मंगलवार, 12 मई 2026

मेरी माँ मेरा बचपन मेरा सामाजिक जीवन मेरा साहित्यिक संसार मेरी एक दुनियां एवं मेरे जीवन के विविध आयाम - लेखक राजेश श्रेयस

मेरी माँ....मेरा बचपन....मेरा सामाजिक जीवन..मेरा साहित्यिक संसार.. मेरी एक दुनियां एवं मेरे जीवन के विविध आयाम ।
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साहित्य और अध्यात्म की बेल कहीं न कहीं से मेरे मन में, मेरी माँ के द्वारा ही विरोपित की गई थी । उनकी ( माँ ) यह अभिरुचि कब मेरी अभिरुचि बन गई यह नहीं कह सकता लेकिन मैंने बचपन मे अपने माँ के सानिध्य में रहते हुए इस चीज को तो अवश्य महसूस किया था कि पढ़ना,आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होना और उसके अनुरूप अपने जीवन में उसे उतारना, हमारे संस्कारों की यात्रा है । जहाँ तक मैं जब इस वीडियो को आपको दिखा रहा था तो वीतराग महात्मा श्री श्री 1008 श्री स्वामी स्वतंत्रतानंद जी महाराज द्वारा रचित तत्वदर्शनी गीता टीका की पवित्र पुस्तक मेरे हाथ में थी और मैं जो बात मै कर रहा था और जिस श्री सूर्य नारायण सिंह की बात कर रहा था, वह कोई और नहीं थे, वे मेरे नाना जी थे और मेरे नाना जी के संस्कार और उनकी रुचि और उनके जीवन जीने की शैली इस सब का प्रभाव मेरी माँ पर पड़ा और माँ के बाद शायद मुझे लगता है कि ये सारी चीजे इस तरह से नीचे उतर कर चली आयीं । मेरा बचपन माँ के साथ बीता तो मुझे लगता है कि जो कुछ भी मैं आज लिखता हूँ या अपनी कलम चलाता हूँ तो उस साहित्य में आध्यात्मिक पुट और अध्यात्मिक दर्शन जो दर्शन होते हैं,वह सब बचपन में माँ के सानिध्य में उसके द्वारा पढ़े गए गीतों, भजन, श्रीमद् भागवत गीता के प्रति उसकी आकर्षण रामायण, नारी कल्याण, श्री रामचरितमानस, श्री राधेश्याम रामायण आदि का वाचन यह सब कुछ, मुझे अपने माँ से मिला। आज संयोग से मातृ दिवस है मातृ दिवस के इस अवसर पर मैं अपनी पूज्यनीया मां को प्रणाम करता हूँ ।
एक वार्ता के दौरान डॉ.शिवम तिवारी ने जब मुझसे पूछा , या एक लंबी प्रश्नावली के माध्यम से मेरे मार्गदर्शक साहित्यिक प्रेरणा स्रोत डॉ. महेश दिवाकर जी ने जब यह जानना चाहा था कि मेरे अंदर यह साहित्य कहाँ से आया, तो मैंने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि आज मेरा साहित्य जो कुछ भी है वह मेरी माँ के कारण ही है। यह मेरी माँ में कहां से आया तो वह उसका पूरा श्रेय मेरे नाना जी तक जाता है । मेरा ननिहाल उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया के तहसील रुद्रपुर के सन्नीकट ग्राम अकटहा में है , जो श्रीनेत वंशीय ( सूर्यवंशी) क्षत्रियों का गांव है।
मेरा जन्म संवरा बलिया में हुआ जहाँ हमारी पारिवारिक विरासत थी । यहां पर खेती-बारी, अध्ययन अध्यापन, के साथ-साथ कुश्ती पहलवानी या फिर सामाजिक रूप से अपने रुतबे को एक ऐसे आदर्श के रूप में रखने की परंपरा थी, जिसकी सुगंध कोसों तक जाए। यानि परिवार का संस्कार इतना उच्च हो कि उसे और उस परिवार को कई कोसो तक लोग जाने । कुछ ऐसी ही परंपरा का परिवार मेरे गांव का परिवार था । मेरे बाबाजी और विशेष रूप से मेरे छोटे चाचा जी श्री उदय शंकर सिंह जो हमारे गांव संवरा के अट्ठारह वर्षो तक प्रधान रहे, उनकी जीवन शैली और उनके कार्य करने की पद्धति और मेरे ननिहाल पक्ष की संस्कृति कुछ अलग थी।

इन दोनों संस्कारों और संस्कृतियों का प्रभाव मैं कहीं न कहीं अपने जीवन में पाता हूँ । मेरे भीतर जो सामाजिकता है वह मुझे मेरे परिवार यानी मेरे पिताजी के पक्ष से मिला, जहां हर छोटे बड़े तबके के लोगों के साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हुए सब की भावनाओं का आदर करते हुए, सब के दुख सुख में भागीदारी करते हुए, अपने को स्थापित किया जाता है यह सब मुझे अपने पितृ पक्ष यानी अपने पिताजी के परिवार से मिला, पूर्वजों के समय में शायद हमारे परिवार में एक मलिकार बाबा होते थे उनके पास ऐसे संस्कार थे और फिर यदि अपनी पीढ़ी में कहें तो मुझे थोड़ा बहुत जो सीखने को मिला यह मुझे मेरे अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला।

यदि मैं बौद्धिक ज्ञान की बात करूं तो बौद्धिक ज्ञान मुझे अपने चाचा श्री शिवशंकर सिंह श्री शिवजी सिंह से मिला और सामाजिक ज्ञान अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह से मिला । मेरे छोटे चाचा श्री उदयशंकर सिंह जी जैसा व्यक्तित्व का व्यक्ति बिरले,ही पैदा होते हैं यह मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूं ।

 अपने परिवार के दो संस्कारों की अगर बात करे तो हमारा परिवार में जो कि एक कलचुरी बंशीय क्षत्रिय परिवार है, इसमें आदर करने का भाव जबरदस्त था । हमारे परिवार में ब्राह्मण के प्रति बहुत सम्मान था और ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय होते थे। हमें ब्राह्मण का कितना सम्मान करना चाहिए, किस प्रकार करना चाहिए इसका ज्ञान मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जी से मिला। यही कारण है कि मेरे मन में भी ब्राह्मण एवं गुरुजनों के प्रति असीम स्नेह है ।

 होली जैसे त्योहारों पर पंडित जी को आदर के साथ अपने घर बुलाना, उन्हें बैठना, उनको प्रसाद ग्रहण कराना और फिर उनको विदा करना, ये सारे संस्कार, मेरे चाचा शिवजी सिंह से मिले थे।
 वही समाज के हर एक वर्ग के प्रति चिंता करना, उनके दुख दर्द को महसूस करना,उनकी मदद करना, हर छोटे -बड़े गरीब अमीर के घर जाना,जाति बिरादरी के विभेद से दूर होकर, सबकी मदद करना, और सबका प्रिय होना, यह सामाजिक ज्ञान मुझे अपने सबसे छोटे जैसा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला ।
 उनके आहाते में कौन व्यक्ति कहाँ का है,  किस बिरादरी का है, किस गांव का है,कितने लोग बैठे हुए हैं,यह समझ पाना और सबको एक साथ, लेकर चलना उनसे सीखा जा सकता था। 
 छोटी-छोटी गतिविधियों और क्रियाकलाप हमारे संस्कारों को परिवार को श्रेष्ठता प्रदान करती है । उदाहरण  स्वरूप, मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जब रोड से घर की तरफ चलते थे तो उस समय उनके पाकेट में कुछ चॉकलेट,कुछ सिक्के हुआ करते थे । गाँव छोटे-छोटे बच्चे जो छोटे -छोते घरों से, हर तपके के लोगों के बच्चे होते थे जिनकी उम्र यही 2 साल 3 साल 4 साल 5 साल 6 साल होती थी वह उनके पास आते थे,  उनको पैर छु कर प्रणाम करते थे, वे उनको एक टॉफी देते थे, या पैसे पढ़ते थे या आशीर्वाद दे देते थे । वे सबसे मिलते हुए चलते थे ।इस प्रकार वे बच्चों के भी लोकप्रिय थे ।

 गांव के किसी भी जाति बिरादरी उच्च नीच,अमीर गरीब किसी के घर में जब शादी होती थी तो शादी में  बेटी के अंतिम सिंदूरदान तक रुकना, सारे  ब्राह्मणजन और पौनी जन को दक्षिण दिलाना, बाहर से आए हुए किसी भी जाति बिरादरी के बाराती को बराती से ज्यादा अपने गांव का अतिथि समझ कर सम्मान देना,   मेरे चाचा की सबसे बड़ी विशेषता होती थी ।
 वहीं मेरे छोटे चाचा की मदद का तरीका कुछ और होता था किस रूप में शारीरिक या आर्थिक रूप से, कहां और कैसा मदद कर रहे हैं, यह कोई जान नहीं पता था लेकिन मदद तो करते थे, यही कारण था कि यह सारे लोग उनके मुरीद हो जाते थे । हर जाति और वर्ग के लोगो का प्रेम कैसे पाया जाता है, कोई उनसे सीखे ।

 शायद मेरे जीवन में भी इसका बड़ा प्रभाव रहा जब तक मैं जनपद बलिया में रहा हर छोटे-बड़े के दुख सुख में जाना और कौन बीमार है, किसको दवा की जरूरत,है किसको क्या मदद की जा सकती है,यह सब कुछ संस्कार मुझे मेरे अपने परिवार से ही मिला है ।अपने चाचा और अपने परिवार के इन्हीं संस्कारों का प्रभाव शायद मेरे व्यक्तित्व पर पड़ा होगा इसीलिए मैं मेरे मन में प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समाज के हर एक व्यक्ति के प्रति विशेष प्रेम अनुराग आज भी है । यदि मैं बहुत नजदीक जाकर अपने व्यक्तिगत जीवन को देखूं तो मेरे जीवन में मेरे भाई श्री चंदेश्वर प्रताप सिंह जिन्हें मैं पिता तुल्य मानता हूं उनका अपरोक्ष सहयोग सदैव मिला । वह मेरे लिए ध्वज दंड के स्वरूप है । जिस प्रकार एक दंड ( डंडा ) ध्वज के भीतर छिपा रहता है, ध्वज फहरता है । लेकिन वह ध्वज कहीं न कहीं उस दंड के सहारे ही फहरता है । 

 यदि सामाजिक प्रतिष्ठा की बात करें तो उम्र कम होने के बावजूद भी गांव के इर्द-गिर्द के सम्मानित लोगों के बीच बैठना,  उनसे बात करना, उनके प्रति अपने मन के आदर भाव को प्रदर्शित करना मेरा व्यक्तिगत स्वभाव होता था । आसपास के गांव के सम्मानित जान जिनकी उम्र मुझे काफी अधिक हुआ करती थी लेकिन वह भी हमसे बहुत प्रेम करते थे और हमारे मन में उनके प्रति बहुत आदर था । 

 विभाग और विभाग से जुड़े हुए लोग मुझसे बहुत प्रिय प्रेम करते थे। यह नहीं की जो फार्मासिस्ट है वही प्रेम करें, स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति बहुत स्नेह करता था । बलिया से स्वास्थ्य विभाग का कोई अधिकारी कर्मचारी कोई व्यक्ति जिसकी गाड़ी लखनऊ की तरफ, रसड़ा की तरफ या अन्य किसी तरफ जा रही हो और रास्ते में यदि संवरा चट्टी आ गई तो वह गाडी रुकती थी, वे लोग हमारे गांव की दुकान पर चाय पीते थे, और कहते थे कि यह किसका गांव है यह राजेश सिंह का गांव है । मैं उसे वक्त रहूं या ना रहूं श्याम लाल की दुकान तो रहेगी न,  धूमन तो रहेंगे न। यह सब कहीं ना कहीं मुझे समाज से जोड़ता था । मेरे नामौजूदगी में  बड़े भैया डॉक्टर शमशेर सिंह और मेरे और दूसरे भाई श्री कमलेश्वर प्रताप सिंह ( मुन्नू भईया,) जो अब इस दुनिया में नहीं रहे वे बिना कुछ समझे,केवल यह जान जाते थे कि मेरा परिचित कोई आ रहा है तो उसको वही आव भगत मिलता था जो मेरे रहने पर मिलता था । इस कार्य को मेरे भतीजे.डा पंकज कुमार सिंह, आज भी बाखूबी निभाते हैं।
 मुझे एक वाकया याद है एक बार श्री बीपी मिश्रा जी और मेरे यूनियन के महासचिव डा. के के सचान,बलिया एक दौरे पर जा रहे थे और मैं लखनऊ में था मैंने उनसे कहा कि बीच में मेरा गांव पड़ता है आप वहां रुक सकते हैं । वे लोग वहां रुके, और जिस प्रकार का आदर्श सम्मान उनको मिला उसकी चर्चा वे बाद तक करते रहे ।

 अभी विगत दिनों में गांव गया था और मैंने अपने गाड़ी का खलीलपुर की तरफ मोड़ दिया मेरी इच्छा थी कि उस पीढ़ी को जिस पीढ़ी के साथ हमने बहुत सीखा था, जिनमें से बहुत थोड़े लोग आज भी है उनसे मिलना और उनसे मिलकर बात करना मुझे अच्छा लगता है । मैं खलीलपुर पहुंच गया खलीलपुर के प्रधान जी श्री रमाशंकर सिंह जी घर पर थे गौरीशंकर सिंह जी से मुलाकात नहीं हो पायी । परिवार के बच्चे हमारे कुल पुरोहित चौबे जी, और परिवारजन वहां मौजूद थे, वास्तव बड़ी सुखद अनुभूति हो रही थी ।  या तो हमारे पिता पक्ष का प्रभाव था ।
 दूसरा पक्ष, मेरे ननिहाल पक्ष का है जहां पर शिक्षा, जीवन शैली, पहनावा वेशभूषा, बात करने की तौर तरीके, सब कुछ कहीं ना कहीं भिन्न थे, लेकिन यह सारे गुण मेरे भी अंदर कहीं न कहीं वहीं से आए । सबसे खास और विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष तो ननिहाल से ही आया। यानी मेरे साहित्य के पीछे कहीं न कहीं   मेरे ननिहाल पक्ष मेरे मेरे नाना जी का प्रभाव है ।

 आज वर्तमान में मैं जिस जिंदगी को जी रहा हूं या अपनी सेवा अवधि जहां समाप्त करने के मोड पर खड़ा हूं , यहां दो प्रकार के व्यक्तियों का समावेश रहा । दो प्रकार के बौद्धिक साथियों का साथ रहा जिसमें एक वर्ग फार्मासिस्ट है । राजकीय सेवा में आने के बाद में डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन से जुड़ गया और जनपद इकाई बलिया के डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन का अध्यक्ष 12 वर्षों तक रहा, प्रदेश उपाध्यक्ष रहा, प्रदेश संगठन मंत्री रहा।   आप इसे समझ सकते हैं कि फार्मासिस्टों के बीच मेरी पकड़, उनके साथ मेरा बात- व्यवहार किस हद तक कितना  था और वे लोग कितने मेरे प्रिय थे,यह मेरा दिल ही समझता है।  
 यद्यपि आजकल मैं  उस दिशा में उतना सक्रिय नहीं हूँ, यह यू कहिए कि मैं संगठन अभी काफी दूर हूँ और साहित्य एवं क्षय उन्मूलन प्रोग्राम के नजदीक हूँ । ऐसे में स्वाभाविक सी बात है कि क्षय उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े हुए मेरे प्यारे साथियों का सहयोग मुझे मिलता है उनसे बात करता हूँ साथ ही साथ साहित्य दुनिया से जुड़े हुए लोग भी मेरे मित्र हैं।  
 यदि मैं उत्तर प्रदेश की टीबी ड्रग टीम की बात करूं तो ड्रग टीम के जो जनपदों के साथी हैं, वह मेरे लिए कोई हमारे सरकारी विभाग में काम करने वाले साथियों के साथ जो संबंध है उसके कारण नहीं है।  उनके साथ मेरे संबंध आत्मिक एवं पारिवारिक संबंधों जैसे संबंध है ।  पिता पुत्र, भाई-भाई, मित्र जैसे संबंध है। जिसका कारण यह है कि वह मुझसे बात करना चाहते हैं,मैं उनसे बात करना चाहता हूं,वह मुझे देखना चाहते हैं,मै उनको देखना चाहता हूं,  वह मेरे पास रहना पसंद करते हैं, मुझे सुनना पसंद करते हैं यही सब सामाजिकता है । यही सब चीज आती तक याद की जाएगी सेवानिवृत्ति के बाद भी मेरे जेहन में बनी रहेगी मेरे साहित्य में बनी रहेगी मेरे कलम के साथ चलती रहेगी ।
 यदि मैं साहित्यिक दुनिया की बात करूँ तो साहित्य में श्री रामदेव धुरंधर जी जैसे अनेकों ऐसे साहित्यकार मेरे जीवन में आए जिन्होंने मुझे साहित्यिक कलम पकड़ा दी और आज जो कुछ भी लिख रहा हूँ या यह कहिए कि इस आलेख को ही यदि लिख रहा हूं तो इसके पीछे इन बड़े साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका है । इनकी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि मैं सबका नाम नहीं ले सकता, लेकिन मेरी कृतज्ञता उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में आधार है, जिन्होंने मुझे साहित्य ज्ञान एवं संबल प्रदान किया । 
 इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि विविध आयामों के साथ मेरी एक दुनिया है। जो अत्यंत दिव्य, भव्य और चीरकाल तक याद रखने वाली, दुनिया है।

सादर
©® राजेश श्रेयस


शनिवार, 9 मई 2026

माँ के होने का मतलब - लेखक डॉ अक्षय पाण्डेय गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

माँ के होने का मतलब
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दिनभर की भाग-दौड़ के बाद जब मन अपने भीतर के किसी शांत कोने की तलाश में भटकता है, तभी अचानक स्क्रीन पर एक तस्वीर उभर आती है- सोशल मीडिया की असंख्य सूचनाओं के बीच ठहरी हुई, पर भीतर गहरे तक उतर जाने वाली। पानी के अथाह विस्तार में एक माँ अपने बच्चे को बाँहों में भींचे हुए है। दोनों के शरीर पर लाइफ जैकेट है, मानो जीवन को बचाए रखने का अंतिम भरोसा। लेकिन उस दृश्य में सबसे अधिक प्रभावशाली जो है, वह यह कृत्रिम सुरक्षा नहीं, बल्कि वह आलिंगन है, माँ का वह अंतिम, अटूट, निरुपाय और फिर भी अदम्य आलिंगन।
पहली दृष्टि में यह एक दुर्घटना का दृश्य है, एक खबर, एक त्रासदी, जिसे लोग साझा कर रहे हैं, उस पर अपने शब्दों की श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे उस तस्वीर पर दृष्टि गहराती है, वह केवल एक घटना नहीं रह जाती; वह एक भाव-दर्शन में बदल जाती है। वहाँ कोई शोर नहीं है, कोई संवाद नहीं, कोई नाटकीयता नहीं, केवल एक माँ है, जो अपने बच्चे को ऐसे थामे हुए है, जैसे वह उसे जीवन के अंतिम किनारे तक पहुँचाना चाहती हो, भले ही स्वयं उस पार न जा सके। कितनी विचित्र विडंबना है- लाइफ जैकेट, जो जीवन बचाने का प्रतीक है, वही उस दृश्य में एक मौन प्रश्न बनकर खड़ी है। वह कहती है कि मनुष्य ने अपने लिए कितनी व्यवस्थाएँ कर ली हैं, कितने साधन जुटा लिए हैं, पर जीवन के सबसे निर्णायक क्षणों में जो सबसे बड़ा सहारा होता है, वह किसी उपकरण का नहीं, बल्कि एक भावना का होता है।और वह है माँ का प्रेम। वह प्रेम, जो किसी तकनीक से नहीं उपजता, किसी प्रशिक्षण से नहीं आता, बल्कि अस्तित्व की जड़ों में रचा-बसा होता है।
कल्पना कीजिए उस क्षण की, चारों ओर पानी का अनंत फैलाव, साँसों का टूटता हुआ क्रम, देह की सीमाएँ धीरे-धीरे जवाब देती हुईं। ऐसे में मनुष्य का स्वभाव है कि वह स्वयं को बचाने की चेष्टा करे। पर यहाँ एक माँ है, जो अपने अस्तित्व के अंतिम क्षण में भी स्वयं को नहीं, अपने बच्चे को प्राथमिकता देती है। उसकी बाँहें उस बच्चे के चारों ओर इस तरह कस जाती हैं, जैसे वह अपने भीतर की सारी शक्ति, सारी ऊष्मा, सारी चेतना उसी में स्थानांतरित कर देना चाहती हो। यह दृश्य केवल करुणा का नहीं, बल्कि विस्मय का भी है। क्योंकि यह हमें उस मूल सत्य के सामने खड़ा कर देता है, जिसे हम जानते तो हैं, पर अक्सर उसकी गहराई को समझ नहीं पाते; माँ का प्रेम स्वाभाविक नहीं, अलौकिक है। वह प्रकृति का एक ऐसा रहस्य है, जिसमें त्याग सहज हो जाता है, समर्पण स्वभाव बन जाता है, और 'मैं' का अस्तित्व 'तुम' में विलीन हो जाता है।
लोग उस तस्वीर को साझा कर रहे हैं- कोई लिखता है 'सलाम इस माँ को', कोई कहता है 'माँ महान है', कोई भावुक होकर आँसू की इमोजी लगा देता है। लेकिन क्या सचमुच इतने भर से उस दृश्य को समझा जा सकता है? क्या कुछ शब्द, कुछ वाक्य उस क्षण की गहराई को व्यक्त कर सकते हैं? शायद नहीं। क्योंकि वह क्षण भाषा की सीमा से बाहर है। वह अनुभव का वह प्रदेश है, जहाँ शब्द पहुँचते-पहुँचते थक जाते हैं। उस आलिंगन में एक इतिहास छिपा है,जन्म से लेकर उस अंतिम क्षण तक का इतिहास। वह वही माँ है, जिसने पहली बार उसे अपनी गोद में लिया होगा, उसकी पहली रोने की आवाज़ सुनी होगी, उसके पहले कदमों पर मुस्कुराई होगी, उसके हर दर्द को अपने भीतर महसूस किया होगा। और अब, उसी माँ की बाँहें उस बच्चे को वैसे ही थामे हुए हैं, बस अंतर इतना है कि अब यह आलिंगन विदा का है, एक अंतिम प्रयास का है।
यहाँ मातृत्व केवल एक भाव नहीं, एक तप है; एक निरंतर साधना, जो जीवन के हर मोड़ पर अपने को सिद्ध करती है। माँ अपने बच्चे के लिए जो करती है, वह किसी नियम, किसी कर्तव्य-बोध या किसी सामाजिक अपेक्षा से संचालित नहीं होता। वह एक सहज प्रवाह है, जैसे नदी का जल, जो बिना किसी आग्रह के बहता है, बिना किसी शर्त के देता है। और शायद यही कारण है कि जब ऐसी कोई घटना सामने आती है, तो वह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं रह जाती; वह समूची मानवता के भीतर एक कंपन पैदा कर देती है। हम सब अपने-अपने भीतर उस 'माँ' को याद करने लगते हैं, वह जो हमारे जीवन में है, या थी, या जिसकी स्मृति अब भी हमारे भीतर किसी दीप की तरह जल रही है।
यह तस्वीर हमें एक बार फिर उस मूल सत्य की ओर लौटाती है, जिसे हम अपने व्यस्त जीवन में कहीं पीछे छोड़ आए हैं कि मनुष्य होने का अर्थ केवल जीना नहीं, बल्कि किसी के लिए जीना है। और इस 'किसी' का सबसे शुद्ध, सबसे निस्वार्थ रूप 'माँ' है।
वह माँ, जो अपने बच्चे के लिए हर परिस्थिति में खड़ी रहती है, चाहे वह सुख का समय हो या दुःख का, चाहे वह उपलब्धि का क्षण हो या विफलता का। दुनिया के सारे संबंध समय के साथ बदल सकते हैं, परिस्थितियों के साथ ढल सकते हैं, पर माँ का संबंध एक स्थिर ध्रुव की तरह होता है, अपरिवर्तनीय, अडिग। इसलिए उस तस्वीर को देखकर केवल दुःख ही नहीं होता, एक गहरा सम्मान भी जागता है। वह सम्मान उस शक्ति के लिए है, जो इतनी सहजता से अपने को विसर्जित कर देती है। वह श्रद्धा उस प्रेम के लिए है, जो किसी भी सीमा को स्वीकार नहीं करता- न समय की, न परिस्थिति की, न जीवन और मृत्यु की। और तब, अनायास ही भीतर से पं.हरिराम द्विवेदी विरचित गीत का लोक-स्वर प्रस्फुटित होता-

माई अस केहू नाहीं माई, माई होले,
माई अँखियन में सुख कै ओहाईं होले।

ओकरा ममता मतिन कउनो ममता न बा,
जग में ओकर कतौं कउनो समता न बा,
उ सनेहिया के सीतल जोन्हाई होले।

यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि उस दृश्य का सार है, उस घटना का निष्कर्ष है। यह हमें बताता है कि माँ की तुलना किसी से नहीं की जा सकती, क्योंकि वह तुलना के दायरे से बाहर है। शायद इसीलिए, जब हम ऐसी घटनाओं के बारे में सोचते हैं, तो हमारे भीतर एक अजीब-सी शांति भी उतरती है- एक विश्वास कि इस संसार में अभी भी कुछ ऐसा है, जो शुद्ध है, जो सच्चा है, जो अविनाशी है। और वह है, माँ का प्रेम। वह प्रेम, जो जीवन के हर अंधकार में एक दीपक की तरह जलता है। वह प्रेम, जो हर संकट में एक सहारा बनता है। वह प्रेम, जो अंततः हमें यह सिखाता है कि मनुष्य होने का सबसे बड़ा अर्थ क्या है।
इस तस्वीर में एक माँ हारती हुई नहीं दिखती; वह अपने सबसे बड़े विजय-क्षण में दिखाई देती है, जहाँ उसने अपने अस्तित्व को अपने बच्चे के लिए समर्पित कर दिया। यह हार नहीं, यह प्रेम की पराकाष्ठा है। यह अंत नहीं, यह उस अमरता की शुरुआत है, जो केवल त्याग और ममता से जन्म लेती है। और शायद यही कारण है कि यह तस्वीर केवल एक घटना की स्मृति नहीं बनती, बल्कि एक शाश्वत प्रतीक बन जाती है, उस सत्य का, जिसे हम बार-बार देखते हैं, बार-बार महसूस करते हैं, और हर बार नए सिरे से स्वीकार करते हैं कि सचमुच,
इस दुनिया में माँ से बड़ा कोई नहीं।
०००

माँ के होने का मतलब
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दियाधरी, दरवाज़ा, खिड़की
छप्पर होता है,
माँ के होने का मतलब
पूरा घर होता है ।

चूल्हे से चौकठ तक माँ है
साँस-साँस बिखरी,
उसकी यादें जेठ-तपन में
नीर-भरी गगरी,
सबसे मीठा धरती पर
माँ का स्वर होता है ।

आँचल की छाया को छू ले
ऐसा ताप नहीं,
माँ के मन को माप सके
ऐसा परिमाप नहीं,
माँ की ममता से छोटा
भू-अम्बर होता है ।

ख़ुद रोती पर हमें
हसीं संसार सदा देती,
निराकार सपनों को माँ
आकार सदा देती,
माँ से बड़ा न पीर,औलिया
ईश्वर होता है ।
०००
- डॉ.अक्षय पाण्डेय
8887899462



मंगलवार, 5 मई 2026

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन श्री माधव कृष्ण ग़ाज़ीपुर

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन

हम किस पार्टी के समर्थक हैं, से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब लोकतंत्र का हाथी अंगड़ाई लेना शुरू करता है तो यह कहना कठिन होता है कि वह कहां जाकर बैठेगा। और इसे स्वीकार करना लोकतन्त्र है। तमिलनाडु में एक फिल्मी अभिनेता पहली बार चुनाव लड़ता है और जनता उसे हाथो हाथ ले लेती है। आप कैसे कहेंगे कि जनता मूर्ख है? इस अहंकार से मुक्त होने के लिए लोकतंत्र की जमीन की तरफ देखना होगा।

(१)
आज बात पश्चिम बंगाल की, और उस जमीन की जिसे मैंने अपनी बंगाल यात्रा के दौरान छूकर महसूस किया था! कोलकाता में मैं होटल ग्रैंड हयात में रुका था। फाइव स्टार होटल, फाइव स्टार क्षेत्र, लेकिन सामने सड़क की दूसरी तरफ अनधिकृत चॉल, बिल्कुल फुटपाथ पर। और एक या दो नहीं, लंबी चौड़ी कई किलोमीटर तक फैली हुई। हर चाल में कुछ कैरम खेलते लोग, फुटबॉल का छोटा सा मैदान और तृणमूल कांग्रेस का कार्यालय।

एक सप्ताह के अंदर कम से कम ३ जुलूस देखा जो उन चालों से निकलकर तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सड़कों पर चलता था। चाय पीने के लिए जब हम बाहर दुकानों पर जाते थे तो पता चलता था कि आमजन इन लोगों से कितने त्रस्त हैं! यहां पर वर्ग संघर्ष की बात नहीं है, क्योंकि ये बातें चाय की छोटी छोटी दुकानों पर होती थीं, ये बंगला भाषी सामान्य गरीब लोग थे। उनका कहना था कि ये लोग बांग्लादेश से आकर यहां बसाए गए हैं और उनकी विवशता है तृणमूल कांग्रेस को अपना समर्थन दिखाना रोज रोज।

(२)
श्रील चैतन्य महाप्रभु के नवद्वीप और नदिया का दर्शन करते समय हम लोग चम्पाहाटी गए। यह एक जंगल जैसा ग्रामीण क्षेत्र था। यहां चैतन्य महाप्रभु अपने प्रिय पार्षद गदाधर के साथ श्रीकृष्ण-चिंतन करने आते थे। वहां एक बड़ा सा मंदिर है। उस मंदिर के चारों तरफ इस्लाम मतावलंबी लोगों का गांव बसता जा रहा है। वहां के पुजारी जी ने बताया था कि इन लोगों को सरकार यहां लाकर बसा रही है।

समस्या इस्लाम से नहीं। भारत के मुसलमान हैं तो कहीं भी जाकर बस सकते हैं। लेकिन पुजारी जी ने बताया कि बांग्लादेश के मुस्लिमों को यहां बसाया जा रहा है। वे आए दिन परेशान भी करते हैं। जब हम वहां से निकल रहे थे तो हमने वहां एक बड़ा सा बोर्ड देखा, एक कार्यालय के बाहर। उस पर लिखा था, रिफ्यूजी सेटलमेंट कमिश्नर। अर्थात शरणार्थियों को बसाने वाले विभाग के आयुक्त। फिर हमें समझ में आया कि पुजारी जी सही कह रहे हैं और तृणमूल कांग्रेस की सरकार बड़े सुनियोजित तरीके से यह काम कर रही है।

(३)
कोलकाता में रहने वाली एक गाजीपुर की बिटिया ने अपने बेटी का एडमिशन केवल एक साल के लिए द प्रेसीडियम में करवाया। उनके पिता जी मेरे बड़े भाई के सदृश हैं। मैंने केवल एक साल का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि, उनकी कॉलोनी के किसी लड़के का बाहर के किसी मुस्लिम से झगड़ा हो गया। सिक्योरिटी होने के बावजूद अवैध कॉलोनी में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थी झुंड बनाकर उनकी कॉलोनी में आए और हर घर पर पथराव किया।

पुलिस ने कुछ नहीं किया। उनके पति इतने डर गए थे कि उन्होंने एक साल के लिए अपने परिवार को गाजीपुर में भेज दिया। उनकी नौकरी थी इसलिए वे नौकरी छोड़ नहीं सकते थे। ये तीन मेरे व्यक्तिगत अनुभव हैं लेकिन समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, चैनल में हमने जो कुछ सुना देखा है, यदि उसे गोदी मीडिया कहकर खारिज भी कर दें, तो आखिर क्या वहां से आ रहे दृश्य, वीडियो, मुर्शिदाबाद के दंगे, विस्थापन, मृत्यु के आंकड़े, क्या ये सब गलत हैं?

बहुत अच्छा हुआ कि केंद्र सरकार ने चुनावी हिंसा के कारण प्रदेश सरकार को बर्खास्त नहीं किया जबकि इसकी मांगें उठती रहीं। केंद्र सरकार यदि ऐसा करती तो वह जनभावनाओं के विपरीत होता और केवल अपने वोटबैंक की भावनाओं अनुकूल होता। लगभग ८० प्रतिशत सीटें जीतने के लिए यह आवश्यक था कि बंगाल का सामान्य जन समुदाय उस सरकार के कार्यों और नीतियों को अपनी आंखों से देख सके, कानों से सुन सकें और आत्मा से महसूस कर सके। भाजपा और संघ जमीनी लड़ाई लड़ते रहे, लोकतांत्रिक तरीकों से जमीन तलाश करते रहे और जनजागरण करते रहे।

पंद्रह वर्षों तक ममता सरकार के साथ खड़े रहने के बाद जनता को परिवर्तन की आवश्यकता महसूस हुई। मुझे पिछले चुनाव के समय, वागर्थ के संपादक शंभूनाथ जी के साथ हुआ अपना फेसबुकिया संवाद भी याद आ रहा है। चुनावी हिंसा के समर्थन में लिखे उनके एक पोस्ट पर मैंने प्रश्न किया कि, क्या आप इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं। उनका उत्तर था कि, तृणमूल वाले बैठकर केवल ताली तो नहीं बजाएंगे। जब मैंने उनसे पूछा कि, क्या वामपंथी हिंसक चरित्र को तृणमूल में अपनी हिंसा का विकल्प दिखाई दे रहा है?

उन्होंने मुझे ब्लॉक कर दिया और यही अनुभव मेरठ विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर विद्या सागर सिंह के साथ भी हुआ। उन्हें भी वागर्थ के माध्यम से संवाद, विमर्श और ऊंची बातें करने वाले शंभूनाथ जी ने असहज प्रश्नों पर ब्लॉक कर दिया। बहरहाल, इसी बहाने मेरी विद्यासागर सर से बौद्धिक मित्रता हो गई। और वागर्थ के संपादकीय की निरर्थकता समझ में आ गई। एक प्रसंग से कितने प्रसंग जुड़े रहते हैं! सब याद आ जाता है।

और आज, लोकतंत्र के हाथी के नृत्य का पर्व है। कुछ भी अकारण नहीं होता, हमें अपनी आंखों को खुला रखना होगा और खुद देखना होगा।

माधव कृष्ण, द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी बड़ी बाग लंका गाजीपुर