले- क्रूरता की सारी हदें पार हो गईं

फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश शक्ति सिंह ने कहा कि चार साल का बच्चा दुनिया की भलाई और बुराई से पूरी तरह अनजान था। उसके साथ जो हुआ वह अमानवीयता और क्रूरता की पराकाष्ठा है। एक मां के सामने उसके बच्चे की हत्या कर दी गई, जिसका दर्द शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

इकलौते बेटे को याद कर रो पड़ा पिता

फैसले के बाद दानियाल के पिता भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि दो बेटियों के बीच दानियाल उनका इकलौता बेटा था और उसकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने बताया कि बाद में उनके घर एक और बेटे का जन्म हुआ, लेकिन दानियाल की याद आज भी उन्हें हर पल रुलाती है।

अदालत के इस फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने राहत की सांस ली है और इसे न्याय की बड़ी जीत बताया है।


गुरुवार, 11 जून 2026

बेसिक शिक्षा विभाग अब बड़े स्तर पर परिषदीय विद्यालयों में 60000 शिक्षकों की भर्ती की तैयारी


उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग का ई-अधियाचन पोर्टल क्रियाशील होने के बाद राज्य में शिक्षक भर्ती प्रक्रिया तेज हो गई है। बेसिक शिक्षा विभाग अब बड़े स्तर पर परिषदीय विद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती की तैयारी में जुट गया है। विभाग के अनुसार, विभिन्न विद्यालयों में कुल करीब 60,000 पद रिक्त हैं, जिनमें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्र शामिल हैं।

इनमें से नगर क्षेत्र के विद्यालयों में 11,508 पद खाली हैं, जिनकी समेकित जानकारी आयोग को ऑफलाइन भेज दी गई है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 48,000 पद रिक्त बताए जा रहे हैं, जिनका विवरण तैयार कर ऑनलाइन पोर्टल पर भेजने की प्रक्रिया चल रही है।

गौरतलब है कि शिक्षा सेवा चयन आयोग पहली बार परिषदीय शिक्षकों की भर्ती परीक्षा आयोजित करेगा। इससे पहले यह जिम्मेदारी परीक्षा नियामक प्राधिकारी (PNP) के पास थी। अब नई व्यवस्था के तहत भर्ती प्रक्रिया को और पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने की तैयारी की जा रही है।

विभाग रिक्त पदों का पूरा डेटा तैयार कर रहा है और नियमावली में भी संशोधन किया जा रहा है। जैसे ही सभी अधियाचन ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड होंगे, भर्ती प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ाई जाएगी।

कुल मिलाकर यह भर्ती प्रदेश के हजारों अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ा अवसर मानी जा रही है, खासकर उन उम्मीदवारों के लिए जो लंबे समय से शिक्षक भर्ती का इंतजार कर रहे हैं।

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शुक्रवार, 5 जून 2026

आने वाले समय में बहुत सारी लड़कियां शादी नहीं करेगी..।

आने वाले समय में बहुत सारी लड़कियां शादी नहीं करेगी..। 

यहां की शादी व्यवस्था वो नरक है जिसमें पढ़ा लिखा कर अपनी जवान बेटी दूसरों के घर दो और बहुत सारा पैसा भी दो..! 

लड़की कमाती है तो भी, नहीं कमाती है तो भी...! कितना बकवास सिस्टम है ये..।

बेटियों को जिस दिन पिता की संपत्ति में बराबर का हक़ मिलने लग जायेगा ( धरातल पर, सिर्फ कानून में नहीं) उस दिन ऐसे लड़कियों का मरना बंद हो जाएगा..। 

अपने बाप के घर वापिस जाने पर उसे ये नहीं लगेगा कि भाई भाभी या समाज क्या कहेगा..! 
उसे पता होगा अपने हिस्से के घर जा रही हूं वापिस..! 
उस दिन वो अपने बाप भाई का वेट भी नहीं करेगी कि वो लेने आए ससुराल से तब ही जाऊंगी...! 
नहीं रखा ससुराल या पति ने ढंग से तो खुद ही चली जाएगी..! 

ये हत्या/ आत्महत्याएं इसलिए हो रही है कि लड़कियों के पास लौटकर जाने को घर नहीं है..। 
पति चाहेगा तो ही ससुराल रह सकती है, उधर पिता माता चाहेंगे तो ही मायके रह सकती है..। खुद का चाहना कुछ है ही नहीं..। 

लड़की का घर होना सबसे ज्यादा जरूरी है..। अभी हम यहीं तक पहुंच पाए है कि लड़कियों को पढ़ा दे, नौकरी करने दे..। अभी बहुत जरूरी जो है वो ये कि उनका घर भी हो..। पिता से मिला घर (घर में हिस्सा)..। जैसे लड़कों को मिलता है..। 

लड़कों को कभी इस समस्या से नहीं  गुजरना पड़ता कि किसी और के घर जाना है, अपने फ्रेंड्स, कंफर्ट जॉन, पेरेंट्स , सिबलिंग्स......सब छोड़कर..। 
इसमें लड़कों का दोष नहीं, व्यवस्था का है..। 

इस व्यवस्था में वही लड़कियां कामयाब हो रही जिनको रणनीति आती हैं, इस सिस्टम में एडजस्ट होने की, या लाभ लेने की..। जिनकी संख्या बहुत कम हैं..। 

साधारण लड़कियों को वर्षों लग जाते नए घर, लोगों के बीच एडजस्ट होने में..। 

" पहले परिवार छोड़ना पड़ेगा, फिर फ्रेंड्स फिर करियर कॉम्प्रोमाइज और फिर मदरहुड... इतने चैलेंज के बाद कोई इंसान,  कितना ही ओरिजिनल पर्सनेलिटी में जी पाएगा..  ये सब समझ पाने के लिए ही फेमिनिज्म की जरूरत है..। "